Wednesday, June 15, 2011

नीयत और नेतृत्व पर सवाल


कहावत है कि दूसरा खसम किया बुरा किया और उसे भी छोड़ दिया और बुरा किया। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की हालत कुछ ऐसी ही है। उसके रणनीतिकारों को समझ में नहीं आ रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते जनसमर्थन से कैसे निपटा जाए? मनमोहन सिंह की सरकार कभी अन्ना हजारे के खिलाफ मोर्चा खोलती है तो कभी उनसे बात करती है। बाबा रामदेव जैसे ही कहते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा जाए, उसके रणनीतिकारों की बांछें खिल जाती हैं। उन्हें लगता है कि अन्ना और उनकी टीम से लड़ाने के लिए उन्हें पहलवान मिल गया है। सो रामदेव के स्वागत में सरकार बिछी हुई नजर आती है। सरकार ज्यों-ज्यों दवा कर रही है उसका मर्ज बढ़ता जा रहा है। दरअसल सरकार मर्ज को समझे बिना उसके इलाज में लगी है। वह इस मुगालते में है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव को कठघरे में खड़ा करके लड़ाई जीत सकती है। आम लोगों की नजर में राजनीति और नेता भ्रष्टाचार का पर्याय बन गए हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी राजनेता की बात को लोग गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि इतने घोटाले सामने आने के बावजूद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कहीं नजर नहीं आ रही थी। कांग्रेस एक बड़ी लकीर खींचने की बजाय अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसी बड़ी लकीरों को छोटा करने में लगी हुई है। पार्टी में यह कोई नहीं सोच रहा है कि आखिर अन्ना हजारे या बाब रामदेव के साथ इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जुड़ रहे हैं? कांग्रेस की दिक्कतें कई हैं। पहली दिक्कत तो यह कि जितने भी घपले-घोटाले सामने आए हैं सब उसकी सरकार के हैं। अब उसमें कांग्रेसी शामिल हों या उसके घटक दल। दूसरी समस्या है-भ्रष्टाचार से निपटने में कांग्रेस और उसकी सरकार की निष्कि्रयता। सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से निपटने की बजाय उनका बचाव करती हुई नजर आ रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु से एक कला सीखी है-चुप रहना। उन्हें लगता है कि यह सबसे अच्छी शासनकला है। रामलीला मैदान में पुलिस की बर्बरता पर दो दिन बाद उन्होंने चुप्पी तोड़ी तो कहा कि कोई विकल्प नहीं था। विकल्पहीनता शासनकला और नेतृत्व की नाकामी का परिचायक है। कांग्रेस पार्टी का हाल और बुरा है। पार्टी और सरकार के पीछे की ताकत सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अक्सर पता ही नहीं होता कि सरकार ने अन्ना हजारे के साथ या बाबा रामदेव के साथ क्या किया? भट्टा-पारसौल में जाकर राहुल गांधी पूछते हैं कि अगर मायावती कुछ छिपाना नहीं चाहतीं तो वहां धारा 144 क्यों लगी है? पर वह दिल्ली में अपनी सरकार से यही बात नहीं पूछते। पार्टी का एक वरिष्ठ नेता जिसे ठग कहता है उसकेस्वागत में चार केंद्रीय मंत्री हवाई अड्डे क्यों गए? अन्ना हजारे और उनकी टीम की बातें अगर फासीवादी है तो ये लोग सरकारी समिति में क्या कर रहे हैं? भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आम लोगों की नजर में भाजपा की छवि कोई साफ-सुथरी नहीं है। बाबा रामदेव के साथ ही अन्ना हजारे को भी भाजपा-संघ के पाले में धकेलकर कांग्रेस ने उसकी मदद ही की है। देश की मुख्य विपक्षी पार्टी को भी सोचना चाहिए कि देश के ज्वलंत मुद्दों पर बहस अगर संसद की बजाय सड़क पर हो रही है तो यह उसकी नाकामी है। भाजपा की किस्मत से इस समय देश में कोई गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपा राजनीतिक ताकत नहीं है। मुख्य विपक्षी दल के नाते सरकार के खिलाफ बनने वाले माहौल का फायदा उसे ही मिलेगा। उन्हें पता है कि बाबा रामदेव और भाजपा-संघ का एजेंडा एक ही है। फिर भी सरकार ने रामलीला मैदान में जो किया उसके बाद बाबा का समर्थन करना उनकी मजबूरी थी, लेकिन कांग्रेस को अब भी समझ में नहीं आ रहा है कि दमन से जनभावनाओं को दबाया नहीं जा सकता। बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोलने के बाद अब सरकार अन्ना हजारे की टीम से छुटकारा पाना चाहती है। कांग्रेस पार्टी धीरे-धीरे अकेली पड़ती जा रही है। अन्ना के साथ देश का शहरी नागरिक समाज है तो बाबा के साथ गांव-देहात। जनसमर्थन के नजरिए से दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों के बीच की दूरी काफी हद तक मनमोहन सिंह की सरकार और उनकी पार्टी ने मिटा दी है। ये दोनों साथ चलें या अलग, कांग्रेस की परेशानी कम नहीं होने वाली है। कांग्रेस को इस बात की भी चिंता करना चाहिए कि इस पूरे प्रकरण में उसके सहयोगी दल मौन हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस की मदद के लिए आगे आकर राजनीतिक हाराकिरी तो करेंगे नहीं। यदि द्रमुक ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो मनमोहन सिंह के लिए पांच साल का कार्यकाल पूरा कठिन हो जाएगा। मनमोहन सिंह और कांग्रेस के लिए अच्छा यही होगा कि वे अन्ना और बाबा की बजाय भ्रष्टाचार से लड़ते हुए नजर आएं, क्योंकि आम लोगों के मन में सरकार की नीति, नीयत और नेतृत्व, तीनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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