Wednesday, June 29, 2011

कलह के दौर में उमा की वापसी के मायने


आखिरकार संघ की त्योरियां चढ़ने के बाद उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो ही गई। इसमें कोई दो मत नहीं कि जमीन से जुड़ी इस नेता की वापसी से पार्टी को न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देश की सियासत में भी फायदा हो सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में पहले से चल रही अंदरूनी कलह के बीच यह कहना मुश्किल है कि उमा भारती अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह बखूबी निभा पाएंगी। नितिन गडकरी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह ऐलान किया था कि पार्टी छोड़कर जा चुके लोगों की वापसी होगी, लेकिन गुटबाजी के चलते उनकी यह घोषणा केवल बयानों में दर्ज होकर रह गई। उमा भारती की वापसी को लेकर पार्टी में पिछले कई सालों से चर्चा होती रही, लेकिन आपसी खींचतान के चलते उनकी वापसी पर अडं़गा लगाने वालों की कमी नहीं रही। मध्य प्रदेश भाजपा से लेकर आरएसएस तक में भी एक दो लोग ऐसे थे, जिन्हें यह लगता था कि अगर उमा भारती की वापसी हो गई तो उनके कई सिपहसालारों को नुकसान हो सकता है। बात चाहे पार्टी अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की हो या फिर मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी की, अनुशासनहीनता और गुटबाजी के पीछे पार्टी का कमजोर नेतृत्व ही जिम्मेदार रहा है। उमा भारती को भले ही दिसंबर 2005 में अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन अनुशासनहीनता और गुटबाजी के दूसरे कई मामलों पर पार्टी नेतृत्व आंखें मूंदे रहा। जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता हाशिए पर आते गए और टेलीविजन चैनलों पर बौद्धिक उछल-कूद के खेल में माहिर कई नेता अपनी ही पार्टी के लोगों के बीच शह और मात का खेल खेलते रहे। इन नेताओं का न तो किसी प्रदेश की राजनीति में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन से लेना-देना रहा और न ही केंद्रीय राजनीति में ही ये लोग कोई कमाल दिखा सके। लेकिन 11 अशोक रोड पर ऐसे ही चेहरे चमकते दिखाई दिए। आंतरिक लोकतंत्र का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मुखौटा कहने पर केएन गोविंदाचार्य को पार्टी से निष्कासित कर दिया था तो दूसरी तरफ झारखंड में भ्रष्टाचार का मसला उठाने वाले बाबूलाल मरांडी की बात को पार्टी ने अनसुना कर दिया था। पूर्व सांसद यदुनाथ पांडे को झारखंड में पार्टी का राज्य अध्यक्ष नियुक्त करने के फैसले पर बाबूलाल मरांडी ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। मरांडी का कहना था कि इस फैसले में पार्टी ने उनसे और प्रदेश के कई नेताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। आखिरकार मरांडी ने बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया तो अगस्त 2009 में शिमला में हो रही भाजपा की चिंतन बैठक में जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उस वक्त राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। जसवंत सिंह को निकाले जाने का ऐलान करते वक्त राजनाथ सिंह के हाव-भाव कुछ इस तरह के थे, जैसे कोई शख्स अगर अपने ताकतवर पड़ोसी से नहीं लड़ सके तो अपने बच्चे का कान उमेठकर ही सारा गुस्सा निकाल दे। यह बात अलग है कि 25 जून 2010 को जसवंत सिंह की फिर से पार्टी में वापसी हो गई। दरअसल, बात उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य या फिर जसवंत सिंह को निकाले जाने या फिर उनके पार्टी छोड़कर जाने की नहीं, बल्कि किसी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की है। उमा भारती ने पार्टी पर ऑफ द रिकॉर्ड प्रेस ब्रीफिंग करने का आरोप लगाया था, लेकिन आज तो ऑन रिकॉर्ड बातचीत में पार्टी के लोग एक दूसरे पर खुलकर निशाना साधने में लगे हैं। अभी कुछ दिनों पहले पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात से इनकार किया कि रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक कैबिनट में जगह दिलाने में उन्होंने कोई भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं, सुषमा का यह भी कहना था कि जब रेड्डी बंधु मंत्री बने थे, उस वक्त अरुण जेटली कर्नाटक भाजपा के प्रभारी थे, जबकि वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्य में वरिष्ठ नेता थे। सुषमा स्वराज ने अपने साक्षात्कार में कहा कि इन लोगों के बीच आपस में क्या बातचीत हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं हैं। रेड्डी बंधुओं की सुषमा स्वराज से नजदीकी उस वक्त सामने आई थी, जब उन्होंने 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि इस पूरे मसले पर भारतीय जनता पार्टी ने सफाई देते हुए कहा कि पार्टी में किसी तरह का कोई मनमुटाव नहीं है। अपनी चिंतन बैठकों में भारतीय जनता पार्टी चिंतन कम और चिंता ज्यादा करती नजर आती है। दरअसल, आज पार्टी पूरी तरह बिखरी दिखाई दे रही है और पार्टी के बड़े नेता कई खेमे में पहले से ही बंटे हुए हैं। चिंतन बैठकों में अक्सर अनुशासन को अहमियत देने की बात कही गई, लेकिन दरअसल पार्टी में अनुशासन का सबक देने वाले खुद कितने अनुशासनशील हैं? क्या पार्टी के बड़े नेता खुद एक दूसरे की टांग खींचते नजर नहीं आते? हुगली वाले मामले में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से हटाने का फैसला जब सार्वजनिक नहीं किया गया था, उस वक्त पार्टी की ही एक बड़ी महिला नेता ने मीडिया के कुछ लोगों से बड़े ही भद्दे अंदाज में इसका ऐलान कर दिया था कि इसकी तो छुट्टी हो गई। सवाल भारतीय जनता पार्टी या उसके नेताओं के बीच आपसी मनमुटाव या रस्साकशी का नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की सकारात्मक भूमिका का है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां अपने दल को आम जनता से जोड़कर देखने के बजाय कॉरपोरेट स्टाइल में कामकाज करती दिखाई दे रही है। कांग्रेस पार्टी इस कॉरपोरेट स्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है और यही वजह है कि आज राज्यों में कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर आती जा रही है, लेकिन इन सबके बावजूद दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का कहना रहा है कि चुनाव प्रबंधन से जीते जाते हैं। यह बात ठीक है कि आज कुछ राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही है, लेकिन अगर बात पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की हो तो उसके कामकाज का तरीका अब भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस की तरह यहां भी कुछ नेता पार्टी को कॉरपोरेट शैली में चलाने की कोशिश में जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार करने में जुटे हैं। आज देश में एक सशक्त विपक्ष की जरूरत है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी यह दायित्व बखूबी नहीं निभा पा रही है। कॉमनवेल्थ खेल से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम समेत कई घोटालों से घिरी कांग्रेस की अगुवाई वाली संप्रग सरकार के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार को घेरने में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नाकाम रहा है। भ्रष्टाचार, काले धन या लोकपाल के मसले को लेकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन को भले ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थन रहा हो, लेकिन पार्टी खुद अपनी तरफ से सरकार के खिलाफ कोई जनांदोलन नहीं खड़ा कर सकी। उमा भारती की वापसी भारतीय जनता पार्टी के लिए तभी कारगर सिद्ध होगी, जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर पूरी तरह लगाम कसने में कामयाब होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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