Tuesday, June 14, 2011

मुस्लिम तुष्टीकरण का नया कांग्रेसी पैंतरा


कांग्रेसकी साम्प्रदायिकता की अपनी परिभाषा रही है जो हिन्दू विरोध और मुस्लिम समर्थन पर आधारित है। इससे बाहर जाकर साम्प्रदायिकता के व्यापक परिप्रेक्ष्य पर विचार करने से वह बचती रही है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण स्वाधीनता के इन 64 वर्षों के इतिहास में केरल में देखने को मिलता है। 1960 के दशक में केरल विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के साथ चुनावी समझौता किया और जब पत्रकारों ने मुस्लिम लीग के एक ऐसे घोर साम्प्रदायिक संगठन होने का सवाल उठाया, जिसने देश का बंटवारा कराया था तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी ने यह कह कर सफाई देने की कोशिश की कि केरल की मुस्लिम लीग साम्प्रदायिक नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि राजनीतिक स्वार्थिसद्धि के लिए कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। जब देश के संदर्भ में विचार करते वक्त सत्ता-स्वार्थों को ध्यान में रखा जाए तो वह दृष्टिकोण राष्ट्र के हित में नहीं होता। इसी तरह, अब यह जो बिल प्रस्तावित किया गया है, साम्प्रदायिक दंगों पर अंकुश लगाने के लिए, इसमें भी कांग्रेस ने साम्प्रदायिकता की अपनी परिभाषा गढ़ी है। साम्प्रदायिक हिंसा पूरी तरह इस विधेयक के प्रावधानों के अंतर्गत बहुसंख्यक समाज के मत्थे मढ़ दी गई है। इसलिए, यह प्रस्तावित विधेयक पूरी तरह एक हिन्दू विरोधी षड्यंत्र का हिस्सा है।
साम्प्रदायिकता को बांटना गलत
साम्प्रदायिकता बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नहीं होती। साम्प्रदायिकता भड़काना या उसके नाम पर खून-खराबा कराना अपने आपमें एक अपराध है। लेकिन इस विधेयक में दिए प्रावधानों के अंतर्गत बताया गया है कि साम्प्रदायिक समस्या बहुसंख्यक समाज द्वारा खड़ी की जाती है अर्थात् वही साम्प्रदायिक अपराध करते हैं। यहां तक कहा गया है कि साम्प्रदायिक हिंसा में बहुसंख्यक समाज पीड़ित नहीं होता बल्कि अल्पसंख्यक समाज पीड़ित होता है। इसलिए बहुसंख्यक समाज को दंडित किया जाए। यह कैसा कानून है जो बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में इस तरह का भेदभाव खड़ा कर रहा है? इसमें तो एक तरह से अल्पसंख्यकों को खुली छूट दे दी गई है और इसकी आड़ में जेहादी आतंकवादी तत्व अपनी हिंसा का रूप बदल कर उसे साम्प्रदायिक रंग में रंग देंगे जिसका पूरा दोष बहुसंख्यकों पर जाएगा। इस तरह, देश में हिंसा का ऐसा वीभत्स तांडव खड़ा होगा कि सरकार उसे सम्भाल नहीं पाएगी। सरकार कड़े कानून की बात करती है तो उसने पोटा को क्यों हटाया जो जेहादी आतंकवाद के खिलाफ एक सशक्त उपाय था? इसका सीधा अर्थ है कि सरकार वोट की राजनीति के लिए यह खेल खेल रही है। मुस्लिम वोट के लिए वह हिंदुओं को, संत-महात्माओं को और राष्ट्रभक्त हिंदू संगठनों को लांछित करने और उन्हें विभिन्न प्रकार से फंसाने का षड्यंत्र करती रही है। यह विधेयक मुस्लिम तुष्टीकरण की वोट राजनीति का नया कांग्रेसी पैंतरा है।
विभेद करना ठीक नहीं
हिंसा को समूहों और समुदायों में विभाजित करके देखना ठीक नहीं है। इससे सामाजिक विद्वेष और ज्यादा बढ़ेगा। सभी समुदाय और समूह एक-दूसरे को शक की नजर से देखने लगेंगे। यह स्थिति हमारे सामाजिक ताने-बाने राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत खतरनाक साबित होगी। हिंसा को एक अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए और उसी रूप में उससे निपटने के कारगर प्रयास किए जाने चाहिए। यह ठीक है कि शासन और प्रशासन के स्तर पर इसकी जिम्मेदारी तय हो पर समुदाय और समूहगत विभेद खड़े करना, यह बहुत नुकसानदेह होगा।
धर्मनिरपेक्षता : राजनीतिक स्टंट
धर्मनिरपेक्षताशब्द एक राजनीतिक स्टंट है। भारत तो प्राचीन काल से सर्वपंथसमभाव वाला देश है। पूरी दुनिया आज शांति और विश्वबंधुत्व के लिए भारत की ओर देख रही है। ब्रिटिश इतिहासकार आर्नाल्ड टाइनवी जैसे लोग जब कहते हैं,दुनिया को एक परिवार की तरह रहना सीखना है तो वह भारत से सीखे, तो इसका मतलब है कि भारत की जो सांस्कृतिक जीवन मूल्यों वाली विरासत है, वह आज भी सामाजिक सद्भाव की राह दिखाने वाली है लेकिन धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हमारे नेताओं ने उस सारी विरासत को कूड़ेदान में फेंक दिया है और धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल हिंदू-विरोध और हिंदू जीवन मूल्यों की अवमानना बन गया है। ऐसी स्थिति में जब तक हम अपनी सामाजिक संकल्पना को सुदृढ़ और पुनर्जीवित नहीं करेंगे, साम्प्रदायिकता जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। तात्कालिक उपाय दूरगामी और चिरस्थायी नहीं होते हैं विशेषकर तब जब उनके पीछे राजनीतिक एजेंडा हो। इसलिए यह जरूरी है कि साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक सदभाव को सतत् सींचा जाए तभी भारत का समाज सुखी सौहार्दपूर्ण हो सकता है।
मोदी को घेरने के लिए सारा प्रपंच
विधेयक को लेकर सबसे बड़ा विरोध तो यह है कि इस विधेयक की जरूरत को लेकर कांग्रेस जो दलील दे रही है, उसमें वह सबसे पहले गुजरात का नाम ले रही है। इससे उसकी मंशा स्पष्ट हो जाती है। कांग्रेस दरअसल नरेन्द्र मोदी को घेरने के लिए यह सारा प्रपंच रच रही है जबकि अभी तक गुजरात दंगों को लेकर नरेन्द्र मोदी की भूमिका किसी भी कोण से सिद्ध नहीं की जा सकी है। राजनीतिक कारणों से केवल उसका दुष्प्रचार किया जा रहा है और यह दुष्प्रचार तीस्ता सीतलवाड़ जैसे तथाकथित मानवाधिकारवादियों के माध्यम से कराया जा रहा है। अभी ऐसे कई प्रमाण सामने आए हैं कि तीस्ता ने पैसे के जोर पर मोदी सरकार के खिलाफ कई झूठी गवाहियां खड़ी कीं। हाल ही में यास्मीन शेख बानो का इसी तरह का मामला बम्बई उच्च न्यायालय में दायर हुआ। 2002 के गुजरात दंगों को कांग्रेस इतना तूल दे रही है तो उसे 1969 के कांग्रेस की हितेन्द्र देसाई सरकार के समय हुए भीषण दंगों को भी याद रखना चाहिए। श्री घनश्याम साह ने, जो जेएनयू में व्याख्याता हैं, अपने 34 पृष्ठों के लेख में इस दंगे का जैसा भयावह वर्णन किया है उसे पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसी तरह, 1984 के सिख विरोधी दंगों में कांगेस की शह पर देश में इतना भीषण नरसंहार हुआ, यह बात भी याद रखी जानी चाहिए लेकिन कांग्रेस और उसकी समर्थक सेकुलर जमात मोदी राग से बाहर निकल कर कुछ सोचना ही नहीं चाहती। एक कानून व्यवस्था के मामले को कांग्रेस साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास कर रही है।

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