Wednesday, June 29, 2011

वादाखिलाफी की पराकाष्ठा


सरकार ने सिविल सोसाइटी से टकराव का जो रास्ता चुना है, वह सरकार और देश दोनों के लिए बहुत घातक होगा। दमन की राजनीति से किसी का भला नहीं होगा। एक के बाद एक कई घोटालों के कारण केंद्र सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है। बाबा रामदेव की मुहिम से निपटने के लिए दमन और बदले की कार्रवाई का सहारा लेकर सरकार अपनी साख को ही क्षति पहुंचा रही है। काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई को लेकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल इसलिए उठते हैं, क्योंकि कई मामलों में सरकार ने भ्रष्टाचारियों और दागी अधिकारियों का बचाव किया है। 2जी मामले में पूरी सरकार पहले राजा का बचाव करती रही, बाद में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर राजा को जेल जाना पड़ा। यह वही कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने कहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई घपला और घोटाला नहीं हुआ है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को जिस तरह से केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय सही ठहराने की कोशिश में लगा हुआ था, उससे भी उसकी नीयत का पता चलता है। बाद में अदालत के आदेश पर ही पीजे थॉमस को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी और तब जाकर प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी। हसन अली के मामले में भी सरकार ने कार्रवाई तब शुरू की, जब अदालत की फटकार पड़ी। पर अब वह फिर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू हुई जंग को सांप्रदायिक तत्वों की साजिश बताकर कुचलना चाहती है। इसलिए उसने अन्ना हजारे के अनशन को भी जंतर-मंतर पर नहीं होने दिया और अब उसे भी सांप्रदायिक सिद्ध करने की कोशिश कर रही है। लेकिन अन्ना हजारे और उनकी टीम लोकपाल बिल के तहत जो मांग कर रही है, उसमें से एक मांग के बारे में खुद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने माना था कि प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का अधिकार लोकपाल का होना चाहिए। उन्होंने लोकपाल विधेयक के सरकारी मसौदे में प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई मामलों में दी गई छूट को भी ज्यादा बताया था। चिदंबरम अपने ये विचार गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक तौर पर सरकार के सामने रख चुके हैं। अब वह इससे मुकर रहे हैं। इसलिए आज अगर नागरिक समाज को लोकपाल के लिए आंदोलन और अनशन करना पड़ रहा है तो इसके लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जो संसद की सर्वोच्चता और पवित्रता की थोथी दुहाई दे रहे हैं। पिछले 42 साल में लोकपाल विधेयक का कानून का रूप न ले पाना यह बताता है कि राजनीतिक दलों ने संसद की शक्तियों को सही तरीके से इस्तेमाल करने के स्थान पर उसका दुरुपयोग किया। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार केंद्र की सत्ता संभालते समय लोकपाल विधेयक लाने का वचन दिया था। दरअसल, लोकपाल विधेयक के मामले में बार-बार की वादाखिलाफी का ही परिणाम है कि आम जनता यह महसूस कर रही है कि राजनीतिक दल लोकपाल का निर्माण करना ही नहीं चाहते। यदि अन्ना हजारे और उनके साथियों की मानें तो केंद्र सरकार अब भी एक सक्षम लोकपाल व्यवस्था के निर्माण में अड़ंगे डाल रही है। काला धन और भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जो आज भारतीय जनमानस को आंदोलित कर रहा है। अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव तो उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बन चुके हैं। उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। सरकार जिस टकराव के रास्ते पर जा रही है, उससे उसकी अधिनायकवाद की प्रवृत्ति का संकेत मिल रहा है। लोकतंत्र में जनता ने यदि आप को चुनकर भेजा है और आप सत्ता में हैं तो लोगों के लिए रोटी-पानी का इंतजाम कीजिए। भ्रष्टाचारियों और कालेधन के खातेदारों को जेल भेजिए। यदि लोगों की बात लोकतांत्रिक तरीके से नहीं सुनी जाती है और दमन के सहारे दबाने की कोशिश की जाएगी तो समाज में ऐसी अव्यवस्था और अराजकता फैल सकती है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं होगा। आतंकवादी और नक्सली हिंसा के दौर से गुजर रहे इस देश के लिए यह जरूरी है कि सरकार जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और आन्दोलन का दमन न करके उनकी बात को सुने। भ्रष्टाचारियों एवं काले धन के खातेदारों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करे, जिससे जनता का सरकार पर विश्वास और भरोसा बढ़े। पर जब भी विदेश में जमा काले धन पर चर्चा होती है तो सरकार कानूनी पेचीदगियां और अपनी असमर्थता की बात करने लगती है। इससे यही संदेश जाता है कि सरकार अपराधियों को बचा रही है।


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