Sunday, January 30, 2011

नए लोकपाल की तैयारी


लेखक लोकपाल के नए मसौदे को भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने का घटिया उपाय बता रहे हैं...
पहरेदार का चोर हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण होता है। आखिरकार पहरेदार पर कौन पहरा दे? प्रधानमंत्री देश के सार्वजनिक धन का न्यासी है, मंत्रिपरिषद उसी का विस्तार है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पर अतिरिक्त सतर्कता की जिम्मेदारी है। सरकार को जवाबदेह बनाने की संसदीय शक्ति बड़ी है बावजूद इसके भ्रष्टाचार संस्थागत हो गया। राष्ट्रमंडल खेलों में अरबों का खेल हुआ। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से देश भौचक हुआ। आदर्श सोसाइटी भी घोटाला का पर्याय बनी। चावल निर्यात घोटाला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एलआईसी हाउसिंग सहित हर तरफ घोटालों की ही बाढ़ है। महंगाई घोटालों के पंख लगाकर ही आसमान पहुंची है। देश घोटालों के दलदल में है। सत्ताधीश छोड़ सब लुट रहे हैं। भ्रष्टाचार ही सत्यम है। आम जन हलकान हैं। यहां हर चीज बिकाऊ है। राजनीति एक विचित्र उद्योग है। थोड़ी पूंजी बड़ा व्यापार, कहीं भी, कभी भी। विधायकी सांसदी के पार्टी टिकट के रेट हैं, मनमाफिक मंत्री बनाने के रेट हैं। सरकार गिराने बचाने, सदन में वोट देने, सदन त्याग करने के पुरुस्कार हैं। केंद्र सरकार तमाम घोटालों के घेरे में है। स्पष्टीकरण काम नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से सरकार की नींद हराम है। जनता में थू-थू हो रही है। सो सरकार एक नए लोकपाल विधेयक की तैयारी कर रही है। विद्वान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई अंतर्विरोधों के शिकार हैं। वह सरल हृदय गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन देश के राजप्रमुख हैं। वह संवैधानिक दृष्टि से संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन वस्तुत: वह सोनिया गांधी के प्रति उत्तरदायी हैं। वह मंत्रिपरिषद के प्रधान हैं, लेकिन मंत्रिगण उनकी बात नहीं सुनते। वह स्वयं ईमानदार हैं, लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन महंगाई जैसी आर्थिक समस्या के सामने ही उन्होंने हथियार डाले हैं। भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बट्टा लगाया है। लोकपाल विधेयक का मंसूबा सरकार की छवि को दुरुस्त करने का नया शिगूफा है। सरकार भ्रष्टाचार से लड़ते हुए दिखाई पड़ना चाहती है। सरकारी मसौदे में लोकपाल की कोई खास भूमिका नहीं है। प्रस्तावित लोकपाल अपनी ओर से कोई जांच शुरू नहीं कर सकेगा। वह सीधे शिकायतें भी नहीं लेगा। पीडि़त व्यक्ति लोकसभाध्यक्ष के पास शिकायत भेजेगा। वह लोकसभाध्यक्ष द्वारा अग्रसारित शिकायतों का संज्ञान लेगा। इसके लिए लोकसभाध्यक्ष को एक शिकायती प्रकोष्ठ बनाना होगा। शिकायतों का प्रारंभिक परीक्षण करना होगा। लोकपाल की रिपोर्ट लोकसभाध्यक्ष के पास जाएगी। मंत्री की शिकायत पर फैसला प्रधानमंत्री करेंगे। यानी नया लोकपाल मसौदा भ्रष्टाचार की चर्चा की दिशा को बदलने वाला भोथरा हथियार है। लोकपाल का आधार स्कैंडनिवियाई देशों की ओम्बड्समैन नामक संस्था है। सबसे पहले स्वीडन ने यह संस्था बनाई थी। इसकी नियुक्ति संसद करती है, वह संसद को अपनी रिपोर्ट देता है। यह संस्था नार्वे (1963) फिनलैंड (1909) और डेनमार्क में भी है। न्यूजीलैंड ने 1962 और ब्रिटेन ने 1966 में यही प्रणाली अपनाई। लोकपाल विधेयक का मनमोहन-प्रस्ताव पहला नहीं है। जनता सरकार के विधेयक 1977, राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के विधेयक 1989, देवेगौड़ा सरकार के विधेयक 1996 और अटल सरकार के विधेयक 1998 में प्रधानमंत्री भी लोकपाल की जांच के दायरे में लाए गए, लेकिन राजीव गांधी सरकार के विधेयक 1985 में प्रधानमंत्री को जांच से बाहर रखा गया था। अटल सरकार के विधेयक में सर्वोच्च न्यायालय के कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को ही लोकपाल बनाए जाने की व्यवस्था थी। इस विधेयक में इसी पद पर दोबारा नियुक्ति का निषेध था। साथ में लोकपाल रह चुके व्यक्ति को भविष्य में केंद्र या राज्य सरकार में लाभ के किसी पद पर नियुक्त न किए जाने के भी प्रावधान थे। जैसे राजीव गांधी सरकार द्वारा 1985 में लाए गए विधेयक में लोकपाल द्वारा की गई जांचों को प्रधानमंत्री को भेजे जाने के प्रावधान थे, प्रधानमंत्री से ही कार्रवाई की अपेक्षा थी, ठीक वैसे ही ताजा मसौदे में भी प्रधानमंत्री से ही अपेक्षाएं की गई हैं। मूलभूत प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री ही अपने दायित्व का निर्धारण ठीक से कर रहे होते तो क्या 2-जी घोटाला होता? तो क्या राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के चलते भारत की अंतरराष्ट्रीय बदनामी होती? अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी के अनुसार भारत के 22.5 लाख करोड़ रुपये अवैध रूप से विदेशी बैंकों में जमा हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे देश के धन की लूट कहा है। भारत के भीतर भी लगभग इसका आधा काला धन है। राष्ट्रमंडल 2-जी आदि चर्चित घोटालों को जोड़कर भी बात पूरी नही होती। सरकारी तंत्र के हर हिस्से में महालूट है। कई मुख्यमंत्री लूट रहे हैं, अनेक केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी इसी तरह की लूट में शामिल बताए जाते हैं। उत्तर प्रदेश व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों पर आय से अधिक संपदा के आरोप रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी जांच के लपेटे में हैं। भ्रष्टाचार के प्रति उदारीकरण की नीति ने आम जन को कंगाल बनाया है। रोग काफी पुराना है। आजादी के बाद पं. नेहरू के समय कृष्णमेनन जीप घोटाला हुआ। उड़ीसा के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक, जम्मू-कश्मीर के बख्शी गुलाम मोहम्मद, बिहार के कृष्ण बल्लभ सहाय, पंजाब के प्रताप सिंह कैरों, महाराष्ट्र के एआर अंतुले आदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोपी रहे हैं। भ्रष्टाचार की कथा अनंत है। केवल छवि सुधार से ही बात नहीं बनेगी। ठोस कार्रवाई जरूरी है। मनमोहन सिंह सरकार अटल बिहारी सरकार के लोकपाल विधेयक से प्रेरणा क्यों नहीं लेती? वह जनता सरकार द्वारा 1977 में प्रस्तुत लोकपाल विधेयक को आधार क्यों नहीं बनाती? वह एक दर्जन से ज्यादा राज्यों में कार्यरत लोकपाल जैसी संस्था लोकायुक्तों की कार्यपणाली, अच्छाई, कमजोरी के अनुभवों का संज्ञान क्यों नहीं लेती? उत्तर प्रदेश सरकार के लोकायुक्त की जांचों ने मंत्रियों की नींद हराम की है। एक मंत्री हाल में ही हटे हैं। कई विदाई से डरे अपना कामकाज जल्दी-जल्दी निपटा रहे हैं। सवाल यह है कि छोटे-छोटे देशों और भारत के अनेक राज्यों ने ऐसी ही निगरानी संस्था का विकास स्वत:स्फूर्त ढंग से कर लिया है तो केंद्रीय स्तर पर लोकपाल जैसी निगरानी संस्था का अधिनियम अतिशीघ्र क्यों नहीं पारित हो सकता? देश भ्रष्टाचार से तबाह है। संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक तंत्र की खास भूमिका होती है। भ्रष्टाचार की राजनीतिक संस्कृति का विकास कांग्रेस ने किया। उसने जैसा बोया था वही फसल आज काट खाने दौड़ रही है। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)



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