Wednesday, March 23, 2011

सुलटे विवाद की पेच


पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर जुड़ा विवाद सुलट जाने से निश्चित ही कांग्रेस ने राहत की सांस ली होगी। यह ऐसा मसला है जिसको लेकर संदेह पहले भी नहीं था, लेकिन यह तय है कि ममता बनर्जी का वर्चस्व हावी होने के बावजूद कांग्रेस इस चुनाव में कुछ खोने की हालत में नहीं है। इसके विपरीत तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन बना रहना न सिर्फ केंद्र में सरकार के लिए मजबूत आधार बनाए रखेगा बल्कि प.बंगाल में कुछ ही क्षेत्रों में सही, कांग्रेस के लिए अपनी जड़ें फिर जमाने का मौका भी देगा। पर हकीकत यह है कि जिसे सीटों से जुड़ा विवाद बताया जा रहा है, मामला वह नहीं है। विवाद की असल जड़ सीटों की तादाद नहीं, यह रही कि कौन सी सीट किसे मिले। कांग्रेस को एक सीट और देकर भी ममता ने उसे कोलकाता महानगर से दूर रखा है। इससे प्रश्न उभरता है कि उनकी हठधर्मिता क्या भविष्य में कांग्रेस के लिए राज्य में अपने हितों के साधन में सहायक होगी? अभी जो हालात हैं, उनसे जाहिर होता है कि राज्य में 34 साल से सत्तारूढ़ वाममोर्चा के लिए भविष्य की राहें आसान नहीं रह गई हैं क्योंकि ममता ने राजनीति के लिए जो रास्ता अपनाया है वह वामपंथ पर नहीं, सत्तारूढ़ मोर्चे की नीतियों पर हमलावर है। इसमें उनके लिए राज्य के बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त करने की गुंजाइश बढ़ती है। ममता ने 'मां, माटी और मानुष' का नारा दिया है, जो राज्य की उस जनता में जबर्दस्त भावनात्मक संवेग पैदा करने में सहायक है। माना जाता है कि उनके निर्णय अक्सर स्वत:स्फूर्त होते हैं। इसके पूर्व में भी उन्होंने अपने बयानों में हमेशा वामो सरकार की नीतियों को ही निशाना बनाते हुए यही संदेश देना चाहा कि वे उन मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध नहीं हैं जिनके आधार पर राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी को खड़े होने, जड़ें जमाने और फैलने का मौका मिला था। पर कांग्रेस के राज्य के नेताओं में अब भी ममता की पार्टी से गठबंधन को लेकर जो हिच दिख रही है। अगर उसे दूर न की गई तो यह तृमूकां-कांग्रेस की उज्ज्वल सम्भावनाओं को प्रभावित कर सकती है। कारण यह नहीं कि राज्य में सरकार उनकी विरोधी है बल्कि यह कि वामो का कैडर अब भी सशक्त है और उसे अपनी सरकार की नीतियों से अब भी कोई दुराव नहीं है। लिहाजा तृमूकां-कांग्रेस गठबंधन पर यही कहा जा सकता है कि इनके नेताओं का फर्ज है कि वे अपने धड़ों के बनिस्बत गठबंधन की सफलता के लिए काम करें। यह ध्वनि नहीं छोड़ें कि उन्हें अपने नेताओं का फैसला कुबूल नहीं है। किसी भी तरह से अगर यह संदेश गया कि तृमूकां-कांग्रेस समझौता मजबूरी का फैसला है तो यह अनपेक्षित परिणाम देने-दिलाने के लिए पर्याप्त होगा। दूसरी ओर सत्तारूढ़ वामो का पराभव तो साफ दिखने लगा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार अभी से हथियार डाल दे। उसने जिस बिना पर अपना निरंतर फैलाव किया था, उसके लिए सम्भावनाएं खत्म नहीं हुई हैं। हां, इसके लिए किसी को भी किसी गलत रास्ते का चुनाव नहीं करना चाहिए।

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