Tuesday, March 1, 2011

असंतोषजनक न्याय


अदालत के फैसले के बावजूद गोधरा कांड की और गहन जांच की अपेक्षा कर रहे हैं लेखक
गोधरा और गुजरात में लगभग नौ वर्ष पूर्व जो कुछ हुआ था वह अविश्वास और चालबाजी के कीचड़ से इतना अधिक मलिन हो चुका है कि अब तथ्यों की पावनता भी धूमिल हो गई है। ट्रेन से अयोध्या से लौट रहे 59 तीर्थयात्रियों की बोगी में लगी आग में जलने से मृत्यु और अगले ही दिन से मुस्लिमों की हत्याओं की शुरुआत-ये घटनाएं मात्र अनुक्रम के लिहाज से ही सही हैं। रेल की बोगी आग में कैसे जली, यह मामला अभी भी विवादों से घिरा है। गुजरात में गोधरा ट्रेन अग्निकांड मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने 31 आरोपियों को दोषी करार दिया और अन्य 63 को, जो नौ वर्ष तक कारावास में रहे, बरी कर दिया। 31 दोषियों में से 11 को मृत्युदंड और शेष 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। गोधरा हत्याकांड के मुख्य साजिशकर्ता समझे जाने वाले मौलाना उमर को भी साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया है, जिन्हें एक राहत शिविर से पकड़ा गया था। मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर उनके खिलाफ मामला शुरू से ही गलत था। जब उनकी संलिप्तता का कोई प्रमाण नहीं मिला तो आरोप स्वत: ही मनगढ़ंत लगता है। मेरी दिलचस्पी साजिश के उस आरोप से है जिसे सिद्ध हुआ कहा गया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआइटी) के प्रमुख ने भी कहा है कि निर्णय संतोषजनक है। संभवत: उनका यह कहना ठीक ही है, किंतु गुजरात में जो कुछ हुआ उसे तर्कसंगत ठहराने के लिए भाजपा षड्यंत्र की थ्योरी का इस्तेमाल करेगी। हिंदू-मुस्लिम संबंधों के भविष्य की दृष्टि से यह अशुभ है। मैं उन कुछ लोगों में से हूं जो गोधरा की त्रासदी के कुछ ही दिनों के भीतर बड़ोदरा और वहां से उस स्थान पर गए थे जहां आग से जली बोगी खड़ी थी। वहां से कुछ दूरी पर मुसलमानों की बस्ती है। गोधरा स्टेशन से ट्रेन के रवाना होने के बाद लोग वहां से दौड़ते तब भी घटनास्थल तक नहीं पहुंच सकते थे। षड्यंत्र की थ्योरी में यह इंगित किया गया है कि मुस्लिम चलती ट्रेन में कूदने को तैयार थे, ताकि तीर्थयात्रियों की बोगी तक पहुंच कर उसमें आग लगा दें। इस घृणित कार्य के पीछे कोई उद्देश्य भी तो होना चाहिए। यह दर्शाने के लिए कुछ भी नहीं है कि उस बस्ती के मुसलमानों (चाहे वे कितने ही आपराधिक प्रवृत्ति वाले क्यों न हों) का हिंदुओं या गुजरात में रहने वालों से कोई नया या पुराना बैर था। उन दिनों देश में कोई तनाव या सांप्रदायिकता का माहौल भी नहीं था। यह कल्पना कर लेना कि गोधरा के समीप स्थित बस्ती के मुसलमानों ने बोगी में तीर्थयात्रियों को जलाया, कोई वैध कारण नहीं, बल्कि क्रूर सोच ही हो सकती है। जब 63 लोग बरी कर दिए गए हैं और इससे आधे से भी कम यानी 31 को दंडित किया गया है तो सारी जांच पर ही सवालिया निशान लग जाता है। पुलिस का घटिया क्रियाकलाप स्पष्ट है, क्योंकि अभियुक्तों में से एक दृष्टिहीन था और एक अन्य सरकारी कर्मचारी, जो उस स्थान के आसपास भी कहीं नहीं था। गोधरा कांड के दो वर्ष के भीतर एक जांच कराई गई थी उसमें यह उद्घाटित किया गया था कि आग लगने की घटना आकस्मिक थी। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यूसी बनर्जी ने एक रिपोर्ट में कहा था, कोच में आग बाहर से नहीं लगाई गई थी, बल्कि स्वत: लगी। मगर, मोदी सरकार द्वारा गठित जस्टिस नानावटी आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला कि आग किसी संयोग मात्र से नहीं लगी थी, बल्कि पेट्रोल फेंके जाने से लगी थी। दोनों निर्णय एक-दूसरे को काटते हैं। सही स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं हो सकी है। आरोप यह भी है कि मोदी ने स्वयं गोधराकांड रचा, क्योंकि वह गुजरात में मुसलमानों से निपटना चाहते थे। गोधरा केस के मुकाबले एसआइटी ने गुजरात में हुई हत्याओं के मामले में एक शानदार कार्य को अंजाम दिया है। मुझे रिपोर्ट के प्रकाशन में विलंब पर आश्चर्य है। यह रिपोर्ट मई से अदालत के पास पड़ी है। इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का यह उपयुक्त अवसर है। गोधरा पर विशेष अदालत के फैसले ने उससे ज्यादा सवाल खड़े किए हैं, जितने का एसआइटी की रिपोर्ट में जवाब मिलता है। कहा जाता है कि एसआइटी रिपोर्ट में उल्लिखित है कि न्याय प्रणाली में मोदी का राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडा भारी पड़ा है। उसमें सांप्रदायिक तनाव के दौरान मोदी की मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध अतिरंजित और उत्तेजक टिप्पणियों को भी उजागर किया गया है। जांच दल ने मोदी और उनकी सरकार को कई लिहाज से, जैसे कि उत्तेजक भाषणों, महत्वपूर्ण रिकार्ड को नष्ट करने और तटस्थ अधिकारियों के उत्पीड़न का दोषी पाया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात सरकार पीडि़तों को न्याय नहीं दे सकी। यहां तक कि गुजरात सरकार ने उस अवधि से संबद्ध पुलिस वायरलेस रिकॉर्ड को ही नष्ट कर दिया है। एक साहसी अधिकारी ने टीम को गुमशुदा रिकॉर्ड की प्रतियां उपलब्ध कराई थीं। उस अधिकारी को नियमों का उल्लंघन करने का नोटिस थमा दिया गया। यह देखकर निराशा ही होती है कि संघीय कार्मिक विभाग इस मुद्दे पर मौन साधे है। अधिकारी अखिल भारतीय सेवाओं से संबद्ध है और कार्मिक विभाग को उसे परेशान किए जाने और संभावित सजा से बचाने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए था। भाजपा रिपोर्ट में उद्घाटित तथ्यों का सामना नहीं कर रही है। इसके बजाय वह लीकेज को लेकर सरकार पर हमला कर रही है। मुझे आशा है कि एक फर्जी मुठभेड़ पर जांच का आदेश देने वाला सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को जल्द निपटाएगा। भाजपा जस्टिस नानावटी के तहत एक समिति की नियुक्ति से संतुष्ट है। उनकी नियुक्ति नौ वर्ष पूर्व की गई थी। शीघ्र रिपोर्ट आने की अभी भी कोई संभावना नहीं लगती। रिटायर्ड जज अक्सर जांच को लंबा खींचने में यकीन रखते हैं। मैं नहीं जानता कि क्या उद्योग घराने अब भी मोदी को भारत का प्रधानमंत्री होते देखना चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध उनकी उत्तेजक टिप्पणियां और गुजरात में हुए कांड से उनकी संबद्धता को लेकर संदेह की गुंजाइश नहीं बचती। जांच दल ने झूठ की उस दीवार को ध्वस्त कर दिया है जो तथ्यों और अपने कुशासन के बीच उन्होंने खड़ी की थी। भाजपा ने चार माह में जनता के समक्ष तथ्य रखने की बात कही थी। अब उस कांड को हुए 9 वर्ष बीत गए हैं। अभी भी मोदी या भाजपा की ओर से पश्चाताप का कोई संकेत नहीं है। गोधरा फैसला भाजपा को और बहादुरी दिखाने के लिए प्रोत्साहित करता है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार )

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