Wednesday, March 30, 2011

चिदंबरम की सोच का सच क्या है


इस समय पूरी दुनिया टेक्नोलॉजी की बढ़त की चपेट में है। मामला चाहे मिस्र की मुक्ति की लड़ाई में इंटरनेट की भूमिका का हो, मीडिया की पहुंच के कारण बिहार में सुशासन की विजय का हो या विकिलीक्स के खुलासों से घायल छद्म लोकतंत्र का, हर मामले में टेक्नोलॉजी की विजय हुई है। विकिलीक्स के ताजे खुलासे में देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम की दोहरी मानसिकता का पर्दाफाश कर दिया है। 25 अगस्त 2009 को अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर द्वारा अपने देश को भेजे गए गुप्त संदेश में गृहमंत्री चिदंबरम द्वारा कही गई तमाम आपत्तिजनक बातों का खुलासा हुआ है। इन खुलासों से पूरा देश भौचक और हतप्रभ है। इस गुप्त संदेश में चिदंबरम के हवाले से बताया गया है कि भारत की प्रगति 11-12 प्रतिशत की दर से होती, अगर देश के केवल दक्षिणी एवं पश्चिमी हिस्से ही होते। दक्षिण भारत और शेष भारत में विकास का काफी अंतर है। शेष भारत विकास (दक्षिणी-पश्चिमी को छोड़कर) को पीछे खींच रहा है और विदेशी राजदूत को देश के नेताओं के बजाय आम जनता से मिलना ज्यादा उचित रहेगा आदि-आदि। इन खुलासों के अगले ही दिन देश की संसद में हंगामा हुआ और माननीय गृहमंत्री ने खंडन भी कर दिया। अब अगर यह बात सच है तो वाकई मामला बेहद चिंताजनक और संवदेनशील है। चिदंबरम और चिदंबरमवादियों के मन में अगर ऐसा कुछ चल रहा है तो उन्हें भारत की सांस्कृतिक और राजनैतिक आत्मा को समझना होगा। विकास दर की इस तात्कालिक सनक के कारण देश की सांस्कृतिक विरासत, साहित्य की भूमिका, देश के इतिहास और भूगोल के लिए हुए संघर्षो, राजनैतिक आंदोलनों, असंख्य बलिदानों तथा देश की विशालता को नजरअंदाज करना देश के लिए शहीद हुए नायकों का अपमान है। यदि देश में केवल दक्षिण-पश्चिम भाग ही होते तो पवित्र गंगा-यमुना का संगम कहा होता? राम की अयोध्या, कृष्ण की मथुरा और शिव की काशी कहां होते? कहां होता पवित्र तीर्थ बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री और कहां होता पर्वतराज हिमालय? रामायण का गायन और गीता का उपदेश किस देश में हुआ होता? सूर, कबीर, तुलसी, जायसी और मीरा ने किस देश के साहित्य को समृद्ध किया होता? और अगर यह सब नहीं होता तो भारत की सांस्कृतिक विरासत क्या होती? यह देश आज भी आइटी के साथ-साथ राम-रहीम, गीता और रामायण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। ऋषि परंपरा इसी देश की संस्कृति की देन है, जहां वसुधैव कुटुंबकम की बात कही जाती है, जिसे आजकल व्यापारिक दृष्टि से ग्लोबल विलेज कहा जाता है। देश की कुल सांस्कृतिक विरासत में दक्षिण-पश्चिम के साथ-साथ शेष भारत की अतुलनीय योगदान है। भारत के राजनैतिक आंदोलनों की गवाह भी यही भूमि बनी है। जिसे चिदंबरम साहब ने देश पर बोझ समझा है। यवनों के आक्रमण से आहत भारत को एक सूत्र में पिरोकर चंद्रगुप्त के नेतृत्व में देश को एकजुट कर संघर्ष के लिए तैयार करने वाला नायक चाणक्य भी इसी भूभाग का था। अगर देश में केवल दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से ही होते तो अरावली की पहाडि़यां चेतक की टापों की गवाह न बनी होतीं। अगर केवल देश में दक्षिणी-पश्चिमी हिस्से ही होते तो सन् 1857 की क्रांति की चिंगारी न फूटी होती और न ही झांसी की रानी का उदय हुआ होता। समाज सुधारक राजा राम मोहन राय, भगवान बुद्ध और रवींद्र नाथ टैगोर ने अपना ज्ञान तथा व्यवहार का संदेश कहां दिया होता? क्या सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद ने इसीलिए अपने प्राण न्योछावर किए थे कि आजाद भारत के विकासवादी गृहमंत्री भारत को एक राष्ट्र न समझकर टुकड़ों में देखें। क्या गांधी जी ने कभी कल्पना भी की थी कि जिस राष्ट्र के लिए वे जिये और मरे, वह राष्ट्र विकसित और कम विकसित हिस्सों में बांट दिया जाए। आजाद भारत के नेता पं. जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद क्या इसी आधुनिक भारत के निर्माण की बात कर रहे थे? एकात्म मानववाद के प्रणेता दीनदयाल उपाध्याय तथा समाजवाद के पुरोधा राम मनोहर लोहिया भी इसी भूभाग में जन्मे थे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण भारत के युवाओं का संपूर्ण क्रांति के लिए आह्वान किया था, न कि केवल शेष भारत का। दलित चेतना के नायक कांशीराम की जन्म स्थली और कर्मस्थली भी इसी भूभाग में है, जिसे चिदंबरम जी बोझ समझते हैं। चिदंबरम जिस दल के गृहमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व कर रहे हैं, उस दल की नेता की पारिवारिक विरासत का स्त्रोत भी यही भूभाग है और अगर यह सब नहीं होता तो भारत कैसा होता? गृहमंत्री की विकास की परिभाषा समझ से परे है। समन्वित विकास का मायने हर पक्ष का विकास होता है, न कि केवल एक हिस्से का विकास। हर राष्ट्र की एक आत्मा होती है और होती है उसकी एक समृद्ध संस्कृति। किसी राष्ट्र का निर्माण उसकी संस्कृति का परिणाम होता है और यही सांस्कृतिक इकाई भारत राष्ट्र राज्य के रूप में स्थापित है। भारत पूरब-पश्चिम तथा उत्तर और दक्षिण में नहीं बंटा है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक भारत एक है। देश का अगर एक हिस्सा आर्थिक तौर पर समृद्ध है तो दूसरा हिस्सा सांस्कृतिक और राजनैतिक तौर पर पुष्ट है। हर हाल में भारत एक इकाई है, जिसका अगर एक हिस्सा विकास कर रहा है तो संपूर्ण भारत विकास कर रहा है और अगर एक हिस्सा पिछड़ा है तो यह पूरे देश के लिए चिंता का कारण है। इन सबके बावजूद क्या केवल विकास दर ही किसी राष्ट्र की परिभाषा होती है? क्या राष्ट्र की पहचान विकास दर से ही होती है? तो क्या जिन देशों की विकास दर कम है, वे राष्ट्र रहने के काबिल नहीं? दुनिया का सबसे विकसित देश भी समस्याओं से जूझ रहा है। अमेरिका में भी लगभग 4 करोड़ लोग बिना बीमा के जीवन यापन कर रहे हैं। ये लोग अमेरिका के विकास में बाधा हो सकते हैं तो क्या अमेरिका यह कह दे कि काश! ये 4 करोड़ लोग अमेरिका में न होते। काश! अपराध ग्रस्त टेक्सास न होता और काश! अमेरिका में सवा करोड़ अवैध घुसपैठिए न होते। क्या मायने हैं इन सब बातों का। हर राष्ट्र आंतरिक चुनौतियों से जूझता है और उनसे पार पाने की कोशिश करता है। किसी देश का एक भूभाग संपन्न और दूसरा भूभाग कमजोर हो सकता है तो क्या संपन्न भूभाग ही राष्ट्र होना चाहिए? विकास की इस अंधी दौड़ ने सांस्कृतिक और राजनैतिक विरासत को बेगाना बना दिया है। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता है कि दक्षिण-पश्चिम का भौतिक विकास शेष भारत की तुलना में कहीं ज्यादा है। उत्तर और उत्तर पूर्वी राज्य विकास के इस नए दौर में पिछड़ गए प्रतीत होते हैं। यह अचरज भरा प्रश्न है कि आजादी के बाद से केंद्र में ज्यादातर नेहरू-गांधी परिवार का प्रत्यक्ष या परोक्ष शासन रहा है। फिर भी उत्तर प्रदेश बेहाल और बदहाल ही रहा है। इन प्रदेशों के नेतृत्व समय की परिवर्तन की आहट नहीं समझ सके और न ही विकास के नए पैमानों के अनुसार अपने को ढाल सके। इधर बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड ने सुशासन का राज कायम किया है और अपनी विकासदर में अपेक्षित सुधार किया है। इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि सबसे ज्यादा युवा संभावनाओं वाला राज्य विकास की इस दौड़ में पिछड़ गया है। सत्ता पाने के लिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेतृत्व ने विकास के सिवा सब कुछ किया है और राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक टोटकों के समाने असहाय सिद्ध हुए हैं। फिर भी इन राज्यों की भूमिका को राष्ट्र राज्य के निर्माण में उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अभी कुछ वर्षो पहले तक देश की विकास दर काफी कम थी तो क्या उसे विश्व विरादरी का हिस्सा होने का हक नहीं था। इस समय जबकि उत्तर-दक्षिण का विवाद लगभग समाप्ति पर है, उस समय चिदंबरम के यह उदगार चिंता का विषय है। जब देश के गृहमंत्री का विचार ही अपने देश के बारे में ऐसा हो तो अलगाववादियों से उनका अंतर करना मुश्किल है। इन खुलासों से एक बात तो सिद्ध हुई है कि टेक्नोलॉजी के इस युग में दोहरी बातों और दोहरे चरित्र का कोई स्थान नहीं है। (लेखक एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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