Thursday, March 17, 2011

आरक्षण की मलाई परोसते सियासी दल


लखनऊ यह यूपी है। यहां वोटो की जुगत के लिए आरक्षण की मलाई खूब परोसी जाती है। 1995 में प्रदेश की पिछड़ा वर्ग सूची में 55 जातियां थीं और आज की तारीख में यह संख्या 79 पहुंच चुकी है। लगभग डेढ़ दर्जन नई जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश सरकार के समक्ष विचाराधीन है तो लगभग दो दर्जन जातियों को लेकर आयोग के समक्ष प्रत्यावेदन लंबित हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग की जो सूची है, उसमें बदलाव केंद्र के स्तर से और वह भी संसद की मंजूरी के बाद ही हो सकता है। राज्य स्तर से उसमें कोई नई जाति को शामिल करना या हटाना संभव नहीं है, लेकिन राज्य स्तर पर बनने वाली पिछड़ा वर्ग की सूची में कोई नई जाति शामिल करने या किसी जाति को सूची से बाहर करने का अधिकार राज्य सरकार में निहित है, इसी वजह से इस सूची को लेकर सबसे ज्यादा राजनीतिक खेल होते हैं। उप्र की पिछड़ा वर्ग की सूची में जो 24 नई जातियां शामिल की गई, वह 1995 से 2000 की अवधि में शामिल की गई। यह वह अवधि थी जब प्रदेश में बसपा और भाजपा की सरकार रहीं हैं। दरअसल, ये दोनो पार्टियां उप्र की सियासत में समाजवादी पार्टी के यादव वोट बैंक को काउंटर करने के लिए दूसरी पिछड़ी जातियों, खास तौर से अति पिछड़ों को लामबंद करने की शुरू से ख्वाहिशमंद रही हैं। उसी के चलते पिछड़ा वर्ग सूची से बाहर चलने वाली अति पिछड़ी जातियों को सूची में शामिल करा उन्हें अपने पाले में करने की इस अवधि में दोनों दलों के बीच होड़ दिखी और यह होड़ अभी भी बरकरार है। बसपा सरकार के इसी कार्यकाल में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग लगभग डेढ़ दर्जन नई जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने की सिफारिश कर चुका है। हालांकि सरकार के स्तर पर अभी उस पर कोई निर्णय नहीं किया गया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व इनमें से कुछ जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल करने का निर्णय प्रदेश सरकार कर सकती है। सरकारी नौकरियों से लेकर सरकारी योजनाओं में आरक्षण का आकर्षण तमाम जातियों को पिछड़ा वर्ग सूची में शामिल होने की बेकरारी का कारण बन गया है। दो दर्जन जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल करने के प्रत्यावेदन पर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग विचार कर रहा है।


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