Thursday, March 10, 2011

जांच के काबिल एक जिद


जेपीसी गठन के प्रति केंद्र सरकार की हीलाहवाली की जांच-पड़ताल की जरूरत जता रहे हैं लेखक
आखिरकार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी इच्छा के विपरीत 2 जी स्पेक्ट्रम मामले की जांच के लिए संयुक्त समिति गठित करने की विपक्ष की मांग के आगे झुकना पड़ा। प्रधानमंत्री के बयानों पर गौर करें तो जेपीसी को लेकर उनकी असहजता स्पष्ट हो जाती है। अचानक उन्हें लगता है कि साफ-सुथरे राजनेता होने के नाते उन्होंने जो प्रतिष्ठा कमाई थी, पिछले छह माह में वह उससे हाथ धो बैठे हैं। कुछ ऐसे कारणों से जिनके बारे में सिर्फ वह ही बता सकते हैं, उन्हें डर है कि जेपीसी जांच से उनकी स्थिति और नाजुक हो जाएगी। मनमोहन सिंह के अनुसार उनका आचरण संदेह से परे है, जबकि अन्य तमाम लोग मसलन मीडिया, विपक्ष, उनके कुछ मंत्री और गठबंधन के सहयोगी दल किसी न किसी मुद्दे पर दोषारोपण के योग्य हैं। इस प्रकार एक ऐसे अनिच्छुक दूल्हे की तरह जिसके सिर पर बंदूक तनी है और जो तमाम रस्मों को बेमन से निभा रहा है, मनमोहन सिंह जता रहे हैं कि उन्होंने जेपीसी के गठन को हरी झंडी इसलिए दी है ताकि संसद का कामकाज सुचारू रूप से चल सके। मनमोहन सिंह ने जेपीसी मसले पर संसद शुरू होने से कुछ दिन पहले अपनी नाराजगी का इजहार किया था। मामला लोकसभा में उठने से पहले ही उन्होंने कुछ दलीलें पेश कीं। उनके अनुसार, गत सितंबर से जो कुछ भी फजीहत हो रही है उसके लिए मीडिया जिम्मेदार है। उन्होंने टीवी संपादकों से कहा कि इन घोटालों को मीडिया द्वारा उछालने के कारण पूरे विश्व में धारणा बनी कि हमारे देश में घोटालों का बोलबाला है। इस प्रकार की खबरों से लोगों का मनोबल कमजोर हुआ है। इसलिए वह चाहते थे कि मीडिया के सैनिक राष्ट्रीय हित में अपनी बैरकों में वापस लौट जाएं, क्योंकि नकारात्मक मुद्दों को अधिक उछालना ठीक नहीं है। इससे लोगों का आत्मविश्वास डिग जाएगा। मनमोहन सिंह की मीडिया को नसीहत इंदिरा गांधी की याद दिलाती है। सातवें दशक में जब प्रधानमंत्री के रूप में उनकी स्थिति डांवाडोल हो गई तो उन्होंने भी ऐसे ही उद्गार प्रकट किए थे। प्रधानमंत्री का अगला निशाना था भारतीय जनता पार्टी। उन्होंने कहा कि यह पार्टी 2-जी स्पेक्ट्रम मुद्दे पर इसलिए मुखर है, क्योंकि केंद्र सरकार ने गुजरात सरकार के एक मंत्री के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। जिस भी व्यक्ति को राजनीति की थोड़ी भी समझ है, वह मनमोहन सिंह के इस बयान को गंभीरता से नहीं लेगा। इसका पहला कारण यह है कि कोई भी दल महज एक राज्य सरकार के मंत्री के पक्ष में कुछ कानूनी रियायतें हासिल करने के लिए देश के सबसे बड़े घोटाले की अनदेखी करने का बेमेल मोलतोल नहीं करेगा। दूसरे, अगर भाजपा का मंतव्य यह था भी तो अन्य विपक्षी दल और मीडिया जेपीसी के गठन पर क्यों जोर देते रहे? इसके अलावा, क्या प्रधानमंत्री को पता नहीं है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा है। तो क्या अदालत सरकार को इसलिए घेर रही है कि भाजपा के हितों की पूर्ति नहीं हुई? इसी बीच, वह बार-बार दोहराते रहे कि न तो उन्होंने और न ही उनकी सरकार ने कुछ गलत किया है। उन्होंने अनेक मुद्दों पर अपनी चिंताएं जाहिर करते हुए संचार मंत्रालय को पत्र लिखे थे। तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा ने कहा था कि स्पेक्ट्रम का आवंटन ट्राइ या फिर टेलीकॉम आयोग ने नहीं सुझाया था। इसकी नीलामी में नए खिलाडि़यों को बराबरी का मैदान नहीं मिलेगा। यही नहीं, मनमोहन सिंह इसमें भी कुछ गलत नहीं पाते कि लाभार्थी कंपनियों ने आवंटन मिलते ही कंपनी की हिस्सेदारी बेचकर मोटा मुनाफा कमाया था। उन्होंने कहा था कि इस संबंध में आधारभूत नीति विद्यमान व्यवहार के अनुसार थी। मुझे उन लोगों की मंशा के बारे में कुछ पता नहीं है, जिन्होंने लाइसेंस हासिल किए और अपनी हिस्सेदारी ऊंचे दामों में बेच दी। कामकाज चलाने के लिए उन्हें पैसे की जरूरत है। वे कंपनी में हिस्सेदारी बेच सकते हैं या फिर पैसा उधार ले सकते हैं। इससे भी लचर और बेतुकी दलील थी, खाद्य व खाद सब्सिडी की तुलना स्पेक्ट्रम सब्सिडी से करना। अंत में, प्रधानमंत्री ने ठीकरा अपने गठबंधन सहयोगियों के सिर फोड़ दिया। उन्होंने कहा कि गठबंधन राजनीति में गठबंधन धर्म का निर्वाह करना पड़ता है। गठबंधन सरकार को चलाने के लिए कुछ समझौते करने पड़ते हैं। संसद में मनमोहन सिंह ने बार-बार इस राग को अलापा कि सरकार जेपीसी जांच के लिए राजी है, क्योंकि देश नाजुक बजट सत्र में बाधा पड़ने के जोखिम का सामना नहीं कर सकता। जेपीसी जांच को लेकर प्रधानमंत्री का प्रतिरोध और हठ लोकतंत्र की स्थापित परंपराओं के विरोध में जाती है। हमने अब तक जो तीन जेपीसी जांच देखी हैं, उनमें से दो के माध्यम से तो संसदीय शक्तियों और जिम्मेदारियों का विस्तार भी हुआ है। 1992 में प्रतिभूति और बैंकिंग लेनदेन के संदर्भ में हुई जेपीसी जांच में संसदीय पड़ताल के नए मापदंड तैयार किए गए। जेपीसी के आग्रह पर स्पीकर ने डायरेक्शन 99 में छूट प्रदान करते हुए जेपीसी को मंत्रियों व पूर्व मंत्रियों को तलब करने का विशेष अधिकार दिया था। जेपीसी ने 10 मंत्रियों और पूर्व मंत्रियों- मनमोहन सिंह, बी. शंकरानंद, वीपी सिंह, यशवंत सिन्हा, एसपी मालवीय, मधु दंडवते, चिंतामोहन, माधवराव सिंधिया, एनडी तिवारी और पी चिदंबरम को तलब किया था। इसी प्रकार 2001 में स्टॉक मार्केट घोटाले की जांच के लिए गठित जेपीसी को भी स्पीकर ने मंत्रियों को बुलाने का अधिकार दिया था। इस जेपीसी ने दो मंत्रियों और दो पूर्व मंत्रियों से लिखित बयान लिए और बाद में इन्हें साक्ष्यों के रूप में दर्ज किया। इस जेपीसी के सामने भी मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम हाजिर हुए थे। इस तथ्य के आलोक में कि अतीत में 14 मंत्री और पूर्व मंत्री जेपीसी द्वारा तलब किए जा चुके हैं और मनमोहन सिंह खुद भी दो बार जेपीसी के सामने पेश हो चुके हैं, 2-जी स्पेक्ट्रम को लेकर सरकार की जिद समझ से परे थी। इसके अलावा सरकार द्वारा जेपीसी सदस्यों की संख्या सीमित करने के तर्क में भी कोई दम नहीं है। इससे पहले गठित की गई प्रत्येक जेपीसी में सदस्यों की संख्या 30 तक रह चुकी है। अब जब संप्रग सरकार ने जेपीसी का गठन कर दिया है और यह समिति जांच-पड़ताल का अपना काम शुरू करने जा रही है तब उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही जांच एक दिन प्रधानमंत्री की 2 जी स्पेक्ट्रम जांच में हिचकिचाहट के कारणों पर प्रकाश डालेगी। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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