Friday, March 11, 2011

सियासत के सामने बाबा रामदेव


बाबा रामदेव काला धन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अभियान के बाद धीरे-धीरे राजनीतिक दलों का निशाना बनने लगे हैं। सबसे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने उन्हें अपना निशाना बनाया। उसके बाद सेवा दल के राष्ट्रीय समन्वयक नवनीत कालरा ने तो उनसे 32 सवाल पूछ डाले। अब राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उनका विरोध किया है। निश्चय ही आने वाले दिनों में रामदेव को ज्यादा तीखे राजनीतिक विरोधों और समस्याओं का सामना करना होगा। रामदेव को भी इसका आभास है। 27 फरवरी को राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित अपनी रैली में उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कालाधन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके अभियान के कारण राजनीतिक दल और नेता उनके विरुद्ध कुछ भी बोल सकते हैं। रामलीला मैदान की उनकी रैली की रिपोर्ट खुफिया विभाग ने सरकार को दी होगी। वास्तव में रामलीला मैदान उस दिन एक नए इतिहास का गवाह बना। राजनीतिक दल, राजनीतिक नेता, धर्म एवं संस्कृति के नाम से चलने वाले कुछ बड़े संगठन, कुछ जातीय संगठन अपनी शक्ति प्रदर्शन, सत्ता या अपने ही दल के नेतृत्व पर दबाव बढ़ाने के लिए इस मैदान में रैलियां करते हैं। पहली बार योगी के रूप में प्रसिद्ध संन्यासी ने सत्ता और राजनीति के विरुद्ध सीधे संघर्ष की दस्तक दी। आम रैलियों में उपस्थित समूह अपने नेता के प्रति जितना प्रतिबद्ध हो सकता है, उससे ज्यादा प्रतिबद्धता एवं स्पंदनशीलता उस दिन रामलीला मैदान में दिख रही थी। समूह की प्रतिक्रिया देखकर यह निष्कर्ष निकालना आसान था कि उनका मन बाबा रामदेव के अभियान के साथ एकाकार हो चुका है। पूरे देश में जगह-जगह वे ऐसी रैलियां कर रहे हैं। इससे सरकार सहित कई राजनीतिक दलों का परेशान होना स्वाभाविक है। दिल्ली रैली में रामदेव के अलावा केएन गोविंदाचार्य, कथावाचक विजय कौशल, अन्ना हजारे, राम जेठमलानी, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, रामदेव के साथी बालकृष्ण आदि भी थे, लेकिन उपस्थित जनसमूह इनके नाम पर नहीं, रामदेव के आह्वान पर आया था। उन्होंने रैली में साफ एलान किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई आरंभ हो गई है, उसे रोका नहीं जाएगा। हां, सरकार उनकी मांगे मान लेती है तो उनका संगठन आंदोलन छोड़कर योग और स्वास्थ्य के अपने मूल काम तक सीमित हो जाएगा। भारत स्वाभिमान की पांच मांगें देश के सामने पहले ही आ चुकी हैं। उनके पर्चो, बैनरों में हर जगह मोटे अक्षरों में लिखा होता है, कालाधन व भ्रष्टाचार को खत्म करने के पांच मुख्य उपाय और स्वामी रामदेव ने अपने मुख से इसे अल्टीमेटम के रूप में प्रस्तुत किया। ये हैं, 1. भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनाना व बड़ी करेंसी को वापस करना, 2. 2006 से स्थगित संयुक्त राष्ट्र की भ्रष्टाचार विरोधी संधि या कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन का अनुमोदन करना, 3. मॉरीशस रूट को बंद करना, 4. कालाधन जमा करने वाले विदेशी बैंकों पर भारत में प्रतिबंध लगाना एवं 5. विदेश खाता नीति की तुरत घोषणा करना। भारत स्वाभिमान कालाधन और भ्रष्टाचार के पांच मूल स्त्रोत मानता है- 1. बड़े नोट एवं अधिक नोट, 2. अवैध खनन, 3. विकास योजनाओं के धन की चोरी, 4. रिश्वतखोरी और पांचवां कर चोरी। सरकार की ओर से उनकी मांगों पर तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई, लेकिन सेवा दल के समन्वयक ने उनकी सपंत्ति का हिसाब मांग लिया और आरोप लगाया कि वे आरएसएस एवं भाजपा के लिए काम कर रहे हैं। लालू यादव ने भी उन्हें भाजपा का एजेंट बता दिया। वैसे दिग्विजय सिंह ने पहले ही उनके विरुद्ध तीखा बयान देकर सत्तारूढ़ समूह की भावना को अभिव्यक्त कर दिया था। हालांकि साधु-संतों से नाक-भौं सिकोड़ने वाले कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों को छोड़कर इन नेताओं का समर्थन करने वालों की संख्या अत्यंत कम है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि बाबा रामदेव बताएं कि उन्हें जिन लोगों ने धन दिया, वह सफेद था या काला। यह बयान सरकार के विरुद्ध ही जाता है। अगर लोगों के पास काला धन है तो यह सरकार की विफलता है या बाबा रामदेव या ऐसे दूसरे सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों की? दिग्विजय बेहतर जानते हैं कि राजनीतिक दलों को जो चंदा मिलता है, उसमें से कितना काला एवं कितना सफेद होता है। सरकार की चिंता समझ में आती है। भाजपा या दूसरी विरोधी पार्टियों द्वारा काला धन और भ्रष्टाचार पर आयोजित रैलियों से सरकार ज्यादा चिंतित नहीं होती, क्योंकि विपक्ष की यह स्वाभाविक भूमिका है। रामदेव भी जब तक केवल अपने योग शिविरों में बोलते थे तो इनके लिए चिंता का कोई विशेष कारण नहीं होता था, लेकिन जब उन्होंने इसे बाजाब्ता राजनीतिक अभियान का स्वरूप दिया और दिनानुदिन उनकी और साथ जुड़ने वालों की आवाज प्रखर होने लगी, भविष्य में राजनीतिक दल या मंच बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा होने लगी तो इनकी पेशानी पर बल पड़ने लगा है। निश्चित रूप से रामदेव द्वारा बताए गए कालाधन और भ्रष्टाचार के कारणों और समाधान के उपायों को पूर्ण नहीं माना सकता, लेकिन ये पांचों कारण हैं और जो पांच उपाय सुझाए गए हैं, उनसे कालाधन और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। लेकिन रामदेव की हुंकार का महत्व कालाधन, भ्रष्टाचार के कारणों या उसके निदान के गुण-दोष पर बहस में नहीं है। इसका महत्व संघर्ष की घोषणा और उसकी तैयारी के संदर्भ में है। किसी संन्यासी ने पहली बार व्यवस्था को भ्रष्ट कहते हुए उसे बदलने का आह्वान किया और देशव्यापी दौरा करके इसके लिए बाजाब्ता संगठन खड़ा किया है। कहा जा रहा है कि इस समय देश के 500 जिलों में भारत स्वाभिमान की ईकाई बन चुकी है। कांग्रेस एवं भाजपा को छोड़कर किसी दूसरे दल की इतनी क्षमता नहीं है। रामदेव जिलों का दौरा करते हैं, योग भी सिखाते हैं, भारत की वर्तमान स्थिति की जो उनकी समझ है, उसे आक्रामक तरीके से रखते हैं तथा उसे बदलने के लिए संघर्ष हेतु तैयार होने की अपील करते हैं। योग के माध्यम से बड़ी संख्या में लोग भावनात्मक रूप से उनसे जुड़े। वे जो आंकड़े रखते हैं, उनमें से ऐसे कई हैं, जिन्हें अधिकृत नहीं कहा जा सकता। साथ ही उनका व्यावहारिक रूपांतरण भी संभव नहीं, किंतु वह लोगों को अपील करता है। मसलन, वे कहते हैं कि भारत भूमि के भीतर इतने अरब या खरब का खनिज उपलब्ध है और इससे भारत का कायाकल्प हो सकता है तो ऐसा लगता है मानो उनके लोगों के हाथों शासन आते ही खनिजों का एकमुश्त धन मिलेगा और उससे देश संपन्न हो जाएगा। यह संभव नहीं। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से प्रेरित औद्योगिक क्रांति ने खनिजों का अंधाधुंध दोहन किया है। भारतीय सोच के अनुसार निर्मित व्यवस्था में पृथ्वी के खनिजों की अंधाधुंध खपत या बिक्री के लिए जगह नहीं हो सकती। तात्पर्य यह कि जिस व्यवस्था की वे कल्पना करते हैं, उसमें व्यावहारिकता की कमी है और मौलिकता का भी अभाव है। लेकिन वे झूठ नहीं बोलते। यह उनकी सोच है और उनसे लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस समय बाबा रामदेव राजनीतिक सत्ता बदलने की बात कर रहे हैं। वे ऐसा कर पाएंगे, इसमें भी संदेह की गुंजाइश है, क्योंकि दो प्रमुख दलों तथा राज्यों में कई क्षेत्रीय दलों की ताकत बहुत ज्यादा है। उनके साथ जाने-अनजाने भारी संख्या में लोग निहित स्वार्थ देखते हैं। रामदेव की राजनीति का अर्थ इस समय की स्थापित समस्त राजनीतिक शक्तियों को पराजित करना है। यह काम कितना कठिन है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अभियान को इतनी दूर लाने के बाद जिन कुछ लोगों को उन्होंने साथ लिया, उनसे आगे समस्याएं भी आएंगी, लेकिन स्वामी रामदेव के अभियान से राजनीतिक प्रतिष्ठान के अंदर खतरा महसूस होने लगा है। भाजपा बाबा के खिलाफ इस समय इसलिए नहीं है, क्योंकि उनका हमला केंद्र सरकार के विरुद्ध लगता है। वस्तुत: उसका स्वर संपूर्ण राजनीति के विरुद्ध है। हालांकि ऐसा करने वाले रामदेव अकेले नहीं है। देश भर में अनेक लोग संगठन बनाकर या व्यक्तिगत स्तर पर व्यवस्था बदलने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन बाबा रामदेव की प्रसिद्धि, उनकी छवि, उनकी प्रखर आवाज और उनके अपने प्रयासों से उपलब्ध संसाधनों आदि के संयोग ने उन्हें इस समय परिवर्तन की मुहिम के शीर्ष पर ला दिया है। यह कोई भी महसूस कर सकता है कि बाबा रामदेव के अभियान से शासन के विरुद्ध लोक जागरण हो रहा है। इसका कुछ न कुछ असर जरूर होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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