Friday, April 29, 2011

कांग्रेस पर कसता घेरा


मजबूत लोकपाल बिल और इसका मसौदा तैयार करने वाली समिति में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग को लेकर अन्ना हजारे का आमरण अनशन शुरू होते ही संप्रग सरकार ने अप्रैल के पहले सप्ताह में उनके सामने घुटने टेक दिए। अन्ना के गांधीवादी, अहिंसक और अनुशासित प्रदर्शन ने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींचा और भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश को आंदोलित कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के आक्रोश को कमतर आंकने वाली मनमोहन सरकार आंदोलन की जबरदस्त लोकप्रियता से हिल गई और उसने अन्ना की मांगों के सामने समर्पण करने में जरा भी देर नहीं लगाई। सरकार ने बिल का प्रारूप तैयार करने वाली दस सदस्यीय समिति के सदस्यों की घोषणा कर दी। एक बार संकट से निकलते ही कांग्रेस ने चालबाजियों का पिटारा खोल दिया। कांग्रेस नेताओं ने अन्ना हजारे और समिति के अन्य सदस्यों पर व्यक्तिगत रूप से निशाना साधना शुरू किया। महाराष्ट्र में धूल फांक रही एक आयोग की जांच रिपोर्ट को झाड़-पोंछ कर निकाला गया ताकि अन्ना हजारे को भी दागी सिद्ध किया जा सके। जांच रिपोर्ट के अनुसार, अन्ना हजारे ने अनधिकृत तौर पर एक जन्मदिन पार्टी में लाखों रुपये खर्च किए थे। येद्दयुरप्पा सरकार के खिलाफ संघर्षरत कर्नाटक के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े पर आरोप लगाया कि वह प्रदेश में भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने कामयाब नहीं रहे। शांति भूषण और उनके बेटे को पहले एक सीडी के जरिए बदनाम करने की कोशिश की गई और बाद में इस आधार पर उनकी आलोचना की गई कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार से बेशकीमती जमीन कौडि़यों के भाव अपने नाम आवंटित कराई है। यही नहीं, अन्ना हजारे के खिलाफ अभियान छेड़ने से पहले उन्होंने बाबा रामदेव को निशाना बनाया, जिन्होंने स्विस तथा अन्य विदेशी बैंकों में भारतीय उद्योगपतियों व नेताओं के जमा काले धन को भारत लाने की मुहिम छेड़ रखी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस को इन प्रयासों का कुछ फायदा जरूर हुआ है। इससे निश्चित तौर पर अन्ना हजारे और उनकी टीम की छवि पर दाग लगा है। इस सफलता पर कांग्रेस पार्टी के कथित रणनीतिकार इतराते फिर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या भारत की सबसे पुरानी पार्टी, जिसने देश में भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण किया है और जो अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार चला रही है, भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनरत कुछ लोगों पर कीचड़ उछाल कर देश के लोगों के मानस को बदल सकती है? कांग्रेस के नेताओं को खुद से पूछना चाहिए कि क्या इस पूरी कवायद से सरकार को रत्ती भर भी राहत मिली है? कांग्रेस और संप्रग सरकार अगर इस खुशफहमी में हैं कि भ्रष्टाचार विरोधियों पर हमले से उन्हें लाभ होगा तो वे भुलावे में हैं। जल्द ही उनकी खुशी काफूर होने वाली है। असलियत में, कांग्रेस पार्टी और संप्रग सरकार 2011 के उत्तरार्ध में और भी बड़ी मुसीबतों में फंसने जा रही हैं। इसके तीन प्रमुख कारण हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की गर्दन दबा रखी है और वह 2 जी स्पेक्ट्रम, हसन अली व विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामलों में सरकार पर त्वरित व कारगर जांच का दबाव डाल रहा है। सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में काम कर रही सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नतीजे दिखाने शुरू कर दिए हैं। विकिलीक्स के जूलियन असांजे ने चेतावनी जारी की है कि किसी दिन स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों के काला धन जमा करने वाले खाताधारकों के नामों का खुलासा हो सकता है। और अंत में, विख्यात योग गुरु बाबा रामदेव, देश में जिनके लाखों अनुयायी हैं, ने सरकार को भ्रष्टाचार के अनेक मामलों पर कार्रवाई करने को मजबूर करने के लिए अपने एक लाख अनुयायियों के साथ दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह शुरू करने की समयसीमा 4 जून तय कर दी है। उच्चतम न्यायालय भी सरकार की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। इसने सरकार की दलीलों को मानने से इनकार कर दिया है और भ्रष्टाचार के सभी मामलों पर सरकार पर दबाव डाल रहा है। अदालत के दबाव ने सीबाआइ और ईडी को 2 जी स्पेक्ट्रम की तेजी से जांच करने को मजबूर कर दिया है और स्वान टेलीकॉम तथा कलैगनर टीवी को मिली मोटी रकम भी जांच के घेरे में है। इसने सरकार को राजस्व सचिव की अध्यक्षता में दस सदस्यीय उच्चाधिकार समिति का गठन करने को मजबूर किया है जो विदेशी बैंकों में जमा काले धन को भारत लाने के लिए उचित कदम उठाएगी। उच्चतम न्यायालय सरकार के रवैये से असंतुष्ट है। इसे लगता है कि जांच केवल हसन अली मामले तक सीमित है। सरकार की चिंता यह भी है कि जूलियन असांजे ने कहा है कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों के नामों का विकिलीक्स बम किसी भी दिन फट सकता है। उन्होंने कहा कि स्विस बैंकों में सबसे अधिक काला धन भारतीयों का जमा है। असांजे के अनुसार भारत सरकार इस मामले में कारगर उपाय नहीं कर रही है। यही नहीं, दोहरी कराधान संधि के कारण विदेशी बैंकों के खाताधारकों के नाम जाहिर न करने की भारत सरकार की दलील को भी उन्होंने थोथा करार दिया है, क्योंकि ये मामले कर चोरी के नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के हैं। इन बैंक खातों में घूसखोरी या फिर इसी तरह की अन्य अवैध कमाई जमा है। सब जानते ही हैं कि रिश्वत की कमाई पर कोई कर अदा नहीं करता। सरकार के जले पर नमक बाबा रामदेव ने छिड़क दिया है। उन्होंने 4 जून से दिल्ली में भ्रष्टाचार मिटाओ सत्याग्रह करने की घोषणा कर दी है। उनकी अनेक मांगें हैं। इनमें अगस्त 2011 तक मजबूत लोकपाल बिल लाना, विदेशी बैंकों में जमा काले धन को तत्काल राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करना, यूएन कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन पर तुरंत हस्ताक्षर करना, 500 और 1000 के नोटों पर रोक लगाना और व्यवस्था के तमाम अंगों से ब्रिटिश राज के प्रावधान खत्म करना शामिल हैं। योगगुरु पिछले साल से भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाए हैं। बाबा रामदेव की छवि को कलंकित करने और उनकी समृद्धि पर सवाल उठाने के कांग्रेस पार्टी के हालिया प्रयास अभी तक कामयाब नहीं हुए हैं। वास्तव में, कांग्रेस या किसी भी अन्य पार्टी में रामदेव जैसा कोई नेता नहीं है, जिनके चाहने वाले देशभर में फैले हैं। अब योगगुरु ने फैसला किया है कि वह अपने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को 4 जून से नए जोशोखरोश से शुरू करेंगे। ये तमाम टाइम बम फटने ही वाले हैं और 24 अकबर रोड पर नेता अन्ना हजारे की टीम पर हमलों से मिले तुच्छ लाभ पर खुशी मना रहे हैं। विनाशकाले विपरीत बुद्धि इसी को कहते हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).

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