Monday, February 27, 2012

तीन दशक से सुलग रहा हाईकोर्ट बेंच का सवाल

सस्ता और सुलभ न्याय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए दूर की कौड़ी है। प्रदेश में इलाहाबाद में हाईकोर्ट और लखनऊ में हाईकोर्ट की बेंच है। इलाहाबाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोर सहारनपुर जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 750 किलोमीटर और दूसरे छोर मैनपुरी की लगभग 450 किलोमीटर है। गरीबों के लिए हाईकोर्ट से न्याय पाने की हरसत पूरी करना नामुमकिन नहीं तो दुारियां भरा जरूर है। इस क्षेत्र के लोगों को सस्ता और सुलभ न्याय मिले यह हक दिलाने के मकसद से अधिवक्ताओं ने तीन दशक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना किए जाने की हुंकार भरी और आंदोलन की राह पकड़ी। तीन दशक बाद भी इस आंदोलन की चिंगारी सुलग रही है। अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, केन्द्रीय विधि मंत्री के दरबार में दस्तक दी। संसद और विधानसभा में भी यह मुद्दा कई बार उठा मगर आंदोलनरत अधिवक्ताओं के हाथ कुछ नहीं आया। क्षेत्रीय नेताओं ने हाईकोर्ट बेंच की स्थापना को लेकर अधिवक्ताओं के सुर में सुर मिलाया मगर संसद में वह इस मुद्दे को धार देने से बचते रहे। यहां अधिवक्ता सड़क पर उतरे तभी पूर्वाचल में इस मांग का विरोध मुखर हो गया। प्रमुख राजनीतिक दलों खासकर भाजपा और कांग्रेस में इस मुद्दे को लेकर अभी तक पूर्वाचल के सियासतदां ही भारी पड़ते नजर आये। विधानसभा चुनाव में सभी दलों के प्रत्याशी अधिवक्ताओं के वोट पाने को ललायित हैं, मगर राजनीतिक दलों की चुनावी सभाओं में अधिवक्ताओं का दर्द सुनायी नहीं पड़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपराधिक वारदातों के आरोपितों की जमानत की सुनवाई जिला अदालत में होती है। जिला अदालत से जमानत अर्जी खारिज होने के बाद वादी और प्रतिवादी इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करते हैं। पीड़ितों में ऐसे गरीब भी होते हैं, जिनके लिए इलाहाबाद जाकर अधिवक्ता करना और आने जाने का खर्च वहन करना बूते से बाहर ही होता है। गरीबों को भी सस्ता और सुलभ न्याय मिले, सभी राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के नंबरदार इसकी वकालत करते रहे हैं। मगर विडम्बना यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए यह हक दूर की कौड़ी ही साबित हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच स्थापित किए जाने की मांग अर्से से उठती रही है। आंदोलनरत अधिवक्ताओं का तर्क है कि मध्यप्रदेश की आबादी लगभग सात करोड़ है। इस राज्य में जबलपुर में हाईकोर्ट और इंदौर व ग्वालियर में खंडपीठ है। महाराष्ट्र की आबादी लगभग 8 करोड़ है। मुम्बई में हाईकोर्ट और नागपुर व औरंगाबाद में खंडपीठ है। उत्तर प्रदेश की आबादी 20 करोड़ से ज्यादा है, इसके बावजूद इलाहाबाद में हाईकोर्ट व लखनऊ में खंडपीठ ही है। मिले आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल 2,94,413 वर्ग किलोमीटर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने को संर्घषरत जनपदों का क्षेत्रफल 98,933 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के क्षेत्रफल का 33.61 फीसदी है। इलाहाबाद मेरठ से 637, मुजफ्फरनगर से 693, सहारनपुर से 752, बागपत से 700 और गाजियाबाद से 607 किलोमीटर की दूरी पर है। 1981 में यह मुद्दा तब गरमाया जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर समेत 18 जनपदों के अधिवक्ता लामबंद हो गये और उन्होंने केन्द्रीय संघर्ष समिति अस्तित्व में लाकर आंदोलन का बिगुल फूंका। तब इन जनपदों के अधिवक्ता लगभग साढ़े तीन माह तक न्यायिक कायरे से विरत रहे। इसके बाद हर शनिवार को न्यायिक कार्य से विरत रहने की राह पकड़ी, जो तीन दशक बाद भी जारी है। तीन दशक के सफर में अधिवक्ताओं ने सत्ताधीशों और नौकरशाहों को आइना दिखाने के लिए वह हर फार्मूला अपनाया, जो उनके बूते में रहा। लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव अधिवक्ताओं ने हर चुनाव में सियासी दलों पर इस मांग का समर्थन करने का दबाव बनाया। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि अधिवक्ताओं की वोट पाने की मंशा रही या फिर वादा कर भूलने की आदत। चुनावी अखाड़े में उतरे यहां के प्रत्याशियों ने हाईकोर्ट की खण्डपीठ की स्थापना के संघर्ष में सहभागिता करने का दम भरा और चुनाव बाद उनके एजेंडे से यह मुद्दा गौण ही नजर आया। केन्द्रीय संघर्ष समिति का चेयरमैन मेरठ बार एसोसिएशन का अध्यक्ष होता है। मेरठ बार एसोसिएशन के कई अध्यक्ष बदले मगर हर अध्यक्ष के कार्यकाल में यह मुद्दा एसोसिएशन के एजेंडे में जीवंत रहा। करीब दो दशक तक आंदोलन की गति धीमी रही, मगर वर्ष 2000 में अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को धार देने की राह पकड़ी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनेताओं ने भी अधिवक्ताओं की मांग को जनहितैषी करार दिया। मगर सच्चाई यह भी है कि इस आंदोलन को जनांदोलन बनाने की, उनमें इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट नजर आया। राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह भी कई बार अधिवक्ताओं के बीच आये और इस मांग का समर्थन किया। श्री सिंह ने अधिवक्ताओं को यह कहकर हरित प्रदेश निर्माण आंदोलन में सहभागिता के लिए आमंत्रित किया कि हरित प्रदेश का निर्माण होगा तो हाईकोर्ट बेंच नहीं बल्कि हाईकोर्ट ही मिल जाएगी। यह बात दीगर है कि हरित प्रदेश निर्माण भी सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में हाईकोर्ट बेंच का मुद्दा जोर-शोर से उठा। मेरठ-हापुड़ सीट से जीत दर्ज कर भाजपा के राजेन्द्र अग्रवाल संसद में पहुंचे। सांसद श्री अग्रवाल के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय विधि मंत्री के अलावा अन्य कई केन्द्रीय मंत्रियों के दरबार में गया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने की मांग की। पिछले तीन वर्षो में आंदोलनरत अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को धार देने में कसर नहीं छोड़ी। मेरठ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे गजेन्द्र धामा के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व महासचिव राहुल गांधी के अलावा कई केन्द्रीय मंत्रियों के पास पहुंचे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच के समर्थन में मांगपत्र सौंपे। हाईकोर्ट बेंच स्थापना संघर्ष समिति के चेयरमैन सतीश गुप्ता बताते हैं कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश पुनर्गठन की मांग उठी। तत्कालीन सत्ताधीशों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने का भरोसा दिलाया। डा. संपूर्णानंद सरकार ने विधानसभा में इसी आशय का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजा। 1976 में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार ने भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया। बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में निश्चित प्रस्ताव पारित कर खंडपीठ स्थापना की संस्तुति प्रदान की और इस प्रस्ताव को केन्द्र को भेजा। 18वें विधि आयोग ने 5 अगस्त 2009 को केन्द्रीय विधि मंत्री के समक्ष खुद की 229वीं रिपोर्ट में उच्चतम न्यायालय की चार बेंच होने की सिफारिश की। 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विनाथ प्रताप सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित किये जाने की संस्तुति की, तब तत्कालीन केन्द्र सरकार ने जसवंत सिंह आयोग का गठन किया। इस आयोग की रिपोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित किये जाने की संस्तुति की गयी। 21 जुलाई 1986 को संसद में तत्कालीन नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रश्न संख्या 45 में राज्यसभा में केन्द्र सरकार से पूछा,‘जसवंत सिंह आयोग की संस्तुति के अनुरूप पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के गठन में विलम्ब क्यों किया जा रहा है?’ इसके जवाब में तत्कालीन विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा था,‘सरकार इस बात पर सहमत है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ की स्थापना की जाए, स्थान का चयन बाकी है..।इस बार विधानसभा चुनाव की आहट पाकर यहां अधिवक्ताओं ने सियासी दलों को तेवर दिखाये। चुनावी बयार में यहां कमोबेश सभी प्रमुख सियासी दलों के प्रत्याशी कचहरी में अधिवक्ताओं से वोट मांगने पहुंचे। इस दौरान अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट बेंच की स्थापना का सवाल दागा, तब इन प्रत्याशियों ने इस मुद्दे को लेकर संघर्ष में सहभागिता करने का भरोसा दिलाया। अधिवक्ता विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे मगर तीन दशक बाद भी हाईकोर्ट बेंच स्थापना का संघर्ष अंतहीन होने का दर्द, उन्हें कचोटना स्वाभाविक है।

No comments:

Post a Comment