Saturday, February 18, 2012

कब टूटेगा जात-पांत का तिलिस्म


डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कभी कहा था कि हिंदू मान्यताओं पर जातिवाद का प्रभाव बहुत ही गहरा है। इस जातिवाद ने जनता की भावनाओं को मार दिया है। यहां तक कि जाति ने जनसामान्य कि नैतिकता की सोच तक को बर्बाद कर दिया है। अब इन विचारों की प्रतिध्वनि विधानसभा के मौजूदा चुनावों में देखी-सुनी जा सकती है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए और उनके बड़े नेताओं के लिए यह विचार करना महत्वपूर्ण है कि क्या वे चुनाव विचारों पर लड़ रहे हैं या किसी और के नाम पर। उनके भाषणों और प्रचार के तरीकों से पता चलता है कि यह चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लड़े जा रहे हैं। पारंपरिक जातिवाद देश में धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है, लेकिन देश के नेता इसे उभार कर हमारी राष्ट्रीय जीवन को खतरे में डाल रहे हैं। दुर्भाग्य से इस देश में सारे चुनाव जात-पात पर लड़े और जीते जाते हैं। उम्मीदवार अपनी जातियों के समर्थन से चुनाव लड़ते हैं और यही नेता जीतने के बाद जातिवाद को बरकरार रखते हैं और अपने जाति वालों को विशेष महत्व देते हैं। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जो जातिवादी राजनीति के शिखर पर हैं, वहां के नेताओं को जैसे सोने की खान ही मिल गई है और उन लोगों ने इतनी अकूत दौलत जमा कर ली है कि उनकी कई पीढ़ी बैठकर अय्याशी कर सकती है। चुनावों के दौरान दलित वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होता है। तथाकथित दलित नेता दलितों को कई समूहों में विभाजित कर देते हैं। 2008 में ओडिशा में हुए चुनाव में दलित ईसाइयों को धमकाया गया था कि अगर वे बताए गए उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देंगे तो उनके हाथ काट दिए जाएंगे या उनके घरों को जला दिया जाएगा। हमारे देशवासी अपने ही उन देशवासियों को प्रताडि़त करते हैं, जो दलित कहे जाते हैं। तथाकथित और स्वयंभू दलित नेता सभी दलितों से अपने पक्ष में मतदान करवाते हैं और अपार सफलता हासिल करते हैं। पर इसके बदले में वे दलितों को गरीबी और निरक्षरता के अलावा कुछ नही देते हैं। तमाम बदलावों के बावजूद दलित आज भी पहले जैसी हालत में हैं। जाति और धर्म की छाया में निर्वाचन आयोग ने चुनावी तिथियों की घोषणा से पहले उत्तर प्रदेश में एक सर्वे कराया था, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हुआ। इससे पता चला था कि मतदाताओं में सभी नेताओं के प्रति खासी नाराजगी है और बड़ी संख्या में मतदाताओं की मांग थी कि जो राजनीतिक दल परिवारवाद पर चल रहे हैं, उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। सर्वेक्षण से साफ हुआ था कि मतदाता जाति से परे राजनीति के पक्षधर थे। वह चाहते थे कि भ्रष्टाचार के आरोपी उम्मीदवारों को चुनाव में टिकट नहीं दिया जाए और वोट डालते समय मतदाताओं की सुरक्षा की जाए। यह अच्छी बात है कि मतदाता इन सब विवादों से बाहर आकर जाति तथा संप्रदाय से प्रभावित हुए बिना वोट डालना चाहते हैं, लेकिन सवाल यही कि क्या यह संभव होगा या क्या हमारे राजनीतिक दल ऐसा होने देंगे? दरअसल, आज की प्रतिस्पर्धी भारतीय राजनीति में जातिवाद महत्वपूर्ण हो गया है। प्राचीनकाल में मनु ने भारतीय समाज को जाति-परंपरा में बदला था। तब से हर भारतीय की जिंदगी, विवाह, पूजा-पाठ और अन्य अधिकार जाति आधारित हो गए हैं। दुर्भाग्य से जाति प्रथा धीरे-धीरे और मजबूती से भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमाती जा रही है और इस बीच तत्कालीन शासक लगातार जाति आधारित राजनीति के बलबूते शासन करते रहे। आजादी के बाद जातिवादी राजनीति ने इतनी जबरदस्त भूमिका निभाई कि नए राज्यों का निर्धारण इसी आधार पर किया गया। आज की राजनीति पूरी तरह कारोबार हो गई है। हमारे देश की इस तरह की राजनीति में संस्थागत और गठबंधन सहयोग बहुत जरूरी हो गया है। इसके चलते राजनीति और जातिवाद का आपसी तालमेल अहम हो गया है। जाहिर है, इसका खामियाजा भी देश की आम जनता को ही भुगतना पड़ रहा है। बिहार विधानसभा चुनावों में जातिवादी राजनीति के खत्म होने की किरण दिखी थी। दरअसल, बिहार के लोग विकास और जनसुधार के लिए खड़े हुए थे। बिहार के मतदाताओं ने अपने नेताओं को यह साफ संकेत दिया था कि जब तक उनके सामान्य जीवन में विकास नहीं होगा, जाति की राजनीति नहीं चल पाएगी। बिहार के लोगों ने अच्छी शिक्षा, अच्छी आर्थिक स्थिति और सामाजिक परिवर्तन की मांग करते हुए मतदान किया था। अब वहां आर्थिक बदलाव की बयार बह रही है और बिहार बदल रहा है। बहरहाल, सच यह भी है कि अब दलितों की जीवनशैली तेजी से बदल रही है और वे अपने परंपरागत पेशे को छोड़कर आसपास के शहरों में अच्छी नौकरियां तलाश रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बसे आधे से अधिक दलित परिवारों का खर्च शहरों से आने वाले मनीऑर्डर पर निर्भर है। इस आर्थिक बदलाव से जातिवाद को लेकर उनके दिलो-दिमाग में बैठी हीन भावना कम हो रही है, क्योंकि शहरी दलित रहन-सहन, जाति और संप्रदाय से काफी दूर है। अब अच्छी शिक्षा, अच्छी आर्थिक स्थित और सामाजिक समानता पाने की उनकी अपेक्षा बढ़ गई है। देश के पहले सार्वजनिक चुनाव में अंबेडकर को महसूस हुआ था कि दलितों के हितों की सुरक्षा के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। संविधान में पिछड़ों को विशेष सुरक्षा मिली हुई है। इनके लिए आरक्षण के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक समानता दिलाने की कोशिश की गई है, लेकिन यही आरक्षण भारतीय राजनीति को गलत तरीके से प्रभावित कर रहा है। इस प्रकार से यही जातिवाद आज जातिविहीन समाज के निर्माण में सबसे बड़ा रोड़ा है। राजनेता भी एक तरफ तो चाहते हैं कि समाज में फैली ऊंच-नीच की भावना और भेदभाव को खत्म किया जाए तो दूसरी तरफ वे अच्छी तरह से जानते हैं कि यही भेदभाव उन्हें वोट दिलाने में सहायक है। इसी के चलते वे जातिवादी संस्थाओं को प्रोत्साहित करते हैं। इन जातिवादी गुटों में जितनी अधिक सदस्य संख्या होती है, उतना ही अधिक उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी मिलती है। चुनाव में सीटों का आरक्षण भी दलित राजनीति को और उलझा रहा है। दलित कोई एक जाति नहीं होती है। आज जितनी जातियां हैं, उतने ही दलित नेता बढ़ते जा रहे हैं। हर जाति का दलित नेता अपनी खुद की जाति पर अधिक ध्यान देता है। इस प्रकार आज सत्ता उन लोगों के हाथों में है, जो खुद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरोधी हैं। पर अब वक्त आ गया है कि असली सच्चाई की तरफ सबका ध्यान खींचा जाए। उत्तर प्रदेश और बिहार में वर्ष 1990 तक राष्ट्रीय दलों का दबदबा था, लेकिन उसके बाद यहां पिछड़ी जाति के नेताओं की राजनीतिक मामलों में पकड़ कायम हुई, जो आज भी बदस्तूर जारी है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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