Wednesday, February 29, 2012

मुस्लिम करेंगे आखिरी चरण का फैसला

यूपी का आखिरी द्वार यानी सातवें चरण के चुनाव का फैसला रुहेलखंड के मुसलमान वोटरों के हाथ होगा। मुस्लिम को अपने पाले में करने के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सबसे दिलचस्प जंग इसी इलाके की 60 सीटों पर होनी है। लोकसभा चुनाव की तरह ही इस दफा भी मुस्लिम मतों की प्रत्याशा में जहां कांग्रेस ने इलाके में पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं सपा भी अपने विश्वसनीय वोटबैंक को इस दफा छिटकने न देने के लिए सारे घोड़े छोड़े हुए है। मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस-सपा की तगड़ी दावेदारी का फायदा उठाने के लिए भाजपा की सारी उम्मीदें हिंदू मतदाताओं के धु्रवीकरण की तरफ जुटी हैं। मायावती के लिए पिछली बार की सफलता दोहराने को पुराना समीकरण साधना फिलहाल बहुत मुश्किल दिख रहा है। 3 मार्च को होने वाले आखिरी चरण के चुनाव में 31 सीटें ऐसी हैं, जहां 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। 16 सीटों में 20 से 29 फीसदी तक मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में 60 में से 46 सीटों पर सीधे तौर पर नतीजों की चाभी मुस्लिमों के रुख पर होगी। गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिम मतों के दम पर ही इलाके में चमत्कारिक प्रदर्शन किया था। 2007 के विस चुनाव में कांग्रेस इलाके में 8.3 फीसदी मत लेकर एक सीट पर ही जीत सकी थी। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस ने विधासभावार 21.1 मत हासिल किए और इस लिहाज से उसकी 15 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। खास बात है कि लोकसभा चुनाव के हिसाब से रालोद को भी 4.3 प्रतिशत मत और पांच विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली। इस दफा कांग्रेस-रालोद गठजोड़ के तौर पर मैदान में है और वही प्रदर्शन दोहराने की प्रत्याशा में राहुल गांधी ने यहां सबसे ज्यादा मुस्लिम क्षेत्रों में ही फोकस किया है। रामपुर में बेगम नूरबानो तो शाहजहांपुर में केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद की भी परीक्षा होगी। राहुल को मुस्लिम क्षेत्रों में रोड शो में मिले समर्थन से कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं। हालांकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने आजम खान को वापस लाने से लेकर उलेमाओं और दूसरे धार्मिक नेताओं का खूब समर्थन जुटाया है। उनके पुत्र अखिलेश चुनाव के बहुत पहले से भी इस क्षेत्र में जूझते रहे। गत विस चुनाव में सपा 23 फीसदी मतों संग 18 सीटें जीती थी। लोस चुनाव में उसे भी तीन फीसदी वोटों का फायदा हुआ था। इसका नतीजा था कि पार्टी को 22 सीटों पर बढ़त मिली थी। सपा-कांग्रेस जंग का फायदा उठाने के लिए भाजपा इस दफा कोई कसर नहीं छोड़ रही। विस चुनाव में उसे 19.3 फीसदी मतों के साथ 9 सीटें मिली थीं। लोस चुनाव में मात्र एक फीसदी वोट बढ़ने से वह 14 विस सीटों पर नंबर एक पर थी। भाजपा की पूरी कोशिश, पिछले लोस चुनाव के दौरान कांग्रेस के पाले में गया सवर्ण व पिछड़ा वोट अपने पाले में खींचने की है। वैसे भी 1991 से लेकर अब तक भाजपा को सबसे ज्यादा सफलताएं इसी रुहेलखंड क्षेत्र से मिलती रही हैं। गुरुवार से इस इलाके में चुनाव प्रचार थमने से शोर जरूर कम हो जाएगा लेकिन दलों की मशक्कत जारी रहेगी। वोटों की इस गुणाभाग में सबसे ज्यादा चुनौती बसपा के सामने है। 2007 के विस चुनाव में मायावती की दलित-अगड़ा-मुस्लिम केमिस्ट्री ने गुल खिलाया था। 27.8 फीसदी मतों के साथ वह 30 सीटों पर थी, जबकि लोस चुनाव में चार फीसदी मतों के नुकसान भर से ही उसे 26 सीटों का नुकसान हुआ था और वह मात्र चार विस क्षेत्र में ही पहले नंबर पर थी। 

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