Thursday, November 24, 2011

यूपी का विभाजन ठीक लेकिन चिंदी-चिंदी नहीं


पूर्वाचल निर्यातक संघ के उपाध्यक्ष मुकुंद अग्रवाल विभाजन के पक्षधर हैं पर सूबे को चिंदी-चिंदी करना ठीक नहीं मानते। कहते हैं, बंटवारे का तरीका उचित नहीं। यदि अलग राज्य बनता है तो विकास होगा पर इसके पहले संसाधनों की बहाली तो हो। वैसे यह पूरा का पूरा मामला ही राजनीतिक है। इसमें विकास के कण शामिल नहीं है। आइटी बीएचयू के प्रो. केके श्रीवास्तव कहते हैं कि विकास का तर्क देकर प्रांत का विभाजन करना तर्कसंगत नहीं है। विकास के लिए पंचायतों को मजबूत करना होगा, स्वायत्तता देनी होगी। विभाजन की घोषणा तो कर दी गई लेकिन इसका खाका तक नहीं प्रस्तुत किया गया। विकास का आधार सिर्फ संसाधनों की उपलब्धता ही नहीं बल्कि आपसी सामंजस्य भी है। विधि संकाय बीएचयू के डॉ. एके पांडेय का कहना है कि अभी वह वक्त नहीं आया है कि प्रांत के विभाजन की बात शुरू की जाती। पूर्वाचल में न तो संसाधन है और न ही उद्योग धंधे। पहले यहां तमाम सुविधाएं बहाल की जाती। सदन में बगैर किसी बहस के प्रांत के अस्तित्व खत्म करने का निर्णय ले लिया जाए यह स्वच्छ और स्वस्थ राजनीति की परिधि में नहीं आता। लक्ष्मी मेटल इंडस्ट्रीज, गोरखपुर के सीईओ मनोज अग्रवाल कहते हैं कि छोटा राज्य होगा तो तरक्की होगी। पूर्वाचल जो टैक्स देता है वह यूपी में सेंट्रलाइज हो जाता है और उससे अन्य क्षेत्रों का विकास किया जाता है, पूर्वाचल उपेक्षित है। अलग राज्य हो जाने से यहां का पैसा यहीं लगेगा। सरकार ने बंटवारे का जो तरीका अपनाया है वह जरूर गलत है। इस पर बहस होनी चाहिए थी। साहित्यकार आचार्य रामदेव शुक्ल कहते हैं कि प्रशासनिक इकाइयां जितनी छोटी होती हैं, शासन उतना अच्छा होता है, लेकिन जो प्रस्ताव पास हुआ वह गलत है। देश में अनेक जगहों पर विभाजन की मांग की जा रही है। ऐसे में उचित होगा कि राज्य पुनर्गठन आयोग बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर इसका अध्ययन किया जाए कि किस प्रकार व किन आधार पर विभाजन किए जाएं। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रवक्ता डॉ. अनुराग कहते हैं कि वह छोटे राज्यों के पक्षधर हैं लेकिन इसमें दो बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। एक प्रशासनिक पहुंच आमजन तक हो व दूसरा कल्याणकारी योजनाओं का आमजन को पूरा लाभ मिले। पूर्वाचल भी अति पिछड़ा हुआ है। कायदे से विधानसभा में बहस होनी चाहिए थी। सत्तापक्ष व विपक्ष अपनी बातें रखते, तो तमाम बातें साफ होतीं।

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