Tuesday, November 6, 2012

बिहारी अस्मिता की राजनीति



पटना में रविवार को अधिकार रैली ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को राजनीतिक एजेंडे में काफी ऊपर ला दिया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मांग को सूबे की अवाम की मांग के रूप में उठाने के लिए पूरे राज्य में अधिकार यात्रा निकाली थी। उनकी कई महीनों की मेहनत निश्चित रूप से तब रंग लाती दिखी, जब राज्य की राजधानी में लाखों लोग इस मांग के समर्थन में जुटे। पिछड़ापन दूर करने के लिए केंद्र सरकार से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग के साथ ही राज्य में राजनीति का एक नया दौर शुरू हो गया है। पिछले दो-तीन दशकों में बिहार की राजनीति की नियामक ताकतें थीं- सामाजिक न्याय और जातिवादी वर्चस्व के बीच का विरोध और साझा। यह एक बिरला ही उदाहरण है जबकि प्रगतिवादी और प्रतिगामी दो तरह की धाराएं यहां की राजनीति का मन-मिजाज तय कर रही थीं। यह सब अब यहां बीते दौर की बात हो जाएगी, ऐसा तो नहीं कह सकते, पर इतना जरूर है कि बिहार भी अब देश के उन राज्यों की पांत में खड़ा हो गया है, जिसके लिए क्षेत्रीय अस्मिता के मायने भावनात्मक और राजनीतिक दोनों हैं। नीतीश कुमार जिस पार्टी की नुमाइंदगी करते हैं, उसका अतीत जरूर राष्ट्रीय रहा है, पर मौजूदा स्थिति में बिहार-झारखंड से बाहर उसकी उपस्थिति अपवादिक ही है। बिहार में उनका अभी दूसरा मुख्यमंत्रीत्वकाल चल रहा है। राजद को सत्ता से बेदखल करने के पीछे विकास एक बड़ा मुद्दा था। पिछले सात सालों में राज्य में बहुत कुछ बदला है। सुशासन का नारा अगर आज वहां पूरी तरह जमीनी नहीं है तो यह महज आसमानी भी नहीं है। बावजूद इन बदलावों और अनुकूलताओं के बिहार की शिनाख्त आज भी कहीं न कहीं बीमारू प्रदेश के रूप में ही होती है। यह शिनाख्त यहां से दूसरे सूबों में गए लोगों का भी पीछा नहीं छोड़ती और उन्हें तमाम तरह की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ता है। नीतीश अब इस स्थिति के सामने अपनी लाचारी रोने के बजाय इसे एक राजनीतिक एजेंडे के रूप में देख रहे हैं। उनकी दलील है कि बिहार अगर विकास के राष्ट्रीय औसत से अब भी पिछड़ रहा है तो यह उनकी सरकार के कारण नहीं बल्कि केंद्र की उपेक्षा के कारण। साफ है कि वह राज्य में अपनी सरकार के खिलाफ पनप रहे आक्रोश और आलोचनाओं का रुख केंद्र की तरफ मोड़कर राज्य की राजनीति में अपने को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं। यही नहीं, विशेष राज्य के दज्रे की मांग उठाकर वे कहीं न कहीं गठबंधन दौर की राजनीति में अपनी हैसियत भी बढ़ा रहे हैं। बिहार में अभी जदयू-भाजपा या कहें, एनडीए का शासन है पर जो राजनीति नीतीश और उनकी पार्टी कर रही है, उसकी भाजपा विरोधी भले न सही, पर बराबर की शरीक भी नहीं है। दरअसल, यह एनडीए के भीतर अपनी स्थिति को और ज्यादा वजनदार बनाने की जदयू की सोची-समझी राजनीतिक कवायद है। अधिकार रैली में केंद्र को एक तरह से अल्टीमेटम दिया गया है कि अगर वह उनकी मांग को नहीं मानती है तो राज्य की जनता अगले साल मार्च में देश की राजधानी पहुंचकर अपनी ताकत का एहसास कराएगी। साफ है कि 2014 के आम चुनाव में केंद्र की राजनीति को बिहार के मतदाता निश्चित रूप से प्रभावित करेंगे और यह सब होगा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे की जमीन पर।

Rashtirya Sahara National Edition 6-11-2012 राजनीति Page-10

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