Friday, November 2, 2012

हिमाचल चुनाव के संकेत



अवधेश कुमार पंजाब के नंगल से होते हुए जैसे ही आप हिमाचल के पहले जिले ऊना की धरती पर पैर रखते हैं, आपको चुनावी माहौल का अहसास होने लगता है। किंतु यह अहसास सर्वप्रभावी किस्म का नहीं है। अन्य राज्यों की तरह यहां न तो उस प्रकार के बैनर पोस्टर हैं और न बहुत ज्यादा शोर ही। वस्तुत: उम्मीदवारों के बैनरों और समाचार पत्रों के कवरेज ही मुख्यत: चुनावी माहौल का अहसास कराते हैं। अपने सघन दौरे में मैंने लोगों की चिंताएं, राजनीतिक दलों एवं नेताओं के बारे में मंतव्य से लेकर जीत संबंधी उनका आकलन भी सुना, पर कुल मिलाकर आम मतदाता में चुनाव को लेकर उत्साह का माहौल कहीं नहीं दिखा। पार्टियंा अपने प्रमुख स्टार प्रचारकों की सभाओं में भीड़ जुटा पाई, लेकिन उनमें भी स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रियाएं दिखाई नहीं पड़ती थीं। आम आकलनों के विपरीत गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया ज्यादा नजर आई। हिमाचल के लिए जनता की चुनाव के प्रति उदासीनता ने परिणामों का आकलन कठिन बना दिया है। हिमाचल के हर चुनाव में सरकारें कांग्रेस और भाजपा के बीच बदलने की परंपरा रही हैं, किंतु मतदाताओं की उदासीनता एवं किसे समर्थन दें और किसे नहीं पर बड़ी संख्या के असमंजस के कारण ऐसी निश्चित भविष्यवाणी कठिन हो गई है। अगर केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है और उसका मनोवैज्ञानिक असर मतदाताओं पर है तो प्रदेश भाजपा सरकार पर भी अनेक आरोप लगाए गए हैं। आरोपों से घिरे कांग्रेस की कमान संभाल रहे वीरभद्र सिंह प्राय: हर सभा में ऐलान करते हैं कि उन्हें प्रदेश की दोनों जेलों को बड़ा करना पड़ेगा, क्योंकि इस सरकार ने इतने भ्रष्टाचार किए हैं कि उनके लिए जेल छोटी पड़ जाएगी। वे मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के शासनकाल में हुए जमीन और निर्माण से संबंधित ज्यादातर सौदे, ठेकों और समझौतों की जांच कराने का ऐलान कर रहे हैं। दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को छोड़ दें तो मतदाताओं की आम प्रतिक्रिया यही है कि भाजपा और कांग्रेस में अब कोई फर्क नहीं रह गया है। मतदाताओं की उदासीनता सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही बसपा के बारे में भी मतदाता कहीं उत्साहित नहीं दिखते। निश्चित रूप से इस मनोविज्ञान से मतदान प्रभावित होगा। हालांकि यह भी सच है कि इस समय मतदाताओं के सामने भाजपा एवं कांग्रेस के अलावा स्थिर सरकार देने का कोई विकल्प भी नहीं है। अगर हम पिछले विधानसभा चुनाव को देखें तो भाग लेने वाले छह राष्ट्रीय, दो निबंधित तथा तीन निबंधित गैर मान्यता प्राप्त पार्टियों में मुख्य मुकाबला भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही रहा। भाजपा ने सभी 68 सीटों पर चुनाव लड़कर 41 सीटें जीतीं। उसे कुल 14 लाख 41 हजार 142 यानी 43.78 प्रतिशत मत मिला। कांग्रेस ने 67 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 23 सीटें मिलीं। कुल 12 लाख 80 हजार 480 यानी 38.90 प्रतिशत मत उसे प्राप्त हुआ। ध्यान रखिए, दोनों के मतों में केवल 1 लाख 60 हजार 662 यानी 4.88 प्रतिशत का अंतर था। अन्य पार्टियों में केवल बसपा को 2 लाख 38 हजार यानी 7.26 प्रतिशत मत तथा एक स्थान प्राप्त हुआ। शेष पार्टियां वहां केवल नाम के लिए थीं। सामान्यत: इस राजनीतिक तस्वीर में बहुत ज्यादा अंतर आने की संभावना नहीं दिख सकती है, लेकिन इस बार कुल 459 रिकॉर्ड उम्मीदवार मैदान में हैं, जो पिछले चुनाव से 123 ज्यादा हैं। दूसरा, तृणमूल कांग्रेस करीब दो दर्जन सीटों पर पहली बार चुनाव लड़ रही है और उसमें ज्यादातर कांग्रेस के विद्रोही हैं। इसके अलावा नए दलों में हिमाचल स्वाभिमान पार्टी, हिमाचल लोकहित पार्टी भी है। अगर पिछले परिणाम का गहराई से मूल्यांकन करें तो यह साफ हो जाएगा कि इतने अधिक उम्मीदवार निश्चित तौर पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का कारक बनेंगे। पिछले चुनावों में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर अत्यंत कम था। भाजपा ने किन्नौर सीट 2489, जुब्बल कोटखाई 2824, शिमला 2588, गगरेट 3071, गंघट 690, राजगीर 1218, पालमपुर 2588, सुलाह 999, बनिखेत, 2065, राजनगर 1822, भारमौर केवल 16, बंजर केवल 232, एनी 1449 से जीता। इसी तरह कांग्रेस ने कुमारसेन 1250, नाहन 746, घुमरवीन 1931, नदाऊं 586, जसवन 118, प्रागपुर 342, भट्टीयट 325, राजनगर 1822, बाल्ह 2288, दरांग 1809 एवं मंडी 2744 मतों से जीता। बसपा ने भी कांगड़ा सीट कांग्रेस से केवल 1309 मतों से जीता। इस प्रकार देखें तो भाजपा की 15 सीटें और कांग्रेस की 11 सीटें कड़ी टक्कर में जीती गई, जिसके परिणाम स्थायी नहीं माने जा सकते। यानी कुल 68 में 27 सीटों का परिणाम अस्थिर अंकगणित का संकेतक है। इसमें कांग्रेस पांच सीटें एक हजार से कम एवं इसमें तीन 500 से कम मतों से जीत पाई, जबकि भाजपा की 1000 से कम अंतर से जीतीं सीटें थी 4, जिनमें 500 के नीचे से केवल 2 सीटें थीं। निर्दलीयों-बागियों का गणित इस अंकगणित से इतना साफ है कि सामान्य तौर पर भाजपा के पक्ष में परिणाम अवश्य था, पर न तो भाजपा के पक्ष में कोई लहर थी और न कांग्रेस के विरुद्ध। इसका एक अर्थ यही है कि मतदाताओं की मानसिकता सरकार बदलने की परंपरागत सोच से विलग हो रही थी। थोड़ी और गहराई से सभी 68 परिणमों के अंकगणित का विश्लेषण करेंगे तो यह तथ्य आपके सामने स्पष्ट हो जाएगा कि निर्दलीय एवं दूसरी छोटी-बड़ी पार्टियों के प्रत्याशियों ने जितने मत काटे, उनसे भी परिणाम निर्धारित हुए। स्थानाभाव में यहां उनकी पूरी सूची प्रस्तुत नहीं की जा सकती, किंतु ऐसे 28 विधानसभा क्षेत्र थे, जिनके परिणाम तो बसपा और विद्रोही व अन्य निर्दलीयों को प्राप्त मतों के आधार पर निर्धारित हुए। कांग्रेस एवं भाजपा दोनों के विद्रोहियों की संख्या करीब 74 है। इनका बहुत थोड़ा मत भी परिणाम को उलट सकता है। वास्तव में चुनाव शास्त्र का सामान्य ज्ञाता भी यह बता सकता है कि असमंजस और उदासीनता की मानसिकता वाले समाज में मतों के विभाजन की पूरी संभावना होती है। इस बार 123 से अधिक निर्दलीय उम्मीदवार कई अन्य राज्यों की तरह तत्काल हिमाचल में भी राजनीति के विखंडन की प्रक्रिया का संकेत दे रहे हैं और राजनीतिक विखंडन में मतों का विखंडन बिल्कुल स्वाभाविक है। भाजपा ने कांग्रेस द्वारा प्रदेश को विकास के लिए उचित धनराशि न देने के आरोप को मुद्दा बनाने की कोशिश की है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी सभा में आंकड़ों से प्रमाणित करने की कोशिश की कि उनकी सरकार ने लगातार विकास राशि में बढ़ोतरी की है। ऐसे माहौल में मतदाता असमंजस की हालत में हैं। यह मुद्दा उन्हें बहुत ज्यादा प्रभावित करेगा, ऐसी संभावना कम है। आपने किसी हिमाचली से इस पर प्रतिक्रिया मांगी और वह भाजपा या कांग्रेस का समर्थक नहीं है तो उसका जवाब दोनों को कठघरे में खड़ा करने वाला मिलता है। कांग्रेस और भाजपा ने अंतिम दौर में शायद उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या एवं राजनीति के विखंडित होने की प्रक्रिया को महसूस किया है, इसलिए वे छोटे दलों एवं निर्दलीयों को मत न देने की अपील करने लगे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने तो अपनी सभाओं में कह दिया कि अगर आप भाजपा को मत नहीं देना चाहते तो कांग्रेस को दे दीजिए, लेकिन इन छोटी पार्टियों और निर्दलीयों के पक्ष में मतदान मत करिए। अगर मतदाताओं के अंदर स्थिर सरकार का मुद्दा बना, तभी कांग्रेस एवं भाजपा के पक्ष एवं विपक्ष में परंपरा के अनुरूप मत का सुदृढ़ीकरण हो सकता है। अन्यथा, इन दोनों के अलावा पार्टियों एवं निर्दलीयों में विभाजित मत ही अंत में परिणाम का मुख्य निर्धारक साबित होगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Dainik jagran National Edition -2-11-2012 राजनीति Page -9

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