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Wednesday, March 14, 2012

गहने-बंगले-बैंक बैलेंस-रिवाल्वर पर गाड़ी नहीं


आठ साल पहले की ही तो बात है। बसपा प्रमुख मायावती की माली हैसियत सिर्फ 11 करोड़ रुपये की थी, लेकिन 2012 में वह 111 करोड़ रुपये की हैसियत वाली बन गई हैं। यह बात खुद मायावती ने तीन चुनावों (2004 में राज्यसभा, 2010 में विधान परिषद और 2012 में राज्यसभा) के वक्त नामांकन पत्र के साथ अपनी संपत्तियों को लेकर जो हलफनामा दाखिल किया है उससे सामने आई है। 2004 में मायावती के पास लखनऊ में सरकारी मकान के अलावा दिल्ली में बस एक अदद मकान हुआ करता था। उसकी कीमत उस वक्त यही कोई पौने दो करोड़ रुपये के करीब थी, लेकिन आज बसपा प्रमुख दिल्ली और लखनऊ में चार-चार आलीशान भवनों की मालकिन बन चुकी हैं, जिनकी कीमत 96 करोड़ रुपये से ज्यादा है। दिल्ली के महंगे इलाकों में से एक कनाट प्लेस में मायावती के पास दो भवन हैं (बी-34 का ग्राउंड फ्लोर और फ‌र्स्ट फ्लोर)। मायावती ने अपने हलफनामे में इनमें से एक की वर्तमान कीमत नौ करोड़ 39 लाख और दूसरे की 9 करोड़ 45 लाख रुपये बताई है। दिल्ली में एसपी मार्ग पर भी उनका एक आवास है, जिसकी कीमत उन्होंने 61 करोड़ 86 लाख रुपये बताई है। लखनऊ में 9, माल एवन्यू उनका निजी आवास हो गया है और उसकी कीमत 15 करोड़ रुपये बताई गई है। आठ साल में माया का बैंक बैलेंस भी बढ़ा है। 2004 के चुनाव के वक्त उनके बैंक एकाउंट में नौ करोड़ 68 लाख रुपये थे। 2010 में वह 11 करोड़ रुपये हो गया और 2012 में 13 करोड़ 95 लाख रुपये। माया के पास आज की तारीख में दस लाख 20 हजार रुपये नकद हैं। मायावती के पास अपनी कोई गाड़ी नहीं है, लेकिन उनके पास जेवर खूब हैं। 2004 में उनके पास सिर्फ 30 लाख रुपये के जेवर थे, लेकिन आज उनके पास एक करोड़ रुपये से ज्यादा के गहने हैं। सोना यही कोई 1034 ग्राम है, हीरा 380 रत्ती है, जिनकी लागत 96 लाख 53 हजार रुपये थी। एक चांदी का डिनर सेट भी है, जिसका वजन 18 किलो के करीब है, इसके अलावा 15 लाख रुपये की अन्य संपत्तियां भी हैं। उनके पास एक रिवाल्वर भी है।

मणिपुर में इबोबी, गोवा में पार्रिकर सीएम बनेंगे


गोवा में भाजपा-महाराष्ट्रवादीगोमांतक पार्टी (एमजीपी) गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। सत्ता विरोधी लहर में दिगंबर कामत सरकार के आठ मंत्री चुनाव हार गए। राकांपा का खाता भी नहीं खुला। कामत ने राज्यपाल के शंकरनारायणन को इस्तीफा सौंप दिया। कांग्रेस को गोवा में मिले जख्म पर मणिपुर ने मरहम लगाया। मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सत्ता की चाबी अपने ही पास रखी। गोवा में भाजपा की जीत के नायक रहे मनोहर पार्रिकर, जिनकी अगुवाई में पार्टी ने 40 में 21 सीटें जीतकर अकेले दम बहुमत हासिल किया है। एमजीपी को तीन सीटें मिलीं। कांग्रेस सिर्फ नौ पर सिमट गई। क्षेत्रीय गोवा विकास पार्टी दो सीट जीतने में कामयाब रही। पांच सीटें निर्दलीयों के खाते में गई हैं। मणिपुर में कांग्रेस ने 60 में 42 सीटें जीतीं। तृणमूल कांग्रेस को सात, मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी को पांच, नगा पीपुल्स फ्रंट को चार, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी को एक-एक सीट मिली हैं। मुख्यमंत्री इबोबी सिंह और उनकी पत्नी लांधोनी देवी ने जीत हासिल की है। इबोबी सिंह पूर्वोत्तर राज्यों के ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने लगातार तीसरी बार कांग्रेस को सत्ता का स्वाद चखाया है। कांग्रेस की यह सफलता इसलिए अहम है क्योंकि कांग्रेस के विरोध में ग्यारह दल एकजुट होकर चुनाव लड़ रहे थे।

पंजाब में बादल फटे तो बह गई कांग्रेस


पंजाब में प्रकाश सिंह बादल की अगुआई वाले अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने सत्ता विरोधी रुझानों को दरकिनार करते हुए स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा। बादल ने जोरदार प्रदर्शन कर कांग्रेस को करारा झटका ही नहीं दिया बल्कि दूसरी बार सत्ता में वापसी की है, जो अपने आप में एक इतिहास है। चार दशक में कोई भी दल लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज नहीं हो सका है। नई सरकार के शपथ-ग्रहण से पहले गुरुवार को अकाली दल और भाजपा के बीच बैठक की उम्मीद है। राज्य की 117 सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन ने 68 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। अकाली दल को 56 सीटों पर विजय हासिल हुई है तो भाजपा को 12 सीटों पर फतह मिली है। कांग्रेस तमाम कोशिशों के बावजूद 46 सीटों पर आकर सिमट गई। तीन सीटें अन्य उम्मीदवारों के खाते में गई हैं। पीपीपी एक भी सीट नहीं जीत सकी है और इस हार से यह साफ हो गया है पंजाब में तीसरा मोर्चा फिलहाल दूर की कौड़ी है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने लांबी क्षेत्र में कांग्रेस उम्मीदवार व अपने चचेरे भाई महेशिंदर सिंह बादल को 24,739 मतों से पराजित किया। जलालाबाद सीट पर सुखबीर बादल ने निर्दलीय उम्मीदवार को 50,246 मतों से हराया। भाजपा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की पत्‍‌नी नवजोत कौर सिद्धू ने अमृतसर पूर्व से जीत हासिल की है। पूर्व ओलंपिक खिलाड़ी व अकाली दल के प्रत्याशी परगट सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी जगबीर सिंह बरार को 6798 मतों से हराया। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पटियाला शहरी क्षेत्र जीत गए, जबकि उनके बेटे रनिंदर सिंह समाना से चुनाव हार गए। प्रकाश सिंह बादल (84) ने अपने पुत्र सुखबीर के साथ बादल गांव स्थित आवास पर पत्रकारों से बातचीत में कहा, मैं पंजाब की जनता को धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने मुझमें दोबारा विश्वास दिखाया। पिता-पुत्र ने कहा, हम राज्य में शांति एवं विकास का एजेंडा लेकर लोगों के पास गए। मैं खुश हूं कि हम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरे। वहीं, अमरिंदर सिंह ने नतीजों पर हैरानी जताते हुए कहा, मैं हार की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं। नतीजे चौंकाने वाले हैं। उन्होंने कहा, देखेंगे कि कहां गलती हुई।

कांग्रेस चारों खाने चित्त


उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने कांग्रेस को लगभग हाशिये पर धकेल दिया है। देश के सबसे बडे़ और राजनीतिक दृष्टि से अहम उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने सभी अनुमानों को ध्वस्त कर 403 सदस्यीय विधानसभा में 224 सीटें हासिल कर लीं। अभूतपूर्व बहुमत के साथ सपा ने बसपा को तो सत्ता से बेदखल किया ही, कांग्रेस को भी जोर का झटका दिया, जो कि राहुल गांधी के धुंआधार प्रचार के बल पर 22 सालों बाद सत्ता में वापसी का सपना देख रही थी। पंजाब और उत्तराखंड में सत्ता विरोधी लहर के भरोसे उम्मीदें पाले बैठी कांग्रेस को मायूसी ही हाथ लगी। बादल की अगुआई में भाजपा-अकाली गठबंधन ने 43 साल के इतिहास में पहली बार दोबारा सत्ता में लौट कर इतिहास रच डाला। उत्तराखंड में त्रिशंकु विधानसभा सामने आई। हालांकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही, लेकिन बहुमत न मिलने से सत्ता की चाबी छोटे दलों एवं निर्दलियों के हाथ आ गई है। गोवा की सत्ता छीनकर भाजपा ने देश की सबसे पुरानी पार्टी को चारों खाने चित कर दिया। कांग्रेस के लिए राहत की खबर सिर्फ मणिपुर से आई जहां पार्टी तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी 224 सीटें जीतने के साथ ही अकेले प्रदेश की सत्ता संभालेगी। 16वीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव के नतीजे पार्टी के लिए उम्मीदों से बहुत बड़ी जीत है, जबकि बसपा के लिए यह अनुमानों से बड़ी हार है। सत्ता विरोधी लहर के चलते बसपा 80 तक ही पहुंच पाई। साइकिल के कद्रदान यूपी ने कांग्रेस और भाजपा को क्रमश: 28 और 47 पर रोक दिया। हालांकि यह संख्या कांग्रेस के पिछले आंकड़े से छह ज्यादा है, लेकिन भाजपा को तो चार सीटों का नुकसान हुआ है। सपा की आंधी में माया के तमाम मंत्री और दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. रमापति राम त्रिपाठी, विस अध्यक्ष रहे केशरीनाथ त्रिपाठी, भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष हरीश द्विवेदी, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीराम चौहान, ओम प्रकाश सिंह, पूर्व मंत्री व कांग्रेसी नेता जगदंबिका पाल के पुत्र अभिषेक पाल, कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष डा. रीता बहुगुणा जोशी के भाई शेखर बहुगुणा, केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस खुर्शीद, पूर्व मंत्री जनार्दन प्रसाद ओझा, अपना दल के बाहुबली नेता व पूर्व सांसद अतीक अहमद को भी जनता ने फेल कर दिया। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने शर्मनाक प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकारते हुए अपना इस्तीफा नितिन गडकरी को भेज दिया है। रिकार्ड तोड़ बहुमत से उत्साहित सपा ने बुधवार को संसदीय दल की बैठक बुलाई है, जिसमें नवनिर्वाचित विधानमंडल दल की बैठक बुलाने और सरकार बनाने का दावा पेश करने पर विचार किया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि सपा बुधवार को ही सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है। शपथ ग्रहण होली बाद होगा। मुख्यमंत्री कौन होगा इस सवाल को अखिलेश यादव ने प्रेस कांफ्रेंस में स्पष्ट किया। उन्होंने कहा,मुख्यमंत्री नेता जी यानी मुलायम ही होंगे। सूत्रों के मुताबिक, सपा में शीर्ष स्तर पर इस पर सहमति बनी है कि मंत्रिमंडल छोटा रखा जाए और उसमें ऐसे लोगों का शामिल किया जाए, जिनकी छवि साफ सुथरी हो। अखिलेश यादव ने सपा सरकार की प्राथमिकताएं भी गिना दी। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था को किसी भी सूरत में बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। जनकल्याण योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। 

विपक्ष में बैठने को तैयार भाजपा-कांग्रेस


उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब,मणिपुर और गोवा में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे मंगलवार दोपहर तक देश-दुनिया के सामने होंगे। चार राज्यों में कांग्रेस-भाजपा में सीधी भिड़ंत है,जबकि राजनीतिक रूप से सबसे अहम उत्तर प्रदेश में दोनों राष्ट्रीय दलों को बसपा और सपा से भी पार पाना है। नतीजे तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक्जिट पोल द्वारा उत्तर प्रदेश की 16 वीं विधानसभा के त्रिशंकु होने की तस्वीर दिखा कर गठजोड़ की कयासबाजी चरम पर पहुंचा दी है। विभिन्न दलों के नेताओं में तेज होती जुबानी जंग के बीच कांग्रेस और भाजपा ने दो टूक कह दिया है कि बहुमत न मिला तो विपक्ष में बैठेंगे। राष्ट्रीय दलों के इन तेवरों ने सरकार गठन की राह को पेचीदा बना दिया है। कांग्रेस व भाजपा का भविष्य इन चुनाव नतीजों पर टिका है, क्योंकि इनका असर केंद्र सरकार से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक होना है। इससे भी इंकार नहीं कि ये नतीजे 2014 लोकसभा चुनाव के संकेत हैं। बीते वर्षो में केंद्रीय राजनीति में हैसियत रखने वाली सपा और बसपा का अस्तित्व इसी पर टिका है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा की 690 विधानसभा सीटों का नतीजा यूं तो राज्य की सत्ता तय करेगा। वक्त कुछ ऐसा है इसका असर दूरगामी होगा। इन पांच राज्यों से लोकसभा में 102 और राज्यसभा में 43 सांसद चुनकर आते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 और राज्यसभा में 31 सांसद आते हैं जो केंद्र की राजनीतिक दिशा तय करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि बाकी चार राज्यों में जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई है और उनकी राजनीतिक सेहत टिकी है वहीं यूपी को लेकर बेचैनी है। माना जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भी राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर यूपी ही है। कभी राज्य में सत्ता की कमान संभालने वाली कांग्रेस और भाजपा फिलहाल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। उन्हें इसका अहसास है कि उत्तर प्रदेश की जमीन दुरुस्त हुई तभी आगे की लड़ाई जीती जा सकती है। बसपा व सपा को भी इल्म है कि कांग्रेस और भाजपा मजबूत हुए तो उनके लिए खतरा है। कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने नतीजे आने से पहले ही कांग्रेस- रालोद व बसपा गठबंधन की वकालत कर यूपी में नए विकल्प की संभावना जगा दी है। वर्मा अड़े हैं कि स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में वह सपा की सरकार नहीं बनने देंगे। वहीं, कांग्रेस महासचिव और मीडिया प्रकोष्ठ के चेयरमैन जनार्दन द्विवेदी ने गठजोड़ के कयासों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, बहुमत न मिलने पर पार्टी किसी भी दल से गठजोड़ नहीं करेगी, बल्कि विपक्ष में बैठेगी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, बेनी प्रसाद वर्मा के विचार उनके निजी विचार हैं, पार्टी इस मुद्दे पर अपना रुख कतई नहीं बदलेगी। भाजपा में गठजोड़ के मुद्दे पर दो वर्ग हैं। एक बसपा से गठजोड़ चाहता है तो दूसरा विपक्ष में बैठने की ढपली बजा रहा है। पूर्व भाजपा सांसद संघप्रिय गौतम का कहना है कि बसपा से गठजोड़ का विकल्प खुला है। उनका तर्क है कि यूपी में बसपा की मदद करनी चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड और पंजाब में बसपा की मदद की दरकार होगी। इस बयान के कुछ ही देर बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने कहा, बहुमत मिला तो सरकार बनाएंगे, वर्ना विपक्ष में बैठेंगे। गठजोड़ को लेकर जारी कयासबाजी पर लोकसभा में पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने विराम लगाया। उन्होंने कहा, भाजपा उत्तर प्रदेश में सरकार गठन के लिए किसी भी दल के साथ समझौैता करने नहीं जा रही। हमारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट कह चुके हैं कि या तो हम सरकार बनाएंगे या फिर विपक्ष में बैठेंगे। दरअसल यूपी के चुनावी नतीजे केंद्र की राजनीति पर भी असर डालेंगे। इसी साल जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिहाज से भी नतीजों पर सबकी और खासकर कांग्रेस की निगाहें टिकी होंगी। अप्रैल माह में राज्यसभा से 58 सांसद रिटायर कर रहे हैं। इनमें से 10 यूपी से हैं। जाहिर है कि विधानसभा में जिसकी ताकत बढ़ी केंद्र में भी उसकी अहमियत बढ़ेगी। कांग्रेस की ताकत केंद्र वहां कमजोर है लोकपाल समेत कई दूसरे विधेयकों को पेश करते वक्त सरकार को यह कमी कचोटती रही है। परेशानी यह भी है कि केंद्र में कांग्रेस को समर्थन दे रहे राजद के दो राज्यसभा सांसदों की जगह इस बार बिहार से राजग के सांसद चुनकर आने तय हैं। उत्तराखंड से आए सत्यव्रत भी अप्रैल में रिटायर हो रहे हैं। राज्य में सरकार बनी तभी कांग्रेस के लिए फिर से अपने उम्मीदवार जिताना संभव होगा। भाजपा की मुश्किलें भी कम नहीं हैं। उत्तराखंड और पंजाब की बागडोर गई तो नीतिगत मुद्दों पर केंद्र के साथ लड़ाई में उनकी स्थिति कमजोर होगी। वहीं साल के अंत तक भाजपा को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में अपनी सत्ता बचाने के लिए भी जूझना होगा। 

Wednesday, February 29, 2012

मुस्लिम करेंगे आखिरी चरण का फैसला

यूपी का आखिरी द्वार यानी सातवें चरण के चुनाव का फैसला रुहेलखंड के मुसलमान वोटरों के हाथ होगा। मुस्लिम को अपने पाले में करने के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सबसे दिलचस्प जंग इसी इलाके की 60 सीटों पर होनी है। लोकसभा चुनाव की तरह ही इस दफा भी मुस्लिम मतों की प्रत्याशा में जहां कांग्रेस ने इलाके में पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं सपा भी अपने विश्वसनीय वोटबैंक को इस दफा छिटकने न देने के लिए सारे घोड़े छोड़े हुए है। मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस-सपा की तगड़ी दावेदारी का फायदा उठाने के लिए भाजपा की सारी उम्मीदें हिंदू मतदाताओं के धु्रवीकरण की तरफ जुटी हैं। मायावती के लिए पिछली बार की सफलता दोहराने को पुराना समीकरण साधना फिलहाल बहुत मुश्किल दिख रहा है। 3 मार्च को होने वाले आखिरी चरण के चुनाव में 31 सीटें ऐसी हैं, जहां 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। 16 सीटों में 20 से 29 फीसदी तक मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में 60 में से 46 सीटों पर सीधे तौर पर नतीजों की चाभी मुस्लिमों के रुख पर होगी। गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिम मतों के दम पर ही इलाके में चमत्कारिक प्रदर्शन किया था। 2007 के विस चुनाव में कांग्रेस इलाके में 8.3 फीसदी मत लेकर एक सीट पर ही जीत सकी थी। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस ने विधासभावार 21.1 मत हासिल किए और इस लिहाज से उसकी 15 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। खास बात है कि लोकसभा चुनाव के हिसाब से रालोद को भी 4.3 प्रतिशत मत और पांच विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली। इस दफा कांग्रेस-रालोद गठजोड़ के तौर पर मैदान में है और वही प्रदर्शन दोहराने की प्रत्याशा में राहुल गांधी ने यहां सबसे ज्यादा मुस्लिम क्षेत्रों में ही फोकस किया है। रामपुर में बेगम नूरबानो तो शाहजहांपुर में केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद की भी परीक्षा होगी। राहुल को मुस्लिम क्षेत्रों में रोड शो में मिले समर्थन से कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं। हालांकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने आजम खान को वापस लाने से लेकर उलेमाओं और दूसरे धार्मिक नेताओं का खूब समर्थन जुटाया है। उनके पुत्र अखिलेश चुनाव के बहुत पहले से भी इस क्षेत्र में जूझते रहे। गत विस चुनाव में सपा 23 फीसदी मतों संग 18 सीटें जीती थी। लोस चुनाव में उसे भी तीन फीसदी वोटों का फायदा हुआ था। इसका नतीजा था कि पार्टी को 22 सीटों पर बढ़त मिली थी। सपा-कांग्रेस जंग का फायदा उठाने के लिए भाजपा इस दफा कोई कसर नहीं छोड़ रही। विस चुनाव में उसे 19.3 फीसदी मतों के साथ 9 सीटें मिली थीं। लोस चुनाव में मात्र एक फीसदी वोट बढ़ने से वह 14 विस सीटों पर नंबर एक पर थी। भाजपा की पूरी कोशिश, पिछले लोस चुनाव के दौरान कांग्रेस के पाले में गया सवर्ण व पिछड़ा वोट अपने पाले में खींचने की है। वैसे भी 1991 से लेकर अब तक भाजपा को सबसे ज्यादा सफलताएं इसी रुहेलखंड क्षेत्र से मिलती रही हैं। गुरुवार से इस इलाके में चुनाव प्रचार थमने से शोर जरूर कम हो जाएगा लेकिन दलों की मशक्कत जारी रहेगी। वोटों की इस गुणाभाग में सबसे ज्यादा चुनौती बसपा के सामने है। 2007 के विस चुनाव में मायावती की दलित-अगड़ा-मुस्लिम केमिस्ट्री ने गुल खिलाया था। 27.8 फीसदी मतों के साथ वह 30 सीटों पर थी, जबकि लोस चुनाव में चार फीसदी मतों के नुकसान भर से ही उसे 26 सीटों का नुकसान हुआ था और वह मात्र चार विस क्षेत्र में ही पहले नंबर पर थी। 

छठे चरण में 60% मतदान


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के छठे चरण में मंगलवार को 60 फीसद से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसके पूर्व वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में छठे चरण में 46.86 फीसद मतदान हुआ था। इस चरण में राज्य के पश्चिमी क्षेत्रों के 13 जिलों की 68 सीटों के लिए मतदान हुआ। मतदान के दौरान छिटपुट घटनाएं भी हुईं। बागपत जिले के बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के ढिकाना गांव में मतदान को लेकर राष्ट्रीय लोकदल के समर्थकों ने दलितों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। आगरा के एत्मादपुर विधानसभा क्षेत्र के खंदौली के गांव शेरखान में बसपा और भाजपा कार्यकर्ताओं की भिड़ंत में कई लोगों को चोटें आई। विवाद की शुरुआत कथित रूप से एक व्यक्ति को पोलिंग कर्मचारियों द्वारा मतदान से रोके जाने से हुई। इस बीच, किसी ने गोली चला दी जिससे एक व्यक्ति घायल हो गया। दोनों पक्षों के बीच हुए पथराव में सेक्टर मजिस्ट्रेट और एक पोलिंग कर्मचारी को चोटें आयीं। डिबाई में सपा प्रत्याशी गुड्डू पंडित के खिलाफ दो मामले दर्ज किए गए हैं। दानपुर ब्लाक की प्रमुख ने उनके खिलाफ मारपीट और अस्पृश्यता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया है। सहारनपुर के 106 हुसैन मलक बूथ और 108 शाहपुर मतदान केंद्र पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। इसका कारण गांव का विकास न होना बताया गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि छठे चरण में सायं 5.00 बजे तक 60.08 फीसद मतदान हुआ है।  मतदान शांतिपूर्ण हुआ और कहीं से किसी भी तरह की कोई गंभीर शिकायत नहीं मिली। श्री सिन्हा ने कहा कि गाजियाबाद के 57 मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग सेन्टर 67 एसआर पब्लिक स्कूल, विजय नगर में ईवीएम के माकपोल न किये जाने के कारण दोबारा मतदान कराया जाएगा। छठे चरण में 86 महिला समेत 1103 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। यह चरण प्रत्याशियों के लिहाज से सबसे बड़ा था। श्री सिन्हा ने बताया कि इस चरण में मतदाताओं की संख्या दो करोड़ 14 लाख थी। मतदान के लिए 12 हजार 70 पोलिंग सेन्टर और 21 हजार 317 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे। इसमें 30 हजार से ज्यादा ईवीएम का प्रयोग किया गया। उन्होंने बताया कि छठे चरण में सहारनपुर में 64.86 फीसद, प्रबुद्ध नगर- 59.33 , मुजफ्फरनगर- 59.17, मेरठ- 60.86, बागपत- 55.67 , गाजियाबाद - 58.00 , पंचशील नगर- 60.67, गौतमबुद्ध नगर- 55.60, बुलंदशहर- 61.07 , अलीगढ़- 60.00, महामाया नगर- 60.5 , मथुरा- 63.80 और आगरा में 58.82 फीसद मतदान हुआ है। फिलहाल, इसमें आंशिक बढ़ोतरी भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि सहारनपुर के चार विधानसभा क्षेत्रों में सर्वाधिक 69 फीसद मतदान हुआ है। इसके अलावा अलीगढ़, बुलन्दशहर, मथुरा, मेरठ, पंचशीलनगर, महामायानगर में 60 फीसद से ज्यादा मतदान हुआ। उन्होंने बताया कि अब तक प्रदेश के 65 जिलों में मतदान हो चुका है। इन सभी जिलों में कुल मतदान प्रतिशत 58.40 है जो आजादी के बाद का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि छठे चरण में कुल 68 शिकायतें आयी थीं। इनमें 27 ईवीएम की खराबी और शेष मतदाता सूची, फोटो आईकार्ड, वोटर पर्ची आदि के थे। सभी शिकायतों की जांच करायी गयी। इनमें कई शिकायतें फर्जी पायी गयीं। गाजियाबाद में एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल के मतदान न डाल पाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मतदाता को भी देखना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में है अथवा नहीं। बावजूद इसके वह इस मामले की जांच करायेंगे कि इसमें गलती बीएलओ के स्तर से है अथवा कहीं और से। यह चरण राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौ. अजित सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए खासतौर पर प्रतिष्ठा से जुडा है क्योंकि दोनों के पुत्र चुनाव मैदान में हैं। श्री चौधरी के सांसद पुत्र जयन्त चौधरी मथुरा की मांट सीट से उम्मीदवार हैं जबकि कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह बुलन्दशहर की डिबाई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय सिकन्दराराऊ से, कृषि मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी छाता से, बसपा के मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह बरौली से, सपा के अरिदमन सिंह, पूर्व मंत्री चौधरी बशीर, रालोद प्रदेश अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह, बसपा के धर्मपाल सिंह, रालोद से हाजी याकूब, किठौर सीट से बसपा के लखीराम नागर, वेदराम भाटी, रालोद से कोकब हमीद, डिबाई से सपा से भगवान शर्मा, बसपा के धर्म सिंह सैनी, सपा के किरनपाल कश्यप आदि प्रमुख प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। मंगलवार को टीम अन्ना के अन्य सदस्य कुमार विास और राष्ट्रीय लोकमंच के अध्यक्ष सांसद अमर सिंह ने गाजियाबाद के साहिबाबाद में वोट डाला जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अलीगढ़ में और केन्द्रीय उड्डयन मंत्री चौधरी अजित सिंह ने बागपत में अपना वोट दिया। मतदान के दौरान हुई छिटपुट घटनाओं में मुजफ्फरनगर के जानसठ विधानसभा क्षेत्र के सूजड़ू गांव स्थित मतदान केंद्र पर उस समय हंगामा मच गया जब बसपा सांसद कादिर राणा ने एक युवक पर यह आरोप लगाते हुए थप्पड़ जड़ दिया कि वह मतदाताओं को एक प्रत्याशी विशेष के पक्ष में मतदान करने के लिए दबाव डाल रहा है। व्यवस्था से खफा और पुल, सड़क या स्कूल निर्माण न किए जाने के खिलाफ कई स्थानों पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार कर अपने गुस्से का इजहार किया। जानसठ विधानसभा क्षेत्र के ढांसरी में सड़क न बनाए जाने के विरोध में ग्रामीणों ने वोटिंग का बहिष्कार कर दिया। बाद में हालात बिगड़ने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के ततीना के ग्रामीणों ने मतदान का सामूहिक बायकॉट किया। गांव वाले मेरठ-मुरादाबाद रेल लाइन पर गांव के निकट मानव रहित फाटक बंद किए जाने से नाराज थे। उन्होंने रेल ट्रैक पर डेरा डाल दिया। बाद में प्रशासन ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया, लेकिन ग्रामीणों ने खुद को मतदान प्रक्रिया से विरत रखा। बेहट (सहारनपुर) से भी बहिष्कार की रिपोर्ट मिली है। बुलंदशहर के शिकारपुर विधानसभा क्षेत्र के पहासू के पड़ागांव के ग्रामीणों ने विकास में पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने पर चुनाव का बहिष्कार किया। नोएडा विधानसभा क्षेत्र के बहलोलपुर पोलिंग बूथ पर क्षेत्रीय सांसद व पुलिस के बीच झड़प हो गई। बाद में समर्थकों के साथ सांसद ने सड़क पर जाम लगा दिया। सूचना मिलने पर डीआईजी ज्योति नारायण दल- बल के साथ मौके पर पहुंचे और समझा-बुझाकर जाम खत्म कराया।

Monday, February 27, 2012

माया के पास कुर्सियां ज्यादा मंत्री कम


मायावती सरकार में अब कुर्सियां ज्यादा और मंत्री कम रह गए हैं। 31 कुर्सियां शोभायमान हैं 26 खाली पड़ी हैं। अप्रैल 2011 से अब तक 20 मंत्री विदा किए जा चुके हैं और ज्यादातर भ्रष्टाचारी अथवा दागी होने के कारण। इनमें से छह तो लोकायुक्त की सिफारिश के बाद ही भ्रष्ट माने गए। अब लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने सातवें और सबसे अहम माने जाने वाले मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को भ्रष्टाचार में लिप्त मानकर उनके विरुद्ध सीबीआइ जांच की सिफारिश की है। क्या माया सबसे नजदीकी और राजनीतिक रूप से अहम मंत्री के विरुद्ध लोकायुक्त की सिफारिश को मानकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएंगी? इस बार ऐसा होना मुश्किल नजर आता है। इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली तो यह है कि नसीमुद्दीन बसपा का मुस्लिम चेहरा कहे जाते हैं। विस चुनाव के अभी दो चरणों का मतदान बाकी है, जो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड में है। इन क्षेत्रों में इस समुदाय के मत 25 से 50 फीसदी के बीच हैं। यहां के वोटरों के बीच नसीमुद्दीन की चाहे जितनी पैठ हो, लेकिन संगठन और टिकट वितरण में उनकी अहम भूमिका रही है। उनको हटाने से सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि सुधरे न सुधरे, राजनीतिक उथल-पुथल तेज हो सकती है। दूसरी अहम वजह यह है कि इस सरकार में बाबू सिंह कुशवाहा और नसीमुद्दीन ही दो ऐसे मंत्री रहे हैं जिन्हें मायावती का बेहद नजदीकी माना जाता रहा है। दोनों की ही छवि पार्टी के फंड कलेक्टर की रही है और दोनों के खिलाफ भूमि घोटालों की भी लंबी फेहरिस्त है। कुशवाहा 7 अप्रैल 2011 को अंटू मिश्रा के साथ एनआरएचएम घोटाले में काम आ चुके हैं और भाजपा द्वारा अपनाए भी जा चुके हैं। अगर चुनाव के इस मौके पर मायावती नसीमुद्दीन के खिलाफ लोकायुक्त के फैसले को मंजूर करती हैं तो यह सरकार के शीर्ष पर हो रहे भ्रष्टाचार की स्वीकारोक्ति जैसी ही होगी। दो सबसे अहम मंत्री और मुख्यमंत्री के बेहद नजदीकी और दोनों भ्रष्ट? इस सवाल को विपक्ष जमकर उछालेगा और इसका जवाब देना माया के लिए असंभव सा ही होगा। सीबीआइ का सामना कर रहे कुशवाहा ने बसपा से हटने के बाद सरकार के जिन कारिंदों से जान को खतरा पाया था उनमें नसीमुद्दीन, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और पूर्व प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेहबहादुर के नाम प्रमुख थे। क्या चुनाव खत्म होते-होते और बड़ी कुर्सियां खाली होंगीं?

Saturday, February 18, 2012

मंदिर बनाने में मदद करो, मस्जिद बनवा देंगे


उत्तर प्रदेश में हर चरण के मतदान के साथ ही भाजपा की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। यही कारण है कि सत्ता की दौड़ में शामिल होने का दावा शुरू हो गया है। इस दावे को ठोस करने के लिए कांग्रेस के मुस्लिम आरक्षण कार्ड के जवाब में भाजपा ने अपना मंदिर कार्ड खेल दिया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मुसलमानों से कहा कि वे अयोध्या में मंदिर निर्माण में मदद करें, पंचकोसी के बाहर मस्जिद बनवा दी जाएगी। चित्रकूट के सगवारा की जनसभा में चुनाव आयोग की सख्ती के बावजूद गडकरी मंदिर मुद्दे को उछाल दिया। उन्होंने कहा, अयोध्या पर अदालत के फैसले से स्पष्ट हो गया कि रामलला जहां विराजमान हैं वही जन्मभूमि है। लिहाजा मुसलमानों को मदद करनी चाहिए। हां, यह वादा है कि पंचकोसी के बाहर मस्जिद जरूर बनेगी। गडकरी को बाबूलाल कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने से बुंदेलखंड में इसका फायदा पार्टी को मिलता दिख रहा है। गडकरी का दावा है कि इससे पार्टी की ताकत और बढ़ेगी। वह सीटों का दावा तो नहीं करते हैं लेकिन दो टूक कहते हैं, हम सत्ता की लड़ाई में हैं। गडकरी के लिए उत्तर प्रदेश नया है। खासकर कानपुर, जहां वह पहली बार आए थे। जनसभा में उन्होंने कानपुर की हालत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने इस शहर का नाम पूर्व के मैनचेस्टर के रूप मे सुना था, लेकिन सड़कों से गुजरने के बाद हकीकत उल्टी नजर आई। किदवई नगर की सभा में उन्होंने इसका जिक्र किया और वादा किया कि भाजपा सत्ता में आई तो कानपुर को फिर से पुराना दर्जा मिलेगा। यूपी के हालात के लिए सपा-बसपा के साथ वह कांग्रेस को ज्यादा जिम्मेदार मानते हैं। खासकर राहुल गांधी को लेकर उनकी भाषा तल्ख और कटाक्षपूर्ण हो जाती है। व्यंगात्मक लहजे में गडकरी अपनी हर सभा में राहुल की तुलना क्रिकेटर सौरव गांगुली से करते हैं, जिन्होंने मैच जीतने के बाद शर्ट हवा में उछाल दी थी। गडकरी ने कहा कि अगर कांग्रेस जीत गई तो राहुल अपने कपड़े भी उतार देंगे।

Wednesday, February 15, 2012

झारखंड के 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार


नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर गृह मंत्री पी.चिदंबरम से मिली फटकार के बाद अब केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने झारखंड की मुंडा सरकार को आइना दिखाया है। रमेश ने परोक्ष रूप से राज्य सरकार व नक्सलियों में समझौते का आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि 24 में से 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार है। जयराम ने मंगलवार को उपमुख्यमंत्री व झामुमो नेता हेमंत सोरेन की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा, झारखंड में राजनीति कहां खत्म होती है और माओवाद कहां से शुरू होता है, इसका पता ही नहीं चलता। अर्जुन मुंडा सरकार को घेरते हुए कहा, हम माओवादियों का सहयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं। इससे फायदा होने वाला नहीं है। हम किसी भी हाल में माओवादियों से समझौता नहीं करेंगे। केंद्रीय मंत्री ने कहा, वे छह माह में पांच बार झारखंड का दौरा कर चुके हैं। सारंडा के घने जंगलों में गया तो स्थिति देखकर आंखों में आंसू आ गए। जयराम रमेश ने कहा, झारखंड सरकार मनरेगा के क्रियान्वयन में सुस्ती बरत रही है। आदिवासी मामलों के मंत्री ने भी राज्य सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि वे असंतुष्ट हैं। ग्राम पंचायत अगर मजबूत नहीं हुईं तो मनरेगा का काम नहीं होगा। पंचायतों को अधिकार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, राज्य सरकार केंद्र से सत्ता के विकेंद्रीकरण की मांग उठाती है लेकिन राज्य में अधिकार देने से परहेज करती है।

Wednesday, December 28, 2011

लोकपाल की आड़ में सरकार पर नियंत्रण चाहते हैं उद्योग घराने


संसद में लोकपाल विधेयक पर विचार- विमर्श के बीच संप्रग सरकार के एक मंत्री ने ही इस व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। अप्रवासी मामलों के मंत्री व्यालार रवि का कहना है कि लोकपाल से सिर्फ उद्योग घरानों को फायदा होगा। एक दिन यह (लोकपाल) उन शक्तिशाली उद्योग घरानों के लिए राजनीतिक नेतृत्व को ब्लैकमेल करने के औजार में तब्दील हो जाएगा,जो कि सरकार पर नियंत्रण करना चाहते हैं। रवि ने आगाह किया कि लोकपाल कानून के प्रतिपालन में सामान्य सिद्धांतों की अनदेखी हुई तो लोकपाल देश को अस्थिर कर सकता है। गौरतलब है कि गत सप्ताह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अग्रणी उद्योगपतियों से भेंट के दौरान आर्थिक नीतियों की आलोचना किए जाने पर खिन्नता और निराशा जताई थी। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी पीएचडी चैंबर ऑफ कामर्स के कार्यक्रम में कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए थे। व्यालार रवि ने सोमवार को एक साक्षात्कार में दावा किया कि देश के गरीबों को कोई शिकायत नहीं है। उद्योग घराने मनमाफिक और फायदेमंद आर्थिक नीतियां न बनने से सरकार से नाखुश हैं। इसीलिए सरकारी नीतियों के पक्षाघात की स्थिति में होने समेत अन्य शिकायतें कर रहे हैं। वे (उद्योग घराने) बहुत शक्तिशाली हैं और भविष्य में सरकार पर नियंत्रण के लिए लोकपाल का दुरुपयोग कर सकते हैं। वह सांसदों और अन्य चुने जनप्रतिनिधियों की शक्तियों को सीमित करने के कुत्सित प्रयास में लगे हैं। उन्होंने अन्ना हजारे पर निशाना साधते हुए कहा कि वह गुप्त उद्देश्यों के साथ आंदोलन चला कर संविधान की सर्वोच्चता को कमतर करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि देश का सबसे बड़ा दस्तावेज है। वह अनुचित मांगों के साथ संसद को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं। रवि ने कहा, टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावित लोकपाल समूचे देश को अस्थिर करेगा। सभी शक्तियों को समाहित करके तैयार सर्व शक्तिशाली निकाय देश के लिए ठीक नहीं। इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा,मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ हूं और यह नहीं कहता कि देश में भ्रष्टाचार नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इससे (भ्रष्टाचार) निपटने के लिए संविधान के बुनियादी दर्शन व तय प्रक्रिया किनारे कर दी जाए। ऐसा होता है तो यह भी एक समस्या है। रवि ने कहा,वह किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, पर कुछ मामलों में परिपक्वता की जरूरत होती है। लोकतंत्र और संतुलन को समझिए। अदालत के एक निर्णय (1975) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अयोग्य घोषित कर दिया था। यह एक तरह से सैन्य आघात था।

Monday, December 19, 2011

किसान हित में लागू करेंगे एफडीआइ

केंद्र सरकार ने विपक्ष के तगड़े विरोध के बाद भले ही खुदरा व्यापार पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया हो लेकिन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी इसको अब भी हवा देने में लगे हैं। अपने मिशन-2012 को कामयाब बनाने में जुटे राहुल ने शुक्रवार को एफडीआइ का खुला समर्थन किया और इसका विरोध करने वाले विपक्ष को किसान विरोधी करार दिया। यूपी में राहुल भी रथ निकालने वालों की सूची में शामिल हो गए। पूरी तरह वातानुकूलित और सुविधाओं से लैस प्रदेश बदलो रथ पर सवार राहुल तय समय से करीब दो घंटे बाद जब सभा स्थल पहुंचे तो कम भीड़ थी। यहां से केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। भीड़ कम होने के लिए बाद में लुईस ने माफी भी मांगी। आलू उत्पादक पट्टी क्षेत्र में हुई जनसभा में उन्होंने कहा हिंदुस्तान में 60 प्रतिशत सब्जी खराब हो जाती है। हमने रिटेल में एफडीआइ लाने की बात कही ताकि आलू की बर्बादी नहीं हो और किसान अपनी फसल को सही दामों पर बेच सकें लेकिन विपक्षी दलों ने उसे रोक दिया.. संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वे किसान विरोधी हैं। उन्होंने अपना एक अनुभव बताते हुए कहा कि छह साल का बच्चा तक यह जानता है कि उत्तर प्रदेश में उसका भविष्य अंधकारमय है। राहुल ने कहा कि किसानों ने बताया कि उनका आलू मुश्किल से 2 रुपये किलो बिकता है, जिसको चिप्स बनाने वाली बड़ी कंपनियां खरीदकर आधे आलू से बना पैकेट 10 रुपये में बेचती हैं। अगर देश में एफडीआइ आ गया तो इससे किसानों का भला ही होगा, किसी का नुकसान नहीं होगा।

Friday, December 2, 2011

पिछड़ों के हिस्से से मुस्लिम कोटा


यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा होगा, वह तो नतीजे बताएंगे, लेकिन उसके बहाने देश के मुस्लिम समुदाय को फायदा जरूर होने जा रहा है। चुनाव नजदीक आने के साथ ही मुस्लिमों को नौकरियों में आरक्षण की कागजी कार्रवाई लगभग पूरी होने को है। संकेत साफ हैं कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले सरकार पिछड़ों के कोटे से ही मुसलमानों को आरक्षण का एलान कर देगी। सरकार और कांग्रेस के रणनीतिकारों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी आगामी फरवरी उत्तराखंड व पंजाब राज्यों के साथ ही हो सकते हैं। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण के मामले में अब और देरी नहीं होगी। कांग्रेस की चुनावी तैयारियां भी उसी लिहाज से चल रही हैं, जिसमें उसका सबसे ज्यादा फोकस उत्तर प्रदेश पर है। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने मुस्लिम आरक्षण पर अपनी कवायद पूरी कर ली है। उसने रंगनाथ मिश्र की अगुवाई वाले धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के आधार पर मुस्लिम आरक्षण के मामले में सभी राज्यों व लगभग दो दर्जन केंद्रीय मंत्रालयों से उनकी राय मांगी थी। इसी परिप्रेक्ष्य में केंद्र सच्चर कमेटी की सिफारिशों व आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व केरल में लागू मुस्लिम आरक्षण का भी परीक्षण कर चुकी है। सूत्र बताते हैं कि मुस्लिम आरक्षण पर सारी कवायद के बाद सरकार पिछड़ों के 27 प्रतिशत आरक्षण में से ही अल्पसंख्यकों को पिछड़ा मानते हुए 8.4 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को सबसे मुफीद मान रही है, जिसमें छह प्रतिशत मुस्लिमों को और 2.4 प्रतिशत बाकी अल्पसंख्यकों के लिए हो सकता है। हालांकि, इस फैसले पर सपा, राजद व जद-यू जैसे गैर कांग्रेस दलों के पिछड़े नेताओं के विरोध की आशंका भी सरकार को है, लेकिन कांग्रेस चुनावी लिहाज से इसमें भी अपना फायदा व विरोधियों का नुकसान देख रही है। सूत्रों का कहना है कि पिछड़े नेताओं ने यदि इसका ज्यादा विरोध किया तो सरकार के सामने आरक्षण के मौजूदा प्रावधानों में बदलाव के लिए संविधान संशोधन के सिवा कोई रास्ता नहीं होगा। तब सरकार उस हद तक जा सकती है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी गुरुवार को यहां संसद भवन परिसर में पत्रकारों से बातचीत में कहा, सरकार ने मुस्लिम आरक्षण का जो वादा किया था, अब उसका समय आ गया है। उन्होंने कहा, यह मुद्दा दो साल से सरकार के एजेंडे में था, केंद्रीय कैबिनेट इस पर जल्द ही फैसला करेगा। हालाकि, उन्होंने इस बाबत निर्णय का निश्चित समय नहीं बताया। हालांकि जब खुर्शीद से पूछा गया कि यह फैसला यूपी विधानसभा चुनाव से पहले आ रहा है तब उन्होंने तपाक से कहा, क्या हमें राज्य में चुनाव से पहले काम करना छोड़ देना चाहिए। हम जो कुछ सोच रहे हैं, वह हमारी जिम्मेदारी है और हम उसे कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री मायावती पर निशाना साधते हुए कहा, यदि वह चिंतित हैं तो वह मुसलमानों को ऐसा ही आरक्षण देने को स्वतंत्र हैं। हम ऐसा केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए कर रहे हैं। यदि वह चिंतित हैं तो वह भी उत्तर प्रदेश में ऐसा ही कर सकती हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी गत दिनों मुस्लिमों के एक सम्मेलन में इसमें अब और देरी न होने की बात कही थी।