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Wednesday, February 29, 2012

यूपी को नायक का इंतजार


एक समय था जब उत्तर प्रदेश को चलाने वाले देश को भी चलाया करते थे। इस समय चुनाव उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए हो रहे हैं पर देश चलाने वालो और चलाने की आकांक्षा रखने वालो की नजर उत्तर प्रदेश के नतीजों पर है। देश के दोनों राष्ट्रीय दलों को राज्य में किसकी सरकार बनेगी इससे ज्यादा चिंता इस बात की है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से इस चुनाव के नतीजे को किस तरह अपने पक्ष में मोड़ा जाए। यही वजह है कि मतदान के सारे चरण पूरे होने से पहले ही राष्ट्रपति शासन की बातें होने लगी हैं। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ही नहीं समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और यहां तक कि राष्ट्रीय लोकदल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे में राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रहे हैं। सबसे पहले बात कांग्रेस की करते हैं। पार्टी को पिछले सात साल में उत्तर प्रदेश की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नजरिए से ही नहीं, मौजूदा केंद्र सरकार को बनाए रखने के लिए भी। उसे आर्थिक क्षेत्र में उदारीकरण की प्रक्रिया को बढ़ाना हो या कड़े नीतिगत फैसले लेने हों, ममता बनर्जी के नखरों से छुटकारा पाना हो, कुछ ही महीने बाद अपना राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनवाना हो, अन्ना हजारे के आंदोलन से निपटने के लिए ताकत चाहिए हो या राहुल गांधी का सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में राज्याभिषेक करना हो, इन सब के लिए एक ही चीज चाहिए-उत्तर प्रदेश। इस चुनाव में कांग्रेस ने अपनी सबसे बड़ी पूंजी दांव पर लगा दी है। पर सवाल है कि क्या उधार के हथियारों से कोई जंग जीती जा सकती है? कांग्रेस के पास पिछड़े वर्ग का बड़ा चेहरा बेनी प्रसाद वर्मा हैं। जिनका पूरा राजनीतिक जीवन कांग्रेस विरोध की राजनीति को समर्पित रहा है। वह अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी पायदान पर खड़े हैं। यही हाल कांग्रेस के मुसलिम चेहरे रशीद मसूद और दलित चेहरे पन्ना लाल पूनिया का है। इस चुनाव ने राहुल गांधी को चुनावी राजनीति की मुख्यधारा में ला दिया है। पर राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के मर्ज की दवा नहीं हैं। उनकी रणनीति कुछ हद तक टीम अन्ना की तरह है जो समस्या तो बता रही है पर उसकी हल नहीं बता रही। राहुल गांधी की बात मानकर उत्तर प्रदेश का मतदाता सपा, बसपा और भाजपा को सत्ता से बाहर कर दे तो किसे सौंपे राजपाट। रीता बहुगुणा जोशी को जो समाजवादी पार्टी के रास्ते कांग्रेस में आई हैं या प्रमोद तिवारी को जो दो दशक से राज्य में कांग्रेस विधायक दल के नेता पद पर विराजमान रहने के बावजूद अपने चुनाव क्षेत्र से बाहर लगभग अपरिचित ही हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सत्ता में आ गई तो भी राहुल गांधी तो दिल्ली में बैठेंगे। रिमोट से पार्टी संगठन चल सकता है सरकार नहीं चलती। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी बसपा के अलावा अकेली पार्टी है, जिसे पिछले दो दशकों में प्रदेश के मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत दिया। कांग्रेस के पास नेता नहीं तो भाजपा नेताओं की बहुतायत की मार झेल रही है। कोई अपने को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझता। कार्यकर्ता पालकी उठाने को तैयार है। मतदाता ने वरमाला डालने के लिए किसी को अभी चुना नहीं है। पर एक ही पार्टी में इतने दूल्हे देखकर हैरान है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को उत्तर प्रदेश से उतना ही चाहिए जिससे उनका अध्यक्ष पद लोकसभा चुनाव तक के लिए बढ़ जाए। सारा जोर इस बात पर है कि कांग्रेस से आगे रहें। पिछले कुछ चुनावों की तुलना में भाजपा के लिए यह सबसे अच्छा मौका था। प्रदेश का सवर्ण मतदाता उसके पास लौट रहा है। अति पिछड़ा उससे नाराज नहीं है। मुसलिम वोट पक्के तौर पर बंट रहा है। बसपा, सरकार से मतदाता की नाराजगी से परेशान है तो समाजवादी पार्टी को अपनी पिछली सरकार के आंतकराज की सफाई देनी पड़ रही है। कांग्रेस की 2009 के लोकसभा चुनाव की हवा थम गई है। पर प्रदेश भाजपा के नेता आस्तीन में छुरा लिए एकदूसरे के पीछे मौके की तलाश में घूम रहे हैं। राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। इसका उदाहरण है समाजवादी पार्टी। 2007 के चुनाव का खलनायक इस चुनाव के नायक के तौर पर उभरता हुआ नजर आ रहा है। पार्टी की छवि बदलने में अखिलेश यादव की भूमिका सबसे अहम है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव के चुनाव अभियान में एक मौलिक अंतर है। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश का मर्ज बता रहे हैं इलाज और डॉक्टर नहीं। अखिलेश मर्ज के साथ दवा और डॉक्टर भी बता रहे हैं। राहुल गांधी उस इलाज का मजाक उड़ा रहे हैं। कांग्रेस को चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी की जरूरत पड़ेगी। सपा हो सकता है कांग्रेस के बिना काम चला ले। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उपलब्धि अखिलेश यादव हैं। प्रदेश को एक नया नेता मिला है। बहुजन समाज पार्टी को 2007 में मतदाता ने बड़ी उम्मीद से सत्ता सौंपी थी। वह मतदाता की अपेक्षा पर खरी नहीं उतरी। हाथी ने केंद्र की योजनाओं का पैसा खाया हो या नहीं पर पर सर्वजन की उम्मीद को जरूर खा गया। यह पहला मौका था जब गैर दलित बसपा के साथ केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं पर दलित नेतृत्व को स्वीकार करने और सत्ता में भागीदारी के लिए गया था। मायावती ने इसे गैर दलितों की मजबूरी समझ लिया। उत्तर प्रदेश चुनाव की बात हो और भाई साहब यानी चौधरी अजित सिंह की बात न हो ऐसा संभव नहीं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अजित सिंह ऐसा लड्डू हैं इसे जिसने खाया वह पछताया। कांग्रेस दूसरी बार खा रही है। जाट मतदाता चौधरी साहब के साथ हैं पर सवाल है कि क्या उनके कहने से जाट कांग्रेस को वोट देंगे? उनकी लालबत्ती इसी पर निर्भर है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

मायावती ने सपा, कांग्रेस व भाजपा पर साधा निशाना

कई वर्षो तक एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस सरकार ने गरीबों को और गरीब बनाया और बसपा में पांच वर्ष के कार्यकाल में विकास की गंगा बहाई है। राहुल जिन्हें भिखारी बता रहे हैं, कांग्रेस के शासन में वही लोग रोजगार की तलाश में उत्तर प्रदेश से पलायन कर दूसरे राज्यों में जाकर बसे थे। यह बातें मुख्यमंत्री मायावती ने यहां बुधवार को पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में आठ विधानसभा क्षेत्रों की संयुक्त जनसभा में कही। उन्होंने सपा, भाजपा व कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। कहा, बसपा सरकार को पूर्व सरकारों की गलत आर्थिक नीतियां विरासत में मिलीं। इसके चलते वर्ष 2007 में सरकार बनने पर सबसे पहले अत्यंत पिछड़े क्षेत्रों में विकास कराया गया। मायावती ने कहा कि यदि प्रदेश में सपा की सरकार बनी तो गुंडाराज कायम हो जाएगा। शाम ढलते ही महिलाओं का घर से निकलना तक दूभर होगा। 

महंगाई और भ्रष्टाचार पर पीएम जनता को जवाब दें


भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने बुधवार को कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आगामी तीन मार्च को गोवा विधानसभा चुनाव से पहले अपने चुनावी अभियान के दौरान जनता को यह जवाब देना होगा कि वह क्यों मंहाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर अंकुश नहीं लगा पाए। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि प्रधानमंत्री को हमें बताना होगा कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ क्या कदम उठाए हैं। वह क्यों महंगाई पर काबू नहीं पा पाए तथा देश में बेरोजगारी के मुद्दे के हल के लिए उन्होंने क्या किया। नायडू ने कहा कि तीन राष्ट्रीय मुद्दे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई गोवा चुनावों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि राज्य की दिगम्बर कामत नीत सरकार ने स्थिरता प्रदान की। 

मणिपुर में 67 मतदान केंद्रों पर चार को पुनर्मतदान


मणिपुर विधानसभा चुनाव में कथित अनियमितताओं की खबरों के बीच चुनाव आयोग ने बुधवार को राज्य में नौ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के 67 मतदान केंद्रों पर चार मार्च को पुनर्मतदान कराने का आदेश दिया है। मणिपुर में विधानसभा की 60 सीटों के लिए 28 जनवरी को मतदान हुआ था। चुनाव आयोग ने कुछ मतदान केंद्रों पर पुनर्मतदान कराने के निर्वाचन अधिकारियों की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद पुनर्मतदान कराने का आदेश दिया है। कांग्रेस शासित राज्य मणिपुर में भाजपा, एनसीपी, सीपीआई, जदयू मणिपुर पीपुल्स पार्टी सहित अनेक प्रमुख विपक्षी दलों ने मतदान में कथित गड़बड़ी की चुनाव आयोग से शिकायत की थी। 

वादाखिलाफी की तो पांच साल तक पछताना पड़ेगा


समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बसपा सरकार निशाना साधते हुए कहा कि ऐसी भ्रष्ट सरकार पहले कभी नहीं देखी। सभा में लोगों से सवाल किया, इस बार सपा की सरकार बनवा रहे हो? जवाब हां में मिलने पर वादा किया कि सरकार बनने पर प्रदेश की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल देंगे। यह भी कहा, मैं वादा खिलाफी नहीं करता, वादा खिलाफी की तो पांच साल पछताना पड़ेगा। सपा मुखिया बुधवार को रामपुर के स्वार में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि सूबे में सपा की सरकार बनने पर किसानों के कर्ज माफ किए जाएंगे। हर हाल में 18 घंटे बिजली मिलेगी। बेरोजगारों को रोजगार दिलाया जाएगा। घोटालेबाजों की जांच कराके सलाखों के पीछे पहुंचाया जाएगा। चुनावी सभा में सपा के राष्ट्रीय महासचिव मोहम्मद आजम खां ने बसपा व कांग्रेस के प्रति हमलावर तेवर रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय लोकमंच को भी निशाने पर लिया। बाटला हाउस कांड की चर्चा करते हुए कहा कि होनहार तालिबे इल्मों को आतंकवादी बता कर मौत के घाट उतार दिया गया था।

मुस्लिम करेंगे आखिरी चरण का फैसला

यूपी का आखिरी द्वार यानी सातवें चरण के चुनाव का फैसला रुहेलखंड के मुसलमान वोटरों के हाथ होगा। मुस्लिम को अपने पाले में करने के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सबसे दिलचस्प जंग इसी इलाके की 60 सीटों पर होनी है। लोकसभा चुनाव की तरह ही इस दफा भी मुस्लिम मतों की प्रत्याशा में जहां कांग्रेस ने इलाके में पूरी ताकत झोंक रखी है, वहीं सपा भी अपने विश्वसनीय वोटबैंक को इस दफा छिटकने न देने के लिए सारे घोड़े छोड़े हुए है। मुस्लिम मतदाताओं में कांग्रेस-सपा की तगड़ी दावेदारी का फायदा उठाने के लिए भाजपा की सारी उम्मीदें हिंदू मतदाताओं के धु्रवीकरण की तरफ जुटी हैं। मायावती के लिए पिछली बार की सफलता दोहराने को पुराना समीकरण साधना फिलहाल बहुत मुश्किल दिख रहा है। 3 मार्च को होने वाले आखिरी चरण के चुनाव में 31 सीटें ऐसी हैं, जहां 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। 16 सीटों में 20 से 29 फीसदी तक मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में 60 में से 46 सीटों पर सीधे तौर पर नतीजों की चाभी मुस्लिमों के रुख पर होगी। गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने मुस्लिम मतों के दम पर ही इलाके में चमत्कारिक प्रदर्शन किया था। 2007 के विस चुनाव में कांग्रेस इलाके में 8.3 फीसदी मत लेकर एक सीट पर ही जीत सकी थी। 2009 के लोस चुनाव में कांग्रेस ने विधासभावार 21.1 मत हासिल किए और इस लिहाज से उसकी 15 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। खास बात है कि लोकसभा चुनाव के हिसाब से रालोद को भी 4.3 प्रतिशत मत और पांच विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली। इस दफा कांग्रेस-रालोद गठजोड़ के तौर पर मैदान में है और वही प्रदर्शन दोहराने की प्रत्याशा में राहुल गांधी ने यहां सबसे ज्यादा मुस्लिम क्षेत्रों में ही फोकस किया है। रामपुर में बेगम नूरबानो तो शाहजहांपुर में केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद की भी परीक्षा होगी। राहुल को मुस्लिम क्षेत्रों में रोड शो में मिले समर्थन से कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं। हालांकि, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने आजम खान को वापस लाने से लेकर उलेमाओं और दूसरे धार्मिक नेताओं का खूब समर्थन जुटाया है। उनके पुत्र अखिलेश चुनाव के बहुत पहले से भी इस क्षेत्र में जूझते रहे। गत विस चुनाव में सपा 23 फीसदी मतों संग 18 सीटें जीती थी। लोस चुनाव में उसे भी तीन फीसदी वोटों का फायदा हुआ था। इसका नतीजा था कि पार्टी को 22 सीटों पर बढ़त मिली थी। सपा-कांग्रेस जंग का फायदा उठाने के लिए भाजपा इस दफा कोई कसर नहीं छोड़ रही। विस चुनाव में उसे 19.3 फीसदी मतों के साथ 9 सीटें मिली थीं। लोस चुनाव में मात्र एक फीसदी वोट बढ़ने से वह 14 विस सीटों पर नंबर एक पर थी। भाजपा की पूरी कोशिश, पिछले लोस चुनाव के दौरान कांग्रेस के पाले में गया सवर्ण व पिछड़ा वोट अपने पाले में खींचने की है। वैसे भी 1991 से लेकर अब तक भाजपा को सबसे ज्यादा सफलताएं इसी रुहेलखंड क्षेत्र से मिलती रही हैं। गुरुवार से इस इलाके में चुनाव प्रचार थमने से शोर जरूर कम हो जाएगा लेकिन दलों की मशक्कत जारी रहेगी। वोटों की इस गुणाभाग में सबसे ज्यादा चुनौती बसपा के सामने है। 2007 के विस चुनाव में मायावती की दलित-अगड़ा-मुस्लिम केमिस्ट्री ने गुल खिलाया था। 27.8 फीसदी मतों के साथ वह 30 सीटों पर थी, जबकि लोस चुनाव में चार फीसदी मतों के नुकसान भर से ही उसे 26 सीटों का नुकसान हुआ था और वह मात्र चार विस क्षेत्र में ही पहले नंबर पर थी।