मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने दलित पिछड़ी जाति एवं किसानों की बदहाली के लिए सपा, कांग्रेस भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने रालोद के गढ़ में चौधरी अजितंिसंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि लम्बे समय से अपने पूर्वजों के नाम पर श्री सिंह राजनीति करते आये हैं उन्हें विकास से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि बसपा ने सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की नीति के तहत प्रदेश का विकास किया है। बागपत के दिल्ली- सहारनपुर हाईवे पर एक मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बसपा प्रदेश की अकेली एक ऐसी पार्टी है जो 403 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। उन्होंने कहा कि चौधरी अजितंिसंह ने कुर्सी के लालच में क्षेत्र के विकास की अनदेखी की है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि बसपा दलित पिछड़ों तथा किसानों की हिमायती रही है। सपा कार्यकाल का बकाया गन्ना भुगतान 2 हजार 600 करोड़ रुपए किसानों को दिलाया तथा किसानों को 125 रुपए की जगह 250 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने का दाम दिलवाया। एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए बिजली बिल माफ कराये तथा भूमि अधिग्रहण मामले में नई नीति बनाकर किसानों को लाभ दिलाया। एक करोड़ बेरोजगार लोगों को रोजगार दिलाया, 25 लाख तक ठेकों में आरक्षण दिलाया गया। बिजली क्षेत्र में ऐतिहासिक फैसला लेने का बसपा ने निर्णय लिया है जिसके तहत 24 घंटे प्रदेश की जनता को बिजली देने का वादा किया है। उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर योजना के तहत अभूतपूर्व विकास किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश का चार भागों में विभाजन कर विकास के लिए केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा, लेकिन यूपीए की सरकार पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेष तथा अवध प्रदेश बनाना नहीं चाहती है। उन्होंने यूपीए सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण महंगाई बढ़ना तथा दलित पिछड़ों, गरीब बेरोजगारों की बदहाली के लिए जिम्मेदार सपा, भाजपा, कांग्रेस को बताया। उन्होंने कहा कि हम कानून द्वारा कानून का राज स्थापित कर सपा, भाजपा आदि राजनीतिक दलों की गुंडई को समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार पर कहा कि विरोधी पार्टियां भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी हुई हैं। एसएनबी चौधरी अजित सिंह ने पूर्वजों के नाम पर की राजनीति, कांग्रेस, सपा व भाजपा ने काला धन जमा किया विदेश में
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Monday, February 27, 2012
राकांपा का चुनावी घोषणा पत्र जारी
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने तीन मार्च को गोवा में होने वाले विधानसभा के चुनाव के लिए आज अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया। राकांपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि यदि उनकी सरकार आयी तो पार्टी एक अच्छा प्रशासन, स्थिर सरकार, राज्य का विकास, पारदर्शी और भ्रष्टमुक्त सरकार देगी। राकांपा के गोवा प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सुरेंद्र सिरसाट, पर्यटन मंत्री नीलकंट हडंकर और पार्टी के अन्य नेताओं के समक्ष पार्टी के महाराष्ट्र के पूर्व विधायक और चमड़ा बोर्ड के अध्यक्ष संदेश कुनवेल्कर ने बृहस्पतिवार को यहां पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी किया। चुनावी घोषणा पत्र जारी करने के बाद श्री सिरसाट ने संवाददाताओं को बताया कि राकांपा पूरे देश में मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है और तीन राज्यों गोवा, नगालैंड और महाराष्ट्र में अन्य पार्टियों के साथ सरकार में शामिलहै। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने घोषणा पत्र में यह भी कहा है कि गोवा के पर्यावरण पर भी ध्यान दिया जाएगा तथा पार्टी गैर कानूनी खान की खुदाई और कच्चे लोहे को पड़ोसी राज्यों में चोरी छुपे भेजने पर भी प्रतिबंध लगाएगी। पार्टी राज्य में लोकायुक्त लाएगी। स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा या स्थानीय भाषा दिलाने का वादा किया। गोवा के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली कृषि क्षेत्र के विकास की योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। गोवा में पर्यटन को बढ़ावा और उसके विकास के लिए निजी क्षेत्र की सहभागिता और ढांचागत निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। राज्य को वैिक श्रेणी का पर्यटन केंद्र बनाने का भी वादा किया है।
राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं राहुल
उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल चरम पर है। बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता की जंग अपने पूरे शबाब पर है। लेकिन इस दौर में अगर सबकी नजर किसी नेता पर है तो वे हैं कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव। दोनों युवा नेता अपने-अपने अंदाज में चुनाव प्रचार में डटे हैं और एक-दूसरे के खिलाफ जमकर मोर्चा संभाले हुए हैं। लेकिन आजकल जिसकी ज्यादा चर्चा हो रही है, बेशक वह हैं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। उन्हें भारतीय राजनीति का अपरिपक्व युवा चेहरा बताया जा रहा है, लेकिन हाल के दिनों में कई मौकों पर उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है। यह बात और है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे उनका राजनीतिक तिकड़म बता रहे हैं। पिछले दिनों राहुल गांधी ने एक मंच से विपक्षी समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र यह कहते हुए फाड़ दिया था कि यह पार्टी बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब धरे के धरे रह जाते हैं। राहुल यहीं नहीं रुके, उन्होंने विपक्षी दलों के घोषणा पत्रों का जमकर माखौल भी उड़ाया। राहुल गांधी के इस रुख से सपा सहित तमाम विपक्षी दलों के नेता अवाक रह गए। पर जब मीडिया ने राहुल गांधी द्वारा फाड़े गए पर्चे का क्लोजअप दिखाया, तो उनकी पोल खुल गई। दरअसल, वह सपा का घोषणा पत्र नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के उन नेताओं के नामों की लिस्ट थी, जिन्हें मंच पर बोलना था। यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या सपा का घोषणा पत्र बताते हुए कांग्रेसी नेताओं के नाम की सूची फाड़कर राहुल ने राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की संभावनाओं के बीच कांग्रेस-सपा के भावी गठबंधन पर रोक लगा दी है? दरअसल, तमाम राजनीतिक विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे थे कि अगर राज्य में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो पर्याप्त संख्या बल के लिहाज से सपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकते हैं। इस भावी गठबंधन के भी दो फायदे होते। पहला तो यह कि 22 सालों से प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती और दूसरा केंद्र की संप्रग सरकार को सपा के रूप में नया खेवनहार मिल जाता तथा संप्रग सरकार की प्रमुख सहयोगी तृणमूल कांग्रेस से कांग्रेस पल्ला झाड़ने का साहस जुटा लेती। मगर दाद देनी होगी राहुल की इस हिम्मत की कि उन्होंने खुले मंच से यह जताने की कोशिश कर दी कि उनकी पार्टी भले ही विपक्ष में बैठना स्वीकार कर लेगी, मगर चुनाव बाद सपा से कोई गठबंधन नहीं करेगी। शायद राहुल को यह तथ्य अच्छी तरह समझ में आ गया होगा कि कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के क्षेत्रीय दलों को समर्थन देने से ही राज्य में इनका नामलेवा तक नहीं बचा है और भविष्य में भी अगर यही हाल रहा तो हो सकता है कि अपने बचे-खुचे अस्तित्व से जूझती इन पार्टियों को पुन: अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में दशकों का समय लगे। खैर, राहुल के इस तेवर ने प्रदेश में चल रहे सियासी गुणा-भाग को और उलझा दिया है। राहुल के पर्चा कांड के बाद मुलायम सिंह ने हमीरपुर की जनसभा में यह कहकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दीं कि अगर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के संकेत दिखते हैं तो उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है। हालांकि बाद में अपनी गलती का एहसास होते ही वह अपनी बात से पलट गए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उनका यह संदेश राज्य की जनता के बीच पहुंच चुका था। मुलायम सिंह के इस रंग-बदलू व्यवहार से निश्चित ही समाजवादी पार्टी को आगामी दो चरणों के चुनाव में नुकसान होने का अंदेशा है। राज्य की जनता को यह समझ आने लगा है कि जब सपा येन-केन प्रकारेण कांग्रेस से गठबंधन को अति-आतुर दिख रही है तो फिर अपने बहुमूल्य वोट का नुकसान क्यों? जानकारों की राय में इससे कांग्रेस, भाजपा और बसपा जैसी विपक्षी पार्टियों का जनाधार बढ़ना तय है। एक ओर जहां युवा तुर्क अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा पूरे प्रदेश में साइकिल की चाल को तेज करने में लगी हुई है तो वहीं मुलायम सिंह अपनी बयानबाजियों से अखिलेश की राह में रोड़ा बन रहे हैं। बहरहाल, नेताओं के हालिया बयानों और विवादों ने यकीनन राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। मगर अंदरखाने क्या खिचड़ी पक रही है, कोई नहीं कह सकता। अब तो विधानसभा चुनाव के बाद ही पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी और इसमें प्रदेश की जनता की मन:स्थिति यकीनन बड़ा कारक होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
राहुल गांधी बनाम अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश चुनाव में जिन दो युवाओं ने सबका ध्यान खींचा है, वे हैं समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गांधी। हालांकि दोनों में समानता है तो केवल इतनी कि दोनों युवा हैं और दोनों को नेतृत्व उनके परिवार की पृष्ठभूमि से मिला है। दोनों की उच्च शिक्षा भी विदेश में हुई। कार्यशली की दृष्टि से देखें तो दोनों ने अपने चुनाव अभियान में सूचना तकनीक का प्रयोग किया है। दोनों अपने वार रूम से लगातार संपर्क में रहते हैं। फेसबुक पर लगातार अपडेट करते रहते हैं। जिस क्षेत्र में चुनावी सभा करनी है, वहां पहले के चुनावों के परिणाम, जनांकिकी, इतिहास, राजनीति के ऐसे लोग जिनका असर आज भी लोगों पर हो और वहां संपर्क करने योग्य नामों की जानकारी तत्क्षण वे प्राप्त करते हैं। अखिलेश फेसबुक, ट्विटर और वर्चुअल वर्ल्ड की हर सोशल नेटवर्किग साइट पर मौजूद हैं। अपनी हर सभा के पहले कहा जाता है कि वे इन पर खुद को अपडेट करते हैं। यही हाल राहुल गांधी का है। वैसे राहुल का वार रूम अखिलेश से ज्यादा शक्तिशाली है, जिसकी खोज-खबर वह खुद लेते रहते हैं। राहुल द्वारा चुनाव में हर प्रकार की आधुनिक तकनीक का उपयोग करना स्वाभाविक लगता है। इसके पहले के चुनावों में भी राहुल का सूचना तकनीकों से सुसज्जित वार रूम ऐसे ही सक्रिय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के बारे में धारणा इसके विपरीत थी। अमर सिंह के प्रभाव से मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी में फिल्मी कलाकारों, नामी सोशलाइटों, उद्योग एवं व्यापार जगत की हस्तियों सहित हर प्रकार के ग्लैमर को तो स्वीकार किया, लेकिन विचारों के स्तर पर माना जाता है कि उनका कारवां डॉ. राममनोहर लोहिया के खांटी अंग्रेजी विरोध और देसी आचारण तक सीमित रहा। जाहिर है, अखिलेश ने समाजवादी पार्टी के साथ-साथ मुलायम सिंह की भी सोच बदली है। क्रांति यात्रा की तैयारी में सपा की वेबसाइट को अपग्रेड करके लांच करना भी शामिल था। इस समय सपा भी सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर मौजूद है। यह सपा का अखिलेश संस्करण है। दोनों युवा नेताओं की इस शैली को चुनाव में कितना लाभ मिलता है, यह अलग से मूल्यांकन का विषय है। कह सकते हैं कि अखिलेश ने सूचना तकनीक के प्रयोग और साइबर स्पेस की दुनिया में सपा को भी कांग्रेस के मुकाबले खड़ा किया है। लेकिन राहुल गांधी की बढ़ी दाढ़ी तथा भंगिमा में गुस्सैल युवा दिखने की छवि अखिलेश से अलग है। 14 नवंबर 2011 को फूलपुर से अभियान की शुरुआत करते समय जब उन्होंने युवाओं को ललकारा कि क्यों दूसरे राज्यों में भीख मांगने जाते हो तो इसकी आलोचना भी हुई, पर दरअसल यह एक रणनीति थी, जिसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया था कि कांग्रेस के युवा नेता के अंदर उत्तर प्रदेश की दुर्दशा के कारण गुस्सा वैसे ही है, जैसे कि अन्य युवाओं के अंदर। वह आगे बढ़कर युवाओं के साथ मिलकर प्रदेश को बदलना चाहते हैं। फिर चुनावी सभा में घोषणा पत्रों को कागजी वादों की फेहरिस्त बताते हुए प्रतीक के तौर पर कागज का टुकड़ा फाड़कर राहुल ने यही प्रदर्शित किया कि उनके अंदर उत्तर प्रदेश की दुर्दशा को लेकर उन सारी पार्टियों के खिलाफ गुस्सा है, जिन्होंने सिर्फ वादे किए। जाहिर है, राहुल युवाओं को अपनी ओर खींचना चाहते हैं। 1970-80 के दशक में अमिताभ बच्चन की गुस्सैल युवा की फिल्मी छवि ने भारी संख्या में युवाओं को उनकी ओर खींचा था। राजनीति में यह सफल होगा या नहीं, इसका मूल्यांकन करना अभी जल्दबाजी होगी। अखिलेश भी विरोधियों पर हमला करते हैं, लेकिन उनके चेहरे से गुस्सा नहीं झलकता। वे शांत तरीके से अपनी बात रखते हैं। राहुल की इस भंगिमा पर उनकी टिप्पणी थी कि कांग्रेस के नेता अभी कागज फाड़ रहे हैं, आगे वह मंच से कूदने लगेंगे। वह शांति से कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और देश की दुर्दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार तो वही दल होगा, जिसने सबसे अधिक समय तक शासन किया। फिर पूछते हैं कि किसने सबसे अधिक राज किया? दोनों की शैली में अंतर साफ दिखता है। इसका कारण भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोनों की और उनकी पार्टियों की हैसियत है। अखिलेश को प्रदेश में एक सशक्त जानाधार, पार्टी के पक्ष में एक मजबूत सामाजिक समीकरण तथा विधायकों, सांसदों, स्थानीय निकायों में जन प्रतिनिधियों के विशाल समूह के साथ एक सक्रिय और जीवंत पार्टी इकाई मिली है। इसके विपरीत राहुल को कांग्रेस का ऐसा जर्जर और नष्ट ढांचा मिला, जिसका जनाधार विलुप्त था। सामाजिक समीकरण तो न जाने कब का समाप्त हो चुका है। वस्तुत: जब राहुल ने कमान संभाली कांग्रेस मर चुकी थी। साथ ही प्रदेश में ऐसा कोई नेता भी नहीं मिला, जिसे आगे बढ़ाकर राहुल कांग्रेस को पुनजीर्वित करने की कोशिश करें। सब कुछ उनके अपने कंधे पर था और है। अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव खुद अभी सक्रिय हैं और अन्य ऐसे नेता हैं, जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव है। यही अंतर उत्तर प्रदेश में दोनों के बीच विषमता की खाई को रेखांकित करते हैं। आखिलेश जहां है, उन्हें उससे आगे बढ़ना है और इसलिए उन्होंने युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए सोशल नेटवर्क का सहारा लेकर टैब्लेट, लैपटॉप और इंटरनेट कनेक्शन तक के वादे किए। अगर युवाओं का थोड़ा हिस्सा भी उनके साथ आ जाए तो फिर पिछले चुनाव की कमी की भरपाई हो जाएगी। राहुल के सामने पार्टी इकाई खड़ी करते हुए कांग्रेस को चुनावी सफलता दिलाना चुनौती है। इसके लिए हर वर्ग समूह से भारी संख्या में मतदाताओं को खींचने और ठोस समाजिक समीकरण विकसित करने की जरूरत है। लोकसभा चुनाव में हालांकि राहुल ने कांग्रेस के ग्राफ को काफी ऊंचा उछाल दिया, लेकिन वह एक अस्थाई प्रवृत्ति थी। वैसे उतने से भी राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश मिशन पूरा नहीं होता। राहुल और अखिलेश में मूल अंतर यह भी है कि अखिलेश की सीमा उत्तर प्रदेश ही है, जबकि राहुल के लिए यह कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में शीर्ष पर लाने और बनाए रखने के मिशन का प्रमुख अंग है। उनकी सोच यह है कि उत्तर प्रदेश में जब तक कांग्रेस शीर्ष पर थी, राष्ट्रीय राजनीति पर भी उसका वर्चस्व था। उत्तर प्रदेश में शिखर से शून्य तक जाने के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस कमजोर हुई। राहुल को उस तरह का स्वाभाविक राजनीतिक प्रशिक्षण भी नहीं मिला, जैसा अखिलेश को मिला है। अखिलेश ने अपने पिता और उनके सहयोगियों की गतिविधियों को निकट से देखा-समझा है। उनके पिता उन्हें राजनीति में लाए और वह आज भी सक्रिय मार्गदर्शक के रूप में मौजूद हैं। उनके कारण अखिलेश का अपने-आप नेताओं और कार्यकर्ताओं से संपर्क बनता गया। दूसरी ओर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद नेहरू परिवार की सुरक्षा व्यवस्था इतनी सख्त हुई कि खुलकर मिलना तक संभव नहीं रहा। जब राहुल विदेश में पढ़ाई कर रहे थे, उनके पिता राजीव गांधी की दुखद हत्या हो गई। उसके बाद सोनिया गांधी ने पूरे साढ़े छह वर्ष तक स्वयं और परिवार को सक्रिय सीधी राजनीति से दूर रखा। फलत: राहुल का न राजनीतिक प्रशिक्षण हुआ और न कार्यकर्ताओं-नेताओं से सीधा संपर्क ही। सोनिया गांधी ने जब दिसंबर 1997 से राजनीति की पारी आरंभ की तो वह मंच पर भाषण देने या फिर कांग्रेस की शीर्ष बैठकों तक सीमित रही। कुल मिलाकर राहुल को सब कुछ खुद करना पड़ा है। उन्हें गरीबी को समझने के लिए गरीब के पास जाना पड़ता है, उसके साथ रात बितानी पड़ती है। कई बार उन्हें स्थानीय भाषा समझने में कठिनाइयां आती हैं, जबकि अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। वैसे विदेशी शिक्षा के बावजूद अखिलेश के भाषणों और बोलने के अंदाज में स्थानीय बोली का प्रभाव साफ नजर आता है। राहुल इससे वंचित हैं। इन अंतरों के बावजूद दोनों ने अपनी-अपनी पार्टी को नए तेवर, नई शैली और संस्कार देने की कोशिश की है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
आधी दुनिया की अधूरी हिस्सेदारी
जहां एक और चुनावों में मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ाने को लेकर चौतरफा मुहिम छिड़ी है वहीं उसमें महिला प्रत्याशियों की घटती हिस्सेदारी पर सब मौन हैं। अभी चल रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जिस तरह महिला उम्मीदवारों की कम संख्या दिखी वह उनकी मतदाता के रूप में बेहतरीन सहभागिता के बिल्कुल विपरीत है। इस बार के चुनावों में पंजाब (93/1078) में साढ़े आठ प्रतिशत, उत्तर प्रदेश (482/5877) और उत्तराखंड (63/ 788) में आठ प्रतिशत, मणिपुर (15/279) में पांच प्रतिशत और गोवा (09/215) में केवल चार प्रतिशत महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। यह चिंता का विषय है। दो कारणों से यह चिंता और भी बढ़ जाती है। प्रथम, इतनी कम महिला प्रत्याशियों में मान्यता प्राप्त दलों के द्वारा उतारी गई महिला प्रत्याशियों की संख्या काफी कम है। ज्यादातर महिलाएं स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ रही हैं, जिनके जीतने की संभावना नगण्य है। द्वितीय, बीस साल से पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद भी राजनीतिक दलों के पास महिला उम्मीदवारों का टोटा क्यों है? या तो बीस साल तक लाखों महिलाओं को राजनीतिक अनुभव देने के बावजूद हम स्वीकार करें कि महिलाओं को आरक्षण द्वारा आगे करने का हमारा प्रयोग सफल नहीं रहा या फिर हमें कहना होगा कि हम महिलाओं को राजनीति में आगे करना ही नहीं चाहते। यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन सभी पांचों राच्यों में 2007 के विधानसभा चुनावों में मतदाता के रूप में महिलाओं की बड़ी जबरदस्त भागीदारी रही थी। 2012 के विधानसभा चुनावों में भी उनकी मतदाता के रूप में बहुत अच्छी साझेदारी रही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 महिलाओं को राच्य द्वारा लिंग भेद के विरुद्ध मौलिक अधिकार देता है और संविधान की उद्देशिका महिलाओं सहित सभी नागरिकों को अवसर की समानता का आश्वासन देती है, पर राजनीति में पुरुषों के बराबर महिलाओं की सहभागिता एक स्वप्न सा होकर रह गई है। यह ठीक है कि महिलाओं की आबादी के हिसाब से उनका आधा प्रतिनिधित्व हो, यह जरूरी नहीं, पर उतनी भी कम नहीं होनी चाहिए जितनी अभी है। राजनीतिक दल महिलाओं के लिए चाहे जितनी भी बड़ी बड़ी बातें करें, लेकिन टिकट देने के वक्त वे उन्हें भूल जाते हैं। क्यों? हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक दलों द्वारा सच्चे अर्थो में दलीय-लोकतंत्र नहीं लाया जा सका। गांवों, कस्बों, शहरों व नगरों में राजनीतिक दलों ने संगठन बनाने और कार्य करने की कोई लोकतांत्रिक शैली विकसित नहीं की। सभी दलों में सामंतवादी दलीय व्यवस्था पनपी है और उसी आधार पर ये राजनीतिक दल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाना चाहते हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? यही मूल कारण है कि हमारे लोकतंत्र और राजनीति में अनेक विसंगतियां आ गई हैं। सबसे कठिन चुनौती राजनीतिक दलों के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के समक्ष आ गई है. जो कार्यकर्ता दल के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं उनको अपने ही दल में उस समय पीछे कर दिया जाता है जब संगठन में उनकी पदोन्नति होनी चाहिए या टिकट वितरण में उनको महत्व दिया जाना चाहिए। उस समय अक्सर कोई बाहरी या विरोधी दल से निकाला हुआ राजनीतिज्ञ आकर बाजी मार ले जाता है। इससे न केवल निष्ठावान कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है, वरन वे आगे के लिए यह सीख भी ग्रहण करते हैं कि संगठन के लिए काम करने से कुछ नहीं होता, बल्कि ऊपर के प्रभावशाली नेताओं के संपर्क में रहना ज्यादा लाभकारी होता है। इसी कारण चुनावों के समय सभी राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उनको चुनावों में कोई ऐसा स्थानीय प्रत्याशी दिखाई नहीं देता जो प्रभावशाली हो और पार्टी को विजय दिलवा सके। अत: वे किसी जिताऊ उम्मीदवार की ओर टकटकी लगा कर देखते हैं जो पैसे और बाहुबल से संपन्न हो। जाहिर है कि महिलाएं इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरतीं, इसलिए उनका प्रत्याशियों के रूप में चयन काफी कठिन हो जाता है। किसी भी सामाजिक वर्ग को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण को अपरिहार्य मान लिया गया है। महिलाओं को भी आरक्षण के जरिये राजनीति में आगे करने की बात की जाती है। यही बात इस चुनाव में मुसलमानों के लिए भी की जा रही है। क्या वास्तव में आरक्षण से कोई भी सामाजिक वर्ग पूरा का पूरा आगे बढ़ सकेगा? वास्तव में आरक्षण का सहारा लेकर हम बहुत दूर नहीं जा सकते। सरकारों को यह सोचना पड़ेगा कि आरक्षण को सुशासन और लोक-कल्याण का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण से समाज में जो खेमेबाजी हो रही है वह जातिवाद और अब सांप्रदायिकता को और गहरा ही कर रही है। महिलाओं को राजनीति में आगे करने से पहले हमें उनको समाज में आगे करना पड़ेगा। पिछले पचास-साठ सालों में महिलाओं को लेकर परिस्थितियां बहुत बदली हैं। हमें ग्रामीण महिलाओं और मुस्लिम महिलाओं के बारे में खास तौर से सोचना चाहिए। उनकी शिक्षा के बारे में बहुत गंभीर होने की जरूरत है। हम सामाजिक व्यवस्था से डरकर अपनी महिलाओं को जितना ही घर के अंदर कैद करेंगे, महिला सशक्तीकरण का सफ़र उतना ही लंबा हो जाएगा। हमें इतनी महिलाओं को समाज में उतार देना होगा कि उनकी सामजिक उपस्थिति स्वयं उनमें आत्मविश्वास पैदा कर दे। महिलाओं को राजनीति में लाने का मतलब है कि उन्हें पुरुषों की तरह खट्टे-मीठे अनुभवों से दो-चार होना ही पड़ेगा। वह दिन भारतीय लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण होगा जब बिना आरक्षण के महिलाओं सहित समाज के सभी वर्गो की राजनीति में समुचित हिस्सेदारी होगी। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
श्रीप्रकाश के बयान पर यूपी की सियासत में उबाल
केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल भले ही दिल्ली पहुंचकर कानपुर में दिए गए अपने बयान से मुकर गए हों, लेकिन उनके बयान से यूपी की सियासत गरमा गई है। इलाहाबाद में मौजूद भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने चुनाव बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाने संबंधी श्रीप्रकाश जायसवाल के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि कांग्रेस ने हमेशा संविधान के साथ खिलवाड़ किया है। चुनाव परिणाम आने से पहले इस तरह की बयानबाजी एक सोची-समझी चाल है। कांग्रेस इससे पहले भी राष्ट्रपति शासन लगा संविधान के साथ खिलवाड़ कर चुकी है। आडवाणी ने कहा कि संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर ने भी कभी नहीं सोचा रहा होगा कि विषम परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने संबंधी संविधान की इस कड़ी का दुरुपयोग होगा। समाजवादी पार्टी ने जायसवाल के बयान को अपनी जीत के रूप में लिया। मतदान के लिए इटावा पहुंचे समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि श्रीप्रकाश जायसवाल के बयान से स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस ने अपनी हार स्वीकार कर ली है, इसलिए राष्ट्रपति शासन लगाने की धमकी दे रही है, लेकिन इसकी नौबत नहीं आने वाली है। समाजवादी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। उधर, आगरा में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि अब लाट साहब की सरकार बनवाने के लिए कांग्रेसी युवराज के कुछ दरबारी दबाव बना रहे हैं। वह प्रदेश की जनता को गवर्नर राज की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव होते हैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बरकरार रखने के लिए, न कि राष्ट्रपति शासन के लिए। कांग्रेस संवैधानिक प्रक्रिया को पूरी तरह ध्वस्त करने पर आमादा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पूरी तरह हताश हो चुकी है। भाजपा पूरे बहुमत से प्रदेश में सरकार बनाएगी।
माया के पास कुर्सियां ज्यादा मंत्री कम
मायावती सरकार में अब कुर्सियां ज्यादा और मंत्री कम रह गए हैं। 31 कुर्सियां शोभायमान हैं 26 खाली पड़ी हैं। अप्रैल 2011 से अब तक 20 मंत्री विदा किए जा चुके हैं और ज्यादातर भ्रष्टाचारी अथवा दागी होने के कारण। इनमें से छह तो लोकायुक्त की सिफारिश के बाद ही भ्रष्ट माने गए। अब लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने सातवें और सबसे अहम माने जाने वाले मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को भ्रष्टाचार में लिप्त मानकर उनके विरुद्ध सीबीआइ जांच की सिफारिश की है। क्या माया सबसे नजदीकी और राजनीतिक रूप से अहम मंत्री के विरुद्ध लोकायुक्त की सिफारिश को मानकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएंगी? इस बार ऐसा होना मुश्किल नजर आता है। इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली तो यह है कि नसीमुद्दीन बसपा का मुस्लिम चेहरा कहे जाते हैं। विस चुनाव के अभी दो चरणों का मतदान बाकी है, जो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रूहेलखंड में है। इन क्षेत्रों में इस समुदाय के मत 25 से 50 फीसदी के बीच हैं। यहां के वोटरों के बीच नसीमुद्दीन की चाहे जितनी पैठ हो, लेकिन संगठन और टिकट वितरण में उनकी अहम भूमिका रही है। उनको हटाने से सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि सुधरे न सुधरे, राजनीतिक उथल-पुथल तेज हो सकती है। दूसरी अहम वजह यह है कि इस सरकार में बाबू सिंह कुशवाहा और नसीमुद्दीन ही दो ऐसे मंत्री रहे हैं जिन्हें मायावती का बेहद नजदीकी माना जाता रहा है। दोनों की ही छवि पार्टी के फंड कलेक्टर की रही है और दोनों के खिलाफ भूमि घोटालों की भी लंबी फेहरिस्त है। कुशवाहा 7 अप्रैल 2011 को अंटू मिश्रा के साथ एनआरएचएम घोटाले में काम आ चुके हैं और भाजपा द्वारा अपनाए भी जा चुके हैं। अगर चुनाव के इस मौके पर मायावती नसीमुद्दीन के खिलाफ लोकायुक्त के फैसले को मंजूर करती हैं तो यह सरकार के शीर्ष पर हो रहे भ्रष्टाचार की स्वीकारोक्ति जैसी ही होगी। दो सबसे अहम मंत्री और मुख्यमंत्री के बेहद नजदीकी और दोनों भ्रष्ट? इस सवाल को विपक्ष जमकर उछालेगा और इसका जवाब देना माया के लिए असंभव सा ही होगा। सीबीआइ का सामना कर रहे कुशवाहा ने बसपा से हटने के बाद सरकार के जिन कारिंदों से जान को खतरा पाया था उनमें नसीमुद्दीन, कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह और पूर्व प्रमुख सचिव गृह कुंवर फतेहबहादुर के नाम प्रमुख थे। क्या चुनाव खत्म होते-होते और बड़ी कुर्सियां खाली होंगीं?
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