लगभग सवा दो महीने चली विधानसभा चुनाव प्रक्रिया के बाद अब अंतत: मंगलवार को इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में कैद कुल 788 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला हो जाएगा। साथ ही साफ हो जाएगा कि उत्तराखंड में जनता ने अगले पांच साल के लिए किस पार्टी के पक्ष में जनादेश दिया। सुबह ठीक आठ बजे राज्य के सभी तेरह जिलों में बनाए गए 16 मतगणना केंद्रों में एक साथ वोटों की गिनती आरंभ होगी। संभावना है कि दोपहर बाद लगभग एक बजे तक सभी 70 सीटों के नतीजे सामने आ जाएंगे। सबसे कम बूथों वाली विधानसभा सीट होने के कारण पौड़ी जिले में कोटद्वार का नतीजा सबसे पहले सामने आ सकता है, इस सीट से मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी मैदान में हैं। राज्य की 70 विधानसभा सीटों के लिए 30 जनवरी को 9744 मतदान केंद्रों पर एक साथ मतदान हुआ था। इस बार राज्य के कुल 63.63 लाख मतदाताओं में से 67.22 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। सभी 70 सीटों पर भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा, उत्तराखंड क्रांति दल-पी, रक्षा मोर्चा समेत कई अन्य दलों व निर्दलीय समेत कुल 788 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। इनमें निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों की संख्या 262 है। जिन दिग्गजों की किस्मत दांव पर है उनमें मुख्य हैं, भुवन चंद्र खंडूड़ी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, विस अध्यक्ष हरबंस कपूर, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य, डॉ. हरक सिंह रावत। राज्य की मुख्य निर्वाचन अधिकारी राधा रतूड़ी ने बताया कि मतगणना के लिए राज्य के सभी 16 मतगणना केंद्रों में चाकचौबंद व्यवस्था कर दी गई है। उन्होंने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को मतगणना को लेकर भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ड्यूटी पर न आने वाले कार्मिकों और आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई जाएगी।
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Wednesday, March 14, 2012
राहुल-अखिलेश की मेहनत का नतीजा आज
उत्तर प्रदेश में 22 साल सत्ता वापसी के लिए प्रयासरत कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और एक बार फिर से अपने पिता को मुख्यमंत्री देखने का सपना सजोने वाले सपा प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की मेहनत का फैसला मंगलवार को होगा। वोटों की गिनती मंगलवार को सुबह आठ बजे से शुरू होगी और दोपहर तक नतीजे आने की संभावना है। इस बार के चुनाव में 403 सीटों की नुमाइंदगी का फैसला 6839 उम्मीदवारों में होगा। इनमें कई बड़े सूरमा भी हैं। पहला नतीजा 11 बजे तक आ जाने की संभावना है। अनुमान है कानपुर की आर्यनगर सीट का परिणाम सबसे पहले आएगा। वहां सबसे कम मतदान केंद्र हैं। 24 दिसंबर को 16वीं विधानसभा के लिए चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के साथ शुरू चुनावी गहमा-गहमी तीन मार्च को अंतिम चरण के मतदान के बाद भले थम गई हो लेकिन नतीजों को लेकर उत्सुकता अब शबाब पर है। रिकार्ड मतदान से अप्रत्याशित नतीजों के कयास लगाए जा रहे हैं। लाख टके का सवाल फिजा में यही तैर रहा है कि किसकी सरकार बनेगी। एक्जिट पोल में किसी को भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की बात आने से जोड़-तोड़ की संभावना को बल मिला है। इस बीच नेताओं के बीच जुबानी जंग बढ़ गई है। नतीजे आने से पहले ही केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने कांग्रेस-रालोद व बसपा गठबंधन की वकालत कर यूपी की राजनीति में नए विकल्प की संभावना जगा दी है। वर्मा इस पर अड़े हैं कि स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में वह सपा की सरकार नहीं बनने देंगे तो उधर सपा नेताओं ने भी बेनी प्रसाद वर्मा को खूब खरी-खोटी सुनाई। अखिलेश ने उन्हें कांग्रेस में उधार का कमांडर करार दिया जोकि अपनी हार सुनिश्चित जानकर अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं। राजनीतिक हलकों में स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में अलग-अलग तरह के विकल्पों की चर्चा हो रही है। प्रमुख विकल्प के रूप में सपा-कांग्रेस व रालोद गठबंधन के कयास लग रहे हैं। कहा जा रहा है कि भले ही अभी दोनों दल एक दूसरे को नकार रहे हों लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए साम्प्रदायिक ताकतों को परास्त करने के नाम पर हाथ मिला सकते हैं। एक विकल्प यह भी जताया जा रहा है कि अगर समाजवादी पार्टी को ज्यादा विधायकों की जरूरत नहीं पड़ी तो रालोद और अन्य छोटे दलों के साथ सपा सरकार बना सकती है। तीसरे विकल्प में बसपा-कांग्रेस-रालोद की चर्चा है। चौथा विकल्प जो चर्चा में है वह बसपा-रालोद और छोटे दलों का है। भाजपा भले ही बार-बार दोहराया रही है कि बसपा के साथ उसका कोई समझौता नहीं होगा पर बसपा-भाजपा गठबंधन की भी खूब चर्चा है। सभी चैनलों के एक्जिट पोल में नंबर एक सपा में उत्साह का माहौल है। वैसे तो पार्टी के लोग आन रिकार्ड स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिल रहा है लेकिन आफ द रिकार्ड वो लोग यह कह रहे हैं कि अगर स्पष्ट बहुमत नहीं भी मिलता है तो भी उन्हें जरूरी समर्थन जुटाने में कोई मुश्किल नहीं आएगी। समर्थन किससे लिया जाएगा, यह इस पर निर्भर है कि समर्थन के लिए उसे कितने विधायकों की जरूरत पड़ती है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह व अखिलेश यादव सोमवार को लखनऊ में ही थे। उनकी मीडिया के लोगों से जब-जब भी बात हुई, उनसे यही सवाल हुआ कि स्पष्ट बहुमत न आने की स्थिति में क्या कांग्रेस से समर्थन लिया जा सकता है, दोनो नेताओं ने कहा उन्हें पूरा विश्वास है कि सपा को स्पष्ट बहुमत मिल रहा है। मुलायम ने कहा, अब जब नतीजे आने में कुछ ही घंटे का रह गए हैं तो कयासबाजी करने का कोई औचित्य नहीं है। सपा और कांग्रेस में इस बार मुस्लिम मतों की मारामारी रही है। परिणाम से साबित हो जाएगा कि सूबे के मुस्लिम ने सियासी रूप से किसका साथ दिया है। बसपा की सोशल इंजीनियरिंग इस बार शुरू से ही छितराई नजर आई है। चुनाव से पहले मायावती के बीस से अधिक मंत्रियों और सौ से अधिक विधायकों का टिकट काटने का फार्मूला कितना असरदार होता है, यह भी देखने की बात होगी। इसके अलावा सुशासन के राग के साथ उतरी भाजपा की पिछड़ों को साथ जोड़ने व बाबू सिंह कुशवाहा के खतरों को नजरअंदाज करने के रणनीतिक फैसले की मीमांसा भी होगी। कांग्रेस ने यूपी के इस समर में बड़ी उम्मीदें पाली हैं। उसके मुस्लिम आरक्षण कार्ड, रालोद से गठबंधन और बाहरी उम्मीदवारों पर भरोसा जताने के निर्णय पर जनता का क्या रुख रहा, परिणाम यह भी साबित कर देंगे।
विपक्ष में बैठने को तैयार भाजपा-कांग्रेस
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब,मणिपुर और गोवा में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे मंगलवार दोपहर तक देश-दुनिया के सामने होंगे। चार राज्यों में कांग्रेस-भाजपा में सीधी भिड़ंत है,जबकि राजनीतिक रूप से सबसे अहम उत्तर प्रदेश में दोनों राष्ट्रीय दलों को बसपा और सपा से भी पार पाना है। नतीजे तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन एक्जिट पोल द्वारा उत्तर प्रदेश की 16 वीं विधानसभा के त्रिशंकु होने की तस्वीर दिखा कर गठजोड़ की कयासबाजी चरम पर पहुंचा दी है। विभिन्न दलों के नेताओं में तेज होती जुबानी जंग के बीच कांग्रेस और भाजपा ने दो टूक कह दिया है कि बहुमत न मिला तो विपक्ष में बैठेंगे। राष्ट्रीय दलों के इन तेवरों ने सरकार गठन की राह को पेचीदा बना दिया है। कांग्रेस व भाजपा का भविष्य इन चुनाव नतीजों पर टिका है, क्योंकि इनका असर केंद्र सरकार से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक होना है। इससे भी इंकार नहीं कि ये नतीजे 2014 लोकसभा चुनाव के संकेत हैं। बीते वर्षो में केंद्रीय राजनीति में हैसियत रखने वाली सपा और बसपा का अस्तित्व इसी पर टिका है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा की 690 विधानसभा सीटों का नतीजा यूं तो राज्य की सत्ता तय करेगा। वक्त कुछ ऐसा है इसका असर दूरगामी होगा। इन पांच राज्यों से लोकसभा में 102 और राज्यसभा में 43 सांसद चुनकर आते हैं। अकेले उत्तर प्रदेश से लोकसभा में 80 और राज्यसभा में 31 सांसद आते हैं जो केंद्र की राजनीतिक दिशा तय करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि बाकी चार राज्यों में जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई है और उनकी राजनीतिक सेहत टिकी है वहीं यूपी को लेकर बेचैनी है। माना जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा के भी राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर यूपी ही है। कभी राज्य में सत्ता की कमान संभालने वाली कांग्रेस और भाजपा फिलहाल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। उन्हें इसका अहसास है कि उत्तर प्रदेश की जमीन दुरुस्त हुई तभी आगे की लड़ाई जीती जा सकती है। बसपा व सपा को भी इल्म है कि कांग्रेस और भाजपा मजबूत हुए तो उनके लिए खतरा है। कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने नतीजे आने से पहले ही कांग्रेस- रालोद व बसपा गठबंधन की वकालत कर यूपी में नए विकल्प की संभावना जगा दी है। वर्मा अड़े हैं कि स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में वह सपा की सरकार नहीं बनने देंगे। वहीं, कांग्रेस महासचिव और मीडिया प्रकोष्ठ के चेयरमैन जनार्दन द्विवेदी ने गठजोड़ के कयासों को सिरे से खारिज करते हुए कहा, बहुमत न मिलने पर पार्टी किसी भी दल से गठजोड़ नहीं करेगी, बल्कि विपक्ष में बैठेगी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, बेनी प्रसाद वर्मा के विचार उनके निजी विचार हैं, पार्टी इस मुद्दे पर अपना रुख कतई नहीं बदलेगी। भाजपा में गठजोड़ के मुद्दे पर दो वर्ग हैं। एक बसपा से गठजोड़ चाहता है तो दूसरा विपक्ष में बैठने की ढपली बजा रहा है। पूर्व भाजपा सांसद संघप्रिय गौतम का कहना है कि बसपा से गठजोड़ का विकल्प खुला है। उनका तर्क है कि यूपी में बसपा की मदद करनी चाहिए, क्योंकि उत्तराखंड और पंजाब में बसपा की मदद की दरकार होगी। इस बयान के कुछ ही देर बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही ने कहा, बहुमत मिला तो सरकार बनाएंगे, वर्ना विपक्ष में बैठेंगे। गठजोड़ को लेकर जारी कयासबाजी पर लोकसभा में पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने विराम लगाया। उन्होंने कहा, भाजपा उत्तर प्रदेश में सरकार गठन के लिए किसी भी दल के साथ समझौैता करने नहीं जा रही। हमारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट कह चुके हैं कि या तो हम सरकार बनाएंगे या फिर विपक्ष में बैठेंगे। दरअसल यूपी के चुनावी नतीजे केंद्र की राजनीति पर भी असर डालेंगे। इसी साल जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिहाज से भी नतीजों पर सबकी और खासकर कांग्रेस की निगाहें टिकी होंगी। अप्रैल माह में राज्यसभा से 58 सांसद रिटायर कर रहे हैं। इनमें से 10 यूपी से हैं। जाहिर है कि विधानसभा में जिसकी ताकत बढ़ी केंद्र में भी उसकी अहमियत बढ़ेगी। कांग्रेस की ताकत केंद्र वहां कमजोर है लोकपाल समेत कई दूसरे विधेयकों को पेश करते वक्त सरकार को यह कमी कचोटती रही है। परेशानी यह भी है कि केंद्र में कांग्रेस को समर्थन दे रहे राजद के दो राज्यसभा सांसदों की जगह इस बार बिहार से राजग के सांसद चुनकर आने तय हैं। उत्तराखंड से आए सत्यव्रत भी अप्रैल में रिटायर हो रहे हैं। राज्य में सरकार बनी तभी कांग्रेस के लिए फिर से अपने उम्मीदवार जिताना संभव होगा। भाजपा की मुश्किलें भी कम नहीं हैं। उत्तराखंड और पंजाब की बागडोर गई तो नीतिगत मुद्दों पर केंद्र के साथ लड़ाई में उनकी स्थिति कमजोर होगी। वहीं साल के अंत तक भाजपा को गुजरात और हिमाचल प्रदेश में अपनी सत्ता बचाने के लिए भी जूझना होगा।
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