जिस देश में राजनीति छल-छद्म और धोखों पर ही आमादा हो, वहां संवादों का कड़वाहटों में बदल जाना स्वाभाविक है। स्वस्थ संवाद के हालात ऐसे में कैसे बन सकते हैं। टीम अन्ना के साथ जो हुआ, वह सही मायने में धोखे की एक ऐसी पटकथा है, जिसकी बानगी खोजे न मिलेगी। लोकपाल बिल पर जैसा रवैया हमारी समूची राजनीति ने दिखाया, क्या वह कहीं से आदर जगाता है? एक छले गए समूह से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वह सरकारी तंत्र और सांसदों पर बलिहारी हो जाए? केजरीवाल जो सवाल उठा रहे हैं, उसमें नया और अनोखा क्या है? उनकी तल्खी पर मत जाइए, शब्दों पर मत जाइए। बस जो कहा गया है, उसके भाव को समझिए। इतनी तीखी प्रतिक्रिया कब और कैसे कोई व्यक्त करता है, उस मनोभूमि को समझने पर सब कुछ साफ हो जाएगा। टीम अन्ना का इस वक्त हाल हारे हुए सिपाहियों जैसा है। वह राजनीति के छल-बल और दिल्ली की राजनीति के दबावों को झेल नहीं पाई और सुनियोजित निजी हमलों ने इस टीम की विश्सनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए। टीम अन्ना पर कभी न्यौछावर हो रहा मीडिया भी उसकी लानत-मलामत में लग गया। जिस टीम अन्ना को कभी देश का मीडिया सिर पर उठाए घूम रहा था, मुंबई में कम जुटी भीड़ के बाद आंदोलन के खत्म होने की दुहाइयां दी जाने लगीं। आखिर यह सब कैसे हुआ? आज वही टीम अन्ना जब मतदाता जागरण के काम में लगी है तो उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। अब देखिए, केजरीवाल ने एक कड़वी बात क्या कह दी, मीडिया उन पर फिदा हो गया। एक वनवास सरीखी उपस्थिति से केजरीवाल फिर चर्चा में आ गए। यह उनके बयान का ही असर है। किंतु आप देखें तो केजरीवाल ने जो कहा, वह आज देश की ज्यादातर जनता की भावना है। आज संसद और विधानसभाएं हमें महत्वहीन दिखने लगी हैं तो इसके कारणों की तह में हमें जाना होगा। आखिर हमारे सांसद और जनप्रतिनिधि ऐसा क्या कर रहे हैं कि जनता की आस्था उनसे और इस बहाने लोकतंत्र से उठती जा रही है। अन्ना और उनके समर्थक हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सवाल भ्रष्टाचार के प्रश्न को संबोधित कर रहे थे। उनके उठाए सवालों में कितना वजन है, यह उन्हें मिले व्यापक समर्थन से ही जाहिर है। लेकिन राजनीति ने इस सवाल से टकराने और उसके वाजिब हल तलाशने के बजाए अपनी चालों-कुचालों और षड्यंत्रों से सारे आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की। यह एक ऐसा पाप था, जिसे सारे देश ने देखा। अन्ना से लेकर आंदोलन से जुड़े हर आदमी पर कीचड़ फेंकने की कोशिशें हुई। आप देखें तो यह षड्यंत्र इतने स्तर पर और इतने धिनौने तरीके से हो रहे थे कि राजनीति की प्रकट अनैतिकता इसमें झलक रही थी। ऐसी राजनीति से प्रभावित हुए अन्ना पक्ष से भाषा के संयम की उम्मीद करना तो बेमानी ही है, क्योंकि शब्दों के संयम का पाठ केजरीवाल से पहले हमारी राजनीति को पढ़ने की जरूरत है। आज की राजनीति में नामचीन रहे तमाम नेताओं ने कब और कितनी गलीज भाषा का इस्तेमाल किया है, यह कहने की जरूरत नहीं है। गांधी को शैतान की औलाद, भारत मां को डायन और जाने क्या-क्या असभ्य शब्दावलियां हमारे माननीय सांसदों और नेताओं के मुंह से ही निकली हैं। वे आज केजरीवाल पर बिलबिला रहे हैं, लेकिन इस कड़वाहट के पीछे राजनीति का कलुषित अतीत उन्हें नजर नहीं आता। हमारे लोकतंत्र को अगर माफिया और धनपशुओं ने अपना बंधक बना लिया है तो उसके खिलाफ कड़े शब्दों में प्रतिवाद दर्ज कराया ही जाएगा। भारत आज भ्रष्टाचार की मर्मातक पीड़ा झेल रहा है। ऐसे में जगह-जगह असंतोष हिंसक अभियानों में बदल रहे हैं। लोकतंत्र में प्रतिरोध की चेतना को कुचलकर हम एक तरह की हिंसा को ही आमंत्रित करते हैं। आंदोलनों को कुचलकर सरकारें जन-मन को तोड़ रही है। इसीलिए लोकपाल बिल बनाने की उम्मीद में सरकार के साथ एक मेज पर बैठकर काम करने वाले केजरीवाल की भाषा में इतनी कड़वाहट पैदा हो जाती है, लेकिन सत्ता के केंद्र में बैठी मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, बेनी वर्मा, सलमान खुर्शीद जैसों की राजनीति में इतना कसैलापन क्यों है। अगर सत्ता के प्रमुख पदों पर बैठे हमारे दिग्गज नेता सुर्खियां बटोरने के लिए हद से नीचे गिर सकते हैं तो केजरीवाल जैसे व्यक्ति को लांछित करने का कारण क्या है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Wednesday, February 29, 2012
अरविंद केजरीवाल का आचरण
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने के लिए जन जागृति अभियान चला रही टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल का कहना है कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी बैठे हैं। अरविंद का कहना है कि लालू, मुलायम और राजा जैसे लोग संसद में बैठकर देश का कानून बना रहे हैं, इनसे संसद को निजात दिलाने की जरूरत है। अरविंद का यह भी कहना है कि सभी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्ट हैं और वे देश को लूटने के लिए जीत दर्ज करना चाहती हैं। अरविंद केजरीवाल का यह कहना तो ठीक है कि संसद से बुरे तत्वों को निकालने के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी, लेकिन सवाल उठता है कि आप संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देकर किस तरह की लड़ाई की बात कर रहे हैं? यह बात ठीक है कि संसद में 163 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं और वाकई देश की जनता को ऐसे सांसदों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने से पहले सौ बार सोचना चाहिए, लेकिन क्या इस संदर्भ में अरविंद केजरीवाल के इस बयान को सही ठहराया जा सकता है कि संसद ही देश की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है? इसके पहले भी अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे को संसद से ऊपर बताने वाला बयान दे डाला था। क्या कभी भी कोई व्यक्ति फिर चाहे वह अन्ना हजारे जैसी शख्सियत ही क्यों न हो, किसी भी संस्था से ऊपर हो सकता है? देश की संसद हो या राज्यों की विधानसभा या फिर स्थानीय निकाय, जीत कर आने वाले कई सदस्य ऐसे होते हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं और वाकई ऐसे लोग देश के विकास में बाधक हैं। दागी उम्मीदवार के लोकसभा या विधानसभा पहुंचने पर जनता में नाराजगी हो सकती है कि उसकी नुमाइंदगी करने वाला नेता अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी नहीं निभा रहा है, लेकिन कोई शख्स फिर चाहे वह अन्ना हजारे हों या फिर अरविंद केजरीवाल, अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं को ललकारने का काम करेंगे तो जनता उनके साथ खड़ी नजर नहीं आएगी। देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर लोगों की आस्था बरकरार है। ऐसे में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की बात की जाए। व्यवस्था में परिवर्तन चंद मुट्ठी भर लोगों से नहीं हो सकता और यह तभी संभव है, जब नए मूल्यों को स्वीकार करने के लिए पूरा देश साथ खड़ा हो। इसमें कोई दो मत नहीं कि लोकपाल बिल के जरिए भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने जब आवाज उठाई तो रोजमर्रा की जिंदगी में भ्रष्टाचार से जूझने वाला आम आदमी इस आंदोलन में उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। 1974 में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुए संपूर्ण आंदोलन के बाद देश की नौजवान पीढ़ी के सामने यह अपनी तरह का अनोखा अनुभव था और उन्होंने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लिया। कुल मिलाकर आजादी के बाद भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझे रहे आम आदमी को इस आंदोलन ने एक उम्मीद जगाई थी, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन मुद्दे से भटककर व्यक्ति विशेष पर सिमटता दिखाई दिया। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह और गांधीवादी पीवी राजगोपाल जैसे लोगों ने अन्ना के आंदोलन से दूरी बना ली। राजेंद्र सिंह का कहना था कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल तानाशाह हैं और यह आंदोलन दलगत राजनीति की गलत दिशा में जा रहा है। राजेंद्र सिंह का यह भी कहना था कि इन दोनों को समझना चाहिए कि लाखों लोग अन्ना और केजरीवाल के लिए नहीं आए थे, वे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए जमा हुए थे। आंदोलन से मुद्दे गायब होते गए और तथाकथित अन्ना मंडली से जुड़े लोग खुद के चेहरे चमकाने में ज्यादा लगे रहे। ये वे लोग थे, जिन्हें यह पता था कि मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। अन्ना जैसी शख्सियत की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। रालेगण सिद्धि में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। बिजली और पानी की कमी से जूझ रहे इस गांव की उन्होंने तस्वीर बदल दी। अन्ना ने गांव के लोगों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी जमा करने के लिए न केवल समझाया, बल्कि खुद भी इस काम में उनके साथ खड़े दिखाई दिए। गांव में सौर ऊर्जा से लेकर गोबर गैस के जरिए बिजली आपूर्ति का इंतजाम किया गया। अन्ना के प्रयासों से रालेगण सिद्धि की तस्वीर बदल गई। महाराष्ट्र में अन्ना के अनशन की वजह से कई बार भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को अपना पद छोड़ना पड़ा। दरअसल, सवाल अन्ना का नहीं, बल्कि उनकी समूची मंडली का है, जिसने जनता और मीडिया का ध्यान खींचने के लिए कहीं न कहीं अन्ना की मौलिकता को भी खत्म करने की कोशिश की। यह ठीक है कि अन्ना हमेशा सफेद खादी के कपड़े पहनते रहे हैं और सिर पर गांधी टोपी पहनते हैं, लेकिन इस आधार पर अन्ना को पूरी तरह गांधीवादी नहीं कहा जा सकता और न ही अन्ना ने इस आंदोलन के पहले खुद को इस तरह कभी पेश किया। हालांकि आंदोलन के वक्त इसे अन्ना मंडली का प्रबंधन कहा जाए या फिर स्वप्रेरित होकर अन्ना हजारे गांधी टोपी पहनकर राजघाट पर जाकर मौन व्रत धारण करके बैठ गए, लेकिन इन बातों ने आम लोगों का ध्यान जरूर खींचा। सवाल यह उठता है कि अन्ना हों या फिर अन्ना मंडली, इन लोगों को देश की जनता को यह बताना होगा कि क्या वाकई उन्हें गांधीवादी मूल्यों पर भरोसा है? जनमत संग्रह के मसले पर जब अन्ना मंडली के सदस्य प्रशांत भूषण की पिटाई की गई तो अन्ना हजारे ने इसकी निंदा करते हुए यह बयान दिया था कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन केंद्रीय मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने वाली घटना पर खुद अन्ना हजारे का यह बयान आता है कि क्या एक ही थप्पड़ मारा? यह जरूरी नहीं कि गांधी टोपी पहनने वाला कोई भी शख्स पूरी तरह से गांधीवादी मूल्यों का समर्थक हो, लेकिन जनता अन्ना मंडली से यह जानना चाहती है कि समाज में आंदोलन और क्रांति का तरीका गांधीवादी होगा या फिर कोई दूसरे तरीके से देश में बदलाव की बात की जा रही है। कभी बाबा रामदेव के साथ मिलकर आवाज उठाने वाली टीम अन्ना ने वर्चस्व की लड़ाई के चलते उनसे दूरियां बना ली तो कभी मुंबई में अन्ना के आंदोलन को समर्थन नहीं मिलने के बाद इन लोगों ने एक बार फिर से बाबा रामदेव का समर्थन मांगा। दरअसल, टीम अन्ना के बड़बोलेपन और वर्चस्व की लड़ाई की वजह से देश में भ्रष्टाचार का मसला हाशिए पर आता दिख रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन टीम अन्ना का नहीं, बल्कि देश की जनता का आंदोलन था और इसे जनता का आंदोलन ही बनाए रखना चाहिए था। अन्ना और उनकी मंडली को समझना होगा कि देश की जनता लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती है। अगर ऐसा नहीं होता तो अब तक नक्सली आंदोलन देश में पूरे चरम पर होता। संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर अगर देश की राजनीति और समाज में सकारात्मक आंदोलन की बात होगी तो एक बार फिर पूरा देश अन्ना के साथ खड़ा दिखाई देगा। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
छठे चरण में 60% मतदान
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के छठे चरण में मंगलवार को 60 फीसद से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसके पूर्व वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में छठे चरण में 46.86 फीसद मतदान हुआ था। इस चरण में राज्य के पश्चिमी क्षेत्रों के 13 जिलों की 68 सीटों के लिए मतदान हुआ। मतदान के दौरान छिटपुट घटनाएं भी हुईं। बागपत जिले के बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के ढिकाना गांव में मतदान को लेकर राष्ट्रीय लोकदल के समर्थकों ने दलितों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। आगरा के एत्मादपुर विधानसभा क्षेत्र के खंदौली के गांव शेरखान में बसपा और भाजपा कार्यकर्ताओं की भिड़ंत में कई लोगों को चोटें आई। विवाद की शुरुआत कथित रूप से एक व्यक्ति को पोलिंग कर्मचारियों द्वारा मतदान से रोके जाने से हुई। इस बीच, किसी ने गोली चला दी जिससे एक व्यक्ति घायल हो गया। दोनों पक्षों के बीच हुए पथराव में सेक्टर मजिस्ट्रेट और एक पोलिंग कर्मचारी को चोटें आयीं। डिबाई में सपा प्रत्याशी गुड्डू पंडित के खिलाफ दो मामले दर्ज किए गए हैं। दानपुर ब्लाक की प्रमुख ने उनके खिलाफ मारपीट और अस्पृश्यता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया है। सहारनपुर के 106 हुसैन मलक बूथ और 108 शाहपुर मतदान केंद्र पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। इसका कारण गांव का विकास न होना बताया गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि छठे चरण में सायं 5.00 बजे तक 60.08 फीसद मतदान हुआ है। मतदान शांतिपूर्ण हुआ और कहीं से किसी भी तरह की कोई गंभीर शिकायत नहीं मिली। श्री सिन्हा ने कहा कि गाजियाबाद के 57 मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग सेन्टर 67 एसआर पब्लिक स्कूल, विजय नगर में ईवीएम के माकपोल न किये जाने के कारण दोबारा मतदान कराया जाएगा। छठे चरण में 86 महिला समेत 1103 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। यह चरण प्रत्याशियों के लिहाज से सबसे बड़ा था। श्री सिन्हा ने बताया कि इस चरण में मतदाताओं की संख्या दो करोड़ 14 लाख थी। मतदान के लिए 12 हजार 70 पोलिंग सेन्टर और 21 हजार 317 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे। इसमें 30 हजार से ज्यादा ईवीएम का प्रयोग किया गया। उन्होंने बताया कि छठे चरण में सहारनपुर में 64.86 फीसद, प्रबुद्ध नगर- 59.33 , मुजफ्फरनगर- 59.17, मेरठ- 60.86, बागपत- 55.67 , गाजियाबाद - 58.00 , पंचशील नगर- 60.67, गौतमबुद्ध नगर- 55.60, बुलंदशहर- 61.07 , अलीगढ़- 60.00, महामाया नगर- 60.5 , मथुरा- 63.80 और आगरा में 58.82 फीसद मतदान हुआ है। फिलहाल, इसमें आंशिक बढ़ोतरी भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि सहारनपुर के चार विधानसभा क्षेत्रों में सर्वाधिक 69 फीसद मतदान हुआ है। इसके अलावा अलीगढ़, बुलन्दशहर, मथुरा, मेरठ, पंचशीलनगर, महामायानगर में 60 फीसद से ज्यादा मतदान हुआ। उन्होंने बताया कि अब तक प्रदेश के 65 जिलों में मतदान हो चुका है। इन सभी जिलों में कुल मतदान प्रतिशत 58.40 है जो आजादी के बाद का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि छठे चरण में कुल 68 शिकायतें आयी थीं। इनमें 27 ईवीएम की खराबी और शेष मतदाता सूची, फोटो आईकार्ड, वोटर पर्ची आदि के थे। सभी शिकायतों की जांच करायी गयी। इनमें कई शिकायतें फर्जी पायी गयीं। गाजियाबाद में एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल के मतदान न डाल पाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मतदाता को भी देखना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में है अथवा नहीं। बावजूद इसके वह इस मामले की जांच करायेंगे कि इसमें गलती बीएलओ के स्तर से है अथवा कहीं और से। यह चरण राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौ. अजित सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए खासतौर पर प्रतिष्ठा से जुडा है क्योंकि दोनों के पुत्र चुनाव मैदान में हैं। श्री चौधरी के सांसद पुत्र जयन्त चौधरी मथुरा की मांट सीट से उम्मीदवार हैं जबकि कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह बुलन्दशहर की डिबाई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय सिकन्दराराऊ से, कृषि मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी छाता से, बसपा के मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह बरौली से, सपा के अरिदमन सिंह, पूर्व मंत्री चौधरी बशीर, रालोद प्रदेश अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह, बसपा के धर्मपाल सिंह, रालोद से हाजी याकूब, किठौर सीट से बसपा के लखीराम नागर, वेदराम भाटी, रालोद से कोकब हमीद, डिबाई से सपा से भगवान शर्मा, बसपा के धर्म सिंह सैनी, सपा के किरनपाल कश्यप आदि प्रमुख प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। मंगलवार को टीम अन्ना के अन्य सदस्य कुमार विास और राष्ट्रीय लोकमंच के अध्यक्ष सांसद अमर सिंह ने गाजियाबाद के साहिबाबाद में वोट डाला जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अलीगढ़ में और केन्द्रीय उड्डयन मंत्री चौधरी अजित सिंह ने बागपत में अपना वोट दिया। मतदान के दौरान हुई छिटपुट घटनाओं में मुजफ्फरनगर के जानसठ विधानसभा क्षेत्र के सूजड़ू गांव स्थित मतदान केंद्र पर उस समय हंगामा मच गया जब बसपा सांसद कादिर राणा ने एक युवक पर यह आरोप लगाते हुए थप्पड़ जड़ दिया कि वह मतदाताओं को एक प्रत्याशी विशेष के पक्ष में मतदान करने के लिए दबाव डाल रहा है। व्यवस्था से खफा और पुल, सड़क या स्कूल निर्माण न किए जाने के खिलाफ कई स्थानों पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार कर अपने गुस्से का इजहार किया। जानसठ विधानसभा क्षेत्र के ढांसरी में सड़क न बनाए जाने के विरोध में ग्रामीणों ने वोटिंग का बहिष्कार कर दिया। बाद में हालात बिगड़ने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के ततीना के ग्रामीणों ने मतदान का सामूहिक बायकॉट किया। गांव वाले मेरठ-मुरादाबाद रेल लाइन पर गांव के निकट मानव रहित फाटक बंद किए जाने से नाराज थे। उन्होंने रेल ट्रैक पर डेरा डाल दिया। बाद में प्रशासन ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया, लेकिन ग्रामीणों ने खुद को मतदान प्रक्रिया से विरत रखा। बेहट (सहारनपुर) से भी बहिष्कार की रिपोर्ट मिली है। बुलंदशहर के शिकारपुर विधानसभा क्षेत्र के पहासू के पड़ागांव के ग्रामीणों ने विकास में पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने पर चुनाव का बहिष्कार किया। नोएडा विधानसभा क्षेत्र के बहलोलपुर पोलिंग बूथ पर क्षेत्रीय सांसद व पुलिस के बीच झड़प हो गई। बाद में समर्थकों के साथ सांसद ने सड़क पर जाम लगा दिया। सूचना मिलने पर डीआईजी ज्योति नारायण दल- बल के साथ मौके पर पहुंचे और समझा-बुझाकर जाम खत्म कराया।
छठवें चरण में वोटर भी बढ़े और मतदान भी
राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा के मुताबिक छठवें चरण के मतदान में 45 फीसद अधिक लोगों ने वोट डाले। पिछले चुनाव में यहां 89.48 लाख मतदाताओं ने वोट डाले थे। इस बार यह संख्या बढ़कर एक करोड़ 39 लाख है। मतदाताओं की संख्या के हिसाब से यह वृद्धि 45 फीसद है। वैसे मतदान प्रतिशत में भी 13.05 प्रतिशत वृद्धि हुई है। गत चुनाव में यहां सिर्फ 46.81 प्रतिशत ही मतदान हुआ था जो इस बार 60.10 फीसद है। मतदान के दौरान 68 शिकायतें आईं जिनमें अधिकांश मतदान सूची में नाम न होने व वोटर पर्ची से जुड़ी शिकायतें थीं। इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी की 28 शिकायतें आईं जिन्हें दूर कराया गया। उन्होंने बताया कि आयोग ने 365 मतदान केंद्रों से मतदान का सीधा प्रसारण किया। इसके अलावा 1015 वीडियो कैमरे व 2353 डिजटल कैमरे लगाए। हर केंद्र पर केंद्रीय पुलिस बल मौजूद रहा। एक लाख पंद्रह हजार कर्मचारियों ने चुनाव संपन्न कराया। विकास कार्य न होने से क्षुब्ध होकर सहारनपुर के बेहट विधानसभा क्षेत्र के दो गांवों हुसैन मलक और शाहपुरा ने मतदान का बहिष्कार किया। यह पूछे जाने पर कि कुछ स्थानों पर मतदाताओं को वोट देने से रोकने के आरोप सामने आए हैं, उन्होंने कहा कि अभी तक आयोग के सामने यह मामला नहीं आया है। कहीं से हिंसा का समाचार भी नहीं प्राप्त हुआ।
किसानों की जमीन नीलाम नहीं होने देगी सपा : मुलायम
सपा सुप्रीमो व सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव बसपा और कांग्रेस पर जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि सत्ता में आए तो किसानों की जमीन नीलाम नहीं होने देंगे। वैट की तरह यूपी में विदेशी खुदरा व्यापार नहीं होने देंगे। कैंसर जैसे गंभीर बीमारियों से पीडि़त मरीजों का सरकारी खर्चे से उपचार कराया जाएगा। सपा सुप्रीमो मंगलवार को बरेली और बदायूं में जनसभाओं को संबोधित कर रहे थे। बसपा सरकार पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि पांच साल में इस सरकार ने बस पत्थर लगवाने और रुपया गिनने का काम किया। सवाल किया कि मुख्यमंत्री बताएं कि उन्होंने दलितों के लिए क्या किया? दलितों की बेटियों के साथ बलात्कार की 19 सौ घटनाएं हुई, लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। कहा, बीएसपी के विधायक ही बलात्कारी हैं। बदायूं और बांदा की घटनाएं इसका उदाहरण हैं। अब ऐसी दलित विरोधी सरकार को उखाड़ फेंकने का समय आ गया है। कहा, सत्ता में आने पर किसानों का 50 हजार का कर्ज मांग करेंगे। 4 प्रतिशत पर किसानों को कर्ज मुहैया कराएंगे। किसी किसान की जमीन को नीलाम नहीं होने देंगे। कक्षा 12 तक की पढ़ाई अनिवार्य की जाएगी। कापी-किताबें मुफ्त की जाएंगी। अच्छे नंबर से पास होने वाले छात्र-छात्राओं को 25 हजार रुपये का इनाम दिया जाएगा।
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