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Monday, July 23, 2012

तीसरे सबसे अधिक उम्र के राष्ट्रपति बने प्रणब दा



देश के 14वें राष्ट्रपति चुने गए प्रणब मुखर्जी केवल अनुभव में ही वरिष्ठ नहीं हैं बल्कि केआर नारायणन और आर वेंकटरामण के बाद वह इस पद पर काबिज होने वाले तीसरे सबसे अधिक उम्र के व्यक्ति हैं। राष्ट्रपति चुने जाते समय प्रणब की आयु 76 वर्ष आठ महीने है। सबसे अधिक अंतर से जीत का रिकार्ड दर्ज करने वाले केआर नारायण की आयु 1997 में राष्ट्रपति चुने जाने के समय 76 वर्ष नौ महीने थी। आर वेंकट रमन की आयु 1987 में राष्ट्रपति चुने जाने के समय 76 वर्ष आठ महीने थी। वेंकटरमन का जन्म चार दिसम्बर, 1910 को और प्रणब दा का जन्म 11 दिसम्बर, 1935 को हुआ। इस प्रकार राष्ट्रपति चुने जाने के समय वेंकटरमण उम्र के मामले में प्रणब से छह दिन बड़े हैं। राष्ट्रपति पद के लिए दो मई, 1952 को हुए पहले चुनाव के समय डा. राजेन्द्र प्रसाद की आयु 63 वर्ष थी जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी टी शाह की उम्र 65 वर्ष थी। छह मई, 1957 को राष्ट्रपति पद के दूसरे चुनाव में डा. राजेन्द्र प्रसाद पुन: विजयी रहे, उस समय उनकी उम्र 70 वर्ष थी। इसके बाद 1962 में राष्ट्रपति बनने वाले डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की आयु 73 वर्ष थी। 1967 के चुनाव में जाकिर हुसैन की आयु 70 वर्ष थी। वहीं वीवी गिरि जब 1969 में नीलम संजीव रेड्डी को पराजित कर राष्ट्रपति बने तब उनकी आयु 75 वर्ष थी जबकि फखरूद्दीन अली अहमद जब 1974 में राष्ट्रपति चुने गए तब उनकी आयु 69 वर्ष थी। 1977 में नीलम संजीव रेड्डी सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुने गए तब उनकी आयु 64 वर्ष थी। इसके पश्चात 12 जुलाई, 1982 को हुए चुनाव के समय ज्ञानी जैल सिंह 66 वर्ष के थे। इसके अगले चुनाव में 1992 में राष्ट्रपति चुने गए डा. शंकर दयाल शर्मा की आयु 74 वर्ष थी। 15 जुलाई, 2002 के चुनाव में राष्ट्रपति चुने गए एपीजे अब्दुल कलाम की आयु 71 वर्ष थी। प्रतिभा पाटिल जब साल 2007 में जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं तब उनकी आयु 72 वर्ष थी।

     

नहीं टूट पाया रिकार्ड

राष्ट्रपति पद के चुनाव में प्रणब मुखर्जी ने 3,97,776 मतों के अंतर से जबर्दस्त जीत दर्ज की। हालांकि वह सबसे अधिक नौ लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से राष्ट्रपति चुने जाने के केआर नारायणन के रिकार्ड को नहीं तोड़ सके। राष्ट्रपति पद के लिए दो मई 1952 को हुए पहले चुनाव में डा. राजेन्द्र प्रसाद ने 5,07,400 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की। चुनाव में टी शाह को 92, 827 मत मिले । राजेन्द्र प्रसाद 4,14,573 मतोें से विजयी हुए थे। छह मई 1957 को राष्ट्रपति पद के दूसरे चुनाव में 4,59,698 मत प्राप्त कर डा. राजेन्द्र प्रसाद पुन: विजयी रहे। राजेन्द्र प्रसाद करीब साढ़े चार लाख मतों से विजयी हुए। इसके बाद 1962 के राष्ट्रपति चुनाव में 5,53,067 मत प्राप्त कर डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 5.47 लाख मतों से विजयी हुए। 1967 के चुनाव में जाकिर हुसैन को 4,71,244 मत प्राप्त हुए जबकि के सुब्बाराव को 3,63,971 मत मिले। जाकिर हुसैन 1,07,273 मतों से विजयी रहे। गिरि ने 1969 में नीलम संजीव रेड्डी को दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर 14,650 मतों के अंतर से हराया था जबकि 1997 में केआर नारायणन ने टीएन शेषन को नौ लाख से अधिक मतों से पराजित किया था। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने प्रेस से कहा कि संविधान में राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में ऐसा प्रावधान है कि बहुमत के लिए जरूरी मत प्राप्त नहीं होने पर दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर निर्णय होता है। उन्होंने कहा कि 1969 में वीवी गिरि दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर ही चुनाव जीत पाए थे। उस चुनाव में प्रथम वरीयता के मतों की गिनती के बाद किसी को बहुमत नहीं मिला। गिरि 14,650 मतों से विजयी हुए। फखरुद्दीन अली अहमद ने 1974 के चुनाव में 7,54,113 मत प्राप्त किए जबकि त्रिदिब चटर्जी को 1,89,196 मत मिले। अहमद 5.64 लाख मतों से विजयी रहे। इसके पश्चात 12 जुलाई 1982 को हुए चुनाव में ज्ञानी जैल सिंह 7,54,113 मत प्राप्त करके 4.71 लाख मतों के अंतर से जीते। उनके प्रतिद्वन्द्वी एचआर खन्ना को 2,82,685 मत मिले थे। आर वेंकट रमन 1987 में 7,40,148 मत प्राप्त करके 4.58 लाख मतों से विजयी रहे। उस चुनाव में वीआर कृष्णा अय्यर को 2,81,550 मत मिले। इसके अगले चुनाव में डा शंकर दयाल शर्मा ने 6,75,864 मत हासिल करके जीजी स्वेल को 3.29 लाख मतों से हराया। सबसे अधिक अंतर से जीत का रिकार्ड दर्ज करने वाले केआर नारायणन ने 1997 के चुनाव में 9,56,290 मत प्राप्त किए जबकि टीएन शेषन को महज 50,631 मत मिले। 15 जुलाई 2002 को चुनाव में एपीजे अब्दुल कलाम को 9,22,884 मत मिले जबकि लक्ष्मी सहगल को 1,07,366 मत प्राप्त हुए। कलाम 8.15 लाख मतों से चुनाव जीते। प्रतिभा पाटिल 2007 में 6,38,116 मत हासिल करते हुए भैरो सिंह शेखावत को तीन लाख से अधिक मतों से हरा कर देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। 

Monday, May 28, 2012

मजबूरी में मुलायम होता हाथ


यूपीए सरकार की तीसरी सालगिरह के मौके पर आयोजित समारोह में समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव की प्रमुखता से शिरकत को लेकर राजनीतिक हलकों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया। यद्यपि दोनों ने इसे शिष्टाचार का नाम दिया है, किंतु इसके गूढ़ राजनीतिक निहितार्थ की अनदेखी नहीं की जा सकती। कांग्रेस पर आर्थिक स्थिति लगातार खराब होने और सरकार पर नीतिगत फैसलों में ढिलाई का आरोप लग रहा है तो नित नए घोटालों का उजागर होना और बढ़ती महंगाई कोढ़ में खाज की तरह है। आम चुनाव (2014) से पहले कांग्रेस आमजन के बीच अपनी इस छवि को तोड़ना चाहती है। इसलिए सपा सुप्रीमो से नजदीकियां उसकी राजनीतिक जरूरत हो गई है। इसीलिए डिनर पार्टी में गठबंधन के नये उभरते समीकरण की यह तस्वीर दिखी है ताकि कांग्रेस अपने सहयोगियों को उनकी हद बता सके। अभी तक वह उनके आगे घुटनों के बल खड़ी थी। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि मुलायम सिंह किस हद तक कांग्रेस का साथ निभाएंगे और किस कीमत पर। राजनीति में कुछ असंभव नहीं है। जरूरत के अनुसार दूरियां नजदीकियों में और नजदीकियां दूरियों में बदलती रहती हैं। गठबंधन राजनीति में अपने नंबर गेमको दुरुस्त देखकर सरकार ने कठोर कदम उठाने के संकेत दे दिये हैं। उसकी पहली कोशिश आर्थिक सुधारों की धीमी पड़ी गति को रफ्तार देने की है ताकि खराब आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके। सहयोगी दलों के अड़ियल रुख के कारण ही रिटेल तथा पेंशन में एफडीआई और बैंकिंग संशोधन बिल अधर में लटके हैं। अब उसकी प्राथमिकता इन्हें यथाशीघ्र पास कराने की है। साथ उसकी कोशिश वर्ष 2012-13 में अनुमानित वृद्धि दर 7.75 फीसद को बनाए रखने की है। फिलहाल रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर है तो औद्योगिक विकास दर 3.5 प्रतिशत के करीब है। ऐसे में बाजार को आशंका है कि यदि देश की अनुमानित वृद्धि दर इससे कम हुई तो रोजगार, वेतन और बचत पर मार पड़ेगी। परिणामस्वरूप बीस साल में पहली बार मध्यवर्ग के जीवन स्तर में गिरावट आएगी। अभी सरकार पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रुपये की वृद्धि कर कठोर फैसला लेने की दिशा में आगे बढ़ी है। हालांकि उसकी राजनीतिक दुारियां भी कम नहीं हैं। आसन्न राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस की साख दांव पर है। उसे अपने प्रत्याशी की जीत के लिए सहयोगियों के अलावा सपा का समर्थन चाहिए। अब सपा के साथ कांग्रेस की बढ़ी निकटता से यह चुनौती आसान होती दिख रही है क्योंकि राज्यसभा में पेश लोकपाल बिल को प्रवर समिति को भिजवाकर सपा ने इसका इजहार कर दिया है। आज क्षेत्रीय नेताओं में मुलायम की स्थिति सबसे मजबूत है। उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार होने से सपा उत्साह से लबरेज है। मुलायम की धर्मनिरपेक्ष छवि पर कोई दाग नहीं है। अभी यूपीए में जो दल शामिल हैं, उनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस को छोड़कर अन्य सभी कभी न कभी भाजपा से हाथ मिला चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को मुलायम का आंखमूंदकर समर्थन मिल पाना दूर की कौड़ी माना जा रहा है क्योंकि उनकी नजर 2014 के आम चुनावों पर है, जहां उनका सीधा मुकाबला कांग्रेस से होगा। इसलिए उनकी हर कोशिश कांग्रेस को कमजोर रखने की ही होगी। सपा ने लोस चुनाव में 50 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। वैसे यूपीए सरकार की बदहाली को लेकर जनता में गुस्सा है तो भाजपा की आपसी लड़ाई से वह निराश है। ऐसे में आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों की केंद्र की राजनीति में मुख्य भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। मुलायम उसका केंद्रबिंदु बनना चाहते हैं। अभी कुछ दिन पूर्व संसद की साठवीं सालगिरह पर मुलायम ने कांग्रेस और भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा था कि 2014 में केंद्र में ऐसी सरकार बनेगी जिसे कांग्रेस और भाजपा चाहकर भी नहीं गिरा सकेंगी। इससे स्पष्ट है कि वे 2014 में केंद्रीय राजनीति में अपनी बड़ी भूमिका की तैयारी में हैं। इसलिए वह कांग्रेस के लिए उसके किसी भी सहयोगी दल से नाराजगी मोल नहीं लेंगे। दूसरे, उनकी राजनीति कांग्रेस विरोध की रही है। अभी हर मुद्दे पर सरकार के विफलता के कारण कांग्रेस की जनता के बीच भद पिट रही है। ऐसे में मुलायम सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस से अपनी निकटता दिखाने से भी परहेज करेंगे। मुलायम सिंह राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं इसलिए उन्हें अपनी कमजोरी और मजबूती का बखूबी पता है। उन्होंने वर्ष 2008 में परमाणु करार के सवाल पर यूपीए-एक की सरकार बचाई थी। ऐसा उन्होंने अपने अपमान की परवाह किये बगैर किया था, क्योंकि 2004 में कांग्रेस के भोज में उनकी घोर उपेक्षा हुई थी। इतना ही नहीं, तब वामपंथियों ने सरकार से समर्थन वापस लिया था और उनसे मुलायम के मधुर संबंध थे। किंतु देशहित की खातिर उन्होंने उनकी भी परवाह नहीं की थी। उस समय लोकसभा में उनके 36 सदस्य थे। उस समय भी वह यूपीए सरकार में शामिल नहीं हुए जिसके चलते उनकी अलग पहचान बनी। अब यूपीए-दो सरकार में शामिल घटक दलों की सौदेवाजी, आसन्न मध्यावधि चुनाव से देश को बचाने तथा खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए भंवर में फंसी कांग्रेस को उबारने के लिए उनकी यह निकटता फिर से बढ़ी है। किंतु राजनीतिक खटास यथावत है। लड़खड़ाती कांग्रेस को इस संकट की घड़ी में सहारा देकर मुलायम अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं ताकि लोस चुनाव के दौरान वोटों की फसल काटी जा सके। इसलिए जन सरोकार के मुद्दों पर ही वह यूपीए सरकार के संकट मोचक बनेंगे। ऐसे में मुलायम कांग्रेस के कितने निकट और कितने दूर होंगे, यह अंदाजा लगाना स्वयं कांग्रेस के लिए भी काफी कठिन होगा। मसलन, पेट्रोल मूल्य वृद्धि के विरोध में विपक्षी दलों द्वारा आयोजित देशव्यापी बंद का समर्थन मुलायम भी कर रहे हैं। यूपीए-दो में कांग्रेस की जनछवि और राजनीति साख काफी कमजोर हुई है। भ्रष्टाचार और महंगाई से निपटने में उसकी अक्षमता के चलते जनता का आक्रोश बढ़ा है जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। इस गिरते मनोबल को उठाने के लिए कांग्रेस को उन्हें जीत का टॉनिक देना होगा। लेकिन वह इतना आसान नहीं दिखता। क्योंकि 2014 के आम चुनाव से पहले अभी कई विधानसभा चुनाव होने हैं, इनमें गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ आदि शामिल है। वैसे गुजरात में हाल के मनसा उपचुनाव में जीत से वहां के कांग्रेसियों में उत्साह है, किंतु वे राज्य को मोदी के हाथों से छीनने की उम्मीद नहीं रखते। दूसरे, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने 22 विधायकों के विद्रोह का सामना कर रहे हैं। उनके लिए अच्छी खबर यह है कि यहां भाजपा भी अंतर्कलह की शिकार है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस गुटबंदी की शिकार है, हालांकि कर्नाटक में येदियुरप्पा के विरोध के चलते कांग्रेसियों में उम्मीद जरूर जगी है कि इससे पार्टी में नई जान आएगी। यह सच है कि दिल्ली में कांग्रेस के पास शीला दीक्षित जैसी करिश्माई क्षेत्रीय नेता जरूर हैं पर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे भाजपाई क्षत्रपों के मुकाबले के नेता उसके पास नहीं हैं। कांग्रेस के सामने फौरी चुनौती 12 जून को आंध्रप्रदेश में 18 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव हैं। यहां जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस को सांसत में डाले हैं तो अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर उसका ढुलमुल रवैया गले की फांस बना हुआ है। ऐसे में आम चुनाव से पूर्व होने वाले ये चुनाव कांग्रेस के लिए काफी अहम माने जा रहे हैं। इसीलिए कांग्रेस मुलायम के सहारे अपने सहयोगी दलों के दबाव को कम करने की जुगत में है। मुलायम सिंह को पता है कि कांग्रेस आज मजबूरी में उनके निकट आई है। इसलिए उन्हें इस सहयोग की राजनीतिक कीमत बसूलने में तनिक चूक नहीं करना चाहिए। उत्तर प्रदेश के लिए विशेष पैकेज के लिए उन्हें दबाव डालना चाहिए। साथ ही राज्य में चल रही केंद्रीय योजनाओं के लिए ज्यादा से ज्यादा धन की मांग करनी चाहिए। इसके अलावा उन्हें कांग्रेस के साथ अपनी निकटता दिखाने में यह सतर्कता बरतनी होगी कि उसकी अक्षमता के लिए जनता उनकी पार्टी सपा को भी उसी के कतार में न खड़ी कर सके। क्योंकि उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार बनाने के बाद उनकी असल चुनौती 2014 में केंद्रीय राजनीति की मजबूत धुरी बनने की है। क्योंकि दोनों राष्ट्रीय दल (कांग्रेस- भाजपा) अपनी कमजोरियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय राजनीति में क्षत्रपों की अहम भूमिका की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

Monday, April 23, 2012

राज्यों ने लगाया केंद्र पर उपेक्षा का आरोप


आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में कई राज्यों ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि आंतरिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मामले में कोई भी फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार को उन्हें पूरी तरह विास में लेना चाहिए। इस मामले में गैर यूपीए शासित सरकारों के मुख्यमंत्री मुखर थे। सैन्य व असैन्य इकाइयों के बीच तनाव से सुरक्षा पर प्रतिकूल असर : सेना के साथ हाल ही में हुए विवाद के लिए केंद्र की आलोचना करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को कहा कि असैन्य एवं सैन्य इकाइयों के बीच में तनाव से देश के आंतरिक सुरक्षा हालात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौजूदा केंद्र सरकार आम आदमी में हमारी रक्षा तैयारियों को लेकर विास का संचार करने में विफल रही। देश की आंतरिक सुरक्षा को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि यह बाह्य सुरक्षा हालात से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि केंद्र को अविास एवं संदेह के इस माहौल को खत्म करने के लिए सक्रि य कदम उठाने चाहिए जो हाल ही में हुए विवादों के कारण पैदा हुआ है। सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर राज्य सरकारों से सलाह-मशविरा नहीं करने के लिए केंद्र की आलोचना करते हुए मोदी ने कहा कि आरपीएफ व बीएसएफ कानून में संशोधन कर केंद्र राज्य के भीतर राज्यका गठन कर रहा है। सीबीआई सहित केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिकरण बढ़ रहा है। उनका इस्तेमाल केंद्र में सत्ताधारी दल के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने में हो रहा है। इस रुख से सीबीआई जैसी एजेंसियों की विसनीयता के साथ समझौता हुआ है और यह चिन्ता की बात है क्योंकि ये एजेंसियां आंतरिक सुरक्षा के मसलों में शामिल हैं। उन्होंने केंद्र के इन दावों पर भी सवाल उठाया कि 97 फीसद खुफिया खबरें केंद्रीय एजेंसियों की ओर से आ रही है और राज्य एजेंसियों की ओर से केवल तीन प्रतिशत खबरें आती हैं। खुली भारत-नेपाल सीमा चिंता का विषय: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आज कहा कि प्रदेश से सटी नेपाल की 550 किलोमीटर लंबी सीमा पर निगरानी की विशेष व्यवस्था की आवश्यकता है ताकि किसी भी संभावित राष्ट्रविरोधी गतिविधि को रोका जा सके। अखिलेश ने पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए राज्य को आवंटित धनराशि 100 करोड रुपए से बढ़ाकर 800 करोड़ रुपए करने की मांग की। उन्होंने 2013 में होने जा रहे कुंभ मेले का जिक्र करते हुए केंद्र की मदद मांगी ताकि कुंभ मेले का आयोजन सफलतापूर्वक किया जा सके। उन्होंने गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर को मेगा सिटी पोलिसिंग परियोजनामें शामिल करने की मांग करते हुए कहा कि दोनों ही जिलों की पुलिस को अत्याधुनिक हथियार और उपकरण मुहैया कराए जाने चाहिए। राज्य पुलिस की क्षमता में सुधार और आबादी के हिसाब से पुलिस की उपलब्धता का अनुपात राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने के लिए 5000 करोड़ रुपए की केंद्रीय मदद मांगी। राज्यों के अधिकार छीन रहा है केंद्र : तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने विधेयकों को पारित कराकर केंद्र द्वारा राज्यों के अधिकार छीनने की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति सचेत करते हुए आज कहा कि ऐसा करना राज्य सरकारों के प्रति असम्मान दर्शाना है। सम्मेलन में जयललिता ने संप्रग सरकार पर चहुंतरफा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) के जरिए केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारक्षेत्र में घुसपैठ कर रही है। यह उन संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है जो राज्यों की सूची में पुलिस को तरजीही दर्जा प्रदान करता है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र ने बंगाल की खाड़ी में भारत-अमेरिकी संयुक्त नौसैनिक अभ्यास का एकतरफा फैसला किया और उसने राज्य सरकार को विास में नहीं लिया। एनसीटीसी का विरोध कर रही मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका मतलब यह होगा कि केंद्र सरकार संवैधानिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों का असम्मान कर रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र जब कभी भी कोई महत्वपूर्ण फैसला करेगा, राज्य सरकारों के साथ पहले से सलाह मशविरा करने के सिद्धांत का पालन करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का भय है कि विधेयक पारित कराके या अधिसूचना जारी कर राज्यों को प्रदत्त अधिकारों के हनन की प्रवृत्ति उभर रही है। आतंकवाद का मिलकर मुकाबला क्यों नहीं : मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह बात उनकी समझ से परे है कि जब हम वामपंथी उग्रवाद जैसी समस्या से संयुक्त रू प से लड़ सकते हैं तो इस माडल पर आतंकवाद से क्यों नहीं लड़ सकते। आंतरिक सुरक्षा की किसी भी स्थिति से निपटने का सर्वप्रथम दायित्व राज्य सरकारों का है। अत: राज्यों को मजबूत किए बिना आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ नहीं किया जा सकता। चौहान ने कहा कि नीति निर्धारण एवं नये कानूनों के बनाने के पूर्व राज्य सरकारों से भी विचार-विमर्श किया जाए न कि स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य लोगों से ड्राफ्ट प्रस्ताव के आधार पर ड्राफ्ट तैयार कर राज्य सरकारों को टिप्पणी के लिए भेजा जाए। उन्होंने कहा कि यूएपी एक्ट में एकतरफा संशोधन इसका उदाहरण है। विगत समय में यह देखने में आया है कि केंद्र आंतरिक सुरक्षा के बहुत से विषयों पर एकतरफा निर्णय ले रही है। चाहे वह एनसीटीसी का गठन हो या फिर देश के अन्य भागों में लागू करने के लिए बीएसएफ एक्ट या आरपीएफ एक्ट के प्रस्तावित संशोधन हों। उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर सभी साझेदारों से विचार विमर्श किये बगैर इसे संसद में लाने का प्रयास किया गया। ऐसा प्रयास संघात्मक ढांचे की भावना के विपरीत और केन्द्रीयकरण की तरफ एक बढ़ता कदम है। एनसीटीसी पर राष्ट्रीय सहमति जरूरी : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि एनसीटीसी की स्थापना के लिए राष्ट्रीय सहमति आवश्यक है जिससे देश के संघीय ढांचे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़े। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद व आतंकवाद से केंद्र एवं राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से ही निपटा जा सकता है। इसके लिए स्वयं उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया है। एएफएसपीए और श्रीनगर से 24 बंकर हटें : जम्मू कश्मीर में सुरक्षाबलों की तैनाती कम करने पर जोर देते हुए राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सभी महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान के लिए वार्ता ही सबसे बढ़िया तरीका है। उमर ने सम्मेलन में भारत-पाक संबंधों से लेकर कश्मीर सहित कई मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून ( एएफएसपीए) को हटाने और श्रीनगर शहर से 24 बंकर हटाने का मुद्दा भी उठाया। पाकिस्तान के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने के लिए उन्होंने जम्मू कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर के बीच टेलीफोन कनेक्शन की बात की। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2011 के दौरान जो शांति रही, वह आगे भी रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्य के सुरक्षा माहौल में चूंकि अब काफी बदलाव आ गया है, एएफएसपीए को जारी रखने की समीक्षा होनी चाहिए । मैं उन जिलों और क्षेत्रों से एएफएसपीए हटाने की वकालत नहीं कर रहा हूं, जो अभी भी उग्रवाद से प्रभावित हैं लेकिन उन जिलों और क्षेत्रों से एएफएसपीए को हटाने की शुरूआत होनी चाहिए, जो आतंकवादी गतिविधियों से प्रभावित नहीं हैं।

Tuesday, March 20, 2012

अगर रेल किराया बढ़ाने पर मेरा इस्तीफा लिया गया तो ‘दादा’ का क्यों नहीं : दिनेश


रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी का मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि उनसे मात्र इसलिए इस्तीफा लिया गया कि उन्होंने रेल किराया में वृद्धि का प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा कि अगर रेल किराया बढ़ाने पर उन्हें हटाया गया तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को भी हटाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भी तो आम बजट में विभिन्न वस्तुओं के दाम महंगे किए हैं। त्रिवेदी के चेहरे पर आज किसी तरह का तनाव नहीं दिखा और एक तरह से वे दार्शनिक मुद्रा में नजर आए। क्या आपको मोहरा बनाया गया, इस सवाल पर त्रिवेदी ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि मोहरा बनाया गया। पार्टी की लीडर (ममता बनर्जी) ने कहा कि इस्तीफा दो तो मैंने यह नहीं पूछा क्यों और इस्तीफा दे दिया। मैंने किसी का भरोसा नहीं तोड़ा।यह पूछे जाने पर कि उन्होंने क्या गलती की थी, त्रिवेदी ने कहा, ‘यह सवाल लोग पूछें। एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे यह सवाल नहीं करना चाहिए। रेलवे राष्ट्रीय संपदा है और एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे अनुशासन का पालन करना होगा।
क्या वह रेलवे को मझधार में छोड़कर जा रहे हैं, इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘व्यवस्था ऐसी ही है। मैं किसी को दोष नहीं दे रहा हूं और मुझे किसी से कोई शिकायत भी नहीं है। हम व्यवस्था का अंग हैं।त्रिवेदी ने कहा, ‘मैंने अपना काम किया, मुझे कोई अफसोस नहीं है। प्रधानमंत्री सहित हर व्यक्ति ने मुझे सहयोग दिया। मुझे खुशी है कि मैंने अपना कर्तव्य निभाया।दिनेश त्रिवेदी ने नए रेल मंत्री मुकुल राय पर कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘मुझे इसमें नहीं पड़ना है। पार्टी के ही लोगों द्वारा षडयंत्र की संभावना के सवाल पर त्रिवेदी ने कहा, ‘मैं इस बात में भी नहीं पड़ना चाहता कि मेरे साथ कोई षडयंत्र हुआ।
रेल भवन में उनके अनुभव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘यह एक बेहतर अनुभव रहा। अपने कार्यकाल के अंत में मैं एक बहुत संतुष्ट व्यक्ति के तौर पर विदा ले रहा हूं। मैं रेल परिवारके 14 लाख सदस्यों के स्नेह और प्यार से अभिभूत हूं। ज्ञान, अनुभव और भावनात्मक स्तर पर मैं एक बहुत समृद्ध व्यक्ति के तौर पर विदा ले रहा हूं।
रेल बजट, जिसकी वजह से उन्हें अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा, के बारे में त्रिवेदी ने कहा कि एक बार बजट जब संसद में पेश कर दिया जाता है तो फिर वह संसद का ही हो जाता है और संसद भारत की जनता की है। उन्होंने कहा, ‘मेरे साथ अहम की कोई समस्या नहीं है। मैंने केवल सही समय पर सही काम करना चाहा था।
लोकसभा में सोमवार को ज्यादातर समय दिनेश त्रिवेदी सत्ता पक्ष में कांग्रेस सदस्यों के साथ ही बैठे। फिर कुछ देर बाद वह आगे आ गए और गृह मंत्री के पास बैठे। कुछ कांग्रेस सदस्यों ने उनसे हाथ मिलाया और उनकी पीठ ठोंकी।
कहा, मेरे साथ अहं की कोई समस्या नहीं है। मैंने केवल सही समय पर सही काम करना चाहा था रेलवे राष्ट्रीय संपदा है और एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे अनुशासन का पालन करना होगा पार्टी की लीडर ने कहा कि इस्तीफा दो तो मैंने यह नहीं पूछा क्यों और इस्तीफा दे दिया

Wednesday, February 29, 2012

छठे चरण में 60% मतदान


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के छठे चरण में मंगलवार को 60 फीसद से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इसके पूर्व वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में छठे चरण में 46.86 फीसद मतदान हुआ था। इस चरण में राज्य के पश्चिमी क्षेत्रों के 13 जिलों की 68 सीटों के लिए मतदान हुआ। मतदान के दौरान छिटपुट घटनाएं भी हुईं। बागपत जिले के बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के ढिकाना गांव में मतदान को लेकर राष्ट्रीय लोकदल के समर्थकों ने दलितों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। आगरा के एत्मादपुर विधानसभा क्षेत्र के खंदौली के गांव शेरखान में बसपा और भाजपा कार्यकर्ताओं की भिड़ंत में कई लोगों को चोटें आई। विवाद की शुरुआत कथित रूप से एक व्यक्ति को पोलिंग कर्मचारियों द्वारा मतदान से रोके जाने से हुई। इस बीच, किसी ने गोली चला दी जिससे एक व्यक्ति घायल हो गया। दोनों पक्षों के बीच हुए पथराव में सेक्टर मजिस्ट्रेट और एक पोलिंग कर्मचारी को चोटें आयीं। डिबाई में सपा प्रत्याशी गुड्डू पंडित के खिलाफ दो मामले दर्ज किए गए हैं। दानपुर ब्लाक की प्रमुख ने उनके खिलाफ मारपीट और अस्पृश्यता अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया है। सहारनपुर के 106 हुसैन मलक बूथ और 108 शाहपुर मतदान केंद्र पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार किया। इसका कारण गांव का विकास न होना बताया गया है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा ने बताया कि छठे चरण में सायं 5.00 बजे तक 60.08 फीसद मतदान हुआ है।  मतदान शांतिपूर्ण हुआ और कहीं से किसी भी तरह की कोई गंभीर शिकायत नहीं मिली। श्री सिन्हा ने कहा कि गाजियाबाद के 57 मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग सेन्टर 67 एसआर पब्लिक स्कूल, विजय नगर में ईवीएम के माकपोल न किये जाने के कारण दोबारा मतदान कराया जाएगा। छठे चरण में 86 महिला समेत 1103 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। यह चरण प्रत्याशियों के लिहाज से सबसे बड़ा था। श्री सिन्हा ने बताया कि इस चरण में मतदाताओं की संख्या दो करोड़ 14 लाख थी। मतदान के लिए 12 हजार 70 पोलिंग सेन्टर और 21 हजार 317 पोलिंग स्टेशन बनाए गए थे। इसमें 30 हजार से ज्यादा ईवीएम का प्रयोग किया गया। उन्होंने बताया कि छठे चरण में सहारनपुर में 64.86 फीसद, प्रबुद्ध नगर- 59.33 , मुजफ्फरनगर- 59.17, मेरठ- 60.86, बागपत- 55.67 , गाजियाबाद - 58.00 , पंचशील नगर- 60.67, गौतमबुद्ध नगर- 55.60, बुलंदशहर- 61.07 , अलीगढ़- 60.00, महामाया नगर- 60.5 , मथुरा- 63.80 और आगरा में 58.82 फीसद मतदान हुआ है। फिलहाल, इसमें आंशिक बढ़ोतरी भी हो सकती है। उन्होंने बताया कि सहारनपुर के चार विधानसभा क्षेत्रों में सर्वाधिक 69 फीसद मतदान हुआ है। इसके अलावा अलीगढ़, बुलन्दशहर, मथुरा, मेरठ, पंचशीलनगर, महामायानगर में 60 फीसद से ज्यादा मतदान हुआ। उन्होंने बताया कि अब तक प्रदेश के 65 जिलों में मतदान हो चुका है। इन सभी जिलों में कुल मतदान प्रतिशत 58.40 है जो आजादी के बाद का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि छठे चरण में कुल 68 शिकायतें आयी थीं। इनमें 27 ईवीएम की खराबी और शेष मतदाता सूची, फोटो आईकार्ड, वोटर पर्ची आदि के थे। सभी शिकायतों की जांच करायी गयी। इनमें कई शिकायतें फर्जी पायी गयीं। गाजियाबाद में एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल के मतदान न डाल पाने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मतदाता को भी देखना चाहिए कि उसका नाम मतदाता सूची में है अथवा नहीं। बावजूद इसके वह इस मामले की जांच करायेंगे कि इसमें गलती बीएलओ के स्तर से है अथवा कहीं और से। यह चरण राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौ. अजित सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के लिए खासतौर पर प्रतिष्ठा से जुडा है क्योंकि दोनों के पुत्र चुनाव मैदान में हैं। श्री चौधरी के सांसद पुत्र जयन्त चौधरी मथुरा की मांट सीट से उम्मीदवार हैं जबकि कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह बुलन्दशहर की डिबाई सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय सिकन्दराराऊ से, कृषि मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी छाता से, बसपा के मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह बरौली से, सपा के अरिदमन सिंह, पूर्व मंत्री चौधरी बशीर, रालोद प्रदेश अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह, बसपा के धर्मपाल सिंह, रालोद से हाजी याकूब, किठौर सीट से बसपा के लखीराम नागर, वेदराम भाटी, रालोद से कोकब हमीद, डिबाई से सपा से भगवान शर्मा, बसपा के धर्म सिंह सैनी, सपा के किरनपाल कश्यप आदि प्रमुख प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। मंगलवार को टीम अन्ना के अन्य सदस्य कुमार विास और राष्ट्रीय लोकमंच के अध्यक्ष सांसद अमर सिंह ने गाजियाबाद के साहिबाबाद में वोट डाला जबकि पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अलीगढ़ में और केन्द्रीय उड्डयन मंत्री चौधरी अजित सिंह ने बागपत में अपना वोट दिया। मतदान के दौरान हुई छिटपुट घटनाओं में मुजफ्फरनगर के जानसठ विधानसभा क्षेत्र के सूजड़ू गांव स्थित मतदान केंद्र पर उस समय हंगामा मच गया जब बसपा सांसद कादिर राणा ने एक युवक पर यह आरोप लगाते हुए थप्पड़ जड़ दिया कि वह मतदाताओं को एक प्रत्याशी विशेष के पक्ष में मतदान करने के लिए दबाव डाल रहा है। व्यवस्था से खफा और पुल, सड़क या स्कूल निर्माण न किए जाने के खिलाफ कई स्थानों पर लोगों ने मतदान का बहिष्कार कर अपने गुस्से का इजहार किया। जानसठ विधानसभा क्षेत्र के ढांसरी में सड़क न बनाए जाने के विरोध में ग्रामीणों ने वोटिंग का बहिष्कार कर दिया। बाद में हालात बिगड़ने पर पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के ततीना के ग्रामीणों ने मतदान का सामूहिक बायकॉट किया। गांव वाले मेरठ-मुरादाबाद रेल लाइन पर गांव के निकट मानव रहित फाटक बंद किए जाने से नाराज थे। उन्होंने रेल ट्रैक पर डेरा डाल दिया। बाद में प्रशासन ने बड़ी मुश्किल से उन्हें वहां से हटाया, लेकिन ग्रामीणों ने खुद को मतदान प्रक्रिया से विरत रखा। बेहट (सहारनपुर) से भी बहिष्कार की रिपोर्ट मिली है। बुलंदशहर के शिकारपुर विधानसभा क्षेत्र के पहासू के पड़ागांव के ग्रामीणों ने विकास में पर्याप्त हिस्सेदारी न मिलने पर चुनाव का बहिष्कार किया। नोएडा विधानसभा क्षेत्र के बहलोलपुर पोलिंग बूथ पर क्षेत्रीय सांसद व पुलिस के बीच झड़प हो गई। बाद में समर्थकों के साथ सांसद ने सड़क पर जाम लगा दिया। सूचना मिलने पर डीआईजी ज्योति नारायण दल- बल के साथ मौके पर पहुंचे और समझा-बुझाकर जाम खत्म कराया।