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Monday, February 27, 2012

राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं राहुल


उत्तर प्रदेश का चुनावी माहौल चरम पर है। बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा के बीच सत्ता की जंग अपने पूरे शबाब पर है। लेकिन इस दौर में अगर सबकी नजर किसी नेता पर है तो वे हैं कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव। दोनों युवा नेता अपने-अपने अंदाज में चुनाव प्रचार में डटे हैं और एक-दूसरे के खिलाफ जमकर मोर्चा संभाले हुए हैं। लेकिन आजकल जिसकी ज्यादा चर्चा हो रही है, बेशक वह हैं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। उन्हें भारतीय राजनीति का अपरिपक्व युवा चेहरा बताया जा रहा है, लेकिन हाल के दिनों में कई मौकों पर उन्होंने अपनी राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है। यह बात और है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे उनका राजनीतिक तिकड़म बता रहे हैं। पिछले दिनों राहुल गांधी ने एक मंच से विपक्षी समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र यह कहते हुए फाड़ दिया था कि यह पार्टी बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब धरे के धरे रह जाते हैं। राहुल यहीं नहीं रुके, उन्होंने विपक्षी दलों के घोषणा पत्रों का जमकर माखौल भी उड़ाया। राहुल गांधी के इस रुख से सपा सहित तमाम विपक्षी दलों के नेता अवाक रह गए। पर जब मीडिया ने राहुल गांधी द्वारा फाड़े गए पर्चे का क्लोजअप दिखाया, तो उनकी पोल खुल गई। दरअसल, वह सपा का घोषणा पत्र नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के उन नेताओं के नामों की लिस्ट थी, जिन्हें मंच पर बोलना था। यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या सपा का घोषणा पत्र बताते हुए कांग्रेसी नेताओं के नाम की सूची फाड़कर राहुल ने राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की संभावनाओं के बीच कांग्रेस-सपा के भावी गठबंधन पर रोक लगा दी है? दरअसल, तमाम राजनीतिक विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे थे कि अगर राज्य में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो पर्याप्त संख्या बल के लिहाज से सपा और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकते हैं। इस भावी गठबंधन के भी दो फायदे होते। पहला तो यह कि 22 सालों से प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती और दूसरा केंद्र की संप्रग सरकार को सपा के रूप में नया खेवनहार मिल जाता तथा संप्रग सरकार की प्रमुख सहयोगी तृणमूल कांग्रेस से कांग्रेस पल्ला झाड़ने का साहस जुटा लेती। मगर दाद देनी होगी राहुल की इस हिम्मत की कि उन्होंने खुले मंच से यह जताने की कोशिश कर दी कि उनकी पार्टी भले ही विपक्ष में बैठना स्वीकार कर लेगी, मगर चुनाव बाद सपा से कोई गठबंधन नहीं करेगी। शायद राहुल को यह तथ्य अच्छी तरह समझ में आ गया होगा कि कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के क्षेत्रीय दलों को समर्थन देने से ही राज्य में इनका नामलेवा तक नहीं बचा है और भविष्य में भी अगर यही हाल रहा तो हो सकता है कि अपने बचे-खुचे अस्तित्व से जूझती इन पार्टियों को पुन: अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में दशकों का समय लगे। खैर, राहुल के इस तेवर ने प्रदेश में चल रहे सियासी गुणा-भाग को और उलझा दिया है। राहुल के पर्चा कांड के बाद मुलायम सिंह ने हमीरपुर की जनसभा में यह कहकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दीं कि अगर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के संकेत दिखते हैं तो उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकती है। हालांकि बाद में अपनी गलती का एहसास होते ही वह अपनी बात से पलट गए, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उनका यह संदेश राज्य की जनता के बीच पहुंच चुका था। मुलायम सिंह के इस रंग-बदलू व्यवहार से निश्चित ही समाजवादी पार्टी को आगामी दो चरणों के चुनाव में नुकसान होने का अंदेशा है। राज्य की जनता को यह समझ आने लगा है कि जब सपा येन-केन प्रकारेण कांग्रेस से गठबंधन को अति-आतुर दिख रही है तो फिर अपने बहुमूल्य वोट का नुकसान क्यों? जानकारों की राय में इससे कांग्रेस, भाजपा और बसपा जैसी विपक्षी पार्टियों का जनाधार बढ़ना तय है। एक ओर जहां युवा तुर्क अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा पूरे प्रदेश में साइकिल की चाल को तेज करने में लगी हुई है तो वहीं मुलायम सिंह अपनी बयानबाजियों से अखिलेश की राह में रोड़ा बन रहे हैं। बहरहाल, नेताओं के हालिया बयानों और विवादों ने यकीनन राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। मगर अंदरखाने क्या खिचड़ी पक रही है, कोई नहीं कह सकता। अब तो विधानसभा चुनाव के बाद ही पूरी तस्वीर साफ हो पाएगी और इसमें प्रदेश की जनता की मन:स्थिति यकीनन बड़ा कारक होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

राहुल गांधी बनाम अखिलेश यादव


उत्तर प्रदेश चुनाव में जिन दो युवाओं ने सबका ध्यान खींचा है, वे हैं समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गांधी। हालांकि दोनों में समानता है तो केवल इतनी कि दोनों युवा हैं और दोनों को नेतृत्व उनके परिवार की पृष्ठभूमि से मिला है। दोनों की उच्च शिक्षा भी विदेश में हुई। कार्यशली की दृष्टि से देखें तो दोनों ने अपने चुनाव अभियान में सूचना तकनीक का प्रयोग किया है। दोनों अपने वार रूम से लगातार संपर्क में रहते हैं। फेसबुक पर लगातार अपडेट करते रहते हैं। जिस क्षेत्र में चुनावी सभा करनी है, वहां पहले के चुनावों के परिणाम, जनांकिकी, इतिहास, राजनीति के ऐसे लोग जिनका असर आज भी लोगों पर हो और वहां संपर्क करने योग्य नामों की जानकारी तत्क्षण वे प्राप्त करते हैं। अखिलेश फेसबुक, ट्विटर और वर्चुअल व‌र्ल्ड की हर सोशल नेटवर्किग साइट पर मौजूद हैं। अपनी हर सभा के पहले कहा जाता है कि वे इन पर खुद को अपडेट करते हैं। यही हाल राहुल गांधी का है। वैसे राहुल का वार रूम अखिलेश से ज्यादा शक्तिशाली है, जिसकी खोज-खबर वह खुद लेते रहते हैं। राहुल द्वारा चुनाव में हर प्रकार की आधुनिक तकनीक का उपयोग करना स्वाभाविक लगता है। इसके पहले के चुनावों में भी राहुल का सूचना तकनीकों से सुसज्जित वार रूम ऐसे ही सक्रिय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के बारे में धारणा इसके विपरीत थी। अमर सिंह के प्रभाव से मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी में फिल्मी कलाकारों, नामी सोशलाइटों, उद्योग एवं व्यापार जगत की हस्तियों सहित हर प्रकार के ग्लैमर को तो स्वीकार किया, लेकिन विचारों के स्तर पर माना जाता है कि उनका कारवां डॉ. राममनोहर लोहिया के खांटी अंग्रेजी विरोध और देसी आचारण तक सीमित रहा। जाहिर है, अखिलेश ने समाजवादी पार्टी के साथ-साथ मुलायम सिंह की भी सोच बदली है। क्रांति यात्रा की तैयारी में सपा की वेबसाइट को अपग्रेड करके लांच करना भी शामिल था। इस समय सपा भी सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर मौजूद है। यह सपा का अखिलेश संस्करण है। दोनों युवा नेताओं की इस शैली को चुनाव में कितना लाभ मिलता है, यह अलग से मूल्यांकन का विषय है। कह सकते हैं कि अखिलेश ने सूचना तकनीक के प्रयोग और साइबर स्पेस की दुनिया में सपा को भी कांग्रेस के मुकाबले खड़ा किया है। लेकिन राहुल गांधी की बढ़ी दाढ़ी तथा भंगिमा में गुस्सैल युवा दिखने की छवि अखिलेश से अलग है। 14 नवंबर 2011 को फूलपुर से अभियान की शुरुआत करते समय जब उन्होंने युवाओं को ललकारा कि क्यों दूसरे राज्यों में भीख मांगने जाते हो तो इसकी आलोचना भी हुई, पर दरअसल यह एक रणनीति थी, जिसके द्वारा यह प्रदर्शित किया गया था कि कांग्रेस के युवा नेता के अंदर उत्तर प्रदेश की दुर्दशा के कारण गुस्सा वैसे ही है, जैसे कि अन्य युवाओं के अंदर। वह आगे बढ़कर युवाओं के साथ मिलकर प्रदेश को बदलना चाहते हैं। फिर चुनावी सभा में घोषणा पत्रों को कागजी वादों की फेहरिस्त बताते हुए प्रतीक के तौर पर कागज का टुकड़ा फाड़कर राहुल ने यही प्रदर्शित किया कि उनके अंदर उत्तर प्रदेश की दुर्दशा को लेकर उन सारी पार्टियों के खिलाफ गुस्सा है, जिन्होंने सिर्फ वादे किए। जाहिर है, राहुल युवाओं को अपनी ओर खींचना चाहते हैं। 1970-80 के दशक में अमिताभ बच्चन की गुस्सैल युवा की फिल्मी छवि ने भारी संख्या में युवाओं को उनकी ओर खींचा था। राजनीति में यह सफल होगा या नहीं, इसका मूल्यांकन करना अभी जल्दबाजी होगी। अखिलेश भी विरोधियों पर हमला करते हैं, लेकिन उनके चेहरे से गुस्सा नहीं झलकता। वे शांत तरीके से अपनी बात रखते हैं। राहुल की इस भंगिमा पर उनकी टिप्पणी थी कि कांग्रेस के नेता अभी कागज फाड़ रहे हैं, आगे वह मंच से कूदने लगेंगे। वह शांति से कहते हैं कि उत्तर प्रदेश और देश की दुर्दशा के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार तो वही दल होगा, जिसने सबसे अधिक समय तक शासन किया। फिर पूछते हैं कि किसने सबसे अधिक राज किया? दोनों की शैली में अंतर साफ दिखता है। इसका कारण भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोनों की और उनकी पार्टियों की हैसियत है। अखिलेश को प्रदेश में एक सशक्त जानाधार, पार्टी के पक्ष में एक मजबूत सामाजिक समीकरण तथा विधायकों, सांसदों, स्थानीय निकायों में जन प्रतिनिधियों के विशाल समूह के साथ एक सक्रिय और जीवंत पार्टी इकाई मिली है। इसके विपरीत राहुल को कांग्रेस का ऐसा जर्जर और नष्ट ढांचा मिला, जिसका जनाधार विलुप्त था। सामाजिक समीकरण तो न जाने कब का समाप्त हो चुका है। वस्तुत: जब राहुल ने कमान संभाली कांग्रेस मर चुकी थी। साथ ही प्रदेश में ऐसा कोई नेता भी नहीं मिला, जिसे आगे बढ़ाकर राहुल कांग्रेस को पुनजीर्वित करने की कोशिश करें। सब कुछ उनके अपने कंधे पर था और है। अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव खुद अभी सक्रिय हैं और अन्य ऐसे नेता हैं, जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव है। यही अंतर उत्तर प्रदेश में दोनों के बीच विषमता की खाई को रेखांकित करते हैं। आखिलेश जहां है, उन्हें उससे आगे बढ़ना है और इसलिए उन्होंने युवाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए सोशल नेटवर्क का सहारा लेकर टैब्लेट, लैपटॉप और इंटरनेट कनेक्शन तक के वादे किए। अगर युवाओं का थोड़ा हिस्सा भी उनके साथ आ जाए तो फिर पिछले चुनाव की कमी की भरपाई हो जाएगी। राहुल के सामने पार्टी इकाई खड़ी करते हुए कांग्रेस को चुनावी सफलता दिलाना चुनौती है। इसके लिए हर वर्ग समूह से भारी संख्या में मतदाताओं को खींचने और ठोस समाजिक समीकरण विकसित करने की जरूरत है। लोकसभा चुनाव में हालांकि राहुल ने कांग्रेस के ग्राफ को काफी ऊंचा उछाल दिया, लेकिन वह एक अस्थाई प्रवृत्ति थी। वैसे उतने से भी राहुल गांधी का उत्तर प्रदेश मिशन पूरा नहीं होता। राहुल और अखिलेश में मूल अंतर यह भी है कि अखिलेश की सीमा उत्तर प्रदेश ही है, जबकि राहुल के लिए यह कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति में शीर्ष पर लाने और बनाए रखने के मिशन का प्रमुख अंग है। उनकी सोच यह है कि उत्तर प्रदेश में जब तक कांग्रेस शीर्ष पर थी, राष्ट्रीय राजनीति पर भी उसका वर्चस्व था। उत्तर प्रदेश में शिखर से शून्य तक जाने के साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस कमजोर हुई। राहुल को उस तरह का स्वाभाविक राजनीतिक प्रशिक्षण भी नहीं मिला, जैसा अखिलेश को मिला है। अखिलेश ने अपने पिता और उनके सहयोगियों की गतिविधियों को निकट से देखा-समझा है। उनके पिता उन्हें राजनीति में लाए और वह आज भी सक्रिय मार्गदर्शक के रूप में मौजूद हैं। उनके कारण अखिलेश का अपने-आप नेताओं और कार्यकर्ताओं से संपर्क बनता गया। दूसरी ओर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद नेहरू परिवार की सुरक्षा व्यवस्था इतनी सख्त हुई कि खुलकर मिलना तक संभव नहीं रहा। जब राहुल विदेश में पढ़ाई कर रहे थे, उनके पिता राजीव गांधी की दुखद हत्या हो गई। उसके बाद सोनिया गांधी ने पूरे साढ़े छह वर्ष तक स्वयं और परिवार को सक्रिय सीधी राजनीति से दूर रखा। फलत: राहुल का न राजनीतिक प्रशिक्षण हुआ और न कार्यकर्ताओं-नेताओं से सीधा संपर्क ही। सोनिया गांधी ने जब दिसंबर 1997 से राजनीति की पारी आरंभ की तो वह मंच पर भाषण देने या फिर कांग्रेस की शीर्ष बैठकों तक सीमित रही। कुल मिलाकर राहुल को सब कुछ खुद करना पड़ा है। उन्हें गरीबी को समझने के लिए गरीब के पास जाना पड़ता है, उसके साथ रात बितानी पड़ती है। कई बार उन्हें स्थानीय भाषा समझने में कठिनाइयां आती हैं, जबकि अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। वैसे विदेशी शिक्षा के बावजूद अखिलेश के भाषणों और बोलने के अंदाज में स्थानीय बोली का प्रभाव साफ नजर आता है। राहुल इससे वंचित हैं। इन अंतरों के बावजूद दोनों ने अपनी-अपनी पार्टी को नए तेवर, नई शैली और संस्कार देने की कोशिश की है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

चुनाव बाद आम आदमी की चुनौतियां


 देश में सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनावी मौहाल के बीच ज्यादातर आर्थिक या फिर आम लोगों की जेब से ताल्लुक रखने वाले मसलों पर खबरें चर्चा में हैं। यह समझने की बात है कि औद्योगिक रफ्तार से लेकर सेंसेक्स की चाल तक और महंगाई के बढ़ने की रफ्तार आदि संभल कैसे गई है? फरवरी के मध्य में बांबे स्टॉक एक्सचेंज का अहम सूचकांक सेंसेक्स छह महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर बंद हुआ और इसकी सबसे बड़ी वजह दिख रही है महंगाई दर का तेजी से घटना और ब्याज दरों में कमी होने के आसार। इस दिन आंकड़े बता रहे थे कि महंगाई के बढ़ने की रफ्तार सात प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। यह 26 महीने में महंगाई दर के बढ़ने की सबसे कम रफ्तार थी। तो क्या बजट के ठीक पहले और यूपी चुनावों के समय आ रही इन शानदार खबरों के बूते हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार फिर से दो अंकों की तरफ ले जाने वाला सपना देखना शुरू कर सकते हैं? चुनाव की मारामारी है तो जाहिर है कि मीडिया के पास चुनावी मुद्दों के अलावा किसी खबर में बाल की खाल निकालने की समय भी नहीं है, लेकिन शायद यह तस्वीर उतनी सुनहरी है नहीं, जितनी दिख रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले 16 नवंबर को तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम करीब 2 रुपये यह कहकर घटाया था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घटी हैं और इसलिए हम ये कीमतें घटा रहे हैं। हालांकि इससे पहले 26 जून, 2010 से पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बाद तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत करीब 48 रुपये से बढ़ाकर 70 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंचा दिया था। जून 2010 से जनवरी 2011 तक पेट्रोल का दाम इसी नीति के तहत 58 रुपये प्रति लीटर के ऊपर हो गया था, लेकिन इसके बाद जनवरी 2011 से लेकर 14 मई 2011 तक पेट्रोल की कीमतें बिल्कुल भी नहीं बढ़ीं। सवाल यह है कि क्या उस दौरान कच्चे तेल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में घट गई थीं या स्थिर थीं। स्वाभाविक है कि ऐसा बिल्कुल नहीं था। दरअसल, 18 अप्रैल से 10 मई तक पश्चिम बंगाल और दूसरे कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने थे और इस वजह से जनवरी से पेट्रोल की कीमतें तय करने का अधिकार मिलने के बावजूद मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल के दाम बढ़ाने के बजाय पेट्रोल पर घाटा सहती रहीं। जबकि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल जनवरी के ़93.87 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर मई में 110.65 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, लेकिन राजनीतिक मजबूरी में सरकार ने तेल कंपनियों को जनता के टैक्स के पैसे से अंडर रिकवरी देना ज्यादा मुनासिब समझा न कि तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल के भाव बढ़ाने की इजाजत देना। इन तीन चार महीनों में पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत न देने से तेल कंपनियों का घाटा पचास हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बढ़ गया। अप्रैल में तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 118.46 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, लेकिन फिर भी सरकार ने कीमतें नहीं बढ़ाया। कुछ हद तक पिछले साल जनवरी से अप्रैल-मई वाले हालात इस समय भी हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और सरकार इस समय पेट्रोल के दाम बढ़ाने की इजाजत तेल कंपनियों को देने का खतरा नहीं उठा सकती। केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस को लगता है कि उत्तराखंड, पंजाब में वह सत्ता छीन सकती है और यूपी में पहले से काफी अच्छा प्रदर्शन करेगी। ऐसे में मुस्लिम आरक्षण के लुभावने मीठे चुनावी वादे के साथ वह महंगे पेट्रोल की कड़वाहट जनता को देने से बचना चाह रही है। वह भी तब, जब जनवरी में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 110.47 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। दिसंबर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 107.20 डॉलर प्रति बैरल था। यानी दिसंबर से जनवरी में कच्चा तेल करीब तीन डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा महंगा हो गया है, लेकिन तेल कंपनियां पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ा रही हैं। 13 फरवरी को उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल के बीच में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के चेयरमैन आरएस बुटोला ने कंपनी के तिमाही नतीजों का ऐलान किया। उन्होंने बताया कि पेट्रोल पर तेल कंपनियों का घाटा तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन पत्रकारों के बार-बार पूछने पर भी वह ये नहीं बता सके कि हर 15 दिन में समीक्षा के बावजूद अभी तक पेट्रोल के दाम क्यों नहीं बढ़े? जनवरी से अब तक पेट्रोल पर सिर्फ इंडियन ऑयल को ही 362 करोड़ रुपये का घाटा हो चुका है। जाहिर है, दूसरी तेल कंपनियों का घाटा मिलाकर यह रकम और ज्यादा होगी। इसकी भरपाई जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टैक्स से ही की जानी है तो फिर यह रकम सीधे पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर ही सरकार क्यों नहीं वसूल लेती? जवाब साफ है, प्रधानमंत्री अर्थशास्त्री हैं तो क्या हुआ, अर्थनीति पर राजनीति भारी पड़ ही जाती है। अब कम से कम 6 मार्च यानी मतगणना के दिन तक तो पेट्रोल महंगा नहीं ही होगा, लेकिन इसके तुरंत बाद पेट्रोल के दाम कम से कम तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ना तय है। वह भी तब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल और महंगा न हो। उसकी उम्मीदें कम इसलिए हैं, क्योंकि भारत और जॉर्जिया में हमले में जिस तरह से ईरान के तार जुड़ रहे हैं और यूरोपीय और अमेरिकी देशों के साथ तनाव बढ़ रहा है। इससे कच्चे तेल के सस्ते होने की उम्मीदें कम ही हैं। देश पहले से ही वित्तीय घाटे से जूझ रहा है। खुद वित्त मंत्री कह चुके हैं कि वित्तीय घाटा संभालना उनके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसे में अर्थनीति पर भारी राजनीति की वजह से पेट्रोल की कीमतों का घाटा सरकारी खजाने को चोट पहुंचाएगा उससे मुश्किल और बढ़ेगी। फिर पेट्रोल के दाम बढ़े तो कुछ न कुछ महंगाई बढ़ेगी ही, जिसे समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं है। अगर महंगाई नहीं भी बढ़ी तो हर रोज चलने वाली स्कूटर से लेकर कार तक का पेट्रोल बिल तो बढ़ ही जाएगा। उस पर रिजर्व बैंक के ब्याज घटाने का असर तुरंत तो होने से रहा, क्योंकि एक साथ आधा प्रतिशत से ज्यादा तो ब्याज घटेगा नहीं और बैंक उसको ग्राहकों तक पहुंचाने में कम से कम महीने भर का समय तो लगा ही देंगे। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल और महंगा करना पड़ा तो सीधे महंगाई की मार और डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी की वजह से सरकारी खजाने पर पड़ना तय है। ऐसे में तब धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में रकम लगा रहे विदेशी निवेशक कितनी देर तक सेंसेक्स-निफ्टी थामेंगे यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि सेंसेक्स में दिसंबर से अब तक करीब बीस प्रतिशत का मुनाफा उन्हें साफ दिख रहा होगा। चुनावी राजनीति और लुभाने वाली खबरों का यह संयोग अर्थव्यवस्था को आगे मुश्किल राह पर ले जाता दिख रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

बढ़ेंगी कांग्रेस की मुश्किलें


उत्तर प्रदेश में प्रथम चरण के चुनाव प्रचार के अंतिम दिन नेहरू-गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने जिस तरह सक्रिय राजनीति में आने के संकेत दिए, उससे कांग्रेसी नीति-नियंताओं की पेशानी पर बल पड़ना स्वाभाविक ही था। कांग्रेस के गढ़ रायबरेली के अंतर्गत सुरक्षित सीट सलोन में कांग्रेस प्रत्याशी शिव बालक पासी के पक्ष में प्रचार करने उतरे रॉबर्ट वाड्रा ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाहिर कर यह संकेत तो दे ही दिए हैं कि आने वाले समय में वह गांधी-नेहरू परिवार की विरासत संभालने का माद्दा भी रखते हैं और ताकत भी। हालांकि प्रियंका ने अपने पति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को सिरे से नकारते हुए मीडिया पर ही इस मुद्दे के राजनीतिकरण का आरोप मढ़ दिया। अगर प्रियंका की बात का भरोसा भी किया जाए तो क्या रॉबर्ट सचमुच राजनीति में नहीं आएंगे? कम से कम रॉबर्ट वाड्रा के नजरिए से देखें तो प्रियंका गलत साबित होती नजर आती हैं। कोई हफ्ते भर पहले रॉबर्ट वाड्रा ने मीडिया के माध्यम से एक बार फिर बयान दिया कि यदि जनता उन्हें नेता के रूप में स्वीकार करना चाहे तो वह सक्रिय राजनीति में जरूर आएंगे। परिदृश्य साफ है, प्रियंका जहां अपने भाई राहुल के राजनीतिक सपनों की खातिर अपने राजनीतिक जीवन को तिलांजलि देने को आतुर हैं तो उन्हीं के पति रॉबर्ट की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जमकर हिलोरें मार रही हैं। यानी आने वाला समय कांग्रेस के शीर्ष परिवार के लिए सत्ता संघर्ष का सबब भी बन सकता है। दरअसल, यह पहला मौका नहीं है, जब रॉबर्ट वाड्रा ने राजनीति में आने की अपनी मंशा का सार्वजनिक इजहार किया हो। दो साल पहले उन्होंने यह कहकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी थीं कि वह भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव जीत सकते हैं। हालांकि तब उनकी बात को इतनी गंभीरता से नहीं लिया गया था, क्योंकि वह हमेशा अपनी पत्नी प्रियंका के साथ दिखते नजर आते थे, लेकिन इस बार चुनाव प्रचार से लेकर मोटरसाइकिल रैली तक में उन्होंने अपने स्वतंत्र वजूद को साबित कर राजनीतिज्ञ बनने की ओर अग्रसर होने पर सार्वजनिक रूप से मुहर लगा दी। रॉबर्ट ने मीडिया के सामने यह भी कहा कि अभी राहुल का वक्त है तो आने वाला वक्त प्रियंका का होगा। इससे तो यही साबित होता है कि वाड्रा अपनी पत्नी के नाम और गांधी-नेहरू परिवार की राजनीतिक विरासत की ऐतिहासिक महत्ता को भुनाना चाहते हैं। इतिहास के आईने से देखा जाए तो नेहरू परिवार से इतर राजनीति में आने की मंशा रखने वाले रॉबर्ट वाड्रा पहले व्यक्ति नहीं हैं। इंदिरा गांधी के पति स्व. फिरोज गांधी ने भी नेहरू परिवार की कर्मस्थली इलाहाबाद से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। मगर रॉबर्ट और फिरोज गांधी की राजनीतिक मंशा में जमीन-आसमान का अंतर है, था और हमेशा रहेगा। रॉबर्ट जहां राजनीति की चमकीली राहों पर चलने में स्वयं को मुफीद पाते हैं, वहीं फिरोज गांधी ने राजनीति में खुद को हमेशा नेहरू परिवार से इतर प्रासंगिक रखा। फिरोज पहले स्वतंत्रता सेनानी थे, बाद में कांग्रेस कार्यकर्ता बने और आखिर में नेहरू परिवार के दामाद। लेकिन रॉबर्ट ने का न तो देश के लिए कुछ योगदान है और न ही कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में उनकी मेहनत झलकती है। फिरोज गांधी ने 1930 में भारत की आजादी के लिए स्वतंत्रता की लड़ाई में कूदने का साहस दिखाया और कई बार जेल की यात्रा की। 1942 में वह प्रांतीय सदन से लोकसभा सदस्यता हासिल कर आगे बढ़ते गए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में फिरोज ने नेहरू सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था। क्या वर्तमान में रॉबर्ट वाड्रा के पास ऐसी इच्छाशक्ति है कि वह अपनी ही पार्टी की सरकार में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मुखर होकर अपना विरोध जता सकें? बिलकुल नहीं। रॉबर्ट को राजनीति में आम से कोई लगाव नहीं है। वह हमेशा खास बनकर उन पर राज करना चाहते हैं। रॉबर्ट की दिनोदिन बढ़ती राजनीतिक हसरतों के बीच अब गेंद सोनिया के पाले में है कि उनके और राजीव गांधी के राजनीतिक वारिस अकेले उनके पुत्र राहुल होंगे या पुत्री और दामाद की भी उसमें हिस्सेदारी होगी। खैर, यह तो वक्त ही बताएगा कि रॉबर्ट राजनीति की उड़ान कितनी दूर तक भर पाते हैं, लेकिन यदि उनका राजनीति में पदार्पण गांधी-नेहरू परिवार के दामाद के रूप में हुआ तो यह परिवारवाद की ओर बढ़ाया गया एक और आत्मघाती कदम होगा। इसकी आंच राहुल सहित प्रियंका को भी झुलसा सकती है। रॉबर्ट की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने गांधी-नेहरू परिवार के वारिसों के माथे पर शिकन तो ला ही दी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

परिवारवाद की राजनीति का नया पहलू


अमेठी में प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने जिस तरह जनता के बहाने अपनी महत्वाकांक्षाओं को जाहिर किया है, उससे साफ है कि देश के पहले राजनीतिक परिवार का रिश्तेदार होने के चलते उनके मन के किसी कोने में राजनीति में उतरने को लेकर दबी-ढकी आकांक्षा जरूर है। रॉबर्ट वाड्रा का यह कहना कि अगर जनता ने चाहा तो वह राजनीति में आ सकते हैं, कांग्रेसी राजनीति के गलियारों में इसे पत्रकारों के सवालों के फौरी जवाब के तौर पर बताकर टालने की कोशिशें तेज हो गई हैं। यह भी बताने की कोशिश हो रही है कि रॉबर्ट वाड्रा की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन इसे उनके सामान्य बयान की तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि सबसे पहले उनके बयान को उनकी पत्नी प्रियंका गांधी ने ही खारिज किया। जैसा कि हर बार ऐसे बयानों में होता है कि पूरा दोष मीडिया पर थोप दिया जाता है। प्रियंका ने भी कुछ ऐसा ही कहा। उन्होंने मीडिया को जिम्मेदार ठहराते हुए कह दिया कि मीडिया ने उनसे सवाल पूछा और इसका उन्होंने जवाब दे दिया। प्रियंका ने कहा, लोग मुझे राजनेता के तौर पर देखना चाहते हैं, लेकिन मेरा और मेरे पति का फिलहाल सक्रिय राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। हम राहुल गांधी के मिशन उत्तर प्रदेश को सफल बनाने के लिए काम कर रहे हैं। रॉबर्ट वाड्रा की राजनीति में आने की सचमुच कोई इच्छा है या नहीं, इसकी पड़ताल से पहले यह देखना जरूरी है कि प्रियंका को लेकर आम कांग्रेसी क्या सोचते हैं। कांग्रेस शायद ही इसे स्वीकार करे कि मौजूदा विधानसभा चुनावों में हाथ के पंजे के सहारे चुनाव मैदान में उतरे लोगों की एक ही चाहत रही है कि प्रियंका उनके यहां आएं, प्रचार करें। हर बार जब भी चुनाव आते हैं, कांग्रेसी हलकों में यह हसरत नए सिरे से परवान चढ़ने लगती है। अगर आम चुनाव हो रहे हों तो प्रियंका को लेकर लोगों में उत्सुकता बढ़ जाती है। कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता तो चाहते ही हैं कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में आएं और उनकी नैया को चुनावी राजनीति से पार ले जाकर राजनीति की उस ऊंचाई पर पहुंचा दें, जो कम से कम अस्सी के दशक तक विकल्पहीन रही है। जिस विकल्पहीनता के चलते कांग्रेस इस देश की स्वाभाविक पार्टी रही है, कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं और नेताओं का अब भी यही मानना है कि अतीत का उसका सियासी ऐश्वर्य कोई वापस दिला सकता है तो वह प्रियंका गांधी ही हैं। आम चुनाव और उत्तर प्रदेश के चुनावों के ठीक पहले इस तरह की हसरतें सिर्फ कांग्रेस का कार्यकर्ता या नेता ही पालना शुरू नहीं करता, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इस हसरत को पूरा होते देखने के लिए मचल उठती है। यही वजह है कि कांग्रेस के चुनावी अभियान के तहत अमेठी और रायबरेली में उतरी प्रियंका गांधी की तरफ देश का प्रदर्शनकारी मीडिया दौड़ लगा पड़ता है। प्रदर्शनकारी मीडिया टीआरपी के दबावों का लाख हवाला दे, लेकिन हकीकत तो यही है कि उसके मन में भी कहीं न कहीं कांग्रेसी कार्यकर्ताओं जैसी हसरत रहती है। हो सकता है कि प्रदर्शनकारी मीडिया की दिलचस्पी कांग्रेस के गौरवमयी अतीत की वापसी में उतनी नहीं हो, लेकिन यह तय है कि प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने को लेकर हसरतमंद तो वह है ही। मीडिया का एक धड़ा अपनी इस प्रियंका प्रियता के तहत कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की चाहत को ही सार्वजनिक अभिव्यक्ति करार देता है। यही वजह है कि प्रियंका के रोड शो से लेकर रॉबर्ट वाड्रा तक के मोटरसाइकिल जुलूस को पूरा फोकस मिलता है। उत्तर प्रदेश के मौजूदा चुनाव में कई और लोग भी लगे हुए हैं। खुद समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव पूरा सूबा अपने क्रांति रथ के सहारे नाप चुके हैं, लेकिन मीडिया का उन्हें वह अटेंशन हासिल नहीं हो पाया है, जो प्रियंका या रॉबर्ट वाड्रा को मिल रहा है या मिला है। इसे लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहे हैं, होते रहेंगे। लेकिन एक तथ्य तो साफ है कि प्रियंका की तरफ देश में एक खास तरह की उत्सुकता जरूर है। ऐसे माहौल में अगर राबर्ट वाड्रा कहते हैं कि जनता अगर चाहेगी तो वह भी सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं तो दरअसल वह भी कांग्रेसी हसरतों को ही नई अभिव्यक्ति दे रहे होते हैं। इसमें उनकी राजनीति हसरतें भी ढूंढ़ी जा सकती हैं। उनकी हसरतों का चीरफाड़ होना जरूरी भी है, लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस का सर्वोच्च परिवार इस हसरत को कैसे लेता है। राजनीति में आने की रॉबर्ट वाड्रा की हसरतों को जिस तरह से तत्काल खारिज किया गया, उसके संकेत तो यही हैं कि फिलहाल कांग्रेस का सर्वोच्च परिवार अभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे राहुल की सर्वस्वीकार्यता पर सवाल उठे और कांग्रेसी नेताओं में कोई गलत संकेत जाए। राहुल गांधी लाख कहें कि वह प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहते। प्रियंका भी राजनीति में आने से लाख इनकार करें, लेकिन कांग्रेस का कार्यकर्ता तो यही मानता है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। उसे उम्मीद है कि प्रियंका राजनीति में जरूर आएंगी। विपक्ष के रस्मी विरोध को भी छोड़ दें तो वह भी राहुल को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहा है। उसे भी लगता है कि अगर 2014 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला या सरकार बनाने की हैसियत हासिल हुई तो निश्चित है कि राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री होंगे। ऐसे में अगर रॉबर्ट वाड्रा अपनी राजनीतिक आकांक्षा को जाहिर करते हैं तो निश्चित तौर पर इसे राहुल के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखे जाने की आशंका बढ़ सकती है और कांग्रेस आलाकमान इस तरह का खतरा क्यों उठाने लगा। वैसे भी राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिंदा करने के लिए जिस तरह से दिन-रात एक कर रखा है, उससे उनकी साख दांव पर लगी है। उत्तर प्रदेश में सुप्त पड़ी कांग्रेस में वे प्राण का संचार कर चुके हैं, लेकिन मौजूदा चुनावों में वह ताकतवर होकर उभरती है तो निश्चित तौर पर इसका पूरा श्रेय उन्हें ही जाएगा, जिसकी कांग्रेस आलाकमान को काफी दिनों से उम्मीद है। बिहार चुनावों में राहुल गांधी की तमाम मेहनत के बावजूद कांग्रेस कोई कमाल नहीं दिखा सकी, उलटे उसका प्रदर्शन शर्मनाक ही रहा। ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस उभर कर सामने आती है तो राहुल के खाते में चमत्कारिक नेतृत्व की एक उपलब्धि जुड़ सकती है, जो उनके प्रधानमंत्री बनने के लिए एक और मजबूत आधार मुहैया करा सकती है। लेकिन ठीक चुनावों के बीच रॉबर्ट द्वारा राजनीति में आने की इच्छा जाहिर करना राहुल की भावी कामयाबी को भी कमजोर कर सकता है। अगर कांग्रेस आलाकमान ने रॉबर्ट की आकांक्षाओं से सहमति जता दी तो इससे राहुल और प्रियंका के बीच सियासी तुलनाओं का दौर शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। निश्चित तौर पर यह कांग्रेस और उसके पहले परिवार के लिए मुफीद नहीं होगा, लेकिन राबर्ट ने एक तथ्य की ओर इशारा कर दिया है कि मौका मिले तो वे भी हाथ आजमाने को तैयार हैं। इन अर्थो में चुनावी राजनीति में उतरने को लेकर अपनी दावेदारी उन्होंने जता ही दी है, लेकिन कांग्रेस के मौजूदा क्रम में उन्हें राहुल को सर्वस्वीकार्य बनने तक इंतजार करना ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, February 14, 2012

सिर्फ वोट भुनाने का हथियार


पिछले दिनों सरकार ने पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समुदाय के पिछड़े वर्ग को आरक्षित करने की बात कही। हालांकि विधानसभा चुनावों के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने चुनाव संपन्न होने तक सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया है। मगर सवाल यह है कि इस तरह का जाल फेंकना क्या रेखांकित क्या करता है? तमाम विपक्षी पार्टियों की नजर में सरकार का यह पैंतरा सीधे-सीधे कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचाता नजर आ रहा है, लेकिन इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे मुस्लिम समाज को फायदा होगा? अगर मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सभी वर्गो की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। इन सभी वर्गो के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के लोग कैसे उठा पाएंगे? इसका अधिकांश लाभ तो ईसाइयों और बौद्ध समुदाय को मिलता नजर आ रहा है। दरअसल, सरकार ने बड़ी ही चालाकी से विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम समाज को ठगने का काम किया है ताकि मुस्लिम समाज का एकमुश्त वोट-बैंक कांग्रेस की झोली में आ गिरे, जबकि हकीकत यह है कि पंजाब में सिख समुदाय पर आरक्षण का लाभ मिलने का वादा किया गया तो गोवा में ईसाइयों पर दांव लगाया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश में इसका केंद्र मुस्लिम बन गए हैं। हमेशा की ही तरह इस बार भी कांग्रेस की बाजीगरी मुस्लिमों को ठगने का काम कर रही है। ऐसे में मुस्लिमों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या उन्हें मात्र आरक्षण का झुनझुना चाहिए या वास्तव में उनके हितों तथा उनके सर्वागीण विकास के लिए ठोस और कारगर कदम उठाने होंगे? फिर देश में यह बहस भी शुरू हो गई है कि आरक्षण जब आजादी के 65 वर्षो बाद भी मुस्लिमों का भला नहीं कर पाया तो राजनीतिक शून्यता के इस दौर में आरक्षण से किसे और क्या फायदा होगा? एक और बड़ा मुद्दा यह कि क्या मजहब के आधार पर आरक्षण देना सही है? आजाद भारत में संविधान निर्माताओं ने हाशिए पर खड़े समाज के संरक्षण और उत्थान के लिए प्रावधान बनाए, मगर संविधान सभा में जब मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग उठी तो सात में से पांच मुस्लिम सदस्यों मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफजुर रहमान, बेगम एजाज रसूल, हुसैन भाई लालजी तथा तजामुल हुसैन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया था। वहीं 26 मई 1949 को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, अगर आप अल्पसंख्यकों को ढाल देना चाहते हैं तो वास्तव में आप उन्हें अलग-थलग करते हैं..। हो सकता है कि आप उनकी रक्षा कर रहे हों, पर किस कीमत पर? ऐसा आप उन्हें मुख्यधारा से काटने की कीमत पर करेंगे। आज जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण की मांग उठाते हैं या सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने की बात करते हैं तो दुख होता है कि एक ऐसे नेता का प्रपौत्र मजहबी आरक्षण का हिमायती है, जो उसका हर स्थिति में विरोध करते थे। नेहरू ही क्यों, 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तब राजीव गांधी ने इसका जोरदार विरोध किया था। विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर 1990 को राजीव गांधी ने संसद में अपने भाषण में मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की मांग की थी। आज जब कांग्रेस सत्ता में है तो उसे अपनी ही पार्टी के नेता का आरक्षण विरोधी रवैया याद नहीं रहा। जिस मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की वकालत राजीव गांधी ने की थी, कांग्रेसी नेता आज उसी मंडल आयोग की संस्तुतियों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समाज खासकर मुस्लिम समाज को ठगने के लिए कर रहे हैं। वैसे भी मजहब के नाम पर आरक्षण का दुष्परिणाम यह रहा है कि आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदाय के क्रीमीलेयर ही उठा ले गए। अगर कांग्रेस वास्तव में मुस्लिम समाज की बेहतरी चाहती है तो सच्चर कमेटी तथा मिश्र आयोग की संस्तुतियों को पूर्णत: लागू करे तथा उनके प्रावधानों के अनुकूल मुस्लिमों को उचित लाभ दिलवाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Saturday, December 10, 2011

इंसाफ की मांग है मुस्लिम आरक्षण


मुस्लिम आरक्षण को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमाई हुई है। सपा, बसपा के बाद कांग्रेस भी चाहती है कि पिछड़े मुसलमानों को आरक्षण मिले। हाल ही में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने मुसलमानों को ओबीसी कोटे में आरक्षण की वकालत कर इस बहस को एक बार फिर जिंदा कर दिया है। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की हालत कोई ज्यादा अच्छी नहीं है। सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं दोनों ही क्षेत्रों में मुसलमानों की नुमाइंदगी कम है। सूबे में 18.5 फीसदी आबादी के बरक्स 7.5 मुसलमान ही फिलवक्त नौकरियों में हैं। मुसलमानों के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक हालातों का जायजा लेने वाली सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग ने केंद्र की संप्रग सरकार से सिफारिश की थी कि अल्पसंख्यकों को पिछड़ा समझा जाए और केंद्र तथा सूबाई सरकारों की नौकरियों में उनके लिए 15 फीसदी स्थान चिह्नित किए जाएं। सच्चर आयोग पांच साल पहले और मिश्र आयोग करीब साढ़े तीन साल पहले अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुका है, लेकिन बावजूद इसके संप्रग सरकार ने आयोग की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं की हैं। मुल्क में मुसलमानों का पिछड़ापन इतना है कि शहरी इलाकों में तकरीबन 38 फीसदी और ग्रामीण इलाकों में 27 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा के नीचे बदतरीन हालत में गुजर-बसर कर रहे हैं। उनके पिछड़ेपन की हालत देखते हुए मिश्र आयोग ने तो पिछड़े वर्ग के 27 फीसदी कोटे में भी अल्पसंख्यकों का कोटा निर्धारित करने की वकालत की है, लेकिन केंद्र सरकार ने इस राह में अभी तलक कोई पहल नहीं की है। आयोग ने अल्पसंख्यकों के आरक्षण से जुड़ी पेचीदगियों से बचने के लिए अपनी रिपोर्ट में आरक्षण की बजाय चिह्नित शब्द का इस्तेमाल किया है और आयोग की यह सिफारिश संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के तहत पूरी तरह से वाजिब है। क्योंकि अनुच्छेद-16 हर हिंदुस्तानी को लोक नियोजन में अवसर की समानता की जमानत देता है। फिर समानता का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों में भी शामिल है, लेकिन बावजूद इसके सिफारिश को लागू करने में होने वाली व्यावहारिक कठिनाई को देखते हुए आयोग ने विकल्प के तौर पर दीगर पिछड़े वर्गो के 27 फीसदी कोटे में 8.4 फीसदी सब कोटा अल्पसंख्यकों के लिए चिह्नित करने की सिफारिश की है। हमारा मुल्क जब आजाद हुआ और संविधान निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, उस वक्त हमारे रहनुमाओं ने एक ऐसे समाज का ख्वाब देखा, जो सामाजिक भेदभाव और गैर-बराबरी से आजाद हो। जहां ऊंच-नीच का फर्क न हो। किसी के साथ नाइंसाफी न हो। इनसे निपटने के लिए संविधान में बाकायदा उपबंध किए गए। जाहिर है, हमारे संविधान में मौजूद मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व इन्हीं विचारों से अनुप्राणित हैं, लेकिन अफसोसनाक है कि आजादी के 64 साल गुजर जाने के बावजूद हम सामाजिक अन्याय, भेदभाव और असमानता जैसी बुराइयां खत्म नहीं कर पाए। इसके पीछे कोई एक वजह ढूढ़ें तो वह बुनियादी वजह है कि हमारी जेहनियत नहीं बदली। जब तक हमारी जेहनियत में तब्दीली नहीं आएगी, तब तक हम न तो संवैधानिक उपचारों को सही ढंग से अमल में ला पाएंगे और न ही सामाजिक रूप से वंचित समूहों को वाजिब इंसाफ मिल सकेगा। यही प्रमुख वजह है कि वंचित और शोषित जातियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था महसूस की गई। जाहिर है, आरक्षण की व्यवस्था हिंदुस्तानी समाज में व्याप्त असमानता, अस्पृश्यता और भेदभाव को दूर करने और मुख्तलिफ हल्कों में दलित व पिछड़े वर्ग के लोगों की नुमाइंदगी को सुनिश्चित करने के मकसद से की गई ताकि सामाजिक अन्याय को जड़ से खत्म कर भेदभाव रहित और बराबरी के जज्बे पर आधारित एक आदर्श समाज का निर्माण और विकास हो सके। कुल मिलाकर जो मुसलमान बरसों से सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के शिकार रहे हैं, उन्हें आरक्षण की छतरी के तले लाना मौजूदा दौर में इंसाफ की मांग है। अवसरों से वंचित अधिकारविहीन लोगों को सामाजिक विभाजन का डर दिखाकर कब तलक तरक्की के मौकों से रोका जाता रहेगा। वास्तव में यह इंसाफ की लड़ाई है, इसे केवल आरक्षण के लिए संघर्ष के रूप में नहीं देख सकते। दरअसल, आरक्षण लोकतांत्रिक संघर्ष का छोटा-सा हिस्सा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

आरक्षण या सिर्फ सियासी दांव


आरक्षण राजनीतिक दलों के सियासी खेल का दांव बनकर उभर रहा है। खाली थाली को दल भूख मिटाने का पर्याय मानकर चल रहे हैं। ये हालात इसलिए निर्मित हुए हैं, क्योंकि राजनीतिक दलों ने जनता के बीच ठोस कामकाज के जरिये कारगर परिणाम देने का भरोसा खो दिया है। इसीलिए मायावती मुस्लिमों को आरक्षण देने का शिगूफा तो छोड़ती ही हैं, आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मणों को भी आरक्षण देने का दांव चलती हैं। मायावती के इस दांव की काट के लिए कांग्रेस भी मुस्लिमों का कोटे में कोटा सुरक्षित करने के आधार पर जल्द आरक्षण देने जा रही है। उसके इस दांव का प्रमुख लक्ष्य उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में विजयश्री हासिल करना है। हालांकि कांग्रेस ने 2009 के आम चुनाव में जारी किए अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि वह फिर से सत्ता में आई तो सरकारी नौकरियों और शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को आर्थिक एवं शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देगी। कांग्रेस के समक्ष आरक्षण का मसला फिलहाल की स्थिति में गले में फंसी हड्डी की तरह है, क्योंकि यदि वह खासतौर से मुस्लिमों को केंद्र की नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान नहीं लाती तो वह इस समुदाय से कौन-सा मुंह लेकर वोट मांगेगी। दूसरी तरफ उसे आरक्षण की यह सुविधा केवल पिछड़ी जातियों के कोटे में देना संभव है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा के मुताबिक आरक्षण की 50 प्रतिशत से ज्यादा सीमा नहीं लांघी जा सकती। लिहाजा, ओबीसी के कोटे में सेंध लगाना भी कांग्रेस को महंगा पड़ेगा? पर मरता क्या न करता की तर्ज पर कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एकमुश्त 18 फीसदी मुस्लिम वोट ललचा रहे हैं। उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के साथ कांग्रेस भी अब आरक्षण की नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है, क्योंकि विधानसभा नजदीक आते देख पहले उन्होंने सरकारी नौकरियों में मुस्लिम आरक्षण की मांग उठाई और फिर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख सवर्ण जातियों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण की मांग उठाकर आरक्षण के मुद्दे को चिंगारी दिखा दी। हालांकि यह चिंगारी सुलगकर ज्वाला बनने वाली नहीं है, क्योंकि सभी जानते हैं कि चुनाव के ठीक पहले उठाई गई ये मांगें एक शिगूफा भर हंै। इससे न तो मुस्लिमों के हित सधने जा रहे और न गरीब सवर्णो के? वैसे भी इस मुद्दे की हवा केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह भरोसा देकर निकाल दी कि संप्रग सरकार सरकारी नौकरियों एवं शिक्षा में मुस्लिमों को आरक्षण देने का कानून इसी शीत कालीन सत्र में पेश कर रही है। इस दिशा में सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट के आधार पर वह पहले ही ठोस कदम उठा चुकी है। आरक्षण के ये टोटके छोड़ने की बजाय किसी भी राजनीतिक दल को यह गौर करने की जरूरत है कि आरक्षण का एक समय सामाजिक न्याय से वास्ता जरूर था, लेकिन सभी वर्गो में शिक्षा हासिल करने के बाद जिस तरह से देश में शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई है, उसका कारगर उपाय आरक्षण जैसे चुक चुके औजार से मौजूदा हालात में संभव नहीं है। इस सिलसिले में हम गुर्जर और जाट आंदोलनों का भी हश्र देख चुके हैं। लिहाजा, राजनीतिक दल अब सामाजिक न्याय के सवालों के हल आरक्षण के हथियार से खोजने की बजाए रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर निकालें तो बेहतर होगा। अगर वोट की राजनीति से परे अब तक दिए गए आरक्षण लाभ का ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो साबित हो जाएगा कि यह लाभ जिन जातियों को मिला है, उन जातियों का समग्र तो क्या आंशिक कायाकल्प भी नहीं हो पाया है। केंद्र सरकार हल्ला न हो, इसलिए जिस कछुआ चाल से मुसलमानों को आरक्षण देने की तैयारी में जुटी है, अगर उस पर अमल होता है तो यह झुनझुना गरीब अल्पसंख्यकों के लिए छलावा ही साबित होगा। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के प्रगतिशील मंत्री सलमान खुर्शीद को जरूरत है कि मुसलमानों को धार्मिक जड़ता और भाषाई शिक्षा से उबारने के लिए पहले एक राष्ट्रव्यापी मुहिम चलाएं, क्योंकि कुछ मुस्लिमों ने शिक्षा का अधिकार विधेयक से आशंकित होकर शंका जताई थी कि यह कानून मुसलमानों की भाषाई शिक्षा प्रणाली पर कुठाराघात है। हालांकि खुर्शीद ने ऐसी आशंकाओं को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ कर दिया था कि मदरसा शिक्षा या अनुच्छेद 29 और 30 की अनदेखी यह कानून नहीं करता। लिहाजा, मुसलमानों को सोचने की जरूरत है कि टेक्नोलॉजी के युग में मदरसा शिक्षा से बड़े हित हासिल होने वाले नहीं हैं। वंचित समुदाय वह चाहे अल्पसंख्यक हों या गरीब सवर्ण, उनकी बेहतरी के उचित अवसर देना लाजिमी है, क्योंकि किसी भी बदहाली की सूरत अब अल्पसंख्यक अथवा जातिवादी चश्मे से नहीं सुधारी जा सकती? खाद्य की उपलब्धता से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जितने भी ठोस मानवीय सरोकार हैं, उन्हें हासिल करना मौजूदा दौर में केवल पूंजी और शिक्षा से ही संभव है। ऐसे में आरक्षण के सरोकारों के जो वास्तविक हकदार हैं, वे अपरिहार्य योग्यता के दायरे में न आ पाने के कारण उपेक्षित ही रहेंगे। अलबत्ता, आरक्षण का सारा लाभ वे बटोर ले जाएंगे जो आर्थिक रूप से पहले से ही सक्षम हैं और जिनके बच्चे पब्लिक स्कूलों से पढ़े हैं। इसलिए इस संदर्भ में मुसलमानों और भाषायी अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की वकालत करने वाली रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट के भी बुनियादी मायने नहीं हैं। मौजूदा वक्त में मुसलमान, सिख, पारसी, ईसाई और बौद्ध ही अल्पसंख्यक के दायरे में आते हैं। जबकि जैन, बहाई और कुछ दूसरे धर्म-समुदाय भी अल्पसंख्यक दर्जा हासिल करना चाहते हैं। लेकिन जैन समुदाय केंद्र द्वारा अधिसूचित सूची में नहीं है। इसमें भाषाई अल्पसंख्यकों को अधिसूचित किया गया है, धार्मिक अल्पसंख्यकों को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक माना गया है, लेकिन इन्हें अधिसूचित करने का अधिकार राज्यों को है, केंद्र को नहीं। इन्हीं वजहों से आतंकवाद के चलते अपनी ही पुश्तैनी जमीन से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडित अल्पसंख्यक के दायरे में नहीं आ पा रहे हैं। वैसे भी रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन जांच आयोग के तहत नहीं हुआ है। दरअसल, इस रपट का मकसद केवल इतना था कि धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों के बीच आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर व पिछडे़ तबकों की पहचान कर अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण सहित अन्य जरूरी कल्याणकारी उपाय सुझाये जाएं, जिससे उनका सामाजिक स्तर सम्मानजनक स्थिति हासिल कर ले। इस नजरिये से सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों का औसत अनुपात बेहद कम है। गोया, संविधान में सामाजिक और शैक्षिक शब्दों के साथ पिछड़ा शब्द की शर्त का उल्लेख किए बिना इन्हें पिछड़ा मानकर अल्पसंख्यक समुदायों को 15 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसमें से 10 फीसदी केवल मुसलमानों को और पांच फीसदी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को दिए जाने का प्रावधान तय हो। शैक्षिक संस्थाओं के लिए भी आरक्षण की यही व्यवस्था प्रस्तावित है। यदि इन प्रावधानों के क्रियान्वयन में कोई परेशानी आती है तो पिछड़े वर्ग को आरक्षण की जो 27 प्रतिशत की सुविधा हासिल है, उसमें कटौती कर 8.4 प्रतिशत की दावेदारी अल्पसंख्यकों की तय हो। वैसे भी केरल में 12 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 10, तमिलनाडु 3.5, कर्नाटक 4, बिहार 3 और आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा 4 फीसदी मुस्लिमों को आरक्षण पिछड़ा वर्ग के कोटे के आधार पर ही दिया गया है। केरल में तो आजादी के पहले से यह व्यवस्था लागू है। लिहाजा, इस प्रावधान के तहत छह प्रतिशत मुसलमान और 2.4 प्रतिशत अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण की सुविधा दी जा सकती है। लेकिन यहां गौरतलब यह भी है कि इन प्रदेशों में ओबीसी के कोटे में अल्पसंख्यक कोटा निर्धारित करना इसलिए आसान हुआ, क्योंकि यहां पिछड़ी जातियों की आबादी कम होने के कारण आरक्षित कोटा पूरा नहीं होता। यहां संकट यह है कि पिछड़ों के आरक्षित हितों में कटौती कर अल्पसंख्यकों के हित साधना आसान नहीं है। इस रिपोर्ट का क्रियान्वयन विस्फोटक भी हो सकता है, क्योंकि पिछड़ों के लिए जब मंडल आयोग की सिफारिशें मानते हुए 27 फीसदी आरक्षण को वैधानिक दर्जा दिया गया था, तब हालात अराजक और हिंसक हुए थे। इस लिहाज से आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में कोटे में कोटा की स्थिति उत्पन्न होती है तो सांप्रदायिक वैमनस्य बढ़ना तय है। इसलिए धर्म-समुदायों से जुड़ी गरीबी को अल्पसंख्यक और जातीय आईने से देखना बारूद को तीली दिखाना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)