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Monday, February 27, 2012

दलितों-पिछड़ों की बदहाली को कांग्रेस, सपा, भाजपा जिम्मेदार

मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने दलित पिछड़ी जाति एवं किसानों की बदहाली के लिए सपा, कांग्रेस भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने रालोद के गढ़ में चौधरी अजितंिसंह पर कटाक्ष करते हुए कहा कि लम्बे समय से अपने पूर्वजों के नाम पर श्री सिंह राजनीति करते आये हैं उन्हें विकास से कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि बसपा ने सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की नीति के तहत प्रदेश का विकास किया है। बागपत के दिल्ली- सहारनपुर हाईवे पर एक मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बसपा प्रदेश की अकेली एक ऐसी पार्टी है जो 403 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। उन्होंने कहा कि चौधरी अजितंिसंह ने कुर्सी के लालच में क्षेत्र के विकास की अनदेखी की है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि बसपा दलित पिछड़ों तथा किसानों की हिमायती रही है। सपा कार्यकाल का बकाया गन्ना भुगतान 2 हजार 600 करोड़ रुपए किसानों को दिलाया तथा किसानों को 125 रुपए की जगह 250 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने का दाम दिलवाया। एक हजार पांच सौ करोड़ रुपए बिजली बिल माफ कराये तथा भूमि अधिग्रहण मामले में नई नीति बनाकर किसानों को लाभ दिलाया। एक करोड़ बेरोजगार लोगों को रोजगार दिलाया, 25 लाख तक ठेकों में आरक्षण दिलाया गया। बिजली क्षेत्र में ऐतिहासिक फैसला लेने का बसपा ने निर्णय लिया है जिसके तहत 24 घंटे प्रदेश की जनता को बिजली देने का वादा किया है। उन्होंने कहा कि डॉ. अम्बेडकर योजना के तहत अभूतपूर्व विकास किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश का चार भागों में विभाजन कर विकास के लिए केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा, लेकिन यूपीए की सरकार पूर्वांचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेष तथा अवध प्रदेश बनाना नहीं चाहती है। उन्होंने यूपीए सरकार की गलत आर्थिक नीतियों के कारण महंगाई बढ़ना तथा दलित पिछड़ों, गरीब बेरोजगारों की बदहाली के लिए जिम्मेदार सपा, भाजपा, कांग्रेस को बताया। उन्होंने कहा कि हम कानून द्वारा कानून का राज स्थापित कर सपा, भाजपा आदि राजनीतिक दलों की गुंडई को समाप्त करना चाहते हैं। उन्होंने भ्रष्टाचार पर कहा कि विरोधी पार्टियां भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी हुई हैं। एसएनबी चौधरी अजित सिंह ने पूर्वजों के नाम पर की राजनीति, कांग्रेस, सपा व भाजपा ने काला धन जमा किया विदेश में

राकांपा का चुनावी घोषणा पत्र जारी

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) ने तीन मार्च को गोवा में होने वाले विधानसभा के चुनाव के लिए आज अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया। राकांपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया है कि यदि उनकी सरकार आयी तो पार्टी एक अच्छा प्रशासन, स्थिर सरकार, राज्य का विकास, पारदर्शी और भ्रष्टमुक्त सरकार देगी। राकांपा के गोवा प्रदेश इकाई के अध्यक्ष सुरेंद्र सिरसाट, पर्यटन मंत्री नीलकंट हडंकर और पार्टी के अन्य नेताओं के समक्ष पार्टी के महाराष्ट्र के पूर्व विधायक और चमड़ा बोर्ड के अध्यक्ष संदेश कुनवेल्कर ने बृहस्पतिवार को यहां पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी किया। चुनावी घोषणा पत्र जारी करने के बाद श्री सिरसाट ने संवाददाताओं को बताया कि राकांपा पूरे देश में मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है और तीन राज्यों गोवा, नगालैंड और महाराष्ट्र में अन्य पार्टियों के साथ सरकार में शामिलहै। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने घोषणा पत्र में यह भी कहा है कि गोवा के पर्यावरण पर भी ध्यान दिया जाएगा तथा पार्टी गैर कानूनी खान की खुदाई और कच्चे लोहे को पड़ोसी राज्यों में चोरी छुपे भेजने पर भी प्रतिबंध लगाएगी। पार्टी राज्य में लोकायुक्त लाएगी। स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा या स्थानीय भाषा दिलाने का वादा किया। गोवा के लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली कृषि क्षेत्र के विकास की योजनाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। गोवा में पर्यटन को बढ़ावा और उसके विकास के लिए निजी क्षेत्र की सहभागिता और ढांचागत निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। राज्य को वैिक श्रेणी का पर्यटन केंद्र बनाने का भी वादा किया है।

आसान नहीं जीत की राह

आगरा दक्षिण विधानसभा क्षेत्र पुराना आगरा के नाम से जाना जाता है। यमुना नदी के किनारे का ऐतिहासिक महत्व का यह इलाका बाबर के आने के पूर्व (1525 से पहले) इब्राहीम लोदी के समय में आगरा कहलाता था। आज इस इलाके की तस्वीर बिगड़ी हुई है। सीधे कहें तो यह इलाका अब महज तंग गलियों का होकर रह गया है। इलाके की अनगिनत समस्याएं यह साफ बयां करती हैं कि आजादी के बाद से यहां चुने गए प्रतिनिधि विकास के नाम पर ईमानदार नहीं रहे। इस बार भी विकास के नाम पर वोट बटोरने की फिराक में प्रत्याशी हैं, लेकिन मतदाताओं को इनके वादे पर भरोसा नहीं है। मतदाताओं का कहना है कि सभी पार्टियां प्राय: एक जैसी हैं इसलिए वह मत उनको देंगे जो उनके मन के लायक होंगे। दूसरे शब्दों में मतदाता उन्हें पसंद करेंगे, जिनमें उनको जनता के प्रति जवाबदेही दिखेगी। फिलहाल छह प्रत्याशियों के बीच यहां टक्कर है। इस इलाके के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यहां सिर्फ साइकिलें चलती थीं। इसको देखते हुए गलियों के लिए इतनी जगह छोड़ी गई, जिसमें साइकिलें आराम से आ जा सकें। अब इन्हीं गलियों में रिक्शा- बाइक भी चलती है। उस पर से आबादी तेजी से बढ़ी और उसके साथ अतिक्रमण भी। दर्जनों ऐसी गलियां हैं, जहां से पैदल निकलने को भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है। बात यह भी नहीं कि राहगीरों में सिर्फ मोहल्ले के लोग शामिल हैं। यहां वस्त्र, सोना-चांदी, जूता, गल्ला, पेठा, मसाले आदि का व्यवसाय फैला है। वहीं ऐतिहासिक जामा मस्जिद, आगरा किला, आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन भी है, सो इलाके में बाहर से आने-जाने वाले लोगों का रेला लगा रहता है। नूरा दरवाजा, फव्वारा, पाय चौकी, धूलिया गंज, माईथान, सेठ गली, चित्ती खाना आदि में कई गलियां महज तीन से पांच फीट चौड़ी हैं। जामा मस्जिद से सटे रावतपाड़ा, मानपाड़ा, रोशन मोहल्ला, नमक की मंडी आदि इलाके में गंदगी का आलम यह है कि मुंह पर रूमाल रखे बगैर निकलना मुश्किल होता है। कचहरी घाट, बेलनगंज, भैरव नाला, काला महल, पथवारी, लुहार गली समेत कई ऐसे इलाके हैं, जहां की संकीर्ण गलियों में हमेशा जलभराव रहता है। इन इलाकों में लगने वाले जाम की तो बस पूछिए ही मत। इस बार भी प्रत्याशी इन वादों के साथ मैदान में हैं कि वह चुने गए तो बिजली, पानी, सड़क, सीवर, जाम आदि समस्याओं से लोगों को निजात दिलाएंगे। खास बात तो यह है कि ये वादे ही झूठे प्रतीत होते हैं। तंग गलियों का निराकरण, जूता फैक्टरियों के कचरे का निस्तारण, बिजली के तारों का मकड़जाल, विकास कार्य के लिए खुदाई की जगह का न होना, सीवर लाइन बिछाने के लिए जगह का अभाव आदि ऐसी बातें हैं कि विकास का नया या आधुनिक मॉड्यूल ही कोई करिश्मा जीत की राह कर सकता है। इस बात को बखूबी वोटर्स भी जानते हैं, इसलिए इस बार ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं, जो चाहे किसी भी दल का हो, इससे कोई मतलब नहीं। मतलब इस बात से है कि विधायक बनने के बात उनकी आंखों में पानी इतना शेष रहे कि वह जनता के दुख दर्द को भुला न दे। पिछले तमाम प्रतिनिधि यह भुलाने में अव्वल रहे। बाकी बात रही जातीय समीकरण के आधार पर वोट के विभाजन की तो इस बार यह समीकरण प्रत्याशियों पर कहीं भारी पड़ रहा है। दरअसल नये परिसीमन ने पुराना समीकरण बिगाड़ दिया है। अब बड़ी संख्या में दलित व अल्पसंख्यक वोट कटकर छावनी विधानसभा क्षेत्र में चला गया है। उत्तरी विधानसभा क्षेत्र का सवर्ण वोट इस क्षेत्र से जुड़ा है। कई मोहल्ले में मुस्लिम मतदाताओं की अधिकता है। छावनी क्षेत्र के विधायक जुल्फिकार अहमद को दक्षिण क्षेत्र से खड़ा किया गया है, जबकि इस क्षेत्र के विधायक गुटियारी लाल दुबेश को छावनी क्षेत्र से चुनाव लड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कांग्रेस के प्रत्याशी नजीर अहमद, भाजपा के योगेंद्र उपाध्याय और सपा के सप्पो उस्मानी पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं समानता दल के बसीर अहमद और जेकेपी के केशो मेहरा भी चुनावी टक्कर में हैं। ये दोनों पूर्व विधायक रह चुके हैं। कुल मिलाकर पुराने पूर्वी और छावनी विधानसभा क्षेत्र के काफी बड़े हिस्से को काटकर तैयार किए गए दक्षिण विधानसभा क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति पुराने पश्चिम विधानसभा क्षेत्र की अपेक्षाकृत काफी बदल गई है। मुस्लिम बाहुल्य इस क्षेत्र में चार मुस्लिम प्रत्याशी हैं। माना जा रहा है कि यहां एक-एक वोट के लिए टक्कर होगी।

तीन दशक से सुलग रहा हाईकोर्ट बेंच का सवाल

सस्ता और सुलभ न्याय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए दूर की कौड़ी है। प्रदेश में इलाहाबाद में हाईकोर्ट और लखनऊ में हाईकोर्ट की बेंच है। इलाहाबाद से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोर सहारनपुर जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 750 किलोमीटर और दूसरे छोर मैनपुरी की लगभग 450 किलोमीटर है। गरीबों के लिए हाईकोर्ट से न्याय पाने की हरसत पूरी करना नामुमकिन नहीं तो दुारियां भरा जरूर है। इस क्षेत्र के लोगों को सस्ता और सुलभ न्याय मिले यह हक दिलाने के मकसद से अधिवक्ताओं ने तीन दशक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना किए जाने की हुंकार भरी और आंदोलन की राह पकड़ी। तीन दशक बाद भी इस आंदोलन की चिंगारी सुलग रही है। अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, केन्द्रीय विधि मंत्री के दरबार में दस्तक दी। संसद और विधानसभा में भी यह मुद्दा कई बार उठा मगर आंदोलनरत अधिवक्ताओं के हाथ कुछ नहीं आया। क्षेत्रीय नेताओं ने हाईकोर्ट बेंच की स्थापना को लेकर अधिवक्ताओं के सुर में सुर मिलाया मगर संसद में वह इस मुद्दे को धार देने से बचते रहे। यहां अधिवक्ता सड़क पर उतरे तभी पूर्वाचल में इस मांग का विरोध मुखर हो गया। प्रमुख राजनीतिक दलों खासकर भाजपा और कांग्रेस में इस मुद्दे को लेकर अभी तक पूर्वाचल के सियासतदां ही भारी पड़ते नजर आये। विधानसभा चुनाव में सभी दलों के प्रत्याशी अधिवक्ताओं के वोट पाने को ललायित हैं, मगर राजनीतिक दलों की चुनावी सभाओं में अधिवक्ताओं का दर्द सुनायी नहीं पड़ रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपराधिक वारदातों के आरोपितों की जमानत की सुनवाई जिला अदालत में होती है। जिला अदालत से जमानत अर्जी खारिज होने के बाद वादी और प्रतिवादी इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख करते हैं। पीड़ितों में ऐसे गरीब भी होते हैं, जिनके लिए इलाहाबाद जाकर अधिवक्ता करना और आने जाने का खर्च वहन करना बूते से बाहर ही होता है। गरीबों को भी सस्ता और सुलभ न्याय मिले, सभी राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के नंबरदार इसकी वकालत करते रहे हैं। मगर विडम्बना यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए यह हक दूर की कौड़ी ही साबित हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच स्थापित किए जाने की मांग अर्से से उठती रही है। आंदोलनरत अधिवक्ताओं का तर्क है कि मध्यप्रदेश की आबादी लगभग सात करोड़ है। इस राज्य में जबलपुर में हाईकोर्ट और इंदौर व ग्वालियर में खंडपीठ है। महाराष्ट्र की आबादी लगभग 8 करोड़ है। मुम्बई में हाईकोर्ट और नागपुर व औरंगाबाद में खंडपीठ है। उत्तर प्रदेश की आबादी 20 करोड़ से ज्यादा है, इसके बावजूद इलाहाबाद में हाईकोर्ट व लखनऊ में खंडपीठ ही है। मिले आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश का क्षेत्रफल 2,94,413 वर्ग किलोमीटर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने को संर्घषरत जनपदों का क्षेत्रफल 98,933 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के क्षेत्रफल का 33.61 फीसदी है। इलाहाबाद मेरठ से 637, मुजफ्फरनगर से 693, सहारनपुर से 752, बागपत से 700 और गाजियाबाद से 607 किलोमीटर की दूरी पर है। 1981 में यह मुद्दा तब गरमाया जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, बुलंदशहर समेत 18 जनपदों के अधिवक्ता लामबंद हो गये और उन्होंने केन्द्रीय संघर्ष समिति अस्तित्व में लाकर आंदोलन का बिगुल फूंका। तब इन जनपदों के अधिवक्ता लगभग साढ़े तीन माह तक न्यायिक कायरे से विरत रहे। इसके बाद हर शनिवार को न्यायिक कार्य से विरत रहने की राह पकड़ी, जो तीन दशक बाद भी जारी है। तीन दशक के सफर में अधिवक्ताओं ने सत्ताधीशों और नौकरशाहों को आइना दिखाने के लिए वह हर फार्मूला अपनाया, जो उनके बूते में रहा। लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव अधिवक्ताओं ने हर चुनाव में सियासी दलों पर इस मांग का समर्थन करने का दबाव बनाया। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि अधिवक्ताओं की वोट पाने की मंशा रही या फिर वादा कर भूलने की आदत। चुनावी अखाड़े में उतरे यहां के प्रत्याशियों ने हाईकोर्ट की खण्डपीठ की स्थापना के संघर्ष में सहभागिता करने का दम भरा और चुनाव बाद उनके एजेंडे से यह मुद्दा गौण ही नजर आया। केन्द्रीय संघर्ष समिति का चेयरमैन मेरठ बार एसोसिएशन का अध्यक्ष होता है। मेरठ बार एसोसिएशन के कई अध्यक्ष बदले मगर हर अध्यक्ष के कार्यकाल में यह मुद्दा एसोसिएशन के एजेंडे में जीवंत रहा। करीब दो दशक तक आंदोलन की गति धीमी रही, मगर वर्ष 2000 में अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को धार देने की राह पकड़ी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनेताओं ने भी अधिवक्ताओं की मांग को जनहितैषी करार दिया। मगर सच्चाई यह भी है कि इस आंदोलन को जनांदोलन बनाने की, उनमें इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट नजर आया। राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह भी कई बार अधिवक्ताओं के बीच आये और इस मांग का समर्थन किया। श्री सिंह ने अधिवक्ताओं को यह कहकर हरित प्रदेश निर्माण आंदोलन में सहभागिता के लिए आमंत्रित किया कि हरित प्रदेश का निर्माण होगा तो हाईकोर्ट बेंच नहीं बल्कि हाईकोर्ट ही मिल जाएगी। यह बात दीगर है कि हरित प्रदेश निर्माण भी सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में हाईकोर्ट बेंच का मुद्दा जोर-शोर से उठा। मेरठ-हापुड़ सीट से जीत दर्ज कर भाजपा के राजेन्द्र अग्रवाल संसद में पहुंचे। सांसद श्री अग्रवाल के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का प्रतिनिधिमंडल केन्द्रीय विधि मंत्री के अलावा अन्य कई केन्द्रीय मंत्रियों के दरबार में गया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने की मांग की। पिछले तीन वर्षो में आंदोलनरत अधिवक्ताओं ने इस मुद्दे को धार देने में कसर नहीं छोड़ी। मेरठ बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे गजेन्द्र धामा के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व महासचिव राहुल गांधी के अलावा कई केन्द्रीय मंत्रियों के पास पहुंचे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच के समर्थन में मांगपत्र सौंपे। हाईकोर्ट बेंच स्थापना संघर्ष समिति के चेयरमैन सतीश गुप्ता बताते हैं कि आजादी के बाद उत्तर प्रदेश पुनर्गठन की मांग उठी। तत्कालीन सत्ताधीशों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना कराने का भरोसा दिलाया। डा. संपूर्णानंद सरकार ने विधानसभा में इसी आशय का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजा। 1976 में तत्कालीन नारायण दत्त तिवारी सरकार ने भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया। बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में निश्चित प्रस्ताव पारित कर खंडपीठ स्थापना की संस्तुति प्रदान की और इस प्रस्ताव को केन्द्र को भेजा। 18वें विधि आयोग ने 5 अगस्त 2009 को केन्द्रीय विधि मंत्री के समक्ष खुद की 229वीं रिपोर्ट में उच्चतम न्यायालय की चार बेंच होने की सिफारिश की। 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विनाथ प्रताप सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित किये जाने की संस्तुति की, तब तत्कालीन केन्द्र सरकार ने जसवंत सिंह आयोग का गठन किया। इस आयोग की रिपोर्ट में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की खंडपीठ स्थापित किये जाने की संस्तुति की गयी। 21 जुलाई 1986 को संसद में तत्कालीन नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रश्न संख्या 45 में राज्यसभा में केन्द्र सरकार से पूछा,‘जसवंत सिंह आयोग की संस्तुति के अनुरूप पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट खंडपीठ के गठन में विलम्ब क्यों किया जा रहा है?’ इसके जवाब में तत्कालीन विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा था,‘सरकार इस बात पर सहमत है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खंडपीठ की स्थापना की जाए, स्थान का चयन बाकी है..।इस बार विधानसभा चुनाव की आहट पाकर यहां अधिवक्ताओं ने सियासी दलों को तेवर दिखाये। चुनावी बयार में यहां कमोबेश सभी प्रमुख सियासी दलों के प्रत्याशी कचहरी में अधिवक्ताओं से वोट मांगने पहुंचे। इस दौरान अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट बेंच की स्थापना का सवाल दागा, तब इन प्रत्याशियों ने इस मुद्दे को लेकर संघर्ष में सहभागिता करने का भरोसा दिलाया। अधिवक्ता विधानसभा चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे मगर तीन दशक बाद भी हाईकोर्ट बेंच स्थापना का संघर्ष अंतहीन होने का दर्द, उन्हें कचोटना स्वाभाविक है।

Saturday, February 18, 2012

यहां का मुद्दा आलू-पानी


एत्मादपुर विस क्षेत्र के मतदाता इस पसोपेश में हैं कि अपना प्रतिनिधि मुद्दों के आधार पर चुने या जाति का ख्याल रखें। बहरहाल यहां सबसे बड़ा मुद्दा आलू और पानी का है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू की पैदावार सबसे अधिक इसी इलाके में होती है, लेकिन समस्याओं की जमीन पर हो रही यह खेती खतरे में है। दूसरी तरफ नए परिसीमन ने इस क्षेत्र का गणित बदल दिया है। अब यह सीट सुरक्षित नहीं है। जातीय समीकरण बदल गए हैं और अधिकतर प्रत्याशी जातीय भावना को भुनाकर मतदाताओं का मत हड़पने की फिराक में हैं। फिलहाल मतदाताओं के के लिए आलू और पानी अहम है या जाति, यह जानना मुश्किल है। वैसे जाति पर आलू भारी दिख रहा है। इन दिनों एत्मादपुर क्षेत्र में जो चुनावी माहौल है, उसमें आलू और पानी गूंज रहा है। तमाम प्रत्याशी चुनावी सभाओं में आलू और पानी का मुद्दा उठाते हैं और इसी आधार पर वोट मांगते हैं। इलाके में आलू का पानी से गहरा संबंध है। यहां की छोटी नहरों की सफाई व मरमम्त 10-12 सालों से नहीं हुई है। सिंचाई विभाग गर्मी में जब पानी की ज्यादा जरूरत होती है तब नहरों में पानी नहीं छोड़ता लेकिन बीते दिसम्बर में तो विभाग ने हद कर दी और नहरों में पानी छोड़ दिया। जिससे करीब ढाई सौ बीघे में आलू की फसल डूब गई थी। ऐसे में क्षेत्र में सिंचाई के लिए बोरिंग एक मात्र विकल्प है और यहां करीब दो सौ फीट पर बोरिंग होती है। इससे भविष्य में भूजल स्रेत के भी प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है। जहां तक पेयजल की बात है तो अधिकतर इलाके में लोग पानी खरीद कर पीते हैं। पानी की सबसे अधिक किल्लत यमुनापार इलाके में है। मतदाताओं का कहना है कि आलू से जुड़ी समस्याओं के मामले में बीते कई चुनावों में सिर्फ आासनों की घुट्टी पिलाई गई। इस क्षेत्र में आलू मंडी और पोटैटो प्लांट लगाने का वादे चुनाव के दौरान किये जाते रहे हैं। इस बार भी ये वादे किए जा रहे हैं। मतदाताओं का कहना है कि आलू निर्यात न होने से भी बेहद नुकसान हो रहा है। इसलिए वे चाहते है कि इस आलू बेल्ट को कर्मठ प्रतिनिधि मिले। जहां तक प्रत्याशियों की बात हैं तो परिसीमन में सामान्य हुई इस सीट पर भाजपा के रामप्रताप सिंह चौहान, कांग्रेस-रालोद गठबंधन के बाबा हरदेव सिंह और सपा के प्रेम सिंह बघेल पहली बार चुनाव लड़ रहे है। बसपा से धर्मपाल सिंह मैदान में हैं। चुनावी चर्चाओं में जातीय हिसाब-किताब भी खूब लगाया जा रहा है। ठाकुर बाहुल्य इस क्षेत्र में तीन प्रमुख उम्मीदवार ठाकुर हैं। वैसे जब प्रमुख दलों के प्रत्याशियों से बात की गई तो उन्होंने जातीय समीकरण को खारिज करते हुए कहा कि वे सिर्फ विकास के आधार पर वोट मांग रहे हैं। गौरतलब है कि इस क्षेत्र का शहरी इलाका काफी बड़ा है। जो शहर की तीनों विधानसभा क्षेत्रों की हवा से प्रभावित हो सकता है। इस कारण सभी प्रत्याशियों की नजर यमुना पार के शहरी इलाकों पर भी है। क्षेत्र में किसी एक प्रत्याशी का बोलबाला नहीं रहा है और प्रमुख दलों में बराबर की टक्कर कही जा रही है। कु ल मतदाता ..................3,51,736 पुरुष मतदाता ..................1,98,854 महिला मदताता.................1,52,878 पुराने परिसीमन पर वर्ष 2007 तक हुए विधानसभा चुनाव में कभी किसी एक दल का आधिपत्य लंबे समय तक नहीं रहा है। 1989 से अब तक प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक इस प्रकार हैं : 1989 ......चंद्रभान मौर्य .........जनतादल 1991 ......चंद्रभान मौर्य ........जनता दल 1993 ......चंद्रभान मौर्य.............सपा 1996 ......गंगा प्रसाद पुष्कर ........बसपा 2002 ......गंगा प्रसाद पुष्कर ........रालोद 2007 ......नारायण सिंह सुमन.......बसपा 2009 लोकसभा चुनाव में स्थिति बसपा..........................49533 कांग्रेस .........................13288 सपा ...........................33210 भाजपा .........................47671 एत्मादपुर सीट