जहां एक और चुनावों में मतदाताओं की हिस्सेदारी बढ़ाने को लेकर चौतरफा मुहिम छिड़ी है वहीं उसमें महिला प्रत्याशियों की घटती हिस्सेदारी पर सब मौन हैं। अभी चल रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जिस तरह महिला उम्मीदवारों की कम संख्या दिखी वह उनकी मतदाता के रूप में बेहतरीन सहभागिता के बिल्कुल विपरीत है। इस बार के चुनावों में पंजाब (93/1078) में साढ़े आठ प्रतिशत, उत्तर प्रदेश (482/5877) और उत्तराखंड (63/ 788) में आठ प्रतिशत, मणिपुर (15/279) में पांच प्रतिशत और गोवा (09/215) में केवल चार प्रतिशत महिला उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। यह चिंता का विषय है। दो कारणों से यह चिंता और भी बढ़ जाती है। प्रथम, इतनी कम महिला प्रत्याशियों में मान्यता प्राप्त दलों के द्वारा उतारी गई महिला प्रत्याशियों की संख्या काफी कम है। ज्यादातर महिलाएं स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लड़ रही हैं, जिनके जीतने की संभावना नगण्य है। द्वितीय, बीस साल से पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद भी राजनीतिक दलों के पास महिला उम्मीदवारों का टोटा क्यों है? या तो बीस साल तक लाखों महिलाओं को राजनीतिक अनुभव देने के बावजूद हम स्वीकार करें कि महिलाओं को आरक्षण द्वारा आगे करने का हमारा प्रयोग सफल नहीं रहा या फिर हमें कहना होगा कि हम महिलाओं को राजनीति में आगे करना ही नहीं चाहते। यहां हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन सभी पांचों राच्यों में 2007 के विधानसभा चुनावों में मतदाता के रूप में महिलाओं की बड़ी जबरदस्त भागीदारी रही थी। 2012 के विधानसभा चुनावों में भी उनकी मतदाता के रूप में बहुत अच्छी साझेदारी रही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 महिलाओं को राच्य द्वारा लिंग भेद के विरुद्ध मौलिक अधिकार देता है और संविधान की उद्देशिका महिलाओं सहित सभी नागरिकों को अवसर की समानता का आश्वासन देती है, पर राजनीति में पुरुषों के बराबर महिलाओं की सहभागिता एक स्वप्न सा होकर रह गई है। यह ठीक है कि महिलाओं की आबादी के हिसाब से उनका आधा प्रतिनिधित्व हो, यह जरूरी नहीं, पर उतनी भी कम नहीं होनी चाहिए जितनी अभी है। राजनीतिक दल महिलाओं के लिए चाहे जितनी भी बड़ी बड़ी बातें करें, लेकिन टिकट देने के वक्त वे उन्हें भूल जाते हैं। क्यों? हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक दलों द्वारा सच्चे अर्थो में दलीय-लोकतंत्र नहीं लाया जा सका। गांवों, कस्बों, शहरों व नगरों में राजनीतिक दलों ने संगठन बनाने और कार्य करने की कोई लोकतांत्रिक शैली विकसित नहीं की। सभी दलों में सामंतवादी दलीय व्यवस्था पनपी है और उसी आधार पर ये राजनीतिक दल हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाना चाहते हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? यही मूल कारण है कि हमारे लोकतंत्र और राजनीति में अनेक विसंगतियां आ गई हैं। सबसे कठिन चुनौती राजनीतिक दलों के निष्ठावान कार्यकर्ताओं के समक्ष आ गई है. जो कार्यकर्ता दल के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं उनको अपने ही दल में उस समय पीछे कर दिया जाता है जब संगठन में उनकी पदोन्नति होनी चाहिए या टिकट वितरण में उनको महत्व दिया जाना चाहिए। उस समय अक्सर कोई बाहरी या विरोधी दल से निकाला हुआ राजनीतिज्ञ आकर बाजी मार ले जाता है। इससे न केवल निष्ठावान कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है, वरन वे आगे के लिए यह सीख भी ग्रहण करते हैं कि संगठन के लिए काम करने से कुछ नहीं होता, बल्कि ऊपर के प्रभावशाली नेताओं के संपर्क में रहना ज्यादा लाभकारी होता है। इसी कारण चुनावों के समय सभी राजनीतिक दलों को टिकट वितरण में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। उनको चुनावों में कोई ऐसा स्थानीय प्रत्याशी दिखाई नहीं देता जो प्रभावशाली हो और पार्टी को विजय दिलवा सके। अत: वे किसी जिताऊ उम्मीदवार की ओर टकटकी लगा कर देखते हैं जो पैसे और बाहुबल से संपन्न हो। जाहिर है कि महिलाएं इन कसौटियों पर खरी नहीं उतरतीं, इसलिए उनका प्रत्याशियों के रूप में चयन काफी कठिन हो जाता है। किसी भी सामाजिक वर्ग को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण को अपरिहार्य मान लिया गया है। महिलाओं को भी आरक्षण के जरिये राजनीति में आगे करने की बात की जाती है। यही बात इस चुनाव में मुसलमानों के लिए भी की जा रही है। क्या वास्तव में आरक्षण से कोई भी सामाजिक वर्ग पूरा का पूरा आगे बढ़ सकेगा? वास्तव में आरक्षण का सहारा लेकर हम बहुत दूर नहीं जा सकते। सरकारों को यह सोचना पड़ेगा कि आरक्षण को सुशासन और लोक-कल्याण का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण से समाज में जो खेमेबाजी हो रही है वह जातिवाद और अब सांप्रदायिकता को और गहरा ही कर रही है। महिलाओं को राजनीति में आगे करने से पहले हमें उनको समाज में आगे करना पड़ेगा। पिछले पचास-साठ सालों में महिलाओं को लेकर परिस्थितियां बहुत बदली हैं। हमें ग्रामीण महिलाओं और मुस्लिम महिलाओं के बारे में खास तौर से सोचना चाहिए। उनकी शिक्षा के बारे में बहुत गंभीर होने की जरूरत है। हम सामाजिक व्यवस्था से डरकर अपनी महिलाओं को जितना ही घर के अंदर कैद करेंगे, महिला सशक्तीकरण का सफ़र उतना ही लंबा हो जाएगा। हमें इतनी महिलाओं को समाज में उतार देना होगा कि उनकी सामजिक उपस्थिति स्वयं उनमें आत्मविश्वास पैदा कर दे। महिलाओं को राजनीति में लाने का मतलब है कि उन्हें पुरुषों की तरह खट्टे-मीठे अनुभवों से दो-चार होना ही पड़ेगा। वह दिन भारतीय लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण होगा जब बिना आरक्षण के महिलाओं सहित समाज के सभी वर्गो की राजनीति में समुचित हिस्सेदारी होगी। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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Monday, February 27, 2012
काम करने में विास रखती है बसपा : मायावती
Saturday, February 18, 2012
राजनीति का पूंजीवादी स्वरूप
लोकतांत्रिक राजनीति में कॉरपोरेट घरानों की घुसपैठ गंभीर चिंता का विषय है। सर्वविदित है कि राजनीति में धन की जरूरत पड़ती है। पहले यह धन जनता और पूंजीपतियों से चंदे के रूप में लिया जाता था। धीरे-धीरे चंदे की जगह वसूली शुरू हो गई। जिस तरह निजी कॉलेजों में डोनेशन देना मजबूरी है, उसी तरह औ द्योगिक घरानों की भी राजनेताओं व राजनीतिक दलों को जबरन चंदा देना मजबूरी हो गई। वसूली के इस कार्य में गुंडे-माफिया सहायक होते थे अत: राजनीति में उनकी एक भूमिका तय हो गई। धीरे-धीरे वे राजनीति में केंद्रीय भूमिका में आ गए। बहुमत जुटाने के वक्त उनका बाहुबल भी उपयोगी सिद्ध होने लगा। लेकिन पैसों की बढ़ती भूमिका से अब निजी कंपनियों ने राजनीति पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। वर्तमान में वे राजनीति पर पूरी तरह हावी हो चुकी हैं। अब तो निजी कंपनियां सरकारी नीतियां तक तय करने लगी हैं। इनके प्रतिनिधियों की सरकारों में घुसपैठ होती है, कहीं तो सीधे मंत्री के ही रूप में। हम जिन्हें जन प्रतिनिधि चुनते हैं, उनमें से बहुत से निजी कंपनियों के दलाल हो जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2जी स्पेक्ट्रम की आवंटन नीति को खारिज कर 122 लाइसेंस रद कर देने से यह साफ हो गया है कि केंद्र सरकार के मंत्रियों ने देश को बेशर्मी से लूटा है। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने ए. राजा को 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन न करने का सुझाव दिया था। किंतु प्रधानमंत्री का यह बयान तर्कसंगत नहीं लगता कि गठबंधन सरकार को बचाने की मजबूरी में वह राजा पर अंकुश नहीं लगा पाए थे। इस पूरे कांड के लिए प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं और उन्हें इस्तीफा देना ही चाहिए। इसी तरह उत्तर प्रदेश में किस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था इसका अंदाजा मायावती द्वारा अपने ही मंत्रियों को निकालने की संख्या से लगाया जा सकता है। यह बात गले नहीं उतरती कि प्रदेश में जो कुछ भी हो रहा था उसकी मुख्यमंत्री को कोई जानकारी नहीं थी। क्या पोंटी चड्ढा या बाबू सिंह कुशवाहा को बहनजी का संरक्षण प्राप्त नहीं था? जैसे केंद्र के भ्रष्टाचार के लिए प्रधानमंत्री दोषी हैं उसी तरह उत्तर प्रदेश के भ्रष्टाचार के लिए मायावती दोषी हैं। चूंकि मुख्यधारा के सभी दल पूंजीपति हितों के संरक्षक बने हुए हैं, तो जनपक्षीय नीतियां कैसे बनेंगी? महंगाई कैसे दूर होगी? गरीब-अमीर के बीच खाई कैसे पटेगी? कुपोषण कैसे दूर होगा? महिलाओं में खून की कमी, मातृत्व मुत्यु दर कैसे कम होगी? सभी बच्चे कब पढ़ पाएंगे? बेरोजगारी कैसे दूर होगी? क्या यह लैपटॉप और गाय बांटने से दूर होगी? उत्तर प्रदेश में सत्ता के दावेदार सभी बड़े दल भ्रष्ट हैं। कुछ सांप्रदायिक रंग में रंगे हैं। राजनीति से भ्रष्टाचार खत्म हो, इसमें अपराधियों की घुसपैठ खत्म हो और राजनीति को पेशा मानने के बजाए सेवा भावना से आए व्यक्ति ही जन प्रतिनिधि बनें, तब कहीं जाकर राजनीतिक तस्वीर बदलनी शुरू होगी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भ्रष्टाचार की मूल वजह हमारी राजनीतिक व्यवस्था का कॉरपोरेट वित्त पोषण है। जब तक राजनीतिक व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलता तब तक भ्रष्टाचार से पीछा छुड़ाना संभव नहीं है। चुनावी राजनीति की बड़ी पूंजी पर निर्भरता समाप्त करने का एक तरीका यह है कि राज्य चुनाव का खर्च उठाने की जिम्मेदारी लें। आजकल युवा नेताओं का बोलबाला है। किंतु क्या ये सामान्य युवा हैं? 30-40 वर्ष की आयु में कौन सा सामान्य युवा किसी राष्ट्रीय-प्रादेशिक दल का नेता बन सकता है, वह भी बिना किसी जमीनी आधार के। ये तथाकथित युवा नेता तो सामंती वंशवादी परंपरा की देन हैं जिन्हें पार्टी नेतृत्व विरासत में मिल गया है। लोकतंत्र में यह सवाल तो कोई पूछ ही नहीं रहा कि नेता का बेटा कैसे नेता बन गया? यह तो घोर अलोकतांत्रिक बात है। जिस दल के अंदर लोकतंत्र नहीं है वह लोकतंत्र को कैसे मजबूत करेगा? भ्रष्टाचार और अपराध की नींव पर टिकी सामंती सोच वाली राजनीति एक भ्रष्ट-आपराधिक-सामंती व्यवस्था का ही निर्माण कर सकती हैं। ऐसी राजनीति को जड़-मूल से खत्म किए बगैर हम सही लोकतंत्र का सपना साकार नहीं कर सकते। आज लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र विरोधी दल व्यवस्था पर हावी हैं। ये सत्ता को अपनी जागीर समझते हैं और मनमाने ढंग से काम करते हैं। यदि अन्ना हजारे जैसा कोई व्यक्ति इन्हें चुनौती देता है, तो ये लोकतंत्र की दुहाई देने लगते हैं। भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर, अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद व विधानसभाओं में पहुंचाकर, दलों को निजी कुनबे की तरह चलाते हुए राजनेता लोकतंत्र व संसद की गरिमा को बढ़ा रहे हैं या गिरा रहे हैं? राजनीति से मुद्दे गायब हो गए हैं इसलिए संसदीय बहस या कार्यवाही की गंभीरता भी खत्म हो गई। क्या हमारे संविधान निर्माताओं में से किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब विधायक सदन में बैठ कर अश्लील तस्वीरें देख रहे होंगे? क्या इस तरह की कार्यवाही से सदन की गरिमा नहीं गिरती? लेकिन फिर भी राजनीतिक दल अपने तौर-तरीके बदलने को तैयार नहीं। वे उन्हीं भ्रष्ट व आपराधिक पृष्ठभूमि वालों पर निर्भर हैं जो उनकी सरकारें बनवा सकते हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण इन दलों के लिए बड़ा मुश्किल हो गया है कि वे गलत तरीके और लोगों को छोड़ कर सही को अपना लें। अन्ना हजारे के आंदोलन की तरह अब जनता ही उन्हें बदलने को मजबूर करेगी। अगर वे फिर भी नहीं सुधरते, तो जनता उन्हें अपने मताधिकार से खारिज कर देगी। (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
यूपी में बढ़े मतदान का मतलब
पंजाब में 78 प्रतिशत, मणिपुर में 82 प्रतिशत और उत्तरांचल में 70 प्रतिशत मतदान के बाद अब उत्तर प्रदेश में प्रथम तीन चरणों में पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले 16-17 प्रतिशत अधिक मतदान होना भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है, लेकिन इससे राजनीतिक दलों के माथे पर शिकन और गहरा गई है। यह अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है कि इसका लाभ किसको मिलेगा। बढ़े मतदान प्रतिशत में सबसे ज्यादा योगदान उन नए युवा मतदाताओं का है जिन्होंने पहली बार उत्साहपूर्वक मतदान किया। नए युवा मतदाताओं के मतदान का क्या आधार हो सकता है? क्या वे एक युवा-वर्ग के रूप में मत देंगे या उनका मत बिखर जाएगा? क्या वे जाति और मजहब से ऊपर उठ पाएंगे? क्या उनकी प्राथमिकताएं विकास और सुशासन होंगीं? क्या उनका कोई रोल-मॉडल हो सकता है? इस दौर के चुनावों में हर राज्य में बढ़ा मतदान प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए तृतीय जन-उफान का संकेत जरूर है। यदि 1967 का प्रथम और 1989 का द्वितीय जन-उफान भारतीय लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर माना जाता है तो 2012 के विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के युवा मतदाता भी कुछ गुल खिला सकते है। दोनों जन-उफानों में बढ़ा मतदान प्रतिशत तत्कालीन सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के विरुद्ध गया था, लेकिन तृतीय जन-उफान क्या कांग्रेस के लिए कोई यू-टर्न लेगा? युवाओं की प्राथमिकताएं जो भी हों, लेकिन उनमें परिवर्तन की इच्छा अवश्य होती है, इसलिए बढ़ा मतदान सत्तारूढ़ दल के विरुद्ध जा सकता है। प्रश्न यह है कि ये युवा परिवर्तन की बागड़ोर सौपेंगे किसे? इन युवाओं में बिहार और गुजरात मॉडल के प्रति आकर्षण है। वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में भी वैसा ही विकास हो जैसा इन राज्यों में हुआ है। दोनों राज्यों में परिवर्तन का श्रेय मुख्यमंत्री को ही दिया जा रहा है। दोनों राज्यों में भाजपा शासन में है और उसे उत्तर प्रदेश में युवाओं की इस अभिलाषा का लाभ मिल सकता था, लेकिन भाजपा का दुर्भाग्य कि वह किसी सशक्त युवा नेतृत्व को प्रदेश में आगे न कर सकी। इस संबंध में सपा और कांग्रेस ने समय रहते सार्थक पहल की। सपा ने अखिलेश को तो कांग्रेस ने राहुल को आगे किया है। इन दोनों ही युवाओं ने चुनाव प्रचार में कड़ी मेहनत की है और मतदाताओं से जुड़ने और उनको अपने से जोड़ने की जी तोड़ कोशिश की है। इसका लाभ उनको मिल सकता है और यह संभव है कि युवा मतदाता इन दो दलों में बंट जाए और दोनों को ही अप्रत्याशित लाभ हो जाए, लेकिन राहुल का राष्ट्रीय व्यक्तित्व है; उनके मुकाबले अखिलेश का राजनीतिक कद काफी छोटा है। फिर जहां कांग्रेस में राहुल की भावी प्रधानमंत्री के रूप में छवि निर्विवाद है वहीं सपा में अखिलेश को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना जोखिम भरा हो सकता है। अन्ना के आंदोलन में युवाओं की सक्रिय भूमिका से वर्तमान विधानसभा चुनावों में तृतीय जन-उफान का पूर्वानुमान संभवत: लग गया था और उसको कैप्चर करने की सबसे अच्छी तैयारी कांग्रेस और सपा की लगती है। कांग्रेस ने जहां एक ओर अन्ना-विरोध को निस्तेज कर दिया वहीं युवा जन-उफान को अपनी ओर करने के लिए युवा नेतृत्व के रूप में राहुल को कुछ एंग्री यंग मैन के रूप में पेश किया। सपा ने भी चुनावी प्रबंधन को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार किया और अखिलेश के लिए समुचित प्रचार-प्रबंधन एवं इमेज-मैनेजमेंट किया। उत्तर प्रदेश में तृतीय जन-उफान में नए और युवा मतदाताओं को खीचने केलिए कांग्रेस और सपा विशेष प्रयास कर रही हैं। इस दौर में बसपा कुछ पिछड़ गई। संभवत: मायावती अपने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले से इतनी आत्म-मुग्ध रहीं कि उनको इसकी सुध ही न रही कि वे यह सुनिश्चित कर सकें कि ब्रांाणों के आगमन और दलितों के विस्थापन से दलितों में कोई रोष पैदा न होने पाए। पिछले पांच साल में पूर्ण बहुमत से शासन करने के बाद बसपा की सरकार यदि दलितों या अति-दलितों की दशा में सुधार नहीं कर पाई तो उनके पास मायावती को दोषी ठहराने के अलावा क्या विकल्प है? यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मायावती केवल दलितों के वोट से चुनाव नहीं जीत सकतीं चाहे वे कितनी भी मजबूती के साथ उनके साथ खड़े क्यों न हों। ऐसा नहीं है कि बसपा के शासन में विकास नहीं हुआ या शांति व्यवस्था नहीं सुधरी, लेकिन बसपा और स्वयं मायावती की जनता से दूरी और संवादहीनता ने पार्टी के लिए अनावश्यक संकट पैदा कर दिया है। तृतीय जन-उफान में युवाओं के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिक भी हैं। जहां युवाओं में शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के सरोकार अलग-अलग हो सकते है वहीं महिला और पुरुष मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी भिन्न हो सकती हैं। यही बात बुजुगरें पर भी लागू होती है। इस कारण बढ़े हुए मतदाताओं की दलीय निष्ठाएं भी भिन्न हो सकती हंै, लेकिन ग्रामीण अंचलों में हरिजन अधिनियम के दुरुपयोग से ब्रांाणों सहित वे उच्च जातियां बसपा से नाराज चल रही हंै जिनके समावेश से बसपा की सोशल इंजीनियरिंग रंग लाई थी। इस चुनाव में एक नूतन प्रवृत्ति देखने को मिल रही है- जहां लोग किसी राजनीतिक दल से नाराज हैं वहां या तो वे अपनी जाति के प्रत्याशी को वोट देना चाहते हैं या एक अच्छे प्रत्याशी को जो विकास करा सके। ताज्जुब है कि गांवों में अन्ना-प्रभाव तब दिखाई दे रहा है जब शहरों से उसका प्रभाव लगभग गायब हो चुका है। प्रथम जन-उफान से गैर-कांग्रेसवाद और द्वितीय से पहचान की राजनीति ने जन्म लिया। अब तृतीय जन-उफान संभवत: भारतीय लोकतंत्र को एक कदम आगे ले जाकर सुशासन एवं विकास पर स्थापित कर सके। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
आरक्षण का भूत
अन्ना हजारे का आंदोलन दम तोड़ रहा है और बाबा रामदेव का अभियान फिलहाल ठंडा पड़ा हुआ है, किंतु इससे घबराने की जरूरत नहीं है। दरअसल, हालिया तीन फैसलों से सुप्रीम कोर्ट ने सुनिश्चित कर दिया है कि कानून के लंबे हाथ घोटालेबाजों के गिरेबां तक पहुंच रहे हैं। इन फैसलों से कानून के शासन में नागरिकों का विश्वास बढ़ा है। ये तीन फैसले हैं-2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस रद कर नए सिरे से नीलामी, आम नागरिकों को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ मामला दर्ज करने का अधिकार और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त का सशक्तिकरण। इन तीन फैसलों में सबसे प्रमुख है 2जी लाइसेंस आवंटन के संबंध में सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी और अन्य की याचिका पर फैसला। इस ऐतिहासिक फैसले में जस्टिस जीएस सिंघवी और अशोक कुमार गांगुली ने सरकार द्वारा आवंटित 122 लाइसेंसों को रद कर दिया है और अनेक कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया है। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गैर सरकारी संगठनों और उन नागरिकों की सराहना की है, जो इस मामले को लेकर अदालत में पहुंचे। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी बनाम मनमोहन सिंह व अन्य मामले में डॉ. स्वामी ने एक मंत्री पर मामला चलाने के अपने अधिकार पर जोर दिया। उन्होंने अदालत का ध्यान खींचा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 2जी स्पेक्ट्रम मामले में पूर्व संचार मंत्री ए राजा के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुमति देने संबंधी आवेदन पर कोई फैसला नहीं ले रहे हैं। अदालत के सामने मुद्दा यह था कि क्या एक नागरिक को भ्रष्टाचार निरोधक कानून 1988 के तहत जनसेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार है? और क्या सक्षम अधिसत्ता के लिए एक निश्चित समयसीमा में इस संबंध में फैसला लिया जाना आवश्यक है? जस्टिस जीएस सिंघवी और एके गांगुली की खंडपीठ ने डॉ. स्वामी के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने एटॉर्नी जनरल की इस दलील को ठुकरा दिया कि एक नागरिक जनसेवक के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पहले भी एटॉर्नी जनरल की ऐसी ही एक दलील को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ अंतुले मामले में खारिज कर चुकी है। अदालत ने विनीत नारायण मामले में तीन सदस्यीय खंडपीठ के फैसले को उद्धृत किया। न्यायाधीशों ने कहा कि इस मामले में खंडपीठ ने व्यवस्था दी थी कि नागरिकों को अदालत में मामला दर्ज करने का अधिकार है। साथ ही सक्षम अधिसत्ता को एक निश्चित समयसीमा में फैसला लेने का आदेश दिया गया था। उस मामले में अदालत ने कहा था कि जनसेवकों के ईमानदारी से विमुख होने का कोई भी मामला विश्वासघात की श्रेणी में आता है और इससे कड़ाई से निपटा जाना चाहिए। अगर जनसेवकों का आचरण दोषपूर्ण है तो इसकी अविलंब जांच होनी चाहिए और अगर उसके खिलाफ प्रथम दृष्टतया मामला नजर आता है तो तुरंत मामला दर्ज होना चाहिए। अंतत: अदालत ने जनसेवकों पर मामला दर्ज करने के संदर्भ में सरकार को फैसला लेने की तीन माह की समयसीमा दी है। अदालत ने सरकार को इस समयसीमा का दृढ़ता से पालन करने को कहा है। हालांकि अगर किसी मामले में एटॉर्नी जनरल या किसी कानून अधिकारी से सलाह लेने की जरूरत है तो एक अतिरिक्त माह का समय और लिया जा सकता है। जजों ने कहा कि संविधान पीठ के फैसले के आलोक में डॉ. स्वामी को ए राजा के खिलाफ मामला दर्ज कराने का अधिकार है। कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती। यह पूरा मामला प्रधानमंत्री के आचरण और डॉ. स्वामी द्वारा लिखे गए अनेक पत्रों के संदर्भ में प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रतिक्रिया के चारो ओर घूम रहा है। डॉ. स्वामी सुप्रीम कोर्ट इसलिए गए क्योंकि उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने बिल्कुल मिथ्या अनुमान पर फैसला लिया कि इस मामले में प्रधानमंत्री ने सीबीआइ को जांच सौंपी हुई है। असल में 4 मई, 2009 को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त ने जांच की थी और रिपोर्ट की प्रति सीबीआइ के निदेशक को भेजी थी कि कहीं 2जी स्पेक्ट्रम मामले में आपराधिक साजिश तो नहीं हुई? इसके बाद सीबीआइ ने एफआइआर दर्ज की। इसके करीब एक साल बाद तक मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा और सीबीआइ ने तभी जांच आगे बढ़ाई जब अदालत ने इसमें दखल दिया। अदालत ने कहा कि साक्ष्यों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री की पहल पर सीबीआइ ने न तो केस दर्ज किया और न ही जांच शुरू की। करीब एक साल पहले डॉ. स्वामी ने प्रधानमंत्री को अभिवेदन दिया था कि सीबीआइ द्वारा एफआइआर दर्ज कराई जाए और इस पर सतत निगरानी रखी जाए। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा प्रस्तुत शपथपत्र में कहा गया है कि एक दिसंबर, 2008 को मामला प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उन्होंने संबंधित अधिकारी को तथ्यों की विवेचना और पड़ताल करने को कहा। चौंकाने वाली बात यह है कि इन निर्देशों का पालन करने के बजाय अधिकारी ने अभिवेदन को संचार मंत्रालय में भेज दिया। उस समय तक यह मंत्रालय उन्हीं ए राजा के अधीन था, जिनके खिलाफ डॉ. स्वामी ने गंभीर आरोप लगाए थे। इन अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को आरोपों की गंभीरता और मामले को चार माह के भीतर निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बारे में नहीं बताया। जस्टिस सिंघवी से सहमति प्रकट करते हुए जस्टिस गांगुली ने कहा कि आज देश में भ्रष्टाचार ने न केवल संवैधानिक शासन के सामने खतरा पैदा कर दिया है, बल्कि इसने भारतीय लोकतंत्र और कानून के शासन को भी खतरे में डाल दिया है। इसलिए यह अदालत का कर्तव्य है कि किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी कानून की इस तरह व्याख्या करे जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग मजबूत हो। उन्होंने फैसला दिया कि अगर सरकार चार माह के भीतर जनसेवकों के खिलाफ मामला दर्ज करने के आवेदन पर फैसला नहीं करती तो यह मान लिया जाएगा कि सरकार ने मामला दर्ज करने की अनुमति दे दी है। तीसरे और अंतिम मामले में अदालत ने 2जी घोटाले की जांच पर स्वतंत्र निगरानी की अपील ठुकरा दी। हालांकि अदालत ने व्यवस्था दी कि भविष्य में सीबीआइ द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भेजी जाए और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एक सप्ताह के भीतर जांच की विवेचना कर अपने मत व सुझाव से अदालत को अवगत कराए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन फैसलों से जनता का मनोबल और कानून के शासन के प्रति विश्वास बढ़ा है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Tuesday, February 14, 2012
कांग्रेस के खोखले दावे
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जहां एक तरफ वह स्वयं, उनकी बहन और उनके बच्चे कांग्रेस के लिए वोट मांग रहे हैं वहीं कांग्रेस के अन्य नेता गांधी परिवार के प्रति अपनी स्वामिभक्ति व्यक्त करने के लिए एक-दूसरे से होड़ लेने में लगे हैं। प्रतिस्पद्र्धा में लगे इन नेताओं के ऐसे बयान सामने आ रहे हैं जो न केवल संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी हैं। विधि एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से मुसलमानों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया। आयोग ने खुर्शीद को आचार संहिता का पालन करने का निर्देश देते हुए सावधानी बरतने के लिए चेताया था, किंतु पिछले दिनों उन्होंने एक और चुनाव रैली को संबोधित करते हुए कहा, चुनाव आयोग भले ही मुझे फांसी पर चढ़ा दे, मैं मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ता रहूंगा। खुर्शीद केंद्रीय विधि मंत्री हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनसे संवैधानिक निकायों के प्रति सम्मान प्रकट करने की अपेक्षा की जाती है। उन्हें चुनाव आयोग की मर्यादा और प्रतिष्ठा की रक्षा करनी चाहिए। इससे पूर्व जब आयोग ने भारतीय जनता पार्टी की शिकायत पर आचार संहिता उल्लंघन करने का संज्ञान लिया था तब भी उन्होंने अमर्यादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि आयोग को चुनाव के बेसिक फंडे की जानकारी ही नहीं है। चुनाव आयोग का बार-बार इस तरह उपहास उड़ाए जाने पर भी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का मौन रहना यह दर्शाता है कि खुर्शीद को उनका समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस में चाटुकारिता का बहुत महत्व है। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का हालिया बयान इसे रेखांकित करता है। पिछले दिनों पत्रकारों से बात करते हुए जायसवाल ने कहा, राहुल जब चाहें, देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सवाल कहां खड़ा होता है। वह इस राज्य में जो भी शासन देंगे उसके रिमोट कंट्रोल का सेंसर बहुत मजबूत होगा। केंद्र में स्थापित रिमोट कंट्रोल वाली व्यवस्था के कारण देश जिस बदहाली के दौर से गुजर रहा है उसको देखते हुए उत्तर प्रदेश का भविष्य सहज ही समझा जा सकता है। संविधान में रिमोट की कोई व्यवस्था नहीं है। 2004 के जनादेश के बाद संवैधानिक अड़चनों के कारण जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा टूटी तो पिछवाड़े से सत्ता की कमान थामे रखने के लिए इस तरह की अलोकतांत्रिक बुनियाद डाली गई। सोनिया के विदेशी मूल के कारण 2004 में कांग्रेस को समझौता करना पड़ा और एक नौकरशाह प्रधानमंत्री बने। लोकतंत्र के साथ किए गए इस नए प्रयोग का दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पद तो है, पर शक्तियां नहीं। सोनिया गांधी संप्रग समन्वय समिति का अध्यक्ष बन सत्ता का रिमोट अपने पास रखे हुए हैं। इस विरोधाभास के कारण ही आज हमारे चारो ओर अव्यवस्था-कुशासन फैला है। सरकार में कायम नेतृत्वहीनता के कारण अर्थव्यवस्था दिशाहीन हो गई है। महंगाई बेलगाम है। नामचीन उद्योगपति सरकारी स्तर पर व्याप्त नेतृत्वहीनता को दूरकर अर्थव्यवस्था को संभालने की अपील कर रहे हैं। सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है। यदि न्यायपालिका ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो न तो 2जी घोटाले के आरोपी तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा और न ही राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट के कसूरवार कलमाड़ी सलाखों के पीछे पहंुचते। सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री पर भी अनियमितता बरतने के आरोप हैं, किंतु सरकार ने उन्हें संरक्षण प्रदान कर रखा है। नेता प्रतिपक्ष के विरोध के बावजूद सरकार ने एक दागदार व्यक्ति को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाया था, जिसे अदालत के आदेश के बाद हटाना पड़ा। कैसी सरकार है यह और इसकी प्राथमिकताएं क्या हैं? आर्थिक, औद्योगिक और कृषि, तीनों क्षेत्रों में विकास की दर मंद है। राहुल गांधी पांच साल में उत्तर प्रदेश की सूरत बदल देने का दावा कर रहे हैं। वह विकास की आंधी से रोजगार के अवसरों की बाढ़ लाएंगे ताकि उत्तर प्रदेश के युवाओं को उनके बयान के अनुसार मुंबई और अन्य महानगरों में भीख मांगने के लिए नहीं जाना पड़े। जरा, केंद्रीय परियोजनाओं पर नजर डालें। आधारभूत संरचनाओं का विकास किए बिना किसी भी क्षेत्र में प्रगति करना संभव नहीं है। सरकार ने प्रतिदिन बीस किलोमीटर हाईवे बनाने का लक्ष्य रखा था, जबकि जमीनी वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चालू केंद्रीय परियोजनाओं में से 65 प्रतिशत योजनाओं में इतनी देरी हो चुकी है कि तय लक्ष्य प्राप्त कर पाना सरकार के लिए असंभव हो गया है। देरी के कारण निर्माण सामग्री के दाम बढ़ जाने से सरकारी खजाने को 1800 करोड़ रुपये का चूना अलग लगा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में आक्रामक तेवर लिए घूम रहे कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की बदहाली के लिए गैर-कांग्रेसी दलों को भले ही कोस रहे हों, किंतु क्या इसके लिए कांग्रेस की जवाबदेही अन्य दलों से बड़ी नहीं है? प्राय: समूचे देश में आजादी के बाद के चार दशक तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है। व्यवस्था क्यों नहीं बदली? आज कांग्रेस मुसलमानों का मसीहा बनने का स्वांग कर रही है। पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक वर्ग के लिए तय करने की घोषणा कर कांग्रेस एक बार फिर मुसलमानों को ठगना चाहती है। मुसलमानों के कल्याण के लिए सच्चर कमेटी के बाद रंगनाथ मिश्र आयोग ने जो संस्तुतियां की थीं उनमें से कितनों को सरकार पूरा कर पाई? राहुल और सोनिया गांधी ने दावा किया है कि चुनाव बाद किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेंगे, किंतु केंद्र में गठबंधन करने से परहेज क्यों नहीं किया? प्रधानमंत्री सरकार की अक्षमता के पीछे गठबंधन दलों का दबाव बताते आए हैं। एक जनहितैषी पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस राजनीतिक अवसरवाद को ज्यादा प्राथमिकता क्यों देती है? वस्तुत: जैसा कि स्वयं राहुल गांधी ने भी पिछले दिनों कहा, कांग्रेस की नजर इन दिनों धनुर्धर अर्जुन की तरह सिर्फ सत्ता पर केंद्रित है। पिछले 22 सालों से यूपी ने कांग्रेस को हाशिए पर डाल रखा है। उस खोए जन विश्वास को वापस पाने के लिए कांग्रेस जिस तरह संवैधानिक निकायों पर हमला कर रही है और संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर वोट बैंक की राजनीति कर रही है उससे चुनावों में लाभ होना तो शायद संभव न हो, किंतु राष्ट्रहितों को क्षति पहुंचने का खतरा अवश्य है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Friday, December 9, 2011
क्यों नहीं चला राहुल का जादू
राहुल गांधी के राष्ट्रीय राजनीति में औपचारिक प्रवेश को सात साल बीत गए हैं। 2004 में अमेठी से लोकसभा का चुनाव जीतकर उन्होंने ठसके से राजनीतिक यात्रा का पहला कदम रखा था। तीन साल बाद जब उन्हें पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया, वह कांग्रेस के हाई कमांड बन गए। इन वर्षो में राहुल गांधी राजनीति में अपना स्थान तलाशने में लगे रहे किंतु उन्हें सीमित सफलता ही मिल पाई। अपने पिता राजीव गांधी के विपरीत, जिन्हें राजनीति में पदार्पण के समय मिस्टर क्लीन कहा जाता था, राहुल गांधी अपनी छाप नहीं छोड़ पा रहे हैं। यद्यपि राहुल गांधी नियमित रूप से रोड शो और राजनीतिक यात्राएं करते रहे हैं, किंतु उन्हें उतना राजनीतिक लाभांश नहीं मिला, जितनी वह मेहनत कर रहे हैं। राहुल गांधी का जादू न चलने के बहुत से कारण हैं। उदाहरण के लिए, वर्तमान राजनीतिक वातावरण कांग्रेस पार्टी के लिए बेहद प्रतिकूल है और इस वजह से राहुल की सफलता की संभावनाएं कम हो रही हैं। किंतु बाहरी वातावरण के अलावा, जिसके लिए वह जिम्मेदार नहीं हैं, राहुल गांधी के व्यक्तित्व का भी सीमित सफलता में योगदान है। इसी तरह दो और कारक राहुल की सफलता में बाधक बने हुए हैं- दृढ़ निश्चय और साहस की कमी। हम राहुल गांधी के पिछले सात साल के आचरण पर नजर डालकर यह देख सकते हैं कि वह दृढ़ निश्चय, गंभीरता और साहस जैसे गुणों पर कितने खरे उतरते हैं। ये गुण ही राजनेताओं को लोगों के दिलों में उतारते हैं। कुछ साल पहले राहुल गांधी ने यह घोषणा करके संजीदगी और सच्चाई के साथ खिलवाड़ किया था कि अगर 1992 में उनके परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वस्त न होता। गौरतलब है कि राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी के कार्यकाल में ही राम जन्मभूमि के कपाट खुले थे। वह भी उनके पिता ही थे, जिन्होंने नवंबर 1989 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले गृहमंत्री बूटा सिंह को अयोध्या में राममंदिर के शिलान्यास में भाग लेने भेजा था। हिंदुओं को खुश करने के लिए यह सब करने के बाद राहुल गांधी हमें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि अगर 1992 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री होते तो विवादित ढांचा ध्वस्त नहीं होता। इसके बाद, पिछले साल से मनमोहन सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के संदर्भ में राहुल की प्रतिक्रिया या कहें कि उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न आना, उनकी गंभीरता और साहस पर सवाल उठाता है। अगस्त 2010 में राष्ट्रमंडल घोटाला उजागर हुआ, इसके पश्चात आदर्श सोसायटी, 2जी स्पेक्ट्रम आदि घोटालों की झड़ी लग गई। लाखो करोड़ों के घोटालों को देखकर जनता दंग रह गई कि जनसेवक किस तरह देश को लूटकर अपना खजाना भर रहे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन में जनता का गुस्सा प्रतिध्वनित हुआ। जब यह सब चल रहा था, तब हमारे युवा आइकन और कांग्रेस पार्टी के उत्तराधिकारी राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो गए। राहुल गांधी को लगा होगा कि अगर वह भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं तो यह उनकी सरकार के विरुद्ध जाएगा और इससे संप्रग के द्रमुक जैसे सहयोगी भी नाराज हो सकते हैं। इसके अलावा उन्हें यह भी लगता होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने पर बोफोर्स आदि मुद्दों पर असहज करने वाले सवाल उठ सकते हैं। अगर राहुल गांधी साफ प्रशासन देने की इच्छा रखते तो उन्हें इन घोटालों के खिलाफ बोलने का साहस दिखाना चाहिए था। जाहिर है, शुरू में इससे प्रधानमंत्री और गठबंधन को परेशानी जरूर होती, लेकिन इसके कारण वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सबसे बड़े नेता और यूथ आइकन बन जाते। अंतत: इसका लाभ कांग्रेस को मिलता। लेकिन साहस और विश्वास के अभाव के कारण उन्होंने यह मौका गंवा दिया। अब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बॉस अन्ना हजारे बन चुके हैं। संजीदगी और साहस के अभाव के साथ-साथ जब कभी उनका भाषण या बयान लिखित नहीं होता, वह कुछ न कुछ गड़बड़ कर बैठते हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली में युवक कांग्रेस सम्मेलन में दावा किया कि सबसे अधिक भ्रष्टाचार हमारे राजनीतिक ढांचे में है। इससे उनका क्या अभिप्राय है? इस राजनीतिक ढांचे को बदलने की उनके पास क्या योजना है? क्या यह अनर्गल प्रलाप नहीं है? इस तरह का बचकानापन बार-बार सामने आता है। कुछ साल पहले उन्होंने एक पत्रकार से कहा कि वह 25 साल का होते ही प्रधानमंत्री बन सकते थे, किंतु इसलिए नहीं बने क्योंकि वह अपने वरिष्ठजनों पर हुक्म चलाना नहीं चाहते थे। हाल ही में एक बार फिर लिखित बयान के अभाव में उन्होंने खुद को मुश्किल में डाल लिया। फूलपुर में उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के लोग कब तक महाराष्ट्र में जाकर भीख मांगते रहेंगे। इसी प्रकार लोकपाल के मुद्दे पर पहले से तैयार रिपोर्ट पढ़ने के बाद जब वह संसद से बाहर निकले तो मीडिया से कह बैठे कि उन्होंने पूरा खेल पलट दिया। क्या खुद अपने बारे में ऐसे दावे करना विचित्र नहीं है? इसके अलावा राहुल गांधी के मन में संसद के प्रति आदर का भाव भी नहीं है। यद्यपि वह युवा सांसद हैं फिर भी जैसे उन्हें लगता है कि वह संसद से भी ऊपर हैं। इस संस्थान के प्रति राहुल गांधी का अनादर इससे झलकता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की पांच दिन की यात्रा 22 नवंबर से शुरू की, जिस दिन शीतकालीन सत्र शुरू हुआ था। अंतत: चापलूसी के बारे में भी कुछ शब्द। इसमें कोई दो राय नहीं कि 1998 में सोनिया गांधी द्वारा कांग्रेस की कमान संभालने के बाद से पार्टी में चापलूसी की परंपरा कमजोर पड़ी है। सातवें दशक में जब इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी, कांग्रेस में चापलूसी चरम पर थी। कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने तो घोषणा ही कर दी थी, इंदिरा भारत है और भारत इंदिरा। अब समय बदल चुका है, तो भी कांग्रेस में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो नेहरू-गांधी परिवार की चापलूसी में कोई कसर छोड़ते हों। हालिया युवक कांग्रेस सम्मेलन में कांग्रेस वर्किग कमेटी के एक सदस्य ने राहुल गांधी को महानतम युवक आंदोलन चलाने पर महिमामंडित किया। उनका कहना था कि इस तरह का आंदोलन तो कभी चीन और रूस तक में देखने को नहीं मिला। यह उम्मीद ही की जा सकती है कि इस तरह की तारीफ के बाद भी राहुल गांधी के पैर दृढ़ता से जमीन पर जमे रहें और वह हवा में न उड़ने लगें। इससे तो उनकी राजनीतिक शक्ति और कम ही होगी। (लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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