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Tuesday, September 20, 2011

वोट बैंक के लिए माया की पीएम को तीसरी चिट्ठी

लखनऊ मुसलमानों और गरीब सवर्णो को आरक्षण की मांग करने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लगातार तीसरे दिन चिट्ठी लिखी। तीसरे पत्र में माया ने प्रधानमंत्री से जाटों को अन्य पिछड़े वगरें की केन्द्रीय सूची में शामिल करने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को भेज गये एक पत्र के जरिए प्रदेश के अन्य पिछड़े वगरें के उत्थान के सम्बन्ध में अपनी सरकार की प्रतिबद्धताओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया है। गौरतलब है कि शनिवार को मायावती ने आबादी के हिसाब से मुसलमानों को और रविवार को गरीब सवर्णो को आरक्षण देने की बात कर चुकी हैं। प्रधानमंत्री को लिखे तीसरे खत में मुख्यमंत्री ने जाटों के वोट बैंक को देखते हुए उनको केंद्र सरकार के अन्य पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने की मांग की है। मालूम हो कि जाट इस मांग को लेकर सोमवार को भेजे गये अपने पत्र में मुख्यमंत्री ने लिखा है कि जाट जाति के व्यक्ति मुख्यत: कृषि एवं कृषि सम्बन्धित अन्य कायरें से जीविकोपार्जन करते हैं। प्रत्येक परिवार के लिए कृषि योग्य भूमि के कम हो जाने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, इसके अतिरिक्त जाट जाति के व्यक्ति शैक्षणिक रूप से भी पिछड़े हुए हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा 10 मार्च, 2000 द्वारा प्रदेश के अन्य पिछड़े वगरें की सूची में जाट जाति को सम्मिलित किया गया है। सरकारी प्रवक्ता के मुताबिक मुख्यमंत्री का दृढ़ अभिमत है कि जाट समुदाय की स्थिति में यदि परिवर्तन लाना है तो उन्हें शिक्षा, सेवायोजन तथा जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए अवसरों में वृद्धि सुलभ कराये जाने की नितान्त आवश्यकता है, जिस पर उनकी सरकार पूर्ण सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा है कि राजस्थान के जाट समुदाय को (धौलपुर एवं भरतपुर जिला को छोड़कर) 1999 में केंद्र के अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है। राजस्थान उत्तर प्रदेश से सटा हुआ राज्य है और वहां के जाट और उप्र के जाट की सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति लगभग एक जैसी है। इस आधार पर उत्तर प्रदेश की जाट जाति को भी केंद्र सरकार की अन्य पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल किया जाना चाहिए

मोदी को मिले समर्थन की तासीर परखने में जुटा संघ

 नई दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सद्भावना उपवास को मिले समर्थन की तासीर परखने में जुटा गया है। यह पहला मौका है जब मोदी के किसी कार्यक्रम को इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक समर्थन मिला है। हालांकि आम चुनाव दूर होने से वह अभी से किसी एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन संभावित नामों को लेकर उसके अंदरूनी आकलन जारी है। उसके इस चिंतन में भाजपा के मौजूदा केंद्रीय नेताओं के अलावा नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है। संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि मोदी भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता पहले से ही हैं। इसके लिए उनको कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। उनके इस उपवास को जिस तरह देश भर का समर्थन मिला, वह काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल बीते एक दशक में मोदी संघ के प्रखर हिंदुत्व के एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में मोदी के उपवास में राजग के बाहर के दलों के समर्थन को संघ भावी राजनीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता है। इस समर्थन की राजनीतिक तासीर कितनी है, इसका आकलन मोदी की भविष्य की राह भी तय करेगा। चूंकि चुनाव अभी काफी दूर हैं इसलिए न तो संघ और न ही भाजपा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में अपने पत्ते खोलना चाहती है। भाजपा में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर संघ पहले ही अपनी राय साफ कर चुका है। उज्जैन की समन्वय बैठक में संघ नेतृत्व ने भाजपा नेताओं को स्पष्ट कर दिया था कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी किसी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं करे। आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा का विरोध भी उसने इसलिए किया था, क्योंकि इससे उनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की अटकलें लगनी लगी थी। जहां तक बात नरेंद्र मोदी की है, तो वह संघ की तरफ से इस पद के लिए एक पसंद पहले से रहे हैं। चूंकि भाजपा के साथ राजग के सहयोगी दल भी है, इसलिए किसी भी नाम पर सहमति बनाने के लिए उनकी भी पसंद देखी जाएगी

शीला ने खेला दलित कार्ड

नई दिल्ली दिल्ली सरकार ने दलित कार्ड खेलते हुए झुग्गियों में रहने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को मुफ्त में आवास देने का फैसला किया है। राजीव रत्‍‌न योजना के तहत सरकार द्वारा मुफ्त आवास वितरित किए जाने के निर्णय को उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के मद्देनजर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। योजना के तहत लगभग 70 हजार आवासों का निर्माण किया जाना है। सरकार के अनुसार 14 हजार आवास आवंटन के लिए तैयार हैं। राजीव रत्‍‌न योजना को लेकर लोकायुक्त की टेड़ी नजर को झेल रही मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दलितों की हमदर्दी बटोरने की कोशिश की है। झुग्गीवासियों को पुनर्वास के लिए जिन मकानों के लिए 60 हजार रुपये अदा करने थे, अब सरकार ने यह राशि स्वयं अदा करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में सोमवार को यह फैसला लिया गया है। दिल्ली सरकार की इस योजना का विरोध करते हुए एक भाजपा नेत्री ने लोकायुक्त से शिकायत की थी। इसमें सरकार पर गुमराह करने का आरोप लगाया गया था। दीक्षित ने कहा कि कांगे्रस सरकार अनुसूचित जाति समेत समाज के कमजोर वर्गो के उत्थान के लिए पूर्ण निष्ठा से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार महत्वाकांक्षी राजीव रत्‍‌न योजना के तहत कम लागत के आवास आवंटन के लिए तैयार हंै। मंत्रिमंडल ने झुग्गी झोंपड़ी के अनुसूचित जाति के निवासियों के पुनर्वास के समय उनके आवास आवंटन के लिए अंशदान को पूरी तरह माफ कर राहत देने का मार्ग प्रशस्त किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अनुसूचित जाति के झुग्गी निवासियों को राजीव रत्‍‌न आवास योजना के तहत दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड द्वारा पुनर्वासित किया जा रहा है। ऐसे में उन्हें अपने अंशदान के 60 हजार रुपये का भुगतान नहीं करना पड़ेगा। इस राशि को दिल्ली सरकार वहन करेगी। लेकिन गैर अनुसूचित जाति के लोगों को अपने हिस्से का अंशदान पूर्ववत अदा करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि इन आवासों की अनुमानित लागत 3.34 लाख रुपये है। इनमें से भारत सरकार का योगदान 1.19 लाख, दिल्ली सरकार का योगदान 62 हजार और जमीन के स्वामित्व वाली एजेंसी का योगदान 93 हजार रुपये है। दीक्षित ने कहा कि दिल्ली को स्लम मुक्त शहर बनाने के मकसद से सरकार ने पुनर्वास योजना बनाई है। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के गठन से राजीव रत्‍‌न आवास योजना के तहत कम लागत के आवास के निर्माण की गति तेज हुई है। पुनर्वास का काम शुरू होते ही विकसित कॉलोनी में सभी नागरिक सुविधाओं के साथ आवास का सपना साकार हो जाएगा

संघ के दबाव में कल्याण को मनाएंगे गडकरी

भाजपा को मरा सांप बताकर कल्याण सिंह ने भले ही दोस्ती या गठबंधन के लिए अपने दरवाजे बंद करने का एलान कर दिया हो, लेकिन संघ के दबाव में भाजपा उन्हें (कल्याण) मनाने की एक कोशिश और करने जा रही है। सिंह की तल्खी खत्म करने के लिए पार्टी पहले उनके एक बेहद करीबी को मध्यस्थ बनाएगी। उसके बाद नितिन गडकरी खुद कल्याण से बात करेंगे। भाजपा को कल्याण सिंह की पार्टी से गठबंधन पर कोई एतराज नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, पिछले दिलों कल्याण सिंह ने भाजपा को लेकर जो तल्ख तेवर दिखाए, उसके मद्देनजर यह माना गया है कि अगले दौर की बातचीत शुरू होने से पहले उनकी तल्खी खत्म की जाए। इसके लिए तय हुआ है कि उनके किसी बेहद करीबी को मध्यस्थ बनाया जाए। हालांकि इस काम के लिए कुसुम राय का नाम चर्चा में है, लेकिन राय ने ऐसे किसी प्रयास की जानकारी से इंकार किया है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा में कल्याण से दोस्ती के लिए इतनी बेताबी की दो वजह हैं। पहली वजह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। संघ उप्र में भाजपा की हर कीमत पर वापसी चाहता है और उसे यह स्वीकारने में गुरेज नहीं है कि कल्याण उप्र में एक ताकत है। 2002 के विस और 2009 के लोस चुनाव में उनकी पार्टी में न रहने की कीमत भाजपा को चुकानी पड़ी है। 2012 के चुनाव में संघ कोई चूक नहीं चाहता है,इसलिए उसका दबाव है कि कल्याण से बातचीत का सिलसिला जारी रखा जाए। दूसरी वजह यह है कि पार्टी के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर राजनाथ सिंह की एंटी लाबी यूपी में राजनाथ को कांउटर करने के लिए कल्याण को वापस लाना चाहती है, जो कि राजनाथ के धुर विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में राजनाथ की एंटी लाबी भी कल्याण का चैप्टर बंद होने नहीं देना चाहती है। यह संयोग ही है कि उप्र में भाजपा अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही कल्याण विरोधी नहीं है। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में शाही शाही उनके प्रिय मंत्रियों में शुमार थे। कल्याण के भाजपा से बाहर रहने के दौरान शाही ने उनसे कभी अपने रिश्ते खराब नहीं किए। कल्याण उन्हें आज भी बहुत पसंद करते हैं और शाही भी उनका बहुत सम्मान करते हैं। कल्याण को लेकर यह जिद कतई नहीं है कि वह भाजपा में वापस ही आएं। भाजपा उनसे गठबंधन कर चुनाव लड़ने में ज्यादा फायदा देख रही है। ऐसे में तल्खी खत्म होने के बाद जब बातचीत होगी तो वह गठबंधन के एक निश्चित फार्मूले के साथ और वह बातचीत नितिन गडकरी भी कर सकती हैं। भाजपा कल्याण सिंह के लिए 30-35 सीटें देने को तैयार है लेकिन मध्यस्थ की बातचीत में क्या निकलता है, इसके बाद बहुत कुछ निर्भर करेगा

Saturday, September 17, 2011

तृणमूल और माकपा में नहीं बनी सहमति

 कोलकाता रैली एवं होर्डिग्स स्थल के बदलाव पर आम सहमति बनाने के ध्येय से राइटर्स में शुक्रवार को सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक बेनतीजा समाप्त हो गई। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रैली व होर्डिग्स लगाने के वर्तमान स्थलों में बदलाव चाहती हैं, लेकिन विपक्ष इससे सहमत नहीं है। विपक्ष इसे लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की संज्ञा दे रहा है, जबकि मुख्यमंत्री का तर्क है कि सियासी रैलियों से आम जनता को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री बनर्जी वर्तमान रैली स्थलों में बदलाव कर ऐसे स्थल का चयन करना चाहती हैं जहां लोगों को रैली के दौरान आवागमन में दिक्कतों का सामना न करना पड़े। वर्तमान में राजनीतिक पार्टियां मेट्रो सिनेमा के सामने, शहीद मीनार, रानीरासमणि एवेन्यू आदि स्थानों पर रैली व सभा करती हैं। मुख्यमंत्री चाहती हैं कि मेट्रो के सामने रैली व सभा न हो बल्कि इसके बदले महात्मा गांधी की मूर्ति मेयो रोड में रैली व सभा की जाए। इसी तरह राजनीतिक होर्डिग्स के लिए वह दस स्थानों को चयनित करना चाहती हैं। बैठक में इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल तृणमूल एवं विपक्ष वाममोर्चा के बीच खासी तकरार हुई। विपक्ष ने ऐसे फैसले को सिरे से खारिज कर दिया। यही नहीं बैठक से बाहर आने के बाद माकपा के नेता मोहम्मद सलीम ने सरकार पर रैली स्थलों के बदलाव के नाम पर लोगों के गणतांत्रिक अधिकारों का हनन का आरोप जड़ दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में रैली व होर्डिग्स के अलावा महंगाई व राज्य में खून खराबा जैसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए थी। इस पर मुख्यमंत्री ममता भड़क गई और पलटवार में उन्होंने माकपा नेता पर झूठ बोलकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगा दिया। भाजपा नेता तथागत राय भी इस मुद्दे पर वामो के साथ हैं। उन्होंने कहा कि पहले जिन स्थानों पर रैली करने की अनुमति थी उन स्थानों में परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। एसयूसीआई के सोमेन बसु ने कहा कि वह राजनीतिक रैली पर किसी तरह की पाबंदी का विरोध करते हैं। वामफ्रंट के 15 पाडियरें में 12 को इस बैठक में आमंत्रित किया गया था जिसमें तीन पार्टियां नहीं आई थीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह लोगों की सुविधाओं को सर्वोपरि मानती हैं। किसी राजनीतिक दल को लोगों को परेशान कर रैली व सभा नहीं करनी चाहिए, लेकिन माकपा के लोग इस मुद्दे पर भी राजनीति कर रहे हैं। जबकि 35 वर्षो के उनके शासन की कारगुजारियां सामने हैं। उन्होंने कहा कि वह साढ़े तीन माह में चार बार सर्वदलीय बैठक बुला चुकी हैं जबकि माकपा 35 वर्षो के शासन में कभी इस तरह के सर्वदलीय बैठकें नहीं बुलाई। उन्होंने कहा कि कोलकाता में इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। धर्मतल्ला में लाखों लोग आते हैं। आंदोलन व रैली से आम लोगों को दिक्कतें होती हैं। रानी रासमणि एवेन्यू के बजाय सुबोध मल्लिक स्क्वायर में रैली की इजाजत देने पर विचार किया जा रहा है

बरकरार रहेगी राहुल गांधी की बढ़ी हुई भूमिका

 सोनिया की गैरमौजूदगी में सरकार और संगठन के निर्णय तंत्र का अहम हिस्सा बन चुके राहुल गांधी की बढ़ी हुई भूमिका कांग्रेस अध्यक्ष की वापसी के बाद भी बरकरार है। कांग्रेस अध्यक्ष की सक्रिय वापसी के बाद हुई पहली कोर कमेटी की बैठक से पहले प्रधानमंत्री से राहुल की मुलाकात ने इस सियासी संदेश को और मजबूती दी है। शुक्रवार शाम प्रधानमंत्री आवास पर महंगाई के मुद्दे पर हुई पार्टी की सर्वाधिक अधिकार संपन्न समिति की बैठक से पहले राहुल की प्रधानमंत्री से मुलाकात को युवराज के बढ़ते दखल और प्रभाव से जोड़ा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोल के बढ़े दामों और रसोई गैस के दाम बढ़ाने की तैयारियों से आम जनता में बेचैनी व नाराजगी के मुद्दे पर राहुल ने प्रधानमंत्री के सामने अपनी बात रखी। पेट्रोलियम पदार्थो की मूल्य वृद्धि पर सरकार के सीधे दखल की स्थिति में नीति बदलने पर चर्चा हुई। गुरुवार को उत्तर प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में हिस्सा लेने वाली सोनिया सेहत के मद्देनजर प्रधानमंत्री आवास पर हुई कोर कमेटी की बैठक में नहीं पहुंचीं। अलबत्ता बैठक से करीब आधे घंटे पहले राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अकेले में बातचीत की। इसके बाद प्रणब मुखर्जी, अहमद पटेल, एके एंटनी और पी. चिदंबरम जैसे नेताओं के साथ हुई कोर कमेटी की बैठक में वह कुछ ही देर रुके। यह पहला मौका है कि कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक में भी राहुल ने शिरकत की हो। सूत्रों के मुताबिक, पहले कोर कमेटी में सोनिया आने वाली थीं, लेकिन दामों में बढ़ोत्तरी और दूसरे विषयों पर सवेरे से ही राहुल विभिन्न नेताओं व अपनी कोर टीम से विचार-विमर्श करते रहे। इसके बाद राहुल ने सोनिया से भी इस मसले पर चर्चा की। तब कोर कमेटी के सभी सदस्यों को संदेश दे दिया गया कि कांग्रेस अध्यक्ष इस बैठक में नहीं आएंगी। सोनिया से विमर्श के बाद राहुल शाम साढ़े पांच बजे पीएम आवास पहुंचे। जबकि कोर कमेटी शाम छह बजे शुरू होनी थी। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले बढ़ रही महंगाई ने राहुल की चिंता बढ़ा दी है। कांग्रेस महासचिव ने प्रधानमंत्री से इस मुद्दे पर ठोस उपायों और दाम वापस लेने के मुद्दों को भी टटोला। कोर कमेटी में लोकपाल के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। इसके लिए कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी बैठक में शामिल हुए। गांधी जयंती के दिन राजघाट जाएंगी सोनिया संगठन और सरकार की बैठकों में सक्रिय हो चुकीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 2 अक्टूबर को जनता के सामने आ सकती हैं। 10, जनपथ के करीबी सूत्रों का कहना है कि गांधी जयंती के दिन पहली बार राजघाट जाकर वह राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी। वैसे शुक्रवार को उत्तर प्रदेश चुनाव समिति की बैठक से पहले वह सरकार के तीन शीर्ष नेताओं के साथ बैठक कर चुकी हैं। बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनसे मिलने गए। इसके बाद सरकार में नंबर दो प्रणब मुखर्जी और रक्षा मंत्री एके एंटनी से भी उनकी मुलाकात हुई थी

कल्याण के झटके से सकते में भाजपा

 उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह को साथ लाने की भाजपा नेतृत्व की मुहिम को करारा झटका लगा है। बेहद गुपचुप ढंग से शुरू हुई रणनीति परवान चढ़ने से पहले ही ध्वस्त हो गई। बात टूटने के पीछे कल्याण सिंह का अडि़यल रुख सबसे ज्यादा जिम्मेदार रहा। इस मामले के उजागर होने से भाजपा सकते में है, क्योंकि उसकी कोशिश पहल के परवान न चढ़ने पर भीतर ही भीतर दबा देने की थी, लेकिन मुखर हुए कल्याण ने मंसूबों पर पानी फेर दिया। यूपी में भाजपा को पूरी ताकत से चुनावी मैदान में उतारने के लिए पार्टी ने कल्याण को भी साथ लेने का मन बनाया था। शीर्ष नेतृत्व ने इस कवायद की शुरुआत बेहद संभलकर की थी। उसने अपने नेताओं को मोर्चे पर लगाने के बजाए गैर राजनीतिक दूत के जरिए कल्याण का मन टटोला था। इससे कल्याण भी अपनी अहमियत समझ गए और उन्होंने कुछ ज्यादा ही मांग रख दी। हालांकि, भाजपा नेतृत्व ने उनकी ताकत और क्षमता पर कुछ सीटें देने की पेशकश की थी। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी से बाहर गए नेताओं को साथ लाने की मुहिम के तहत ही कल्याण का दांव भी खेला था। कल्याण को लेकर संघ का भी रुख नरम रहा है। शुरुआत में तो इस मुहिम के बारे में पार्टी के बड़े नेताओं तक को भनक नहीं थी, लेकिन जब कुछ को पता लगा तो विरोध भी हुआ। भाजपा नेतृत्व को झटका इससे नहीं लगा कि उसकी पहल परवान नहीं चढ़ सकी। बल्कि इसके उजागर होने से वह ज्यादा सकते में है। दरअसल, पूर्व में कल्याण भाजपा की इतनी फजीहत करा चुके हैं कि पार्टी में उनका काफी विरोध है। हालांकि, भाजपा आलाकमान को लगता था कि कल्याण सिंह भी अपने भविष्य के लिए फिर पार्टी के साथ जुड़ जाएंगे

Friday, September 16, 2011

मैंने भाजपा में वापसी का प्रस्ताव ठुकराया : कल्याण

लखनऊ जनक्रांति पार्टी राष्ट्रवादी के संस्थापक एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का कहना है कि भाजपा ने उन्हें पार्टी में वापसी का प्रस्ताव भेजा था जिसे उन्होंने ठुकारा दिया। उनका कहना है कि यह प्रस्ताव भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही, योगी आदित्यनाथ एवं संजय जोशी लेकर अलग-अलग तारीखों में आए थे, लेकिन मैंने भाजपा में वापसी से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अब उनका एकमेव लक्ष्य अपनी पार्टी को मजबूत करना है। भाजपा से तो तालमेल भी नहीं करेंगे। कल्याण सिंह गुरुवार को पत्रकारों से मुखातिब थे। कुछ दिनों पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्यप्रताप शाही कल्याण सिंह से मिलने उनके आवास गए थे। शाही ने इस मुलाकात को लेकर सफाई दी थी कि कल्याण सिंह का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उनकी मिजाजपुर्सी के लिए गया था,लेकिन गुरुवार को प्रेस कांफ्रेंस में कल्याण सिंह ने इस मिजाजमुर्सी का राज उजागर कर दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा में वापसी का प्रस्ताव मैंने उनका प्रस्ताव खारिज कर दिया। यही नहीं उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि मेरी पार्टी का भाजपा से तालमेल भी नहीं होगा। कल्याण सिंह गुरुवार को भाजपा को लेकर काफी तल्ख नजर आए। उन्होंने पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ कलराज मिश्र और भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी पर भी जमकर तंज कसे। कलराज को लेकर उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में वह भी किसी से पीछे नहीं रहे। मुझे वह दिन याद है जब मेरे मुख्यमंत्रित्व काल में विधानसभा में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की सफाई देने के बजाए कलराज फफक-फफक कर रो रहे थे। राजनाथ को लेकर कल्याण ने कहा कि उनका इतिहास पार्टी को बर्बाद करने का रहा है। लालकृष्ण आडवाणी की प्रस्तावित रथयात्रा को भाजपा का निष्प्रभावी रस्मी कर्मकांड बताते हुए कल्याण सिंह ने कहा कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी भाजपा को इस मुद्दे पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली भाजपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है। जिसमें रिश्र्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा एक राष्ट्रीय अध्यक्ष और घूस लेने वाले सांसद आज भी जमे हुए है। कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं से लेकर छत्तीसगढ़, झारखंड व उत्तराखंड में हुए घोटालों की सीबीआइ जांच हो जाए तो भाजपा के कई शीर्ष नेताओं के काले कारनामे सामने आ जाएंगे। उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलने के सवाल पर कल्याण ने कहा कि इससे साबित हुआ कि भाजपा ने पार्टी में पनपे भ्रष्टाचार की बात स्वीकारी। दावा किया कि सीएम बदलने से भी वहां भाजपा सत्ता में वापस नहीं हो सकेगी, क्योंकि प्रभारी राजनाथ सिंह है

आडवाणी के रथ को मिलेगा यूपी में पास

 नई दिल्ली भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा से उत्तर प्रदेश में पार्टी की चुनावी रणनीति को झटका लगा है। पूरे प्रदेश में पार्टी का माहौल बनाने के लिए राजनाथ सिंह व कलराज मिश्र के नेतृत्व वाली जन स्वाभिमान यात्राएं, आडवाणी की यात्रा के प्रदेश से गुजरने के दौरान रुकी रहेंगी। प्रदेश की इन दोनों यात्राओं का दो चरणों के बीच दीवाली व छठ का ठहराव भी कुछ लंबा खिंच सकता है। इतना ही नहीं, समापन पर लखनऊ में होने वाली रैली की तारीख भी बदल जाएगी। उत्तर प्रदेश में भाजपा को भावी सरकार के विकल्प के रूप में जनता में पेश करने व कार्यकर्ताओं को पूरी तरह से सक्रिय करने के लिए भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह व प्रदेश चुनाव अभियान समिति के मुखिया कलराज मिश्र की 13 अक्टूबर से प्रदेश व्यापी जन स्वाभिमान यात्राओं पर निकलेंगे। इसी समय आडवाणी की भी यात्रा होने से प्रदेश के नेताओं की पशोपेश बढ़ गई है। गुरुवार को प्रदेश के नेताओं ने आडवाणी व प्रदेश की यात्राओं में टकराव टालने व कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए लगभग छह घंटे तक कड़ी मशक्कत की। सूत्रों के अनुसार आडवाणी की यात्रा प्रदेश में सात नवंबर से 13 नवंबर के दौरान रहने की उम्मीद है। यह यात्रा वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, शाहजहांपुर, बरेली व रामपुर से गुजरेगी। इसलिए प्रदेश की नेताओं की यात्राओं को इस मार्ग से दूर रखा जाएगा। राजनाथ सिंह व कलराज मिश्र को अपनी जन स्वाभिमान यात्राओं का कार्यक्रम बदलना पड़ा है। दोनों नेताओं को दीवाली व छठ त्यौहारों के चलते 23 अक्टूबर से 12 नवंबर तक बीच में यात्रा स्थगित करनी थी। यह यात्राएं तब तक स्थगित रहेंगी, जब तक कि आडवाणी की यात्रा प्रदेश से गुजर नहीं जाती। इसलिए यात्रा का लखनऊ में समापन भी 21 नवंबर से आगे बढ़ जाएगा। क्योंकि आडवाणी 20 नवंबर को दिल्ली में रैली से यात्रा समाप्त करेंगे। पार्टी दिल्ली व लखनऊ की रैली में भी कुछ दिनों का अंतर रखेगी। तय कार्यक्रम के अनुसार प्रदेश की दोनों जन स्वाभिमान यात्राएं 13 अक्टूबर को शुरू होगी। एक यात्रा पूर्व में काशी के भारत माता मंदिर से निकलेगी, जबकि दूसरी पश्चिम में मथुरा में दीनदयाल उपाध्याय धाम से शुरू होगी। काशी से शुरू होने वाली यात्रा प्रदेश के 28 जिलों व लगभग 150 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरेगी, जबकि मथुरा से प्रारंभ होने वाली यात्रा लगभग 36 जिलों व 170 विधानसभाओं से गुजरेगी

Saturday, July 16, 2011

आतंकियों जैसा काम तो राज ठाकरे भी कर रहे हैं : बसपा


बहुजन समाज पार्टी ने महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे द्वारा उत्तर भारतीयों के संबंध में दिए गए बयान की निंदा करते हुए कहा कि राज ठाकरे भी तो आतंकियों जैसा ही कार्य कर रहे है। बसपा प्रवक्ता ने शुक्रवार को यहां जारी बयान में कहा कि जहां आतंकवादी सिलसिलेवार बम विस्फोट का सहारा लेकर देश की एकता एवं अखंडता को क्षति पहंुचाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं राज ठाकरे देश की संवैधानिक व्यवस्था, एकता एवं अखंडता को चोट पहुंचाने के लिए अपने गैर जिम्मेदाराना बयान का सहारा ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज ठाकरे को समझना चाहिए कि इस प्रकार के बयान से आतंकवादी व अन्य विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा मिलेगा। प्रवक्ता ने कहा कि राज को मालूम होना चाहिए कि यदि आज मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी माना जाता है तो इसके पीछे उत्तर प्रदेश व बिहार के लाखों कामगारों का भी महत्वपूर्ण योगदान है। प्रवक्ता ने कहा कि राज को यह भी नही भूलना चाहिए कि मुंबई में उत्पादित वस्तुओं की खपत उत्तर भारत सहित पूरे देश के करोड़ों उपभोक्ताओं द्वारा की जाती है और यही तथ्य मुंबई की आर्थिक खुशहाली का प्रमुख आधार है, इसलिए मनसे नेता को गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी करने से पहले तथ्यों की समग्र जानकारी अवश्य कर लेनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि संविधान में देश के प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी राज्य में जाकर रोजी रोटी कमाने व बसने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति से संबंधित हो अथवा किसी भी प्रदेश का निवासी हो। मुंबई भारत का ही अंग है, इसके लिए कोई अलग संविधान नही है, जिसके अनुसार वहां देश के दूसरे राज्यों के लोग जाकर रोजी रोटी न कमाएं और वहां जाकर न बस सकें।

राहुल के ही शब्द दोहरा रही कांग्रेस


कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने शत-प्रतिशत आतंकी हमलों को रोकना मुश्किल क्या बताया कि पूरी कांग्रेस अब यही लाइन दोहरा रही है। इस मुद्दे पर भड़के विपक्ष पर उल्टे हमलावर रुख अपनाते हुए कांग्रेस राहुल गांधी के साथ गृहमंत्री पी. चिदंबरम और आतंकी धमाकों के वक्त फैशन शो में मौजूद एक और केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के बचाव में खुलकर सामने आ गई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने भी शुक्रवार को कहा कि पूरी चौकसी बरतने के बावजूद आतंकी हमले पूरी तरह रोकना मुश्किल है। वहीं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने राहुल के बयान पर विपक्ष के हमलों को निंदनीय करार दिया। विपक्ष की तरफ से इसे मुद्दा बनाए जाने पर कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य और महाराष्ट्र के राजनीतिक मामलों के प्रभारी मोहन प्रकाश ने तीखे अंदाज में कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील मसले पर विपक्ष को छींटाकशी और राजनीति से बचना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने चिदंबरम का इस्तीफा मांग रही भाजपा पर उल्टे सवाल दाग दिए। शकील ने पूछा कि क्या जब अक्षरधाम, कंधार या संसद पर हमला हुआ तो भाजपा ने तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से इस्तीफा मांगा था। उल्टे उन्हें उप प्रधानमंत्री बना दिया और बाद में प्रधानमंत्री पद का दावेदार। शकील ने दावा किया कि संप्रग के कार्यकाल में आतंकी घटनाओं में काफी कमी आई है। राजग के कार्यकाल में आतंकी घटनाएं ज्यादा हुई थीं इसलिए विपक्ष को कुछ भी सोच-समझकर बोलना चाहिए। मुंबई धमाकों के समय केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय के एक फैशन शो में होने पर शकील अहमद ने कहा, यह देखना चाहिए कि जब वह समारोह में थे तो उन्हें इस घटना की जानकारी थी या नहीं।


भूल थी राकांपा को गृह मंत्रालय देना : चह्वाण


महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के मुंह से शुक्रवार को राज्य का गृह मंत्रालय अपने पास न होने की कसक निकल ही गई। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय राकांपा को देना बड़ी भूल थी। हालांकि मामला तूल पकड़ता, उससे पहले ही गृहमंत्री आरआर पाटिल की तारीफ करते हुए मुख्यमंत्री अपनी बात से पीछे हट गए। दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी ने मोहन प्रकाश ने भी यह कहते हुए चह्वाण के बयान से किनारा कर लिया कि उन्हें मुख्यमंत्री के बयान की जानकारी नहीं है। दरअसल, मुख्यमंत्री ने एक टीवी चैनल को साक्षात्कार में कहा कि पहले गृह एवं वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय मुख्यमंत्री अथवा उनके दल के पास ही रखने की परंपरा थी, लेकिन शिवसेना-भाजपा की सरकार जाने के बाद जब 1999 में राज्य में कांग्रेस-राकांपा की सरकार बनी तो उसने भी शिवसेना-भाजपा वाला सूत्र अपनाते हुए ये दोनों महत्वपूर्ण मंत्रालय कांग्रेस ने अपने सहयोगी दल को दे दिए। मुख्यमंत्री के अनुसार इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए। चह्वाण के बयान के बाद यह खबर फैली कि मुंबई की कानून-व्यवस्था एवं यहां होने वाली आतंकी घटनाओं को देखते हुए मुख्यमंत्री गृह जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय राकांपा के पास होने से संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन इस खबर पर राकांपा की प्रतिक्रिया आती, उससे पहले ही मुख्यमंत्री ने एक बार फिर टीवी पर आकर गृह मंत्री पाटिल की बाकायदा तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने ये बातें मुंबई विस्फोटों के संदर्भ में नहीं कही थी। इसलिए इस प्रसंग को यहीं खत्म किया जाना चाहिए। चह्वाण भले ही सहयोगी दल के साथ रिश्ते मधुर रखने के लिए सफाई देते नजर आ रहे हों, लेकिन उनकी पहले व्यक्त की गई भावना को ही कांग्रेस की मूल भावना माना जा रहा है। 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेनेवाले अशोक चह्वाण भी कह चुके हैं कि गृह विभाग मुख्यमंत्री या उनके दल के पास रहने से राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखना ज्यादा आसान होता है।