जीवंत लोकतांत्रिक चुनाव सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लोकाचार से प्रभावित होता है। अपने देश में शुरुआती चुनावों में राजनीतिक स्वाधीनता के संघर्ष के प्रभाव में चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर होता था। सोशल इंजीनियरिंग जो अभी तक जारी है, बाद के दिनों में हावी हुई। आखिर में आर्थिक विकास का मुद्दा राष्ट्रीयता की भावना और सोशल इंजीनियरिंग पर भारी पड़ा। दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और हाल ही में बिहार में सत्ता विरोधी रुझानों को धता बताते हुए सत्तारूढ़ दलों की चुनावों में विजय से इस बात की पुष्टि होती है। अब मतदान केंद्र में जाकर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन का बटन दबाने वाले आम आदमी के लिए आर्थिक विपन्नता और असमानता पहले से कहीं अधिक मायने रखने लगी है। वह उस उम्मीदवार या पार्टी का चुनाव करता है जो उसके आर्थिक जीवन को बेहतर बना सकती है। कुछ अन्य राज्यों के साथ-साथ 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। एक बार फिर मतदाता अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करंेगे। वे क्या चुनते हैं, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसकी प्रबल संभावना है कि उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षो के दौरान विकास या विकासहीनता का मुद्दा आत्मघोषित सामाजिक इंजीनियरिंग के मुद्दे पर भारी पड़ेगा। उत्तर प्रदेश की जीडीपी वृद्धि दर पर गौर करें तो पता चलता है कि यह राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश पिछले दस वर्षो के दौरान किसी भी वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर के मामले में शीर्ष तीन राज्यों की सूची में शामिल नहीं रहा है। भारत और उत्तर प्रदेश की जीडीपी वृद्धि दर में दो से तीन प्रतिशत का अंतर पिछले पांच वर्षो में देखने को मिल रहा है। अगर इसमें नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद का अंशदान घटा दें तो यह अंतर और भी अधिक हो जाएगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तहत आने वाले इन इलाकों के विकास का अधिक लाभ उत्तर प्रदेश के निवासियों के बजाय दिल्लीवासियों को मिला है। उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी का औसत पांच प्रतिशत से भी कम है, जबकि भारत का औसत करीब 7.5 फीसदी है। इससे पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के लोगों की आर्थिक स्थिति अन्य राज्यों के निवासियों के मुकाबले खराब है। वास्तव में, उत्तर प्रदेश की विकास दर भारत की विकास दर की तुलना में गिर रही है। आर्थिक विकास को बहुत से पहलू प्रभावित करते हैं। हालांकि इनमें से चार पहलू ऐसे हैं जिनका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। ये हैं-मानव पूंजी की गुणवत्ता, निजी निवेश की मात्रा, ढांचागत सुविधाओं की गुणवत्ता व विस्तार तथा सामाजिक व्यवस्था। राजनीतिक स्वतंत्रता के समय और उसके दो दशक बाद तक उत्तर प्रदेश में अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक प्रतिष्ठित शैक्षिक, तकनीकी और प्रोफेशनल संस्थान थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, आइआइटी कानपुर, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ ऐसे ही कुछ नाम हैं, जिनकी चमक देश के अन्य संस्थानों से कहीं अधिक थी। पूरे देश से छात्र उत्तर प्रदेश में पढ़ने के लिए आते थे। आज आर्थिक रूप से समर्थ राज्य से बाहर के लोग आइआइटी कानपुर को छोड़कर उत्तर प्रदेश के किसी शिक्षण संस्थान में अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना पसंद नहीं करते। यही नहीं, उत्तर प्रदेश काम करने के लिहाज से भी सबसे घटिया राज्यों में शामिल है। उत्तर प्रदेश में निवेश की दर भी तेजी से गिर रही है। एक समय भारत के पांच शीर्ष औद्योगिक शहरों में शामिल कानपुर आज एक मृत शहर सा नजर आता है। आगरा, इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी जैसे सुप्रसिद्ध शहरों में बहुत कम आधुनिक औद्योगिक और व्यावसायिक इकाइयां लग रही हैं। निवेश के निचले स्तर के कारणों का अनुमान लगाना कठिन नहीं है। उत्तर प्रदेश में ढांचागत सुविधाओं, चाहे वे भौतिक हों या सामाजिक, की दशा दयनीय है। सड़कें गड्ढों से भरी हैं, ट्रेनें जगह-जगह रुक-रुक कर चलती हैं और हवाई अड्डे बहुत कम और बदतर हैं। स्वास्थ्य, स्वच्छता सुविधाएं और पानी की आपूर्ति बदहाल है और नागरिक जीवन की गुणवत्ता अफ्रीका के पिछड़े हुए देशों से भी गई-बीती है। प्रशासन का आकार तो विशाल है, किंतु इसमें सक्षमता नहीं है। यह अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता। पारिस्थितिक तंत्र हितकारी नहीं है। सुधार की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देतीं। यहां योजनाओं की घोषणाओं पर जोर है, न कि उनके क्रियान्वयन पर। सामाजिक व्यवस्था, जिसके दायरे में जान-माल व स्वतंत्रता की सुरक्षा, नागरिकों में आपसी सौहार्द्र, आर्थिक अवसरों की संभावना और बिना परेशानी के कामकाज की सुविधा शामिल हैं, भी निराश-हताश करती है। यहां तक कि बिहार, जहां कभी जंगल राज बताया जाता था, बहुत तेजी से तरक्की की सीढि़यां चढ़ रहा है। उत्तर प्रदेश में सामाजिक व राजनीतिक हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। अक्सर यहां काम देरी से होता है या फिर होता ही नहीं। काम में न केवल देरी होती है, बल्कि वे होते भी नहीं हैं। विडंबना यह है कि इसके बारे में कहीं कोई चिंता नहीं दिखाई देती। लोगों को सुविधाओं से वंचित करने के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन भी सुनाई नहीं देते। कुल मिलाकर यहां के समाज में मायूसी और विषाद घर कर चुका है। गरीबी में जीवनयापन कर रहे लोगों का असंतोष और विरोध समझ में आता है। इसकी प्रतिक्रिया होनी ही है। एक खामोश क्रांति वातावरण में फैल सकती है। विधायिका और राजनीतिक कार्यपालिका में जगह बनाने के दावेदार लोग यदि आर्थिक खुशहाली को अपना घोषणापत्र बनाएं तो वे अपना भला कर सकते हैं। खोखले वायदे अब काम नहीं आने वाले। वितरण प्रणाली में सुधार और जवाबदेही के ढांचे को मजबूत बनाने के तौर-तरीके भी एजेंडे में शामिल होने चाहिए। राजनीतिक दल अपने चुनावी कौशल और नारेबाजी की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक समीकरणों के सहारे सफल होने की कोशिश करेंगे। इसके बजाय उन्हें जमीन पर कान लगाकर फुसफुसाहट सुननी चाहिए, जमीनी सच्चाई का सामना करना चाहिए और उन्हें मुद्दों का रूप देकर अपने समाधान के साथ मतदाताओं के पास जाना चाहिए। जो लोग सकारात्मक सोच के साथ ऐसा करेंगे उनके जीतने की संभावना अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक होगी। समय तेजी से भाग रहा है। उम्मीदवारों को तेजी से कार्य करना चाहिए और उस राह पर अपने कदम बढ़ाने चाहिए जहां से अभी तक कम लोग गुजरे हैं। (लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष हैं
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Wednesday, September 21, 2011
मुंडा को सुरक्षा में कोताही बर्दाश्त नहीं
रांची मुख्यमंत्री द्वारा सचिवालय में गृह विभाग की आननफानन में बुलाई गई बैठक में पुलिस अधिकारियों की खूब क्लास लगी। मुख्यमंत्री ने जहां जिलों से मासिक रिपोर्ट मुख्यालय को नहीं मिलने पर नाराजगी जताई वहीं अफसरों को स्पष्ट हिदायत दी कि इसमें कोई कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने इसे अनुशासनहीनता करार देते हुए कहा कि शिथिलता और लापरवाही करने वाले अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने बैठक में निर्देश दिया कि भूमि हड़पने, एससी-एसटी से जुड़े मामलों, महिला और बाल अत्याचार से जुड़े मुकदमे जल्द निपटाने की जरूरत है। मुख्यालय से इसकी समय-समय पर मानीटरिंग आवश्यक है। मुख्यमंत्री ने संगठित गिरोहों पर धावा बोलने का आदेश देते हुए कहा कि एक अभियान चलाकर इनका खात्मा करें। मुख्यमंत्री का दबाव इस बात को लेकर था कि कार्यकुशल सिपाहियों को प्रशिक्षित करें ताकि आम आदमी को यह अहसास रहे कि पुलिस उनकी सुरक्षा में हमेशा तत्पर है। मुंडा ने बताया कि उन्होंने अपने स्तर से केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र भेजकर अनुरोध किया है कि सक्षम पुलिसकर्मियों को मेरू स्थित बीएसएफ कैंप में प्रशिक्षण दिया जाए
मोदी जैसों का कद बढ़ना शुभ संकेत नहीं
नई दिल्ली गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिन के सद्भावना उपवास के फायदों को लेकर भाजपा गदगद हो सकती है, लेकिन कांग्रेस ने इसे बीते दस साल में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखंड करार दिया है। पार्टी ने यहां तक कह दिया कि है कि चूंकि मोदी देश की सामाजिक बनावट और समन्वित स्वरूप को ही नहीं स्वीकारते, लिहाजा उनके जैसे नेताओं का कद बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। कांग्रेस महासचिव एवं मीडिया विभाग के चेयरमैन जनार्दन द्विवेदी ने पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहा, मोदी का उपवास भाजपा एवं राजग का सिरदर्द है। उससे संप्रग पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भाजपा की ओर से मोदी को भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने से धर्मनिरपेक्ष और गैर धर्मनिरपेक्ष लोगों के ध्रुवीकरण के मद्देनजर क्या कांग्रेस खुश है? द्विवेदी ने कहा, बिल्कुल नहीं। मोदी जैसों का कद बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। लिहाजा कांग्रेस के प्रसन्न होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। उपवास पर राजग के घटक दलों के अलग-अलग बयानों पर उन्होंने कहा, अगर उसमें जदयू और शिवसेना नहीं शामिल हुईं, तो राजग है कहां? दरअसल भाजपा के प्रमुख नेता अपने-अपने प्रभुत्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आडवाणी की रथयात्रा हो या फिर भाजपा अध्यक्ष के पैंतरे, यह सब उसी का हिस्सा है। उसी क्रम में मोदी भाजपा पर प्रभुत्व के लिए उपवास का नाटक कर रहे थे। इसमें कोई ताज्जुब नहीं है। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि उपवास पर बैठे नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि ठीक करने के प्रयास में चाहे जो कहा हो, समाज का कोई भी समुदाय यह नहीं मान सकता कि वह अंतरात्मा से जाति और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ हैं। भाजपा में कुछ लोग मोदी के बिना राजनीति की कल्पना नहीं कर सकते। मोदी का ढोल बजाना उन लोगों की मजबूरी है। दरअसल जिस तरह भाजपा कर्नाटक में मजबूर थी, कुछ मामलों में गुजरात में भी उसकी वही स्थिति है
वाघेला-मोदी अब जनता के बीच दिखाएंगे दम
अहमदाबाद गुजरात में उपवास से शुरू हुई सियासत थमने का नाम नहीं ले रही है। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सत्याग्रह पर बैठे शंकर सिंह वाघेला ने मंगलवार को अनशन समाप्त कर दिया, लेकिन अब दोनों दिग्गज जनता दरबार तक अपनी बात पहुंचाने का खम ठोक रहे हैं। आसाराम आश्रम में संदिग्ध हालत में मारे गए दो मासूम बच्चों के माता-पिता भी आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। आरोप है कि लालकृष्ण आडवाणी को पीएम बनाने के लिए उनके बच्चों की बलि दी गई। गुजरात दंगा मामले में देश की सर्वोच्च अदालत के ताजा फैसले के बाद गुजरात सरकार की ओर से सद्भावना मिशन शुरू किया गया जिसके तहत मुख्यमंत्री मोदी ने तीन दिन का सार्वजनिक उपवास रखा। मोदी के इस हाइप्रोफाइल फाइव स्टार उपवास की गूंज प्रदेश की राजनीति में भी अभी भी सुनाई दे रही है। मोदी के उपवास का खर्च विपक्ष के हर बयान के बाद बढता गया, पहले पांच करोड़, फिर चालीस, पचास व 55 करोड़ तथा मंगलवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोढवादिया ने मोदी पर उपवास के नाम पर दो सौ करोड़ रुपये खर्च करने का आरोप जड़ दिया। गांधी आश्रम के सामने उपवास पर बैठे कांग्रेसी दिग्गज वाघेला ने एलान कर दिया है कि अब सरकार के साथ उनकी लड़ाई जनता दरबार में होगी। कांग्रेस की ओर से पूर्व निर्धारित 28 सितंबर को कच्छ तथा 30 सितंबर को पालनपुर में रैली के लिए कार्यकर्ताओं को कमर कसने का एलान भी कर दिया है। वाघेला तथा कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया ने मंगलवार को उपवास समाप्त करने के साथ ही सरकार के साथ युद्ध का भी एलान कर दिया है। वाघेला ने मोदी के उपवास को उपहास बताते हुए कहा कि उन्होंने जनता को सरकार की सगाई बताने के लिए ही यह अनशन किया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी को लपेटते हुए वाघेला ने कहा कि उपवास को उत्सव की तरह मनाने के लिए शर्म आनी चाहिए थी। वाघेला ने यह भी आरोप लगाया कि मोदी के उपवास में लोगों को पकड़कर लाया गया जबकि उनके सत्याग्रह में सरकार से परेशान लोग स्वयंभू जुटे। वाघेला ने मोदी पर खुद की मार्केटिंग करने का आरोप लगाते हुए कहा कि आदिवासी इलाकों में लोग भूख के मारे पत्ते खाने को मजबूर हैं और सरकार गरीबों का धन बर्बाद कर रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं गुजरात कांग्रेस प्रभारी मोहनप्रकाश ने यहां तक कहा कि मोदी ने कॉरपोरेट दलालों को एकत्र कर पांच सितारा अनशन किया है। सरकार व उद्योगपति मिलकर जनता का धन लूट रहे हैं, मोदी में वास्तव में सद्भावना होती तो दंगा पीडि़तों के घर जाते अथवा हरेन पंड्या के परिजनों से मिलकर उनके दुख में भागीदार बनते। मोहनजी ने मोदी पर राजग तथा भाजपा की सद्भावना बिगाड़ने का आरोप लगाते हुए कहा कि यहां आए भाजपा नेता ऊपर से भले हंस रहे हों, लेकिन भीतर उनकी आत्मा रो रही थी। संघ विचारधारा पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि इन्होंने पहले गांधीजी को मारा तथा अब गुजरात में उनकी विचारधारा को खत्म कर रहे हैं। उधर, नेता विपक्ष शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि मोदी को पीएम के लिए प्रोजेक्ट करना था तो उपवास का खर्च भाजपा को उठाना चाहिए था। गोहिल ने भाजपा सांसद नवजोत सिंह सिद्धू को एक कॉमेडियन बताते हुए कहा कि उपवास स्थल से जब सिद्धू गुजरात का अपमान कर रहे थे तब उनको रोकने कोई आगे क्यों नहीं आया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोढवाडिया ने भी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी पर हमला बोला और कहा कि उनके गांधीनगर से चुने जाने पर शर्म आती है। मोदी ने 72 घंटे का अनशन का एलान कर 56 घंटे में ही तोड़। अब बाकी का उपवास आडवाणी को करना चाहिए। साथ ही मोढवाडिया ने मोदी के उपवास पर हुए खर्च पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब उनके भूखे रहने का खर्च दो सौ करोड़ आता है तो खाने का खर्च क्या आएगा
कलराज और केशरी को पागलखाने भेजें: कल्याण
बुलंदशहर कल्याण सिंह ने भाजपा से दोस्ती के सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया है। भाजपा को मरा सांप बता चुके सिंह ने मंगलवार को वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी पर सीधा हमला बोला और कहा, वह श्रीराम को भूलकर जय जिन्ना गाते हैं, ऐसे विश्वासघाती के बारे में लोग सब कुछ जानते हैं। इतना ही नहीं, कलराज मिश्र और केशरीनाथ त्रिपाठी को मानसिक रोगी बताते हुए पागलखाने भेजने की सलाह तक दे डाली। जनक्रांति पार्टी के संरक्षक कल्याण सिंह ने यहां पत्रकारों से बातचीत के दौरान आडवाणी की रथ यात्रा पर टिप्पणी करते हुए कहा, जो लोग श्रीराम को भूलकर जय जिन्ना गाते हैं, ऐसे विश्वासघाती के बारे में लोग सब कुछ जानते हैं। उन्होंने कलराज मिश्र और केशरी नाथ त्रिपाठी को मानसिक रोगी बताते हुए पागलखाने भेजने की जरूरत बताई। साथ ही कहा, कलराज आज तक कोई चुनाव नहीं लड़े, सभासद भी निर्वाचित नहीं हो सकते, पर भाजपा की चुनावी जीत का नक्शा तैयार कर रहे हैं। केशरी नाथ के पास भी कोई राजनीतिक दृष्टि नहीं है और वह यूपी विजन 2012 बना रहे हैं। उन्होंने भाजपा नेता व पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह को भी निशाने पर लेते हुए कहा, वह पूर्ववर्ती रिकार्ड को खराब नहीं करेंगे। जब मैं भाजपा छोड़कर आया था तो सूबे में भाजपा के 176 विधायक थे। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में 88 विधायक रह गए, अब 44 विधायक बचे हैं। कल्याण सिंह ने नरेन्द्र मोदी के उपवास को राजनैतिक ड्रामा बताया और कहा, मोदी को पीएम के रूप में प्रस्तुत करने से मुसलमान एकजुट होकर भाजपा को हराने का कार्य करेंगे और एनडीए टूट जाएगा
Tuesday, September 20, 2011
भरतपुर हिंसा पर सेंकी जाने लगीं राजनीति की रोटियां
जयपुर बीमारी के बाद आराम कर रहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राजस्थान के हालात को लेकर चिंतित हैं। सोनिया गांधी ने भरतपुर के गोपालगढ़ में दो समुदायों के बीच हुई हिंसा और पुलिस फायरिंग में एक समुदाय विशेष के आठ लोगों के मारे जाने की घटना पर नाराजगी जताई है। कांग्रेस आलाकमान का मानना है कि जिस समुदाय के लोग मारे गए है उसका हरियाणा, राजस्थान में बड़ा वोट बैंक है। सूत्रों के मुताबिक सोनिया ने माना है कि मौजूदा हालात में यह घटना पार्टी के लिए ठीक नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष की चिंता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पार्टी के चार सांसदों की एक टीम को सोमवार को गोपालगढ़ भेजी। इनमें विजय बहुगुणा, रशीद अल्वी, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, विप्लव ठाकुर शामिल थे। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. ंद्रभान भी सांसदों के साथ रहे। आलाकमान की चिंता को देखते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अचानक शनिवार को दिल्ली गए और कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल, महासचिव जनार्दन द्विवेदी एवं मुकुल वासनिक से मुलाकात कर गोपालगढ़ मामले से उन्हें अवगत कराया। इससे पहले सोनिया के निर्देश पर रविवार को केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने गोपालगढ़ का दौरा कर लोगों से मुलाकात की। उन्होंने भरतपुर जिला अस्पताल जाकर घायलों से मुलाकात की। जितेंद्र सिंह ने आज जयपुर में प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय पहुंचकर अध्यक्ष डॉ. चंद्रभान के साथ लंबी बैठक की। बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में चन्द्रभान ने माना कि इस घटना में पुलिस प्रशासन की कमी रही है। गोपालगढ़ की घटना में मारे गए आठ लोगों से दो के शवों का ही अभी पोस्टमार्टम हुआ है। छह शवों का पोस्टमार्टम होना बाकी है। इन छह शवों को भरतपुर के सरकारी अस्पताल में मोर्चरी में रखा गया है। गोपालगढ़ में तनाव और भय के चलते लोगों का पलायन जारी है। यही वजह है कि कई बस्तियां खाली हो गई हैं। गलियों में सन्नाटा और मकानों पर ताले लटके हुए हैं। इस बीच कस्बे के व्यापारी दुकानें खोलने को तैयार नहीं हैं। उन्हें व्यापार से पहले सुरक्षा की गारंटी चाहिए। इस संबंध में क्षेत्र के लोगों को अधिकारियों को ज्ञापन भी दिया। गौरतलब है कि पिछले बुधवार को गोपालगढ़ में दो समुदायों के बीच हुए विवाद में पुलिस फायरिंग और आपसी हिंसा में आठ लोगों की मौत हो गई थी
वोट बैंक के लिए माया की पीएम को तीसरी चिट्ठी
लखनऊ मुसलमानों और गरीब सवर्णो को आरक्षण की मांग करने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लगातार तीसरे दिन चिट्ठी लिखी। तीसरे पत्र में माया ने प्रधानमंत्री से जाटों को अन्य पिछड़े वगरें की केन्द्रीय सूची में शामिल करने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को भेज गये एक पत्र के जरिए प्रदेश के अन्य पिछड़े वगरें के उत्थान के सम्बन्ध में अपनी सरकार की प्रतिबद्धताओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट किया है। गौरतलब है कि शनिवार को मायावती ने आबादी के हिसाब से मुसलमानों को और रविवार को गरीब सवर्णो को आरक्षण देने की बात कर चुकी हैं। प्रधानमंत्री को लिखे तीसरे खत में मुख्यमंत्री ने जाटों के वोट बैंक को देखते हुए उनको केंद्र सरकार के अन्य पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल करने की मांग की है। मालूम हो कि जाट इस मांग को लेकर सोमवार को भेजे गये अपने पत्र में मुख्यमंत्री ने लिखा है कि जाट जाति के व्यक्ति मुख्यत: कृषि एवं कृषि सम्बन्धित अन्य कायरें से जीविकोपार्जन करते हैं। प्रत्येक परिवार के लिए कृषि योग्य भूमि के कम हो जाने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, इसके अतिरिक्त जाट जाति के व्यक्ति शैक्षणिक रूप से भी पिछड़े हुए हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा 10 मार्च, 2000 द्वारा प्रदेश के अन्य पिछड़े वगरें की सूची में जाट जाति को सम्मिलित किया गया है। सरकारी प्रवक्ता के मुताबिक मुख्यमंत्री का दृढ़ अभिमत है कि जाट समुदाय की स्थिति में यदि परिवर्तन लाना है तो उन्हें शिक्षा, सेवायोजन तथा जीवन के अन्य सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए अवसरों में वृद्धि सुलभ कराये जाने की नितान्त आवश्यकता है, जिस पर उनकी सरकार पूर्ण सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा है कि राजस्थान के जाट समुदाय को (धौलपुर एवं भरतपुर जिला को छोड़कर) 1999 में केंद्र के अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है। राजस्थान उत्तर प्रदेश से सटा हुआ राज्य है और वहां के जाट और उप्र के जाट की सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति लगभग एक जैसी है। इस आधार पर उत्तर प्रदेश की जाट जाति को भी केंद्र सरकार की अन्य पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल किया जाना चाहिए
मोदी को मिले समर्थन की तासीर परखने में जुटा संघ
नई दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सद्भावना उपवास को मिले समर्थन की तासीर परखने में जुटा गया है। यह पहला मौका है जब मोदी के किसी कार्यक्रम को इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक समर्थन मिला है। हालांकि आम चुनाव दूर होने से वह अभी से किसी एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन संभावित नामों को लेकर उसके अंदरूनी आकलन जारी है। उसके इस चिंतन में भाजपा के मौजूदा केंद्रीय नेताओं के अलावा नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल है। संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी का कहना है कि मोदी भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता पहले से ही हैं। इसके लिए उनको कुछ साबित करने की जरूरत नहीं है। उनके इस उपवास को जिस तरह देश भर का समर्थन मिला, वह काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल बीते एक दशक में मोदी संघ के प्रखर हिंदुत्व के एक प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में मोदी के उपवास में राजग के बाहर के दलों के समर्थन को संघ भावी राजनीति की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता है। इस समर्थन की राजनीतिक तासीर कितनी है, इसका आकलन मोदी की भविष्य की राह भी तय करेगा। चूंकि चुनाव अभी काफी दूर हैं इसलिए न तो संघ और न ही भाजपा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के बारे में अपने पत्ते खोलना चाहती है। भाजपा में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर संघ पहले ही अपनी राय साफ कर चुका है। उज्जैन की समन्वय बैठक में संघ नेतृत्व ने भाजपा नेताओं को स्पष्ट कर दिया था कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी किसी को प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं करे। आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा का विरोध भी उसने इसलिए किया था, क्योंकि इससे उनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की अटकलें लगनी लगी थी। जहां तक बात नरेंद्र मोदी की है, तो वह संघ की तरफ से इस पद के लिए एक पसंद पहले से रहे हैं। चूंकि भाजपा के साथ राजग के सहयोगी दल भी है, इसलिए किसी भी नाम पर सहमति बनाने के लिए उनकी भी पसंद देखी जाएगी
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