| देश के 14वें राष्ट्रपति चुने गए प्रणब मुखर्जी केवल अनुभव में ही वरिष्ठ नहीं हैं बल्कि केआर नारायणन और आर वेंकटरामण के बाद वह इस पद पर काबिज होने वाले तीसरे सबसे अधिक उम्र के व्यक्ति हैं। राष्ट्रपति चुने जाते समय प्रणब की आयु 76 वर्ष आठ महीने है। सबसे अधिक अंतर से जीत का रिकार्ड दर्ज करने वाले केआर नारायण की आयु 1997 में राष्ट्रपति चुने जाने के समय 76 वर्ष नौ महीने थी। आर वेंकट रमन की आयु 1987 में राष्ट्रपति चुने जाने के समय 76 वर्ष आठ महीने थी। वेंकटरमन का जन्म चार दिसम्बर, 1910 को और प्रणब दा का जन्म 11 दिसम्बर, 1935 को हुआ। इस प्रकार राष्ट्रपति चुने जाने के समय वेंकटरमण उम्र के मामले में प्रणब से छह दिन बड़े हैं। राष्ट्रपति पद के लिए दो मई, 1952 को हुए पहले चुनाव के समय डा. राजेन्द्र प्रसाद की आयु 63 वर्ष थी जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी टी शाह की उम्र 65 वर्ष थी। छह मई, 1957 को राष्ट्रपति पद के दूसरे चुनाव में डा. राजेन्द्र प्रसाद पुन: विजयी रहे, उस समय उनकी उम्र 70 वर्ष थी। इसके बाद 1962 में राष्ट्रपति बनने वाले डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की आयु 73 वर्ष थी। 1967 के चुनाव में जाकिर हुसैन की आयु 70 वर्ष थी। वहीं वीवी गिरि जब 1969 में नीलम संजीव रेड्डी को पराजित कर राष्ट्रपति बने तब उनकी आयु 75 वर्ष थी जबकि फखरूद्दीन अली अहमद जब 1974 में राष्ट्रपति चुने गए तब उनकी आयु 69 वर्ष थी। 1977 में नीलम संजीव रेड्डी सर्वसम्मति से राष्ट्रपति चुने गए तब उनकी आयु 64 वर्ष थी। इसके पश्चात 12 जुलाई, 1982 को हुए चुनाव के समय ज्ञानी जैल सिंह 66 वर्ष के थे। इसके अगले चुनाव में 1992 में राष्ट्रपति चुने गए डा. शंकर दयाल शर्मा की आयु 74 वर्ष थी। 15 जुलाई, 2002 के चुनाव में राष्ट्रपति चुने गए एपीजे अब्दुल कलाम की आयु 71 वर्ष थी। प्रतिभा पाटिल जब साल 2007 में जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं तब उनकी आयु 72 वर्ष थी। |
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Monday, July 23, 2012
तीसरे सबसे अधिक उम्र के राष्ट्रपति बने प्रणब दा
नहीं टूट पाया रिकार्ड
राष्ट्रपति पद के चुनाव में प्रणब मुखर्जी ने 3,97,776 मतों के अंतर से जबर्दस्त जीत दर्ज की। हालांकि वह सबसे अधिक नौ लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से राष्ट्रपति चुने जाने के केआर नारायणन के रिकार्ड को नहीं तोड़ सके। राष्ट्रपति पद के लिए दो मई 1952 को हुए पहले चुनाव में डा. राजेन्द्र प्रसाद ने 5,07,400 मत प्राप्त कर जीत दर्ज की। चुनाव में टी शाह को 92, 827 मत मिले । राजेन्द्र प्रसाद 4,14,573 मतोें से विजयी हुए थे। छह मई 1957 को राष्ट्रपति पद के दूसरे चुनाव में 4,59,698 मत प्राप्त कर डा. राजेन्द्र प्रसाद पुन: विजयी रहे। राजेन्द्र प्रसाद करीब साढ़े चार लाख मतों से विजयी हुए। इसके बाद 1962 के राष्ट्रपति चुनाव में 5,53,067 मत प्राप्त कर डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन 5.47 लाख मतों से विजयी हुए। 1967 के चुनाव में जाकिर हुसैन को 4,71,244 मत प्राप्त हुए जबकि के सुब्बाराव को 3,63,971 मत मिले। जाकिर हुसैन 1,07,273 मतों से विजयी रहे। गिरि ने 1969 में नीलम संजीव रेड्डी को दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर 14,650 मतों के अंतर से हराया था जबकि 1997 में केआर नारायणन ने टीएन शेषन को नौ लाख से अधिक मतों से पराजित किया था। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने प्रेस से कहा कि संविधान में राष्ट्रपति के चुनाव के संदर्भ में ऐसा प्रावधान है कि बहुमत के लिए जरूरी मत प्राप्त नहीं होने पर दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर निर्णय होता है। उन्होंने कहा कि 1969 में वीवी गिरि दूसरी वरीयता के मतों के आधार पर ही चुनाव जीत पाए थे। उस चुनाव में प्रथम वरीयता के मतों की गिनती के बाद किसी को बहुमत नहीं मिला। गिरि 14,650 मतों से विजयी हुए। फखरुद्दीन अली अहमद ने 1974 के चुनाव में 7,54,113 मत प्राप्त किए जबकि त्रिदिब चटर्जी को 1,89,196 मत मिले। अहमद 5.64 लाख मतों से विजयी रहे। इसके पश्चात 12 जुलाई 1982 को हुए चुनाव में ज्ञानी जैल सिंह 7,54,113 मत प्राप्त करके 4.71 लाख मतों के अंतर से जीते। उनके प्रतिद्वन्द्वी एचआर खन्ना को 2,82,685 मत मिले थे। आर वेंकट रमन 1987 में 7,40,148 मत प्राप्त करके 4.58 लाख मतों से विजयी रहे। उस चुनाव में वीआर कृष्णा अय्यर को 2,81,550 मत मिले। इसके अगले चुनाव में डा शंकर दयाल शर्मा ने 6,75,864 मत हासिल करके जीजी स्वेल को 3.29 लाख मतों से हराया। सबसे अधिक अंतर से जीत का रिकार्ड दर्ज करने वाले केआर नारायणन ने 1997 के चुनाव में 9,56,290 मत प्राप्त किए जबकि टीएन शेषन को महज 50,631 मत मिले। 15 जुलाई 2002 को चुनाव में एपीजे अब्दुल कलाम को 9,22,884 मत मिले जबकि लक्ष्मी सहगल को 1,07,366 मत प्राप्त हुए। कलाम 8.15 लाख मतों से चुनाव जीते। प्रतिभा पाटिल 2007 में 6,38,116 मत हासिल करते हुए भैरो सिंह शेखावत को तीन लाख से अधिक मतों से हरा कर देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं।
प्रणब मुखर्जी बने महामहिम
संप्रग उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी भारी बहुमत से देश के 13वें राष्ट्रपति चुन लिए गए। उन्होंने राजग प्रत्याशी पीए संगमा को करीब चार लाख वोटों से हराकर रायसीना हिल्स का सफर पूरा किया। करीब 70 फीसदी वोट लेकर विजयी रहे प्रणब 25 जुलाई को सुबह 11.30 बजे राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। पहले बंगाली राष्ट्रपति बनने का गौरव पाने वाले मुखर्जी के पक्ष में विपक्षी गठबंधन पहले ही खुलकर आ गए थे। कर्नाटक समेत कुछ राज्यों में क्रास वोटिंग ने उनकी जीत का अंतर बढ़ा दिया। संप्रग सरकार में संकटमोचक की भूमिका में रहे प्रणब की जीत के बाद पहली प्रतिक्रिया थी, इस चुनाव में आम चुनाव जैसा माहौल था। मैं उन लोगों का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने पार्टी लाइन से आगे बढ़कर मेरा समर्थन किया। अपने पांच दशक के सार्वजनिक जीवन में सहयोग के लिए उन्होंने सभी लोगों का धन्यवाद देते हुए वादा किया कि बतौर राष्ट्रपति संविधान का संरक्षक होने के नाते वह अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह पूरी ईमानदारी और विनम्रता से करेंगे। जीत से भावुक प्रणब ने कहा कि उन्होंने जितना राजनीति को दिया, उससे कहीं ज्यादा उन्हें मिला। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार समेत तमाम नेताओं का प्रणब के घर बधाई देने के लिए तांता लगा रहा। 19 जुलाई को हुए मतदान में 776 सांसदों में 748 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इनमें प्रणब को 527 और संगमा को 206 मत मिले। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सहित 15 सांसदों के मत खारिज कर दिए गए। राज्यों में भी गुजरात, मप्र, तमिलनाडु, ओडिशा, पंजाब, हिमाचल और छत्तीसगढ़ को छोड़कर सभी सूबों में प्रणब ने संगमा को चारों खाने चित्त किया। भाजपा शासित कर्नाटक में भी संगमा की तुलना में प्रणब को ज्यादा वोट मिले। बिहार और झारखंड में तो खैर राजग के सहयोगी दल पहले ही प्रणब के पक्ष में थे, लिहाजा भाजपा गठबंधन वाले राज्यों में दादा ही जीते। जीत के लिए मुखर्जी को 5,25,140 का आंकड़ा पार करना था। संसद भवन में मतगणना के बाद प्रणब को 7.13 लाख से ज्यादा वोट मिले जबकि संगमा 3.16 लाख वोटों पर सिमट गए। मतगणना के दौरान प्रणब की तरफ से चिदंबरम, पवन बंसल, राजीव शुक्ला, नारायणसामी और पबन सिंह घटोवार जमे रहे। संगमा के प्रतिनिधि सत्यपाल जैन और भर्तृहरि महताब मौजूद रहे। प्रणब के पक्ष में माहौल शुरू से कुछ ऐसा था कि चुनाव और मतगणना सिर्फ औपचारिकता ही थी। तृणमूल के समर्थन के बाद कुछ बचा नहीं था। प्रणब को केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे सपा, बसपा, राजद, जद (एस) के अलावा राजग सहयोगियों झामुमो, जदयू और शिवसेना के साथ-साथ माकपा एवं फारवर्ड ब्लाक का भी समर्थन हासिल था। संगमा को भाजपा, अकाली दल, असम गण परिषद, अन्नाद्रमुक और बीजद ने समर्थन दिया था। भाकपा, तेदेपा और टीआरएस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
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