नई दिल्ली भाजपा आलाकमान के सख्त रवैये के चलते गुरुवार को ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हो गए बीएस येद्दयुरप्पा अब अपनी पसंद का उत्तराधिकारी तय होने तक इस्तीफा न देने पर अड़े हुए हैं। इसके लिए उनके समर्थकों ने केंद्रीय पर्यवेक्षकों, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह व राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के सामने ही मोर्चा खोल दिया है। लगभग 70 विधायकों व 14 सांसदों ने येद्दयुरप्पा को ही मुख्यमंत्री बरकरार रखने की मांग की। यह एक तरह से येद्दयुरप्पा का शक्ति प्रदर्शन था, जिससे वह राज्य में सत्ता परिवर्तन के सूत्र अपने हाथ में रखना चाहते हैं। येद्दयुरप्पा अपने उत्तराधिकारी के रूप में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सांसद सदानंद गौड़ा को लाना चाहते हैं। सबसे बड़ी समस्या येद्दयुरप्पा के इस्तीफा न देने से खड़ी हो रही है। जब तक वह इस्तीफा नहीं देते हैं पार्टी नया नेता नहीं चुन सकती है। दोपहर बाद जब राजनाथ सिंह व जेटली येद्दयुरप्पा से मिलने पहुंचे तो येद्दयुरप्पा ने उनके सामने ज्योतिषीय कारणों से 31 जुलाई तक इस्तीफा न देने की बात रखी। इसके चलते शाम को होने वाली विधायक दल की बैठक टालनी पड़ी। सूत्रों के अनुसार राज्य में नए घटनाक्रम में बेल्लारी के दोनों रेड्डी बंधु भी फिलहाल येद्दयुरप्पा के साथ खड़े हैं। भाजपा नेतृत्व को यह आशा कतई नहीं थी कि येद्दयुरप्पा के साथ इतना समर्थन जुड़ सकेगा। अब उसके सामने येद्दयुरप्पा की बात मानने की मजबूरी बढ़ गई है क्योंकि इस मोड़ पर वह सरकार गंवाने का खतरा भी नहीं उठा सकती है। दिन भर चली चर्चाओं के दौर में नए नेता के नाम पर भी फिलहाल कोई सहमति नहीं बन सकी है। येद्दयुरप्पा खेमे से सदानंद गौड़ा के अलावा वीएस आचार्य का नाम भी है। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व अनंत कुमार के साथ जगदीश शेट्टार, सुरेश कुमार व ईश्वरप्पा के साथ सभी नामों पर विधायकों को टटोलना चाहता है। येद्दयुरप्पा किसी को उप मुख्यमंत्री भी नहीं चाहते हैं। एक फार्मूले में वोकलिग्गा या ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनने के चलते सामाजिक समीकरण साधने के लिए लिंगायत समुदाय के जगदीश शेट्टार को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात भी आई थी। येद्दयुरप्पा चाहते हैं कि राज्य में मुख्यमंत्री तो उनकी पसंद का हो ही, प्रदेश संगठन भी उनके हाथ में रहे। इसके लिए वह प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं, लेकिन पार्टी उन्हें केंद्र में उपाध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में है। मालूम हो कि येद्दयुरप्पा ने बुधवार देर रात दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी व अन्य नेताओं के साथ बैठक में भी अडि़यल रवैया अपनाया था। अपना पक्ष रखने के लिए वह अपने साथ राज्य के महाधिवक्ता को भी साथ लाए। रात तीन बजे तक चली इस बैठक में महाधिवक्ता ने लोकायुक्त की रिपोर्ट को हाईकोर्ट में चुनौती देने व उसमें सरकार के साफ तौर पर बच निकलने को लेकर दलीलें भी दी थीं।
Saturday, July 30, 2011
Thursday, July 28, 2011
अय्यर ने कांग्रेस को सर्कस बताया
नई दिल्ली पहले से ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जूझ रही कांग्रेस को विपक्ष भी उतनी चोट नहीं दे पा रहा, जितना कि उसके वरिष्ठ नेता। पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस से ही राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस को सर्कस बता डाला। साथ ही जोड़ा कि हर कांग्रेसी इस सर्कस में खुद को बेहतर जगह पर स्थापित करने की जिद्दोजहद में लगा है। अय्यर के बयान से असहज कांग्रेस टिप्पणी करने से तो बच रही है, लेकिन पार्टी के ही दूसरे वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री को जोकर करार दे डाला। जबकि कांग्रेस के भीतर चल रहे इस सर्कस के दूर से मजे ले रही भाजपा ने इस पर कुछ ज्यादा टिप्पणी करने से परहेज किया। अय्यर ने एक पुस्तक विमोचन के दौरान अपनी बेलाग टिप्पणी में कह दिया कि पद पाने के लिए लोग सोनिया गांधी से लेकर उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के चक्कर लगाते हैं और जो कुछ नहीं पाते वे कांग्रेस दफ्तर में डेरा जमाते हैं। पार्टी की मुश्किलें बढ़ाने वाले बयान में अय्यर ने कहा कि जिनके काम बन जाते हैं उनकी पहुंच 10, जनपथ तक होती है, जबकि जिनको अपना काम बनने की आस होती है वे 23 ,वेलिंगटन क्रीसेंट के चक्कर लगाते हैं। 24, अकबर रोड तो वे लोग आते हैं, जिनकी सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी होती हैं। ध्यान रहे कि 10, जनपथ सोनिया गांधी का आवास है तो 23, वेलिंगटन क्रीसेंट अहमद पटेल का, जबकि 24, अकबर रोड कांग्रेस मुख्यालय है। अय्यर इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने कहा कि उम्मीद खो चुके लोग कांग्रेस दफ्तर इस आस से आते हैं कि यहां मेज-कुर्सी लगाए बैठे लोगों से मुलाकात कर शायद उनका काम बना पाए, लेकिन कम लोग ही यह जानते हैं कि यहां बैठे 10 लोगों में आधे वे होते हैं जो किसी ऊंची कुर्सी या ओहदे की दौड़ में लगे होते हैं, बाकी पांच हाशिए पर जा रहे होते हैं। कई बार लोग सफल होते हैं तो कई बार असफल। यह एक तरह का मेला है और हर कांग्रेसी को इस सर्कस में शामिल होना ही पड़ता है। अय्यर की टिप्पणी से कांग्रेस नेतृत्व न सिर्फ असहज है, बल्कि नाराज भी। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने तो बस इतना ही कहा कि, आप मणिशंकर को जानते ही हैं। लेकिन वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी उन पर कटाक्ष करने से नहीं चूके। चतुर्वेदी ने कहा कि कहीं अय्यर सर्कस के जोकर तो नहीं हैं! दूसरी ओर भाजपा के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि मणिशंकर अय्यर खुद राजीव गांधी और सोनिया गांधी के बेहद करीब रहे हैं। उनको साहित्यिक कोटे से राज्यसभा में कांग्रेस ही लाई। अगर वे कांग्रेस के बारे में कोई टिप्पणी करते हैं तो वे खुद ही सोचें।
चिढे़ चिदंबरम भाजपा पर बरसे
मुंबई सीरियल ब्लास्ट की जांच और खुफिया जानकारी जुटाने में नाकामी के लिए लगातार आलोचना का शिकार हो रहे गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने सोमवार को आतंकवाद के सहारे मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा पर जोरदार राजनीतिक हमला बोल दिया। भाजपा की ओर से 2जी मामले में खुद को निशाना बनाए जाने और इस्तीफा मांगे जाने के बाद चिदंबरम ने कहा कि दक्षिणपंथी आतंकी संगठनों की तेजी से हो रही जांच से घबरा कर यह पार्टी उन पर हमला कर रही है। चिदंबरम ने दक्षिणपंथी आतंकी संगठनों की ओर इशारा करते हुए कहा, सबको पता है कि इनका आका कौन है। इन मामलों के आरोपी, भगोड़े और जिनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं वे लोग कौन हैं? मक्का मस्जिद, अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव विस्फोट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ये हाल के दिनों के सबसे बड़े आतंकी हमले हैं, जिनकी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) जांच कर रही है, लेकिन इन्हें कौन बचा रहा है? सब जानते हैं कि इन मामलों के भगोड़े संघ और भाजपा के करीबी हैं। ये क्यों नहीं कानून के सामने आते? इन्हें कौन पनाह दे रहा है? उन्होंने कहा कि कम से कम नौ ऐसे मामले हैं, जिनमें दक्षिणपंथी आतंकी संगठनों के बम बनाने और निर्दोष लोगों की जान लेने के पक्के सबूत मिले हैं। चूंकि यूपीए सरकार ने इन मामलों की जांच को तेजी दे दी है, इसलिए भाजपा की ओर से उन्हें, दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ये आतंकी संगठन निर्दोष लोगों की जान ले रहे हैं इसलिए सरकार इन मामलों से सख्ती से निपट रही है। चिदंबरम के इस बयान की भाजपा ने निंदा करते हुए इसे पाकिस्तान के रवैये के पक्ष में जाता हुआ बताया। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा, 2जी घोटाले में जिस तरह रोजाना उनका नाम उजागर हो रहा है उससे निपटने के लिए चिदंबरम को कोई बेहतर रास्ता अपनाना चाहिए था। इस बयान से यह भी साफ हो रहा है कि मुंबई हमले के आरोपियों के खिलाफ यह सरकार कुछ नहीं करने के अपने रुख पर कायम है। भाजपा ने सोमवार को ही ए. राजा की ओर से अदालत में प्रधानमंत्री और तब के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का नाम लिए जाने के बाद इन दोनों पर जोरदार हमला बोला। इससे पहले दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के पदाधिकारी तो ऐसा आरोप लगाते रहे हैं, लेकिन गृहमंत्री को ओर से भाजपा को सीधे आंतकवादी संगठनों से जोड़ने का बयान पहली बार आया है।
आरएसएस का हौवा
भारतीयता ही राष्ट्रीयता और राष्ट्रीयता ही मंत्रिधर्म है। इस विचारधारा में आस्था रखने वालो को कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उन्होंने इस अवधारणा से लोगों को जोड़ने के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम को आसान कर दिया है। जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई थी। 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में जनसंघ को आधे निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार भी नहीं मिले थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सारे देश में विशेष कर दक्षिण भारत में जनसंघ की मुखर आलोचना की। तब जनसंघ अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि नेहरू हमारे सबसे बड़े प्रचारक हैं। उन्होंने देशभर में हमारी पहचान बनाई है। नेहरू वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। उनके नेतृत्व में जिस सरकार ने 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया उसी ने 1962 में चीनी हमले के बाद संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया। तबसे लेकर आज तक संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया गया। पहले प्रतिबंध को उसने अपने संगठन की शक्ति के बल पर नाकाम किया। इसके बाद जब 1975 में इंदिरा गांधी ने प्रतिबंधित किया तो 1977 में संघ ने कांग्रेस को चुनावी शिकस्त देकर उसका मुकाबला किया। इसी प्रकार जब नरसिम्हा राव के कार्यकल में 1992 में प्रतिबंध लगा तो अदालत ने सारे आरोपों को निराधार करार देते हुए प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया। आजादी के समय कांग्रेस के अलावा देश में समाजवादी और साम्यवादी पार्टियां ही थीं, जिनकी नीतियों में कोई मतभेद नहीं था। जनसंघ की स्थापना से एक वैचारिक भिन्नता मिली और नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ। आज कांग्रेस से भी अधिक राज्यों में भाजपा सत्तासीन है। साम्यवादी विचारधारा के संगठन सभी क्षेत्रों में ध्वस्त हो चुके हैं। भ्रष्टाचार और कुशासन की पहचान बनने से हताश कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौवा खड़ा कर वह देश के मुसलमानों के वोट के सहारे चुनावी नैया पार लगा लेगी। मुसलमानों में संघ के प्रति भय का जो कृत्रिम माहौल है उसको भड़काकर सभी गैर भाजपाई दल भयदोहन की राजनीति कर रहे हैं। अब तो मुसलमान भी इस भ्रामक प्रचार से ऊबने लगा है। बिहार में मुस्लिम गुमराह नहीं हुआ और गुजरात में भी निष्पक्ष व विकासोन्मुखी कामों ने उन्हें भ्रमित होने से रोका है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की छवि विकृत हो रही है। कांग्रेस में इससे बेचैनी है। आतंकी वारदातों में पाकिस्तानी हमलावरों के पकड़े जाने पर संतुलन बनाने के लिए हिंदू आतंकवाद का हौवा खड़ा किया जाता है। अब सोनिया गांधी की सुपर कैबिनेट हिंदू विरोधी सांप्रदायिकता विरोधी विधेयक पास कराना चाह रही है। यह आश्चर्य की बात है कि जो कांग्रेस दिग्विजय सिंह की राय को उनकी निजी राय कहकर अपना पल्ला झाड़ रही है वही एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जिसमें किसी संस्था अथवा व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति या कृत्य के लिए गिरफ्तारी का प्रावधान है। दिग्विजय सिंह की नवीनतम सोच है संघ बम बनाने की फैक्टरी है। दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर काले झंडे दिखाए गए। टीवी पर उन्हें जिस तरह भागते हुए दिखाया गया उससे उनके हिम्मती होने की छवि की चिंता उन्हें भी करनी चाहिए। जिस तरह उन्होंने बिना छानबीन के राजस्थान के पत्रकार को संघी घोषित कर उत्तेजना पैदा करने की कोशिश की और बाद में गलत साबित हुए वही हाल उनके बाकी आरोपों का भी है। केंद्र सरकार आरोपों के संबंध में छानबीन में बड़ी तेजी दिखाती है। क्या उसे दिग्विजय सिंह से संघ को बम बनाने की फैक्ट्री बताने की जानकारी नहीं लेनी चाहिए? वह आतंकी घटनाओं में संघ का हाथ होने का दावा करते हैं, लेकिन जानकारी नहीं देते। जिन्हें बेवजह फंसाया जा रहा है उनके खिलाफ प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री से मिलवाते हैं। प्रत्येक विस्फोट के बाद जांच एजेंसियां जिस दिशा में सक्रिय होती हैं उसके विपरीत बयान देना दिग्विजय सिंह का एकमात्र कार्यक्रम रहता है। अब तो वह भ्रष्टाचार के आरोप में पद से हटाए गए अथवा जेल में डाले गए लोगों की भी सार्वजनिक रूप से वकालत कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह की इन हरकतों से मनमोहन सिंह की सरकार को परेशान होना चाहिए न कि हिंदुत्व के प्रति निष्ठावान लोगों को। कांग्रेसी तो परेशान हैं इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि अपने भावी प्रधानमंत्री के जिस चमत्कारी संचालन से उनको कुछ आस बंधी है उसे वह धूमिल करते जा रहे हैं। इसलिए जो लोग यह चाहते हैं कि देश की व्यवस्था का संचालन समाज को भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्त करने वालों के हाथ में आना चाहिए, उन्हें दिग्गी राजा का अभिनंदन करना चाहिए। वह उसी काम में लगे हुए हैं। जहां तक संघ का सवाल है वह ऐसे सभी कपोकल्पित आरोपों के बाद समाज में और अधिक पैठ बनाने के लिए अनुकूलता पाता जा रहा है। (लेखक पूर्व सांसद हैं).
मोदी विरोधियों के हाथों खेल रहे संजीव भट्ट
गुजरात दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने वाले आइपीएस अधिकारी संजीव भट्ट अब अपने बचाव के लिए मोदी विरोधियों की शरण में है। सुप्रीम क ोर्ट के समक्ष दिए गए संजीव के बयान की कई बातें झूठ निकल रही हैं। ऐसे में खुद को बचाने के लिए वह कांग्रेसी नेताओं, वामपंथी कार्यकर्ताओं, नौकरशाहों और मोदी विरोधी सामाजिक कार्यकर्ताओं से मदद की गुहार लगा रहे हैं। भट्ट का इन सभी से ईमेल के जरिए हुआ सूचनाओं का आदान-प्रदान पूरे मसले में ऐसी ही साजिश के पुख्ता संकेत दे रहा है,जिसमें वह भी मोहरा बने। सूत्रों के मुताबिक, गोधरा मामलों की जांच कर रही एसआईटी को मिले भट्ट के ईमेल का ब्यौरा खुद उनके ही खिलाफ जा रहा है। ईमेल से गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की रात उनके मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में शामिल रहने के दावे पर सवालिया निशान लग गए हैं। भट्ट ने सुप्रीमकोर्ट में 23 अप्रैल 2011 को दाखिल हलफनामे में आरोप लगाया है कि मोदी ने बैठक के दौरान अफसरों से कहा था कि हिंदुओं का गुस्सा निकल जाने दो और मुसलिमों को मुंहतोड़ जवाब देने दो, मगर भरपूर कोशिश के बावजूद वह बैठक में मौजूदगी का सुबूत नहीं जुटा पा रहे हैं। भट्ट ने यह भी दावा किया था कि मुख्यमंत्री आवास पर बैठक के दौरान उनकी पूर्व मंत्री हरेन पंड्या (बाद में उनकी हत्या हो गई) से भेंट हुई थी, जबकि पांड्या के काल रिकार्ड इस गलत ठहराते हैं। भट्ट ने अपने आईपीएस साथी राहुल शर्मा की मदद से पांड्या के गांधीनगर में होने के सुबूत तलाशने की भरसक कोशिश की। इस कड़ी में 12 से 22 मई, 2011 के बीच भट्ट व राहुल के बीच मेल पर लंबा पत्राचार भी हुआ। 22 मई की सुबह 7.42 पर राहुल ने भट्ट को मेल किया कि पांड्या के दिए गए नंबर पर आखिरी काल रात 10.52 पर आई उस समय वह गांधी नगर की तरफ नहीं बल्कि अपने क्षेत्र में थे। 27 की रात और 28 को तड़के तक उनके गांधीनगर में होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा भट्टा लगातार तीस्ता सीतलवाड़ और कांग्रेस नेताओं के संपर्क में रहे। अप्रैल में कभी वकील तो कभी तथ्यों को लेकर उनकी तीस्ता, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोडवाढि़या और विस में नेता प्रतिपक्ष शक्ति सिंह गोहित से लगातार बात होती रही। इस दौरान भट्ट ने कांग्रेस नेता गोहित से कागजों के साथ- साथ ब्लैकबेरी मोबाइल भी मंगाया और उसे पाने की पुष्टि की। भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी और एमाइकस क्यूरी (अदालत का मददगार) को भी प्रभावित करने के लिए सिविल सोसाइटी का सहारा लिया। इस कड़ी में गैर सरकारी संस्था अनहद की शबनम हाशमी और प्रशांत संस्था के फादर सेड्रिक प्रकाश को पत्र लिखकर अभियान चलाने की मदद भी मांगी। 9 मई को ऐसे ही संस्थाओं को पत्र भेजकर हस्ताक्षर अभियान की गुजारिश भी की.
दया याचिकाओं पर अपने ही नियम तोड़ रहा गृह मंत्रालय
केंद्रीय गृह मंत्रालय खुद अपने बनाए नियम तोड़ रहा है। निचली अदालत से बाद में सजा पाए अपराधियों की याचिकाएं निपट गईं, पहले सजा पाए इंतजार ही कर रहे हैं। दरअसल, फांसी की सजा वाले कैदियों की दया याचिकाओं को निपटाने के लिए मंत्रालय ने नियम बनाया था कि सुनवाई अदालत से सजा होने के आधार पर याचिकाएं निस्तारित की जाएंगी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। हैरानी की बात यह है कि संसद हमले के आरोपी मो. अफजल व दो अन्य के मामले तो गृहमंत्रालय के स्तर पर ही विचाराधीन हैं। एक याची तो डेढ़ दशक से ज्यादा समय से जेल में अपनी मौत का इंतजार कर रहा है। मंत्रालय ने सुभाष चंद्र अग्रवाल की आरटीआइ अर्जी के जवाब में दया याचिकाओं से संबंधित मामलों की जो सूची दी है, उसको देखने पर स्पष्ट होता है कि मंत्रालय अपने ही बनाए नियम तोड़ रहा है। मंत्रालय के मुताबिक, राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इसी साल 8 मई को दिल्ली में 1995 में हुए बम विस्फोट कांड में टाडा अदालत से 25 अगस्त 2001 को फांसी की सजा पाए देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर और हत्या के मामले में असम के कामरूप जिले की अदालत द्वारा अगस्त 1997 में दोषी करार महेंद्र नाथ दास की दया याचिकाएं खारिज कर दी हैं। जबकि इन दोनों से कई साल पहले निचली अदालत से सजा पाए लोगों की याचिकाएं लंबित हैं। इनमें सबसे पुराना मामला उप्र के गुरमीत सिंह का है। 17 अगस्त 1986 में हुए सामूहिक नरसंहार मामले में सत्र न्यायालय ने गुरमीत को 20 सितंबर 1992 में फांसी की सजा दी थी। इसी प्रकार हरियाणा में 9 जून 1993 को हुए सामूहिक हत्याकांड में निचली अदालत ने धर्मपाल को 5 मई को फांसी दी थी। उसकी याचिका भी 11 साल से राष्ट्रपति के पास लंबित है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कातिलों को सुनवाई अदालत ने 28 जनवरी 1998 में फांसी की सजा सुनाई थी, उनकी दया पांच साल से लंबित है। ऐसे ही कई अन्य मामले हैं.
Wednesday, July 27, 2011
राजनीतिक प्रयोग का समय
आखिर हमारे देश में राष्ट्रस्तरीय नेतृत्व का अकाल क्यों है? सवाल यह भी बनता है कि आज राष्ट्र स्तरीय नेतृत्व की आवश्यकता ही किसे है? जवाबों की तलाश हमें हमारी राजनीतिक व्यवस्था की ओर ले जाती है। हमारी राजनीति आज अगर राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं पैदा कर रही है तो कहीं इसके लिएहमारी व्यवस्था तो जिम्मेदार नहीं है? हमारे राष्ट्रीय नेता तो आजादी के आंदोलन की उपज थे। राष्ट्रीय नेताओं की जाति का खत्म हो जाना एक बड़ा सरोकार है। कारण? क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता पर हावी हो चली है। हमने अनेक प्रधानमंत्री देखे हैं जिनको देश की जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में सोचा ही नहीं था। सांसदगण द्वारा चुना गया नेता मूलत: सांसद होता है। अत: मात्र एक संसदीय क्षेत्र हमारे नेतृत्व की स्वत: सीमा बन जाता है। चूंकि संपूर्ण राष्ट्र किसी का चुनाव क्षेत्र नहीं बनता इसलिए राष्ट्रीय नेताओं की संभावनाएं समाप्त होती गई हैं। विकास की ओर अग्रसर इस देश में लीक से हटकर परिवर्तन के बारे में सोचना जरूरी हो गया है। गठबंधन की मजबूरियां हमें अपंग कर कहीं गुलाम न बना दें। अमेरिका में गवर्नर का सीधे जनता द्वारा चुनाव होता है। प्रतिनिधि सभाओं के चुने हुए प्रतिनिधि एक्ट पास कराने, बजट व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका तो निभाते हैं, लेकिन वे गवर्नर को हटा नहीं सकते। चार वषरें तक स्थिरता का वातावरण गवर्नर को विकास की सोच का अवसर देता है। इस कारण अमेरिका में राज्यपालों पर राजनीतिक दबाव की संभावनाएं बहुत कम हो जाती हैं। प्रतिनिधिगण कानून बनाने के दायित्वों का निर्वहन करते हैं। चूंकि प्रतिनिधि की मुख्यत: भूमिका विधिक होती है, अत: दबंगों, माफियाओं, दादाओं का प्रतिनिधि सभा में कोई काम ही नहीं है। इसलिए अमेरिका में कोई माफिया किस्म का आदमी चुनाव लड़ता नहीं दिखता। अमेरिकी राष्ट्रपति कोई भी हो, बराबर का शक्तिशाली होता है और हमारा प्रधानमंत्री? नेहरू बहुत शक्तिशाली थे लेकिन कुछ अन्य के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता? अब व्यवस्थाओं के बदलने से हमारी स्थितियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जैसे कि किसी राच्य की राजनीति में खनन माफियाओं की बड़ी भूमिका है। उनकी सशक्त लॉबी के सामने सरकारें, मुख्यमंत्री तक असहाय हो जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में नैतिक-अनैतिक, स्याह-सफेद प्रश्नों को दरकिनार कर सत्ताधारी दल येन-केन-प्रकारेण अपनी सरकार का अस्तित्व बचाने में लगा रहता है। नतीजन, बिना किसी जिम्मेदारी, जवाबदेही के एक अनैतिक सत्ता केंद्र का जन्म हो जाता है। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का प्रतिफल यह है कि हमें दिन-रात 24 घंटे की वह राजनीति झेलनी पड़ती है, जो 5 वर्ष के अंतराल में एक बार होनी चाहिए। फर्ज करें कि एक पुलिस अधीक्षक है, जो अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर अच्छा कार्य कर रहा है। उसका अच्छा होना राज्य के तो हित में है, लेकिन हो सकता है कि यह बात स्थानीय मठाधीश के हित के विपरीत हो। वह किसी थानेदार को उसकी अकर्मण्यता के कारण हटाना चाहता है तो अक्सर हटा नहीं पाता। दबावों, समीकरणों से प्रभावित प्रशासन में प्राय: राच्यों के लक्ष्यों के प्रति समर्पण में कमी हो जानी स्वाभाविक है। राच्यों के शीर्ष नेतृत्व के लिए स्थानीय सत्ता समीकरणों में प्रभावी बन चुके नेता को दरकिनार कर सकना संभव नहीं होता। हमारी राजनीति सत्ता की दहलीज तक पहुंच कर आगे लक्ष्यहीन हो जाती है। राजनीतिक बाध्यताओं के कारण बहुत से नीति-नियामक महत्वपूर्ण पदों को समझौतों में दे देना पड़ता है। हमने देखा है कि विकास का ककहरा भी न जानने वाले प्रदेशों के नेता बन बैठे हैं। वर्तमान लोकतंत्र ने जन जागरूकता, गरीब और उपेक्षित समाज तक सत्ता को पहुंचाने का काम बखूबी किया है, लेकिन अब से आगे के लिए राष्ट्रपति या अध्यक्षीय शासन प्रणाली ही अधिक उपयुक्त होगी। समझना जरूरी है कि देश का सबसे शक्तिशाली पद असहाय क्यों हो रहा है? क्षेत्रीय पार्टियों, छोटे राच्यों, जातीय-भाषिक समूहों को प्रश्रय मिलता दिख रहा है। इसके विपरीत राष्ट्रपति, राच्यपाल प्रणाली में विभाजन के स्थान पर संयोजन को सत्ता का माध्यम बनाना मजबूरी होगी। राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए अनिवार्य होगा कि वह मणिपुर, पांडिचेरी जैसे छोटे राच्यों से भी आवश्यक मत प्राप्त करें। अगर आप राष्ट्रपति के उम्मीदवार हैं तो आप बांग्ला भी सीखेंगे और मराठी भी। यहां से राजनीति के राष्ट्रीय एकता की दिशा में उन्मुख होने की शुरूआत हो सकती है। संविधान समिति की कार्यवाहियों में 8 एवं 9 जून 1947 को राष्ट्रपति प्रणाली का बिंदु इमाम हुसैन, शिब्बन लाल सक्सेना द्वारा उठाया तो गया था, किंतु गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 की पृष्ठभूमि के कारण यह बिंदु गहन विचार का विषय नहीं बना। बाबा साहब ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में कहा था लोकतांत्रिक कार्यपालिका प्रथमत: स्थिर होनी चाहिए और फिर जिम्मेदार होनी चाहिए। अमेरिकी व्यवस्था स्थिर अधिक है, जबकि ब्रिटिश व्यवस्था जिम्मेदार अधिक है। आज की स्थितियों के रूबरू बाबा साहब के विचार क्या होते, इसकी कल्पना की जा सकती है। जब स्थिरता ही न होगी तो जिम्मेदारी का प्रश्न ही गौण हो जाता है। राजनीति में प्रयोगशालाएं नहीं होतीं, फिर भी प्रयोगधर्मिता के लिए सदैव संभावनाएं हैं। हिमाचल, उत्तरांखड, झारखंड, सिक्किम, गोवा, पांडिचेरी आदि छोटे राज्यों में मुख्यमंत्रियों के स्थान पर जनता द्वारा निर्वाचित राज्यपालों की व्यवस्था पर सहमति बनाने का प्रयास किया जा सकता है। स्थिरता विकास की चाभी है। स्थिरता के लिए यह राजनीतिक प्रयोग करके देखा जा सकता है। यदि यह सफल हुआ तो इससे छोटे राज्यों के तर्क को मजबूती मिलेगी। वे व्यवस्थाएं जो परिवर्तनों के अनुरूप ढलने से इंकार करती हैं उनका समूल नाश क्रांतियों से होता है। राजनीतिक व्यवस्था में भी विकास की अपेक्षा है। क्या हमारी व्यवस्था संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुरूप परिणामपरक रही हैं? 24 घंटे की राजनीति का उलझाव हमारी शक्तियों का इस हद तक अपव्यय करता है कि हम राष्ट्र के प्रति समर्पित दृष्टि विकसित ही नहीं कर सके हैं। हिलेरी क्लिंटन इस दौरे में कह गई हैं कि भारत के लिए यह एशिया के नेतृत्व का समय है। हम क्या करें? राष्ट्र का कद बढ़ रहा है और नेतृत्व का कद छोटा हो रहा है। हमारे पास प्रदेश और देश की जनता से सीधे संवाद कर सकने, उनमें प्रेरणा भर देने वाले नेताओं का सर्वथा अभाव है। वर्तमान व्यवस्था में आसान रास्ता लेने वाले ऐसे नेताओं की गुंजाइशें बन गई हैं जिन्होंने जन-संघर्ष, जन-आंदोलनों का चेहरा तक नहीं देखा है। राजनीतिक व्यवस्था कोई धर्म नहीं है कि जो लिख दिया गया वह कभी मिटेगा नहीं। वक्त के साथ चलना राजनीति की जरूरत है। यह परिवर्तन, नई सोच और नए चरित्र के नेताओं की राह बनाएगा। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं).
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