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Friday, September 30, 2011

माया ने बनाए तीन नए जिले


उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने बुधवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तीन नए जिलों की घोषणा की। शामली, हापुड़ और संभल तहसीलों को जिले का दर्जा दिया गया है। तहसीलों के नाम यथावत रहेंगे, जिलों के नाम क्रमश: प्रबुद्ध नगर, पंचशील नगर और भीम नगर होंगे। देर शाम शासन ने इस संबंध में अधिसूचना जारी करते हुए अधिकारियों की तैनाती भी कर दी। बताते चलें कि 1994 से अब तक प्रदेश में 20 नए जिलों का गठन हुआ है, जिनमें से 16 का गठन मायावती ने अपने विभिन्न कार्यकाल में किया है। सीएम ने नए जिलों के गठन के पीछे कानून व्यवस्था, बढ़ता शहरीकरण व आबादी विस्तार के तर्क दिए और कहा, अब विकास कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर होगी। बुधवार को सबसे पहले सीएम मुजफ्फरनगर की तहसील शामली पहुंचीं और 73वें जिले के रूप में प्रबुद्ध नगर की घोषणा की। इसमें शामली और कैराना तहसील को शामिल किया गया है। यह सहारनपुर मंडल का हिस्सा होगा। इसके बाद गाजियाबाद की तहसील हापुड़ पहुंचीं। इसे पंचशीलनगर के नाम से प्रदेश का 74वां जिला बनाने की घोषणा की। इसमें हापुड़, गढ़मुक्तेश्वर और धौलाना तहसील को शामिल किया गया है। संभल पहुंचने पर मुख्यमंत्री ने संभल को सूबे का 75वां जिला बनाने का एलान किया। इसे अब भीम नगर के नाम से जाना जाएगा। इस जिले में तीन तहसीलें संभल, चंदौसी और गुन्नौर शामिल की गई हैं, जिनमें दो मुरादाबाद जिले से और एक बदायूं से ली गई है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद शाम को प्रमुख सचिव राजस्व केके सिन्हा ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी। साथ ही नए जिलों में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और अपर पुलिस अधीक्षकों की तैनाती कर दी।

सिंगुर की जमीन हारे टाटा

 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बुधवार को दोहरी सफलता हासिल हुई। भवानीपुर विस उपचुनाव में माकपा प्रत्याशी को 54,213 मतों से हराने वाली ममता ने सिंगुर की जमीन पर कब्जे के मामले में रतन टाटा को हाईकोर्ट में मात दी। कलकत्ता हाई कोर्ट ने सिंगुर भूमि पुनर्वास- विकास अधिनियम, 2011 को चुनौती देने वाली टाटा मोटर्स की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा,राज्य सरकार द्वारा कुछ माह पूर्व पारित कानून संवैधानिक व वैध है। कंपनी दो माह के भीतर सिंगुर से सारा सामान हटा ले। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा, सिंगुर के किसान आंदोलन ने भारत ही नहीं पूरी दुनिया के ऐसे प्रभावितों को रास्ता दिखाया है। सरकार दो नवंबर के बाद किसानों को जमीन लौटाने की प्रक्रिया शुरू करेगी। वहीं, टाटा मोटर्स ने अदालत के फैसले के अध्ययन के बाद आगे की कार्रवाई की बात कही है। हाईकोर्ट के न्यायाधीश इंद्रप्रसन्न मुखर्जी ने 51 पृष्ठों के फैसले में कहा, राज्य सरकार द्वारा बनाया गया कानून तथा इसके तहत उठाया गये कदम संवैधानिक है। कानून में इस प्रकार के अधिग्रहण के लिए पर्याप्त जनहित का ध्यान रखा गया है। अदालत ने कहा,उसके फैसले पर दो नवंबर तक बिना शर्त रोक रहेगी ताकि पीडि़त पक्ष आगे अपील कर सकें। अदालत ने हुगली के डीएम-एसपी को विशेष अधिकारी नियुक्त किया है,जो इस बात पर नजर रखेंगे कि टाटा से भूमि का हस्तांतरण दो माह में राज्य सरकार को सुगमता से हो। मुखर्जी ने इस मामले में दुकानदारों की भी अर्जी खारिज करते हुए उन्हें दी गई जमीन का हस्तांतरण भी बरकरार रखा। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता ने नया कानून पारित कर 21 जून की शाम पूरी जमीन कब्जे में ले ली थी। टाटा मोटर्स ने 22 जून को हाईकोर्ट में यह कहते हुए नए कानून को चुनौती दी कि यह असंवैधानिक है क्योंकि 600 एकड़ भूमि उसे दी गई थी जिसका हस्तांतरण किया जाना गलत है। वहीं, ममता ने अदालत को धन्यवाद देते हुए कहा, सिंगुर में 600 एकड़ भूमि में एक बड़ा कारखाना लगाया जाएगा, शेष 400 एकड़ भूमि मुआवजा स्वीकार नहीं करने वाले किसानों को वापस कर दी जाएगी।

दादा पर टिका चिदंबरम का भविष्य

 मनमोहन सिंह के अपनी टीम में आल इज वेल का संदेश देने के 24 घंटे के भीतर गृहमंत्री पी चिदंबरम और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बीच छिड़ा घमासान दूर करने की कवायद चरम पर पहुंच गई है। सरकार के संकट में फंसे होने का हवाला देकर मतभेदों को भुला 2 जी घोटाले पर वित्त मंत्रालय के नोट से उठे राजनीतिक बवाल को शांत करने के लिए प्रणव को स्पष्टीकरण जारी करने के लिए मनाने की कोशिशें तेज हो गई है। शाम को कोलकाता से दिल्ली आए प्रणब अपनी तरफ से कोई बयान जारी कर सकते हैं, जिसमें वित्त मंत्रालय के उस नोट पर भी स्पष्टीकरण हो सकता है, जिसके बाद चिदंबरम पर इस मामले में संलिप्तता का आरोप प्रगाढ़ हुआ है। प्रणब ने पीएम और सोनिया गांधी को इस मामले में सफाई देते हुए चार पेज का एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया है कि 25 मार्च का नोटन सिर्फ वित्त बल्किअन्य मंत्रालयों की सलाह पर ही लिखा गया। कांग्रेस आलाकमान से मुखर्जी की मंगलवार शाम हुई मुलाकात के बाद सामने आई इस चिट्ठी को विवाद दबाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि विचार-विमर्श का तर्क अदालत में जारी सुनवाई के दौरान इस नोट को सुबूत बनने से रोक सकता है। सूत्रों के मुताबिक, प्रणब की ताजा चिट्ठी में इस बात पर जोर दिया गया है कि 25 मार्च को वित्त मंत्रालय से पीएमओ भेजा गया नोट दरअसल, अंतरमंत्रालयी विचार- विमर्श का हिस्सा था और यह प्रधानमंत्री कार्यालय व कैबिनेट सचिवालय की जानकारी पर आधारित था। वित्त मंत्रालय की दलील है कि चूंकि इस पूरे विवाद पर अलग-अलग कथन सामने आते रहे हैं, लिहाजा 25 मार्च को भेजे गए नोट के सहारे समग्र व एकजुट पक्ष रखने की कोशिश की गई। यह अलग बात है कि यह नोट जब सामने आया तो विवाद का सबब बन गया। इसे बुधवार को सरकार और संगठन के स्तर से मुखर्जी-चिदंबरम के बीच तकरार की धारणा तोड़ने की कोशिश माना जा रहा है। कांग्रेस में अंदरखाने वित्त मंत्रालय का 25 मार्च का नोट हैरानी का सबब है जिसमें कहा गया है कि तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम को 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के लिए जोर देना चाहिए था। सूत्रों ने कहा, नोट का मकसद चिदंबरम को नीचा दिखाना नहीं हो सकता, ऐसी मंशा होती तो मार्च में लिखा गया यह नोट कब का लीक कर दिया गया होता। कांग्रेस और पीएम इस मामले में पूरी तरह चिदंबरम का साथ देकर भाजपा के आरोपों को हवा में उड़ा रहे हैं कि सरकार के अंदर अनबन है। कांग्रेस आधिकारिक रूप से यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि सरकार में किसी प्रकार का मतभेद है। पार्टी प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे भाजपा की कुंठाओं का नतीजा करार दिया और कहा,वित्त मंत्रालय के नोट का 2जी मामले पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पडे़गा। संकेत हैं कि तकनीकी रूप से इस मसले पर अदालत व सीबीआइ के चंगुल से चिदंबरम को निकालने के बाद सरकार अपनी लड़ाई तेज करेगी।

Thursday, July 28, 2011

मोदी विरोधियों के हाथों खेल रहे संजीव भट्ट


गुजरात दंगों के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने वाले आइपीएस अधिकारी संजीव भट्ट अब अपने बचाव के लिए मोदी विरोधियों की शरण में है। सुप्रीम क ोर्ट के समक्ष दिए गए संजीव के बयान की कई बातें झूठ निकल रही हैं। ऐसे में खुद को बचाने के लिए वह कांग्रेसी नेताओं, वामपंथी कार्यकर्ताओं, नौकरशाहों और मोदी विरोधी सामाजिक कार्यकर्ताओं से मदद की गुहार लगा रहे हैं। भट्ट का इन सभी से ईमेल के जरिए हुआ सूचनाओं का आदान-प्रदान पूरे मसले में ऐसी ही साजिश के पुख्ता संकेत दे रहा है,जिसमें वह भी मोहरा बने। सूत्रों के मुताबिक, गोधरा मामलों की जांच कर रही एसआईटी को मिले भट्ट के ईमेल का ब्यौरा खुद उनके ही खिलाफ जा रहा है। ईमेल से गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की रात उनके मुख्यमंत्री निवास पर हुई बैठक में शामिल रहने के दावे पर सवालिया निशान लग गए हैं। भट्ट ने सुप्रीमकोर्ट में 23 अप्रैल 2011 को दाखिल हलफनामे में आरोप लगाया है कि मोदी ने बैठक के दौरान अफसरों से कहा था कि हिंदुओं का गुस्सा निकल जाने दो और मुसलिमों को मुंहतोड़ जवाब देने दो, मगर भरपूर कोशिश के बावजूद वह बैठक में मौजूदगी का सुबूत नहीं जुटा पा रहे हैं। भट्ट ने यह भी दावा किया था कि मुख्यमंत्री आवास पर बैठक के दौरान उनकी पूर्व मंत्री हरेन पंड्या (बाद में उनकी हत्या हो गई) से भेंट हुई थी, जबकि पांड्या के काल रिकार्ड इस गलत ठहराते हैं। भट्ट ने अपने आईपीएस साथी राहुल शर्मा की मदद से पांड्या के गांधीनगर में होने के सुबूत तलाशने की भरसक कोशिश की। इस कड़ी में 12 से 22 मई, 2011 के बीच भट्ट व राहुल के बीच मेल पर लंबा पत्राचार भी हुआ। 22 मई की सुबह 7.42 पर राहुल ने भट्ट को मेल किया कि पांड्या के दिए गए नंबर पर आखिरी काल रात 10.52 पर आई उस समय वह गांधी नगर की तरफ नहीं बल्कि अपने क्षेत्र में थे। 27 की रात और 28 को तड़के तक उनके गांधीनगर में होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसके अलावा भट्टा लगातार तीस्ता सीतलवाड़ और कांग्रेस नेताओं के संपर्क में रहे। अप्रैल में कभी वकील तो कभी तथ्यों को लेकर उनकी तीस्ता, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोडवाढि़या और विस में नेता प्रतिपक्ष शक्ति सिंह गोहित से लगातार बात होती रही। इस दौरान भट्ट ने कांग्रेस नेता गोहित से कागजों के साथ- साथ ब्लैकबेरी मोबाइल भी मंगाया और उसे पाने की पुष्टि की। भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी और एमाइकस क्यूरी (अदालत का मददगार) को भी प्रभावित करने के लिए सिविल सोसाइटी का सहारा लिया। इस कड़ी में गैर सरकारी संस्था अनहद की शबनम हाशमी और प्रशांत संस्था के फादर सेड्रिक प्रकाश को पत्र लिखकर अभियान चलाने की मदद भी मांगी। 9 मई को ऐसे ही संस्थाओं को पत्र भेजकर हस्ताक्षर अभियान की गुजारिश भी की.

दया याचिकाओं पर अपने ही नियम तोड़ रहा गृह मंत्रालय


 केंद्रीय गृह मंत्रालय खुद अपने बनाए नियम तोड़ रहा है। निचली अदालत से बाद में सजा पाए अपराधियों की याचिकाएं निपट गईं, पहले सजा पाए इंतजार ही कर रहे हैं। दरअसल, फांसी की सजा वाले कैदियों की दया याचिकाओं को निपटाने के लिए मंत्रालय ने नियम बनाया था कि सुनवाई अदालत से सजा होने के आधार पर याचिकाएं निस्तारित की जाएंगी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। हैरानी की बात यह है कि संसद हमले के आरोपी मो. अफजल व दो अन्य के मामले तो गृहमंत्रालय के स्तर पर ही विचाराधीन हैं। एक याची तो डेढ़ दशक से ज्यादा समय से जेल में अपनी मौत का इंतजार कर रहा है। मंत्रालय ने सुभाष चंद्र अग्रवाल की आरटीआइ अर्जी के जवाब में दया याचिकाओं से संबंधित मामलों की जो सूची दी है, उसको देखने पर स्पष्ट होता है कि मंत्रालय अपने ही बनाए नियम तोड़ रहा है। मंत्रालय के मुताबिक, राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने इसी साल 8 मई को दिल्ली में 1995 में हुए बम विस्फोट कांड में टाडा अदालत से 25 अगस्त 2001 को फांसी की सजा पाए देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर और हत्या के मामले में असम के कामरूप जिले की अदालत द्वारा अगस्त 1997 में दोषी करार महेंद्र नाथ दास की दया याचिकाएं खारिज कर दी हैं। जबकि इन दोनों से कई साल पहले निचली अदालत से सजा पाए लोगों की याचिकाएं लंबित हैं। इनमें सबसे पुराना मामला उप्र के गुरमीत सिंह का है। 17 अगस्त 1986 में हुए सामूहिक नरसंहार मामले में सत्र न्यायालय ने गुरमीत को 20 सितंबर 1992 में फांसी की सजा दी थी। इसी प्रकार हरियाणा में 9 जून 1993 को हुए सामूहिक हत्याकांड में निचली अदालत ने धर्मपाल को 5 मई को फांसी दी थी। उसकी याचिका भी 11 साल से राष्ट्रपति के पास लंबित है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कातिलों को सुनवाई अदालत ने 28 जनवरी 1998 में फांसी की सजा सुनाई थी, उनकी दया पांच साल से लंबित है। ऐसे ही कई अन्य मामले हैं.

Wednesday, June 29, 2011

लोकपाल पर अन्ना के आगे नहीं झुकेगी सरकार


लोकपाल मुद्दे पर सरकार और कांग्रेस अलग-अलग सुर नहीं अलापेगी। कांग्रेस कार्यसमिति में यह साफ कर दिया गया कि जो हो गया, सो हो गया। अब सरकार और पार्टी लोकपाल मसले पर मजबूती से एक साथ खड़े नजर आने चाहिए। भ्रष्टाचार और काले धन की तरह लोकपाल मुद्दे पर भी कांग्रेस बुकलेट छपवाकर पूरे देश में बांटेगी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बैठक के अंत में ताकीद की कि इस मुद्दे पर अधिकृत प्रवक्ताओं या नेताओं के सिवाय दूसरे नेता मुंह न खोलें। इस ताकीद का असर भी दिखा। हर मुद्दे पर सबसे ज्यादा ज्यादा मुखर रहने वाले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से जब इस संदर्भ में सवाल किया गया तो उनका कहना था, मीडिया चेयरमैन (जनार्दन द्विवेदी) से बात करिए। द्विवेदी ने लोकपाल पर कहा, कोई व्यक्ति कुछ भी मांग कर सकता है। सरकार को कमजोर नहीं दिखना चाहिए। दबाव का हथकंडा सही नहीं है। सीडब्ल्यूसी की शुरुआत सोनिया गांधी ने इस पूरे मसले पर पार्टी और सरकार के रुख पर बयान जारी कर की। सरकार और संगठन के बीच किसी भी तरह के मतभेद या संवादहीनता दूर करने पर सबसे ज्यादा जोर रहा। बेलगाम बयानबाजियों पर भी सोनिया ने सख्ती दिखाई। बैठक के अंत में कांग्रेस कार्यसमिति में उन्होने दो टूक कह दिया कि लोकपाल मसले पर पार्टी प्रवक्ता के अलावा अन्य नेता न बोलें। सोनिया गांधी व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में हुई इस बैठक में लोकपाल मसले पर सिविल सोसाइटी के नाम पर टीम अन्ना को अत्याधिक तवज्जो दिए जाने के खिलाफ संगठन के सभी नेताओं ने एक सुर से मुखर विरोध दर्ज कराया। जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि कार्य समिति में सबका कहना था कि चार-पांच लोग देश के भाग्य विधाता नहीं बन सकते। बकौल जनार्दन द्विवेदी प्रधानमंत्री ने भी सभी सदस्यों की भावनाओं से सहमति जताई। माना जा रहा है कि लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री को लाने की मांग पर कांग्रेस का झुकना अब नामुमकिन है। लोकपाल विधेयक पर टीम अन्ना के खिलाफ आक्रामक हो रही कांग्रेस अपने पत्ते अभी भी खोलने को तैयार नहीं है। द्विवेदी ने स्पष्ट रूप से कहा भी कि सर्वदलीय बैठक के बाद ही सरकार अपना मत स्पष्ट करेगी और कांग्रेस उसके साथ होगी। पार्टी इस मसले पर देश में जगह-जगह रैली कर जनता से रूबरू भी होगी। हजारे के प्रस्तावित अनशन के बारे में द्विवेदी ने कहा कि पहले 16 अगस्त आने दीजिए। बैठक में प्रणब मुखर्जी ने टीम अन्ना के लोकपाल और सरकार के लोकपाल विधेयक के प्रारूप पर मोटी जानकारी दी तो गृह मंत्री पी चिदंबरम ने लोकपाल के चुनने की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला।


कांग्रेस मुंडे के स्वागत को तैयार


महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे प्रभावी चेहरे और लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गोपीनाथ मुंडे लगातार कांग्रेस के संपर्क में बने हुए हैं। गडकरी से नाराज मुंडे के कांग्रेस से हाथ मिलाने के फार्मूले और शर्तो तक बात पहुंच चुकी है। हालांकि कांग्रेस अभी तक इस बारे में अंतिम फैसला नहीं कर सकी है, लेकिन मुंडे को लेकर पार्टी नेतृत्व खासा संजीदा जरूर है। मराठवाड़ा कांग्रेस की कमजोर कड़ी रहा है। मुंडे न केवल इस इलाके के बल्कि पिछड़े वर्ग के प्रभावी नेता हैं इसलिए कांग्रेस इस अवसर को एक झटके में गंवाना नहीं चाहती। यह जरूर है कि मुंडे को लाने के नफा-नुकसान पर कांग्रेस में मंथन जारी है। वह मुंडे के साथ वार्ता का चैनल भी खोले हुए है। सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और महाराष्ट्र के पार्टी मामलों के प्रभारी मोहन प्रकाश के बीच लगातार इस बारे में बात हो रही है। सूत्रों के मुताबिक मुंडे के संदेशवाहकों की तरफ से कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने या शामिल होने का फार्मूला और शर्ते मोटे तौर पर भेजी जा चुकी हैं। मुंडे अपने साथ करीब 15 विधायकों और महाराष्ट्र के तीन सांसदों को कांग्रेस में शामिल कराने का दावा कर रहे हैं। जाहिर है कि वह महाराष्ट्र विधानसभा में पार्टी के एक तिहाई से ज्यादा विधायकों को तोड़कर गडकरी को झटका देने का मन बना चुके हैं। मुंडे की अपेक्षा महाराष्ट्र सरकार में दो और केंद्र में एक मंत्री पद की है। अलग दल बनाने से लेकर कांग्रेस में शामिल होने जैसे विकल्पों पर भी कांग्रेस को कुछ संदेश दिए गए हैं। खास बात यह है कि भाजपा नेताओं के मोबाइल पर नहीं आ रहे मुंडे की लगातार कांग्रेस नेताओं से बातचीत जारी है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि महाराष्ट्र में जब शिवसेना के फायरब्रांड नेता नारायण राणे के साथ कांग्रेस को कोई दिक्कत नहीं हुई तो मुंडे के साथ भी सांप्रदायिकता के मुद्दे पर समस्या नहीं होगी। अलबत्ता, उनके दावों, प्रभावों और शर्तो पर पार्टी जरूर मंथन कर रही है। कांग्रेस यह भी देख रही है कि कहीं ऐसा न हो कि मुंडे सिर्फ भाजपा को ब्लैकमेल करने के लिए ही कांग्रेस का इस्तेमाल कर रहे हों। मुंडे की जल्द ही कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता के साथ बातचीत भी हो सकती है।


अशोक चह्वाण ने देशमुख पर फोड़ा घोटाले का ठीकरा


महाराष्ट्र के दो पूर्व मुख्यमंत्री आदर्श सोसाइटी घोटाले में आरोपों का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ रहे हैं। इस घोटाले में घिरने के कारण मुख्यमंत्री का पद गंवाने वाले अशोक चह्वाण ने सोमवार को इसके लिए अपने पूर्ववर्ती और मौजूदा केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख को जिम्मेदार ठहराया। चह्वाण ने अपने हलफनामे में कहा कि 25 लाख रुपये से ज्यादा कीमत के भूखंड पर फैसला करने का अधिकार मुख्यमंत्री को होता है, न कि राजस्व मंत्री को। आदर्श सोसाइटी को भूखंड देते वक्त अशोक चह्वाण महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री थे और देशमुख मुख्यमंत्री। अशोक चह्वाण ने सोमवार को दो सदस्यीय पाटिल आयोग के समक्ष आठ पेज का हलफनामा दाखिल किया। इसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा है, मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में मैंने विवादित आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैटों के आवंटन में कुछ भी गलत या नियम विरुद्ध नहीं किया, ही किसी आम नागरिक को फ्लैट आवंटन की सलाह दी। यह घोटाला उजागर होने के बाद पिछले साल नवंबर में चह्वाण को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। उन पर आरोप है कि उन्होंने सोसाइटी में अपनी सास और कुछ अन्य रिश्तेदारों को फ्लैट दिलवाए थे। चह्वाण ने हलफनामे में कहा है कि उनकी सास को फ्लैट आवंटित करने की पूरी कार्यवाही अधिकारियों द्वारा पूरी की गई थी। दक्षिण मुंबई के अत्यंत महंगे इलाके में पहले उक्त हाउसिंग सोसाइटी की सिर्फ छह मंजिली इमारत प्रस्तावित थी। लेकिन, नेताओं और नौकरशाहों द्वारा रुचि लेने के कारण 31 मंजिली इमारत खड़ी कर दी गई। अशोक चह्वाण पर आरोप लगता रहा है कि उनकी सलाह पर ही आदर्श सोसाइटी में आम नागरिकों को फ्लैट आवंटन की प्रक्रिया शुरू की गई। जबकि, पहले सोसाइटी के फ्लैट सिर्फ कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों की विधवाओं को ही दिए जाने थे। जांच आयोग के सामने दिए अपने शपथपत्र में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने कहा था, सोसाइटी का भूखंड राज्य सरकार की संपत्ति था। इसे सोसाइटी को देने के बदले इसमें सैनिकों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी फ्लैट देने की सलाह तत्कालीन राजस्व मंत्री ने दी थी। चह्वाण के हलफनामे पर देशमुख ने कहा, अब यह फैसला आयोग को करना है कि कौन सही है और कौन गलत।


केंद्र ने रोकीं यूपी की 8 अरब की परियोजनाएं


उत्तर प्रदेश में प्यास बुझाने की राह में भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता आड़े आ रही है। पर्याप्त जलापूर्ति के लिए राज्य सरकार की तीन दर्जन पेयजल परियोजनाएं तो केंद्र सरकार के स्तर पर ही लंबित हैं। जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूवल मिशन के तहत तकरीबन आठ सौ करोड़ रुपये की उक्त पेयजल परियोजनाएं को लगभग ढाई वर्ष पहले केंद्र को भेजा गया था, लेकिन केंद्र ने इनके लिए अब तक धन नहीं दिया है। राज्य सरकार इसे राजनीतिक विद्वेष के कारण उप्र के साथ नाइंसाफी बता रही है। प्रमुख सचिव नगर विकास दुर्गा शंकर मिश्र का कहना है सूबे में 630 नगर है जिसमें से 71 के लिए केंद्र सरकार ने जेएनएनयूआरएम के तहत धनराशि दी है। शेष नगरों के लिए भी केंद्र सरकार से धन मांगा जा रहा है ताकि उनके निवासियों को भी पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराया जा सके। जनता को मानक के मुताबिक जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 67 अरब रुपये का आकलन किया गया है। इसमें 13 नगर निगम वाले शहरों के लिए 39 अरब, 194 पालिका परिषदों के लिए 20 अरब व 423 नगर पंचायत वाले छोटे नगरों के लिए आठ अरब चाहिए। केंद्र का कहना है कि मिशन के तहत यूपी को दी जाने वाली धनराशि की परियोजनाएं स्वीकृत कर दी गई हैं, इसलिए अब अन्य प्रस्तावों पर विचार करना मुमकिन नहीं है। जल निगम के प्रबंध निदेशक एके श्रीवास्तव बताते हैं कि जेएनएनयूआरएम के तहत अभी 2682 करोड़ रुपये की 75 पेयजल परियोजनाओं पर ही काम चल रहा है। इस पर अब तक 13 अरब रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। इसमें 645 नए ट्यूबवेल स्थापित किए जा रहे हैं। 221 भूमिगत व 348 ओवरहेड टैंक बनाने के साथ ही नौ हजार किलोमीटर की पेयजल लाइन का निर्माण हो रहा है। 808.5 एमएलडी क्षमता के सात नए जलकल बनाए जा रहे हैं। 27 सौ करोड़ रुपये की परियोजनाओं के बावजूद अन्य नगरों में पर्याप्त जलापूर्ति के लिए 40 अरब रुपये की और जरूरत होगी। प्रमुख सचिव नगर विकास मिश्र का कहना है कि जलापूर्ति के संबंध में बेंचमार्क तय कर इस साल न केवल जलापूर्ति व्यवस्था सुधारने पर जोर है बल्कि वसूली में भी पांच फीसदी का इजाफा करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए सन् 2015 तक 13वें वित्त आयोग के तहत केंद्र से मिलने वाले ढाई-तीन हजार करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा जलापूर्ति पर खर्च करने के निर्देश दिए गए हैं। बढ़ती आबादी व घटते भूजल स्तर से सूबे का पेयजल संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में सतही जल की परियोजनाएं ही स्थायी तौर पर पेयजल संकट से निपटने में कारगर होंगी लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा भारी-भरकम धनराशि की व्यवस्था करना है। नहरों में पानी न आने तथा पटते तालाबों के कारण सिंचाई के लिए भी टयूबवेलों की बोरिंग होती जा रही है। इससे भूगर्भीय जल भंडार पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। जानकारों के अनुसार नगरीय क्षेत्र में अभी सालाना 150 खरब क्यूबिक मीटर भूगर्भ जल की निकासी हो रही है, तेजी से बढ़ती आबादी के मद्देनजर वर्ष 2050 तक यह निकासी बढ़कर 600 खरब क्यूबिक मीटर सालाना पहुंचने का अनुमान है.