भारतीयता ही राष्ट्रीयता और राष्ट्रीयता ही मंत्रिधर्म है। इस विचारधारा में आस्था रखने वालो को कांग्रेस महामंत्री दिग्विजय सिंह के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। उन्होंने इस अवधारणा से लोगों को जोड़ने के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के काम को आसान कर दिया है। जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई थी। 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में जनसंघ को आधे निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार भी नहीं मिले थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सारे देश में विशेष कर दक्षिण भारत में जनसंघ की मुखर आलोचना की। तब जनसंघ अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि नेहरू हमारे सबसे बड़े प्रचारक हैं। उन्होंने देशभर में हमारी पहचान बनाई है। नेहरू वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। उनके नेतृत्व में जिस सरकार ने 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया उसी ने 1962 में चीनी हमले के बाद संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का निमंत्रण दिया। तबसे लेकर आज तक संघ को तीन बार प्रतिबंधित किया गया। पहले प्रतिबंध को उसने अपने संगठन की शक्ति के बल पर नाकाम किया। इसके बाद जब 1975 में इंदिरा गांधी ने प्रतिबंधित किया तो 1977 में संघ ने कांग्रेस को चुनावी शिकस्त देकर उसका मुकाबला किया। इसी प्रकार जब नरसिम्हा राव के कार्यकल में 1992 में प्रतिबंध लगा तो अदालत ने सारे आरोपों को निराधार करार देते हुए प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया। आजादी के समय कांग्रेस के अलावा देश में समाजवादी और साम्यवादी पार्टियां ही थीं, जिनकी नीतियों में कोई मतभेद नहीं था। जनसंघ की स्थापना से एक वैचारिक भिन्नता मिली और नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ। आज कांग्रेस से भी अधिक राज्यों में भाजपा सत्तासीन है। साम्यवादी विचारधारा के संगठन सभी क्षेत्रों में ध्वस्त हो चुके हैं। भ्रष्टाचार और कुशासन की पहचान बनने से हताश कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौवा खड़ा कर वह देश के मुसलमानों के वोट के सहारे चुनावी नैया पार लगा लेगी। मुसलमानों में संघ के प्रति भय का जो कृत्रिम माहौल है उसको भड़काकर सभी गैर भाजपाई दल भयदोहन की राजनीति कर रहे हैं। अब तो मुसलमान भी इस भ्रामक प्रचार से ऊबने लगा है। बिहार में मुस्लिम गुमराह नहीं हुआ और गुजरात में भी निष्पक्ष व विकासोन्मुखी कामों ने उन्हें भ्रमित होने से रोका है। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की छवि विकृत हो रही है। कांग्रेस में इससे बेचैनी है। आतंकी वारदातों में पाकिस्तानी हमलावरों के पकड़े जाने पर संतुलन बनाने के लिए हिंदू आतंकवाद का हौवा खड़ा किया जाता है। अब सोनिया गांधी की सुपर कैबिनेट हिंदू विरोधी सांप्रदायिकता विरोधी विधेयक पास कराना चाह रही है। यह आश्चर्य की बात है कि जो कांग्रेस दिग्विजय सिंह की राय को उनकी निजी राय कहकर अपना पल्ला झाड़ रही है वही एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जिसमें किसी संस्था अथवा व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति या कृत्य के लिए गिरफ्तारी का प्रावधान है। दिग्विजय सिंह की नवीनतम सोच है संघ बम बनाने की फैक्टरी है। दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश में दो स्थानों पर काले झंडे दिखाए गए। टीवी पर उन्हें जिस तरह भागते हुए दिखाया गया उससे उनके हिम्मती होने की छवि की चिंता उन्हें भी करनी चाहिए। जिस तरह उन्होंने बिना छानबीन के राजस्थान के पत्रकार को संघी घोषित कर उत्तेजना पैदा करने की कोशिश की और बाद में गलत साबित हुए वही हाल उनके बाकी आरोपों का भी है। केंद्र सरकार आरोपों के संबंध में छानबीन में बड़ी तेजी दिखाती है। क्या उसे दिग्विजय सिंह से संघ को बम बनाने की फैक्ट्री बताने की जानकारी नहीं लेनी चाहिए? वह आतंकी घटनाओं में संघ का हाथ होने का दावा करते हैं, लेकिन जानकारी नहीं देते। जिन्हें बेवजह फंसाया जा रहा है उनके खिलाफ प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री से मिलवाते हैं। प्रत्येक विस्फोट के बाद जांच एजेंसियां जिस दिशा में सक्रिय होती हैं उसके विपरीत बयान देना दिग्विजय सिंह का एकमात्र कार्यक्रम रहता है। अब तो वह भ्रष्टाचार के आरोप में पद से हटाए गए अथवा जेल में डाले गए लोगों की भी सार्वजनिक रूप से वकालत कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह की इन हरकतों से मनमोहन सिंह की सरकार को परेशान होना चाहिए न कि हिंदुत्व के प्रति निष्ठावान लोगों को। कांग्रेसी तो परेशान हैं इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि अपने भावी प्रधानमंत्री के जिस चमत्कारी संचालन से उनको कुछ आस बंधी है उसे वह धूमिल करते जा रहे हैं। इसलिए जो लोग यह चाहते हैं कि देश की व्यवस्था का संचालन समाज को भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्त करने वालों के हाथ में आना चाहिए, उन्हें दिग्गी राजा का अभिनंदन करना चाहिए। वह उसी काम में लगे हुए हैं। जहां तक संघ का सवाल है वह ऐसे सभी कपोकल्पित आरोपों के बाद समाज में और अधिक पैठ बनाने के लिए अनुकूलता पाता जा रहा है। (लेखक पूर्व सांसद हैं).
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Thursday, July 28, 2011
Friday, July 1, 2011
प्रधानमंत्री की खोखली दलील
शीर्ष भ्रष्टाचार पर जारी तकरार चरम पर है। सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध तगड़ा पहरेदार नहीं चाहती। संप्रग सरकार और भ्रष्टाचार पर्यायवाची हो गए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि वह प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के दायरे में लाने को तैयार हैं, लेकिन उनके मंत्रियों को डर है कि इससे अस्थिरता का खतरा है। मनमोहन सिंह ने कथित अस्थिरता पर अपनी राय नहीं दी। प्रश्न है कि यदि अस्थिरता की बात वास्तविक है तो प्रधानमंत्री क्यों तैयार हैं? अस्थिरता की बात काल्पनिक है तो मंत्रिगण क्यों विरोध कर रहे हैं? बात प्रधानमंत्री की मंत्रिपरिषद में सामूहिक उत्तरदायित्व की भी है। प्रधानमंत्री असहाय हैं? और कुछ मंत्री ज्यादा प्रभावशाली हैं। देश और अन्ना हजारे ताकतवर लोकपाल चाहते हैं। प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार में लाने की मांगें हैं लेकिन सरकार प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में न लाने के आग्रह पर अड़ी हुई है। प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग को संवैधानिक आदर्शो के विरुद्ध बताया है। अन्ना टीम और सरकारी समिति के बीच हुई नौ बैठकें बेनतीजा रहीं। सरकार ने जुलाई के पहले सप्ताह विरोधी दलों की बैठक बुलाई है। अन्ना विपक्ष के नेताओं से भी मिल रहे हैं। सरकार का रुख अडि़यल है तो अन्ना भी सत्याग्रही हैं, सो लोकपाल की बहस अब राष्ट्रीय बेचैनी है। प्रधानमंत्री कृपया देश को बताएं कि यह अस्थिरता क्या है? भारत की संविधान सभा में अस्थिरता के प्रश्न उठे थे। डॉ. अंबेडकर ने जवाबदेही और अस्थिरता के बीच जवाबदेही को जरूरी बताया था। उन्होंने संसदीय प्रणाली की जवाबदेही की प्रशंसा की थी और कहा था कि विधायिका की जवाबदेही में विफल सरकार सत्ता में रहने का अधिकार खो देती है। देश जवाबदेही की कीमत पर स्थिरता नहीं चाहता। आखिरकार भ्रष्ट सरकार की स्थिरता का मतलब क्या है? अनुच्छेद 75(3) के अनुसार समूची मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जवाबदेह है। स्थिरता या अस्थिरता के प्रश्न बेमतलब हैं। कांग्रेस स्थिर सत्ता चाहती है, स्थिर प्रधानमंत्री नहीं। मनमोहन सिंह को अस्थिर करने और राहुल गांधी को लाने के प्रस्ताव कांग्रेसजन ही करते हैं। बेशक प्रधानमंत्री देश का सर्वोच्च अधिशासी प्रतिनिधि है। उस पर लगे आरोपों से विदेश में देश का सम्मान घटेगा। उसे दागी राजप्रमुख के रूप में देखा जाएगा। लोकपाल विधेयक में इसका प्रावधान किया जा सकता है। प्रधानमंत्री के विरुद्ध लोकपाल में दर्ज शिकायतों का प्रकाशन और चर्चा कानूनी तौर पर रोकी जा सकती है। तो भी संसद में प्रधानमंत्री के विरुद्ध बहस के दरवाजे खुले रहेंगे। विपक्षी दल फिलहाल मौन हैं। अन्ना टीम ने अनशन आंदोलन की शुरुआत में राजनीतिक दलों को दूर रखा था। कारण और भी हैं। विपक्ष संप्रग पर विश्वास नहीं करता। संप्रग ने किसी भी राष्ट्रीय प्रश्न पर विपक्ष से संवाद नहीं बनाया। सत्तापक्ष ने अन्ना व रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलनों को भाजपा प्रायोजित बताया है। लेकिन लोकपाल विधेयक के प्रश्न पर विपक्षी दलों के विकल्प सीमित हैं। प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने के प्रश्न पर वे समझौतावादी नहीं हो सकते। सभी विपक्षी सरकारों द्वारा अपनी सत्ता के समय लाए गए विधेयकों में प्रधानमंत्री का पद भी लोकपाल के दायरे में रहा है। जबकि कांग्रेस प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के दायरे में कभी नहीं लाई। प्रधानमंत्री की गरिमा और संवैधानिक प्रतिष्ठा के तर्क बेकार हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने ही उनके सहयोगी भ्रष्टाचार करते रहे, वह जानबूझ कर अनजान रहे। भ्रष्टाचार अंतरराष्ट्रीय चर्चा बना। प्रख्यात राजनीतिक विचारक फाइनर ने कहा था कि प्रधानमंत्री कोई सीजर नहीं है जिसे चुनौती न दी जा सके। भारतीय प्रधानमंत्री संविधान, संसद या भारतीय कानूनों से बड़ा नहीं होता। भारतीय दंड विधान, कर चोरी, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम या अन्य कानून प्रधानमंत्री के विरुद्ध भी लागू होते हैं। तो प्रधानमंत्री को लोकपाल की जांच के दायरे से बाहर क्यों होना चाहिए? कांग्रेसजन ध्यान दें। भ्रष्टाचार अब राष्ट्रीय बेचैनी है। समूची व्यवस्था के प्रति गुस्सा है। न्यायपालिका के प्रति भारत के मन में श्रद्धा है। 2-जी व कालेधन आदि मसलों पर न्यायपालिका की सक्रियता सराही गई है, लेकिन भ्रष्टाचार से अछूती वह भी नहीं है। प्रधानमंत्री पद या न्यायालय की गरिमा के प्रश्न आम जनता को और भी आहत करते हैं। उमस गहराई है। आमजन आंधी की प्रतीक्षा में हैं। अन्ना हजारे या सिविल सोसाइटी की मांगों को इसीलिए जनसमर्थन मिला रहा है। स्वाभाविक ही विपक्ष से सकारात्मकता की अपेक्षा है। अन्ना ने 16 अगस्त से अनशन का निश्चय किया है। यह एक अशुभ संकेत है। संवेदनशील सरकारें ही अनशन का संज्ञान लेती हैं। उन्हें आंदोलन की जनजागरण नीति अपनानी चाहिए। जागृत जनमत आततायी सरकारों से भी अपनी बात मनवाकर ही दम लेता है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं).
Wednesday, June 29, 2011
संघीय ढांचे का असम्मान
लेखक केंद्रीय सत्ता पर गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं...
तानाशाही और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं चलते। लोकतंत्र का मुख्य तत्व है सत्ता का विकेंद्रीकरण। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता संचालन का सुस्पष्ट बंटवारा है। बावजूद इसके सोनिया नियंत्रित केंद्र सरकार गैरकांग्रेसी राज्यों के साथ भेदभाव कर रही हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार केंद्र के भेदभाव से खफा हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र पर गुजरात के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा को कांग्रेसी राज्यपाल के जरिए परेशान किया जा रहा है। राज्यपाल ने कर्नाटक सरकार की बर्खास्तगी की रिपोर्ट भेजी थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान प्रदेश को आवंटित कोयले की मात्रा न दिए जाने सहित ढेर सारे केंद्रीय भेदभावों से परेशान हैं। गरीबों को चावल और गेहूं बांटने की योजना के लिए लोकप्रिय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह बेहद हलकान हैं। केंद्र ने राज्य का खाद्यान्न कोटा घटा दिया है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व झारखंड की सरकारें भी केंद्र के रवैये से पीडि़त हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी केंद्र सरकार पर भेदभाव के आरोप लगाए हैं। संघीय ढांचे पर प्रश्नचिह्न है। सरकारिया आयोग की सिफारिशें मिमिया रही हैं। संविधान के खोल में असंवैधानिक तानाशाही है। बिहार पिछड़ा राज्य है। केंद्रीय मानक के अनुसार इस समय डेढ़ करोड़ परिवार गरीबी की रेखा के नीचे (बीपीएल) हैं, लेकिन केंद्र 65 लाख बीपीएल का ही खाद्यान्न व किरोसिन दे रहा है। बिहार के पास सिर्फ 150 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता है। बिजली उत्पादन इकाइयों के ढेर सारे प्रस्ताव हैं। इनके लिए कोल लिंकेज की जरूरत है। केंद्र हीलाहवाला कर रहा है। प्रधानमंत्री सड़क योजना की स्वीकृत राशि देने में भी बिहार भेदभाव का शिकार है। कई औद्योगिक घराने एथनॉल उत्पादन की इकाइयां लगाने को तैयार हैं, लेकिन केंद्र की अड़ंगेबाजी है। गुजरात की सरदार सरोवर परियोजना के बारे में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री को जनवरी 2011 में पत्र भी लिखा था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। सरकार ने सरदार पटेल की कर्मभूमि कर्मसाद, गांधी की जन्मभूमि पोरबंदर व गांधीनगर में जेएनयूआरएम योजना लागू करने का आग्रह किया था। केंद्र ने गांधीजी की जन्मभूमि वाले प्रस्ताव को ही स्वीकृति दी। सरदार पटेल से जुड़े प्रस्ताव को टरका दिया। केंद्र ने गुजरात का किरोसिन तेल कोटा भी 33 प्रतिशत घटाया है। गुजरात सरकार ने रसोई गैस की पाइपलाइन घरों तक बिछाई है। केंद्र ने पाइपलाइन बिछाने के कार्य को भी गलत बताया है। कांग्रेसी नेतृत्व संविधान और राज्यों द्वारा किए गए विकास का सम्मान नहीं करता। गैरकांग्रेसी सरकारों की लोकप्रियता उसे बर्दाश्त नहीं हैं। नरेंद्र मोदी या नीतीश कुमार की तो कतई नहीं। गुजरात अब अपनी जरूरत से ज्यादा बिजली बना रहा है। मोदी कम बिजली वाले राज्यों को बिजली देने को तैयार हैं, लेकिन केंद्र ग्रिड संयोजन नहीं करता। गुजरात कपास उत्पादक है। निर्यात की सुविधा नहीं। किसानों का नुकसान जारी है। कर्नाटक में रेशम धागे का आयात शुल्क 30 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने से कर्नाटक की क्षति हुई। मध्य प्रदेश की थर्मल इकाइयों को मध्य प्रदेश के ही कोयला ब्लाकों से कोयला नहीं मिलता। केंद्र चाहता है कि वह अन्य राज्यों से कोयला उठाए, घाटा उठाए, सरकारी खर्च बढ़े। मानेसर पावर परियोजना के काम को बंद करने के केंद्रीय आदेश हैं। उत्तराखंड का विशेष औद्योगिक पैकेज काटा गया। बवाल हुआ तो 2010 तक बढ़ाया गया। पर्वतीय क्षेत्र में स्थित इस राज्य के औद्योगीकरण और विकास पर भी केंद्र की वक्रदृष्टि है। केंद्र नक्सली हिंसा के विरुद्ध राज्यों को हर तरह की मदद का दावा भी करता है, लेकिन केंद्र ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को हैसियत बताने के लिए माओवादी संगठनों से रिश्तों के आरोपी विनायक सेन को योजना आयोग का सलाहकार बनाया है। तमिलनाडु की जयललिता से अभी उम्मीदें हैं, वरना उनके साथ भी यही भेदभाव होना है। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने भी संघीय ढांचे पर हमला किया है। सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के नाम पर लाया जा रहा विधेयक राज्य के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण है। गुजरात विधानसभा ने संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक दो बार पारित किया। राजस्थान की तत्कालीन भाजपा सरकार ने भी ऐसा ही विधेयक पारित करवाया था, लेकिन दोनों ही राज्यों में राज्यपाल ने अनुमति नहीं दी। कांग्रेस शासित महाराष्ट्र में ऐसा ही कानून (मकोका) लागू है। बिहार विधानसभा द्वारा पारित आधा दर्जन विधेयक राजभवन में हैं। झारखंड सरकार के दंड प्रक्रिया संशोधन, झारखंड विद्युत शुल्क, प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय व वस्तुओं पर प्रवेश कर के अधिनियम राष्ट्रपति के विचारार्थ लंबित हैं। हिमाचल प्रदेश के 3 विधेयक 2009 से व 2 विधेयक 2010 से राजभवन में लंबित हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने तो गोहत्या निरोधक विधेयक भी लटका रखा है। गुजरात में संगठित अपराधों वाले विधेयक के साथ ही पांच अन्य विधेयक राष्ट्रपति के यहां व सात विधेयक राज्यपाल के यहां लंबित हैं। मध्य प्रदेश सरकार के भी छह विधेयक राष्ट्रपति भवन में हैं, इसमें गोरक्षा निषेध व संगठित अपराध रोकने वाले विधेयक शामिल हैं। संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-विचार के बाद संघीय ढांचा बनाया था, लेकिन कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करके ही सत्ता चलाती है। चौथे आम चुनाव तक केंद्र व राज्यों में टकराव कांग्रेस का अंदरूनी मामला था। फिर गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। कांग्रेसी केंद्र ने स्वाभाविक ही भेदभाव किया। राज्यपालों का दुरुपयोग हुआ, सरकारों की बर्खास्तगी का खेल चला। योजना आयोग जैसी असंवैधानिक सत्ता ने राज्यों को औकात बताई। कर राजस्व के वितरण पर वित्त आयोग की व्यवस्था है, लेकिन सरकारी भेदभाव जारी है। संप्रग के शासन में सभी संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति घटी है। प्रधानमंत्री का प्राधिकार घटा है। महामहिम राज्यपालों को मोहरा बनाया गया। मुख्य सतर्कता आयुक्त की गरिमा कांग्रेस ने ही गिराई है। लोक लेखा समिति में कांग्रेस प्रायोजित हुल्लड़ हुआ। नियंत्रक महालेखाकार (कैग) पर भी टिप्पणियां की गईं। न्यायपालिका को भी हदें बताई गईं। राज्य नाम की संवैधानिक इकाई व मुख्यमंत्री जैसी संस्थाएं भी कांग्रेसी कोप का शिकार हैं। परिणाम सामने है। आम जन संविधान तंत्र और संसदीय जनतंत्र को ही दोषी ठहरा रहे हैं, लेकिन सारा दोष कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
Wednesday, June 1, 2011
राजनीति में कुनबापरस्ती
आरके धवन इंदिरा गांधी के समय से गांधी-नेहरू परिवार के अत्यंत करीबी माने जाते रहे हैं। राजीव गांधी के भी वह करीबी रहे, लेकिन सोनिया गांधी के अभ्युदय के बाद उनका दर्जा घटता गया और आजकल कांग्रेस कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य भर रह गए हैं। पिछले दिनों उनका एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी को अपने पिता के समान रिश्तेदारों और मित्रों को महत्व देने में घातक परिणामों से सचेत किया है। उन्होंने कहा है कि मित्र और रिश्तेदार अपने को संभालने वाले व्यक्ति के समकक्ष समझकर आचरण करते हैं। उन्होंने राजीव गांधी के रिश्ते में भाई लगने वाले अरूण नेहरू, मित्र अरूण सिंह तथा कैप्टन सतीश शर्मा का नाम लेकर कहा है कि इन तीनों में से प्रथम दो को मंत्रिपरिषद में जूनियर मंत्री और शर्मा को राजीव गांधी ने सांसद बनाया। तीनों का व्यवहार ऐसा था, मानों वे ही प्रधानमंत्री हों। इसका अत्यधिक विपरीत प्रभाव वरिष्ठ मंत्रियों और उन कांग्रेसजनों पर पड़ा जो चाहे पद पर रहे हों या हाशिए पर, सदैव कांग्रेस के प्रति निष्ठावान रहे हैं। धवन का यह साक्षात्कार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा पार्टी और सरकार में समन्वय के लिए एक समिति बनाए जाने के बाद आया है। इस समिति में गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, आनंद शर्मा और अहमद पटेल हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी समस्या के समाधान के लिए प्रणब मुखर्जी, एके एंटनी या वीरप्पा मोइली या फिर पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल की आवश्यकता नहीं समझी गई। राहुल गांधी का संदर्भ लेकर जो सलाह आरके धवन ने दी है, यदि उसके निहितार्थ की विवेचना की जाए तो यही स्पष्ट होता है कि उन्होंने राहुल गांधी का नाम भले ही लिया हो, लेकिन उनका लक्ष्य सोनिया गांधी हैं। उन्होंने वर्तमान मंत्रिमंडल की समीक्षा करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक भले मानुष हैं। वह वास्तव में राजनीतिक नहीं हैं। उनका उद्देश्य देश को अधिक मजबूती की ओर ले जाना है। उन्होंने अपने मंत्रियों को बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है। फिर भी कुछ लोग इसलिए नहीं बोलते कि कहीं महत्वपूर्ण पदों को पाने में उनका बोलना बाधक न साबित हो, जबकि वे राजनीति में लंबे समय से हैं। इसके बावजूद मंत्रिमंडल में सामंजस्य का अभाव सार्वजनिक रूप से प्रगट होता रहता है। यद्यपि धवन ने पार्टी और सरकार के बीच किसी प्रकार के विरोधाभास से इंकार किया है, फिर भी यह कहा है कि बहुत से वरिष्ठ लोगों में उनकी वरिष्ठता के अनुरूप प्रतिष्ठा न मिलने के कारण क्षोभ अवश्य है। आरके धवन का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोनिया गांधी के इटली सबंध की कुछ अंतराष्ट्रीय सौदों में भूमिका की बात सामने आई है। समाचारों के अनुसार लड़ाकू विमान की अमेरिका से खरीद का करार रद्द कर अब फ्रांस से बात चल रही है और उसमें इटली के कुछ लोगों का नाम बिचौलियों के तौर पर चर्चित हुआ है। इस समाचार का अभी तक खंडन नहीं हुआ है। राहुल गांधी के रिश्तेदार और मित्रमंडली में कौन-कौन हैं, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होगी, लेकिन जिस प्रकार वे एक अन्य महामंत्री दिग्विजय सिंह का बड़बोलेपन में अनुशरण कर रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि धवन का इशारा उसी ओर था। भट्टा पारसौल के मामले ने राहुल गांधी की अभिव्यक्तियों को हास्यास्पद बनाने का ही काम किया है। इससे कांग्रेस की प्रतिष्ठा बढ़ने के बजाय गिरी ही है। आज जो हालात हैं उसमें धवन की सलाह राजनीति के नक्कारखाने में तूती के समान भी असर दिखा सकेगी, इसकी कोई संभावना नहीं है। किसी एक राजनीतिक दल में कुनबापरस्ती हो या मित्र को तरजीह मिलती हो तो स्थिति में सुधार की अपेक्षा की जा सकती है। दुर्भाग्य से इस मामले में सभी दल एक समान हैं। यद्यपि करुणानिधि इसी कारण कुनबे सहित डूब गए हैं फिर भी इस रास्ते पर चलने वालों की चेतना जागृत नहीं हो रही है। चाहे पार्टी का ढांचा खड़ा करना हो या सत्ता संभालने वालों का चयन, सभी दल कांग्रेस के अनुयायी बन गए हैं। आजादी के बाद से प्राय: राज्यों और केंद्र में भी कांग्रेस की ही सत्ता रही है और सत्ताधारी या तो नेहरू-गांधी परिवार का व्यक्ति रहा है या फिर उनका चहेता। प्रयास यही रहा है कि उसकेहाथ में सत्ता न जाने दी जाए जिसके पैर के नीचे जमीन हो। कामराज योजना इसी मनोवृत्ति का परिणाम थी और इंदिरा गांधी ने मोहरों की तरह से मंत्रियों को इस खाने से उस खाने में रखकर किसी राजनेता को भी हैसियत वाला नहीं बनने दिया। आरके धवन इस सभी के अंतरंग जानकार हैं, क्योंकि नेहरू के समय से, जब वह एक कनिष्ठ सहायक के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में दाखिल हुए थे, निरंतर उनका दखल रहा है। इसलिए उनकी सलाह अनुभव के आधार पर है। कांग्रेस के वरिष्ठजनों और नीचे स्तर तक की नीतियों के कारण जो क्षोभ है वह अगले चुनाव में सफलता न मिलने पर पार्टी को 1977 की स्थिति में ले जा सकता है। (लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं)
Sunday, May 22, 2011
केंद्र की कठपुतलियां
लेखक राज्यपाल की केंद्रीय सत्तादल के प्रति वफादारी को कर्नाटक संवैधानिक संकट की वजह बता रहे हैं….
कांग्रेस अजब-गजब संयोगों का पर्याय है। प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के विद्वान हैं लेकिन देश मुद्रास्फीति और महंगाई की गिरफ्त में है। वह ईमानदार कहे जाते हैं लेकिन पूरी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। विधिमंत्री रहे प्रख्यात विधिवेत्ता कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज संविधान प्रमुख होकर भी बहुमत प्राप्त राज्य सरकार की बर्खास्तगी पर आमादा हैं। वह उच्चतम न्यायालय की सदन को ही विश्वासमत का श्रेष्ठ स्थान बताने की स्थापना से असहमत हैं। वह सदन आहूत करने और विश्वासमत लेने के मुख्यमंत्री के अनुरोध को भी टाल चुके हैं। वह जैसे-तैसे कर्नाटक सरकार का वध चाहते हैं। वह महामहिम हैं लेकिन कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं की तरह भाजपा सरकार के खिलाफ हैं। संवैधानिक ढांचा विफल हो जाने की उनकी अपनी व्याख्या है। ताजा सिफारिश विवाद का विषय है। केंद्र उनकी सिफारिश नहीं मानता तो भी वह लज्जित नहीं होते। वह राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था की साख गिराने वाले महामहिमों की सूची के चमकते नायक हैं। आश्चर्य है कि बावजूद इसके केंद्र उन्हें वापस नहीं बुलाता। राज्यपालों का आचरण संविधान निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में हैं। रोहिणी कुमार चौधरी ने संविधान सभा में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया पर आशंका जताई और कहा कि प्रधानमंत्री के परामर्श से राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्त करेंगे। प्रधानमंत्री राजनीति में डूबा व्यक्ति होगा। उसके विचार तटस्थ नहीं होंगे। उड़ीसा के विश्वनाथ दास ने भी शंका व्यक्त की-ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गवर्नर जो कुछ करते थे, वही अब सत्तारूढ़ दल करेगा। जवाहरलाल नेहरू ने बहस में हस्तक्षेप किया और कहा, इस पद के लिए हम एक पूर्ण तटस्थ व्यक्ति रखेंगे जो प्रांत की सरकार को मान्य हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह अपने प्रकार्य अच्छी तरह नहीं कर सकेगा। संविधान सभा केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पिट्ठू राज्यपाल नहीं चाहती थी। बावजूद इसके अधिकांश राज्यपालों ने संविधान की मर्यादा भंग की। पहले आम चुनाव में कांग्रेस मद्रास प्रेसीडेंसी में हार गई। टी प्रकाशम ने सरकार गठन का दावा किया। राज्यपाल ने अल्पमत के बावजूद सी राजगोपालाचार्य को शपथ दिलाई, जोड़तोड़ हुई, बहुमत बना। यह सब पंडित नेहरू के समय हुआ। लोकतंत्र जवाबदेही से चलता है। सारी संवैधानिक संस्थाएं जवाबदेह हैं। राज्यपाल की कोई जवाबदेही नहीं। राज्यपाल केंद्रीय सत्तादल के अनुसार ही चलते हैं। राज्य सरकारों की बर्खास्तगी संवेदनशील मसला है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि इस अस्त्र का प्रयोग कम से कम किया जाएगा लेकिन संविधान प्रवर्तन 1950 से अब तक मात्र 61 वर्ष में लगभग 115 दफा राज्य सरकारों की बर्खास्तगी की जा चुकी है। 1970 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का अधिवेशन प्रस्तावित था, लेकिन राज्यपाल ने बहुमत के लिए सदन की प्रतीक्षा नहीं की और चरण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई। हरियाणा के राज्यपाल तपासे ने बहुमत दल के नेता देवीलाल को विधायकों की परेड के लिए 24 मई, 1982 की तारीख दी और इसी बीच भजनलाल को मुख्यमंत्री की शपथ भी दिला दी गई। आंध्र के राज्यपाल रामलाल ने बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव सरकार का वध (1984) किया। रामाराव सारे विधायकों सहित राष्ट्रपति भवन पहुंचे। विधायकों को राष्ट्रपति भवन ले जाने की परंपरा शुरू हुई। राज्यपाल संविधान की संरक्षक संस्था है लेकिन तमाम राज्यपालों ने संविधान को भी शर्मसार किया है। गुजरात के राज्यपाल कृष्णपाल ने शंकर सिंह बाघेला के पक्ष में भाजपा सरकार की बर्खास्तगी की। अयोध्या हादसे के दिन बहुमत प्राप्त मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने त्यागपत्र दिया। लेकिन राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश सरकार की बर्खास्तगी ही की। केंद्र ने अयोध्या कांड के बहाने तीन अन्य भाजपाई राज्य सरकारें भी बर्खास्त करवाईं। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उत्तर प्रदेश में नया रिकॉर्ड बनाया। कल्याण सिंह ने 21 अक्टूबर, 1997 को बहुमत सिद्ध किया। बावजूद इसके महामहिम ने कल्याण सिंह को हटाकर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बनाया। न्यायालय के निर्देश पर विधानसभा का विशेष सत्र 26 फरवरी, 1998 को हुआ। कल्याण सिंह जीत गए। बिहार सरकार की बर्खास्तगी पर न्यायालय का आदेश जगजाहिर है। कांग्रेस ने प्रतिबद्ध राज्यपाल की परंपरा चलाई। 1977 की जनता पार्टी सरकार भी उसी रास्ते चली। उसने नौ विधानसभाएं भंग कीं। 1980 में केंद्र की कांग्रेसी सरकार ने भी नौ विधानसभाएं बर्खास्त कीं। मूलभूत प्रश्न यह है कि क्या राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ दल के ही एजेंट हैं। 1970 के राज्यपाल सम्मेलन में आचार संहिता पर सहमति बनी। राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल की अध्यक्षता में राज्यपालों की पांच सदस्यीय समिति बनाई। समिति ने तय किया, बहुमत का प्रश्न विधानसभा ही तय करेगी, मुख्यमंत्री अधिवेशन न बुलाए तो बहुमत समाप्त माना जाएगा। वैकल्पिक सरकार की संभावनाओं के खत्म होने पर सदन भंग ही रास्ता है। गठबंधन सरकारों में किसी घटक के अलग हो जाने पर भी सरकार पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। मुख्यमंत्री से विधानसभा बुलाकर बहुमत सिद्ध करने को कहा जाना चाहिए। फिर सरकारिया आयोग (1983) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य का शासन जब संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल रहा है तब तथ्यों सहित राज्य सरकार को पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और सरकार के उत्तर पर गंभीरतापूर्वक विचार करके ही कोई कार्रवाई की जानी चाहिए। सन् 1997 के राज्यपाल सम्मेलन में भी आचरण संबंधी सात सूत्रीय दिशानिर्देश तय हुए। राजग सरकार के संविधान समीक्षा आयोग ने भी कई मूल्यवान सिफारिशें की थीं लेकिन प्रतिबद्ध राज्यपाल अपने काम पर हैं। कर्नाटक के राज्यपाल ने केंद्र के ईमानदार प्रतिनिधि के रूप में काम नहीं किया। उन्होंने राज्य सरकार के विरुद्ध दो बार केंद्र को रिपोर्ट दी। केंद्र ने पहली रिपोर्ट खारिज की, दूसरी पर असमंजस है। बुनियादी सवाल यह है कि बार-बार केंद्र को गुमराह करने और केंद्र व राज्य दोनों को ही विषम परिस्थितियों में झोंकने वाले राज्यपाल के प्रति केंद्र के मन में खास तरह की ममता क्यों है? क्या केंद्र ने ही उन्हें कर्नाटक सरकार को अस्थिर करने या उसका वध करने की सुपारी दी है? अनेक राज्यपालों के आचरण से संविधान की गरिमा को चोट पहुंची है। राज्यपालों की नियुक्ति व आचरण पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है। इस पद पर राजनेताओं की नियुक्ति बंद होनी चाहिए। निवर्तमान राज्यपाल को बाद में किसी लाभ के पद पर नियुक्त न किए जाने का प्रावधान भी जरूरी है। संवैधानिक चीरहरण का धारावाहिक आचरण बर्दाश्त के बाहर है। (लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं )
Monday, April 11, 2011
बंगाल के पतन की कहानी
1971 में स्कूली परीक्षा देने के तुरंत बाद मैं कोलकाता छोड़कर दिल्ली आ गया। इसके कुछ व्यवहारिक कारण थे। मैं तीन साल में स्नातक पूरा करना चाहता था। उन दिनों कोलकाता में राजनीतिक हिंसा के कारण डिग्री कोर्स पूरा करने में कम से कम 16 महीने अधिक लग जाते थे। मेरे आदरणीय दादा मेरी योजनाओं को लेकर भयाक्रांत थे। उन्होंने व्यंग्य से कहा-क्या दिल्ली में कॉलेज भी हैं? उनकी निगाह में एक छात्र को इतिहास पढ़ने के लिए ऑक्सब्रिज के अलावा केवल एक ही स्थान था-प्रेसीडेंसी कॉलेज। बंगाल पर गर्व करने वाले लोगों की तरह उनके लिए श्रेष्ठ शिक्षा के लिए बंगाल ही सर्वश्रेष्ठ स्थान है। किसी इतिहासकार के लिए उस क्षण को चिन्हित करना दिलचस्प होगा जब बंगाली भ्रदलोक खुद को भारत की श्रेष्ठ बौद्धिक जाति के रूप में मानने लगा था। क्या यह मराठा वर्चस्व के खात्मे के बाद और पेशवाओं के सांस्कृतिक पतन के बाद शुरू हुआ? क्या यह राजा राममोहन रॉय के विविध आध्यत्मिक विचारों की एक शाखा था? या फिर इसका संबंध पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता के सबसे लंबे संसर्ग से है? इस आत्मविश्वास का जो भी कारण हो, यह सत्य है कि बंगाल ने बीसवीं सदी में उदीप्त भाव के साथ कदम रखा। यहां तक कि 1947 का विभाजन भी बंगाली मिथ्याभिमान को तोड़ नहीं पाया। बाद में बेदखली और कठिनाइयों के कारण बंगाल की बौद्धिक वरीयताओं और फैशन से हालात बदल गए। 1943 के अकाल और इसके पश्चात पूर्वी बंगाल के नुकसान के कारण भद्रलोक बुद्धिजीवी उखड़ गए। प्रगतिशील राजनीति वैश्विक धारा के रूप में उभरी, पर इससे बंगाल में मूलभूत विकृतियां पैदा हो गईं। सर्वप्रथम, पूंजीवाद को लेकर अंतरजात अविश्वास के कारण बंगाली बुद्धिजीवियों ने खुद को संपदा निर्माण की प्रक्रिया से काट लिया। राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान बंगालियों के मन में स्वदेशी उद्यमिता के मूल्यों की पैठ के सजग प्रयास हुए। 1950 के बाद बौद्धिक अनुकूलता धीरे-धीरे दूसरे पक्ष की तरफ मुड़ गई। समाजवाद को पसंदीदा विकल्प के रूप में पेश किया गया, जबकि वास्तविकता इसके उलट थी। दूसरे, इसका इतना नुकसान न हुआ होता, अगर प्रगतिशील विचार बंगाल की प्रमुख बौद्धिक धारा में से एक होता। उदाहरण के लिए ब्रिटिश राज के आखिरी दशक वफादारी, राष्ट्रवादी कट्टरता, हिंदुत्व, मुस्लिम अलगाव, गांधीवाद, क्रांतिकारी आतंकवाद और मार्क्सवाद की खिचड़ी के साक्षी रहे हैं। 1967 तक कांग्रेस के जनाधार में सेंध लगने के बाद समाजवाद या मार्क्सवाद की बहस छिड़ गई। वाम वर्चस्व ने विकास में बाधाएं खड़ी कर दीं और बौद्धिक रूढि़वाद को पनपाने में योगदान दिया। वर्तमान चुनाव अभियान में तृणमूल कांग्रेस बीच का रास्ता अपनाने का प्रयास कर रही है। यह राजनीतिक गांभीर्य और विकास के मानवीय चेहरे पर जोर दे रही है। आज बंगाल के सभी तबकों में वाम दलों के घटते जनाधार का कारण राज्य का राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाक्रम से कटा रहना है। अपने पहले कार्यकाल में वाम मोर्चा देहात में सत्ता समीकरण बदलने में सफल रहा। ऑपरेशन बर्गा के तहत इसने भूमिहीन किसानों के बीच जमीन का वितरण कर गरीबों के सशक्तीकरण का नेतृत्व किया। जहां शेष भारत ने बाजारोन्मुख नीतियों द्वारा दिए गए नए अवसरों को लपक लिया, वहीं बंगाल सशक्तीकरण के अपने मॉडल पर ही आत्ममुग्ध होता रहा। यानी वह गुस्ताखियों की आजादी के मजे लेता रहा और बंद के दौरान वहां की सड़कों पर लोग क्रिकेट खेलते रहे। बंगाल में निवेश का माहौल न होने के कारण यह विकास की दौड़ में पिछड़ता चला गया। अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि बंगाल के आर्थिक पतन का लंबे समय तक संज्ञान नहीं लिया गया। करीब तीन दशक तक बंगाल नकार की मुद्रा में रहा। जब राजीव गांधी ने कलकत्ता को दम तोड़ता शहर बताया तो वह भविष्यदृष्टा होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से दुस्साहसिक भी थे। टाटा मोटर्स का नरेंद्र मोदी के गुजरात में जाना आत्मबोध का निर्णायक क्षण था। कारण कुछ भी हो, यह कटु सच्चाई है कि ऐसे देश में जो 9 फीसदी की विकास दर से दौड़ रहा हो, बंगाल में ठहराव आ गया है। जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, बंगाल बदलाव के लिए तैयार दिखाई दे रहा है। अगर परिवर्तन होता है तो नई व्यवस्था के सामने कठिन चुनौतियां होंगी। नाकारा प्रशासन, खंडित समाज, तीन दशक के कैडर आतंक के खिलाफ जनता में आक्रोश और अभी भी प्रगतिशीलता के स्वप्नलोक में रची-बसी बौद्धिक संस्कृति प्रगति की राह में प्रमुख बाधाएं हैं। बंगाल का कायाकल्प प्रबुद्ध राजनीतिक नेतृत्व के बूते ही संभव है। साथ ही इसके लिए जोरदार क्रांतिरोधी अभियान भी जरूरी है, कम से कम बंगालियों के मानस में। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
Monday, March 28, 2011
प्रधानमंत्री का राजनीतिक जवाब
अभिजात वर्ग के जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस में अन्य नेताओं से राजनीतिक और व्यक्तिगत दूरी बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास करना पड़ा था। प्रथम प्रधानमंत्री के सामाजिक तबके में अधिकांश कांग्रेसी राजनेताओं को साधारण कोटि का, अशिक्षित, संकीर्ण मानसिकता वाला माना जाता था। बहुतों को आलसी, गोपूजा करने वाला और ज्योतिषी व आयुर्वेदिक दवाओं में विश्वास रखने वाला माना जाता था। कुछ पर बेईमान का ठप्पा लगा था। धोतीवालों को लेकर नेहरू की अरुचि आंशिक रूप से वर्ग समस्या थी। हालांकि प्रमुख रूप से यह उस कुंठा का परिणाम था जो शक्तिशाली प्रांतीय नेताओं पर सवारी न गांठ पाने से पैदा हुई थी। इंदिरा गांधी को कांग्रेस को नीचा दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, क्योंकि जहां तक उनका सवाल था, वह खुद कांग्रेस थीं। किसी और का कोई मतलब नहीं था। अटल बिहारी वाजपेयी के बहुत से सहयोगियों का मानना है कि वह गलत पार्टी में सही व्यक्ति थे। उनका कद भारतीय जनता पार्टी से भी इतना ऊंचा था कि यह बताने में भी एक प्रकार से उनकी हेठी थी कि वह भाजपा नेता हैं। वास्तव में राजग सरकार के बहुत से फैसले भाजपा की नीति के उलट या अलग थे। वाजपेयी के दरबारियों ने जिस भद्दे तरीके से उन्हें भाजपा से अलग दिखाने की कोशिश की उसका उतना ही हास्यास्पद दोहराव मनमोहन सिंह के मामले में नजर आ रहा है। लगता है कि रेसकोर्स रोड की तीन कोठियों में कोई वास्तुदोष है कि इनमें रहने वाले प्रधानमंत्री मानने लगते हैं कि उनकी शक्ति में राष्ट्रपति और राजाओं की शक्ति निहित है। पिछले सात माह से संप्रग सरकार एक के बाद एक भ्रष्टाचार के विपक्ष के वारों का सामना कर रही है। घोटालों ने तीन मंत्रियों की बलि ले ली है, फिर भी मनमोहन सिंह की अपने खुद के मंत्रियों को काबू में रखने की क्षमता पर सवालिया निशान लगा है। अपने राजनीतिक कॅरियर में मनमोहन सिंह पहली बार आलोचना और हंसी के पात्र बने हैं। एक ऐसा व्यक्ति जिसने सार्वजनिक जीवन में अपनी शिक्षा और जानकारी के बल पर प्रवेश पाया, अब जैसे कुछ न जानने को कला की एक विधा के रूप में स्थापित कर चुका है। उनकी साफ-सुथरी छवि पूरी तरह दागदार हो गई है। जुलाई 2008 में वोट के लिए नोट घोटाले पर विकिलीक्स के नए खुलासों के बाद पिछले सप्ताह मनमोहन सिंह को विपक्ष के आरोपों की भारी गोलाबारी झेलनी पड़ी। इस बात से साफ इनकार के अलावा कि न तो वह खुद और न ही कोई कांग्रेसी इस घोटाले में शामिल था, प्रधानमंत्री इस आरोप का कोई विश्वसनीय जवाब नहीं दे पाए कि किशोर चंद्र देव संसदीय समिति को उद्धृत करते हुए उनका बयान तथ्यों से परे था। विडंबना यह है कि इतना सब होते हुए भी प्रधानमंत्री इस भीषण संसदीय युद्ध से साफ बच निकले। यह इसलिए संभव हो पाया कि उन्होंने भाजपा की सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी पर जोरदार प्रहार किए। लालकृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की अदम्य लालसा पर तंज कसते हुए उन्होंने भाजपाइयों को हताशों की टोली साबित कर दिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने किसी भी सदन में विपक्ष के नेता को निशाना नहीं बनाया। उन्होंने सोचसमझ कर ऐसे व्यक्ति को चुना जो चुनाव हार गया और जनादेश से असंतुष्ट रहा। आडवाणी के ढीले-ढाले रवैये ने सरकार पर विपक्षी हमले की धार भोथरी कर दी। कभी खत्म न होने वाले घोटालों के वार से कांग्रेस को गंभीर क्षति पहुंची, किंतु प्रधानमंत्री ने किसी तरह खुद का अधिक नुकसान होने से बचा लिया। वास्तव में, विकिलीक्स पर बहस के बाद मनमोहन सिंह एक सप्ताह पहले के मुकाबले कहीं मजबूत होकर उभरे हैं। यह राहत तात्कालिक हो सकती है, क्योंकि अभी संप्रग के पिटारे में घोटालों के प्रेतों के निकलने का सिलसिला बंद नहीं हुआ है। मोहाली में भारत-पाक क्रिकेट मैच देखने का मनमोहन सिंह का पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को दिया गया न्यौता वास्तव में शिष्टाचार वश दिया गया है, किंतु जिस तरीके से इसे प्रचारित किया जा रहा है उससे लगता है कि एक अनपेक्षित शुरुआत को भांपकर प्रधानमंत्री भारत-पाक वार्ता को फिर से पटरी पर लाने को उतावले हैं। यह शर्म-अल-शेख समझौते के बाद चौतरफा आलोचना से घिरने के बाद भारत के धीमे चलो रुख के विपरीत है। अस्थिर पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने से एक बार फिर भारत दुस्साहसिक कूटनीति के अखाड़े में कूद पड़ा है। प्रधानमंत्री अपनी संशयग्रस्त पार्टी के सामने कुछ सकारात्मक कर दिखाना चाहते हैं। हमारी पड़ोस नीति न केवल घरेलू मजबूरियों की बंधक है, बल्कि यह एक छवि चमकाने का ऐसा खेल बन गई है जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी शामिल है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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