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Friday, September 30, 2011

राज्यपाल की मर्यादा का उल्लंघन


राज्यपाल का पद एक बार फिर विवादों में है। इस बार गुजरात की राज्यपाल की नीयत पर उंगली उठाई जा रही है। घटना की पृष्ठभूमि में गुजरात के लोकायुक्त की नियुक्ति में किया जाने वाला मनमानापन है। गत माह राज्यपाल ने अवकाश प्राप्त न्यायाधीश आरए मेहता को गुजरात का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया। इस मामले में उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल से कोई सलाह नहीं ली। राज्यपाल का तर्क है कि उन्होंने गुजरात लोकायुक्त अधिनियम 1986 के अनुसार काम किया है। उनका कहना है कि गुजरात लोकायुक्त अधिनयम की धारा-3(1) में लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा किए जाने की व्यवस्था है और यह भी कि ऐसा करते समय गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा विधानसभा के विपक्ष के नेता से परामर्श किए जाने की बाध्यता है। उसमें मुख्यमंत्री का नाम नहीं लिखा हुआ है इसलिए मुख्यमंत्री से परामर्श करना उनके लिए जरूरी नहीं था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि भारतीय संविधान के अंतर्गत क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श के बिना इस तरह की नियुक्तियां कर सकता है? यदि हां, तो यह विवेकाधिकार किस सीमा तक है? यही सवाल मोदी से उपवास का हिसाब मांगने पर भी उठता है। संविधान सभा में आशंका व्यक्त की गई थी कि केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार होने पर केंद्र राज्यपालों के माध्यम से राज्य के कामकाज में दखलंदाजी कर सकता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 30 दिसंबर, 1948 को संविधान सभा में कहा था कि राष्ट्रपति की तरह ही राज्यों में राज्यपाल केवल संवैधानिक तथा प्रतीकात्मक प्रधान होगा। संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्राध्यक्ष के पास सीमित विशेषाधिकार ऐसे होते हैं जिनका इस्तेमाल वे अपने विवेक के अनुसार कर सकते हैं। उनका मानना था कि राज्यपालों की स्थिति और उनके विवेकाधिकार वही होंगे जो राष्ट्रपति के हैं और राज्यपाल को राज्य मंत्रिमंडल के परामर्श से ही काम करना होगा। राज्यपाल और राज्य मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद-163 में की गई है। उसमें तीन महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। पहला यह कि राज्यपाल की सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी और कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें उसे अपने विवेक के अनुसार काम करने का अधिकार होगा। दूसरा यह कि उन मामलों को तय करने का अधिकार राज्यपाल के पास होगा कि कहां पर उसे मंत्रिपरिषद की सलाह माननी है और कब अपने विवेक के अनुसार काम करना है। तीसरा प्रावधान यह कि मंत्रियों द्वारा राज्यपाल को दी गई सलाह के संबंध में जांच करने का अधिकार न्यायालय को नहीं होगा। गुजरात की राज्यपाल अनुच्छेद-163 का अर्थ अपने तरीके से निकाल रही हैं जो संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुकूल नहीं है। गुजरात की राज्यपाल ऐसी अकेली शख्यिसत नहीं हैं जिन्होंने अनुच्छेद-163 का अपने मन मुताबिक अर्थ निकाला हो। राज्यपालों ने राज्य शासन के साथ सैकड़ों बार खिलवाड़ किया है। एक बार तो नौबत ऐसी आ गई थी कि केंद्र सरकार के इशारे पर राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रकरणों की बाढ़ आ गई थी। इसकी शुरुआत 1952 में ही हो गई थी, जब तत्कालीन मद्रास राज्य के राज्यपाल श्रीप्रकाश ने स्पष्ट बहुमत नहीं होने के बावजूद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। सन 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली सरकार को गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया। शुरू में अदालतें इस तरह के दुरुपयोगों में हस्तक्षेप करने से बचती रहीं किंतु जब पानी नाक से ऊपर पहुंच गया तो न्यायालय को दखलंदाजी करनी पड़ी। कम से कम चार मामले ऐसे आए जिनमें न्यायालय ने राज्यपाल के आचरण पर गंभीर टिप्पणी की। सन 1998 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रमेश भंडारी ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करके दूसरे मंत्रिमंडल को शपथ दिला दी। जगदंबिका पाल बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना पड़ा कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के समर्थकों की संख्या का पता लगाया जाए। सन 2005 में झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल ने संविधान की अपेक्षाओं के प्रतिकूल आचरण किया और राज्य सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की। अनिल कुमार झा बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा के अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वह सदन में शक्ति परीक्षण कराएं। सदन में मतदान से यह साबित हो गया कि राज्यपाल गलत थे। एसआर बोम्बई बनाम भारत संघ (सन 1994) मामले में राज्यपाल के अधिकार और उसकी मर्यादा से जुड़े विषयों पर व्यापक दिशानिर्देश किए गए। मंशा यह थी राज्यपाल अपने को तानाशाह न समझे बल्कि संविधानिक मर्यादा के अनुरूप आचरण करे। इसके बाद रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि कोई राज्यपाल बहुमत के दावे को इस आधार पर नकार नहीं सकता कि उसकी व्यक्तिगत राय या अनुमान के मुताबिक बहुमत हासिल करने के लिए अनैतिक या गैरकानूनी साधनों का इस्तेमाल किया गया। गुजरात के मामले में एक बार फिर इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है। (लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ हैं)

प्रधानमंत्री की जवाबदेही


लेखक मंत्रिमंडल और उसके मुखिया की कार्यशैली को संप्रग सरकार के संकट का कारण बता रहे हैं
केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार का संकट गहराता जा रहा है। संकट 2जी घोटाले और उसकी खुलती नई-नई परतों की वजह से उतना नहीं है, जितना मंत्रिमंडल और उसके मुखिया की कार्यशैली के कारण है। क्या एक गैरराजनीतिक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का प्रयोग विफल हो रहा है? संप्रग-1 के नायक डॉ. मनमोहन सिंह संप्रग-2 के खलनायक जैसे क्यों नजर आने लगे हैं? क्या यह विपक्ष के भ्रामक प्रचार का नतीजा है या मीडिया का इस सरकार से मोहभंग का? क्या कांग्रेस के अंदर ही ऐसे लोग हैं जो इस सरकार और मनमोहन सिंह को कामयाब नहीं होने देना चाहते? क्या मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में कांग्रेस का दबा हुआ अंदरूनी संघर्ष अब खुलकर सामने आने लगा है? क्या प्रधानमंत्री की सरकार पर और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पार्टी पर पकड़ ढीली पड़ती जा रही है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हर कोई जानना चाहता है। सवाल दिन ब दिन बढ़ रहे हैं पर जवाब देने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। 2जी घोटाले की आंच अब पी चिदंबरम तक पहुंच गई है। सीबीआइ और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इस मामले में चिदंबरम की भूमिका की जांच करने की कोई जरूरत नहीं है। चिदंबरम के मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने वाले सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि नए तथ्यों की रोशनी में जांच कराने में हर्ज क्या है। नया तथ्य वित्त मंत्रालय का वह नोट है जो प्रधानमंत्री के लिए तैयार किया गया था। इस नोट को तैयार करने में कई मंत्रालय और कैबिनेट सचिव भी शामिल थे। प्रधानमंत्री इस पूरे मामले का तथ्यात्मक ब्यौरा चाहते थे। इस नोट में कहा गया है कि तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कोशिश की होती तो घोटाले को रोका जा सकता था। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि मनमोहन सरकार के दोनों वरिष्ठ मंत्रियों प्रणब मुखर्जी और चिदंबरम आपस में बातचीत भी नहीं करते। इसलिए इस पूरे मामले को दोनों के आपसी झगड़े का नतीजा बताया जा रहा है। दोनों की सोनिया गांधी के दरबार में पेशी हो चुकी है। अब सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की मुलाकात के बाद कोई अंतिम फैसला होगा। दोनों की नजर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर है। लेकिन प्रधानमंत्री ने मंगलवार को विदेश से लौटते समय हवाई जहाज में मीडिया से कहा कि सरकार में सब ठीक-ठाक है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह समय से पहले चुनाव के लिए बेचैन है और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का कहना है कि यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला नहीं है जिसे पार्टी के नेता मिल बैठकर सुलझा लेंगे। यह जनता के पैसे का सवाल है। इस नोट के आधार पर विपक्ष चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहा है। सवाल इस बात का नहीं है कि चिदंबरम राजा को रोक सकते थे या नहीं। सवाल इस बात का है कि प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्य अपनी ही सरकार की बनाई नीति से सहमत हैं या नहीं। स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए पहले आओ पहले पाओ की नीति को लागू करने में तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा ने क्या गड़बड़ की यह एक अलग मामला है। उससे पहले सवाल है कि क्या तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस नीति से सहमत थे या हैं। आजाद भारत की यह पहली सरकार है जिसका मुखिया सहित हर सदस्य यह साबित करने में लगा है कि जो कुछ हुआ उसके लिए कम से कम वह जिम्मेदार नहीं है। सरकार के एक अहम नीतिगत फैसले की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है। किसी टीम का कप्तान टीम की जीत हार या उसके प्रदर्शन से अपने को कैसे अलग रख सकता है? ऐसी हालत में कैबिनेट के सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का क्या होगा? अगर सरकार के प्रशासनिक या नीतिगत फैसले की जिम्मेदारी और जवाबदेही से प्रधानमंत्री मुक्त हैं तो सरकार में प्रधानमंत्री की भूमिका क्या है? क्या प्रधानमंत्री को उनकी ही सरकार से अलग करके देखा जा सकता है? प्रधानमंत्री और उनके वरिष्ठ सहयोगी अपने इस व्यवहार से एक स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि इस नीतिगत फैसले में कुछ गड़बड़ जरूर है। मनमोहन सिंह सरकार के हर गलत फैसले से अपने को अलग दिखाने में सबसे आगे नजर आते हैं। ऐसे में दूसरे मंत्री भी ऐसा ही करें तो क्या गलत है। चिदंबरम अगर आज संकट में हैं तो उसके लिए प्रणब मुखर्जी से उनकी प्रतिस्पर्धा या प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा जिम्मेदार नहीं है। चिदंबरम इसलिए संकट में हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। जब ए राजा स्पेक्ट्रम आवंटन की नीति तय कर रहे थे तो प्रधानमंत्री क्या कर रहे थे। उन्हें देश को बताना पड़ेगा कि वह अपनी ही सरकार की इस नीति से सहमत थे या नहीं। यदि सहमत थे तो उसके बचाव में खड़े क्यों नहीं हो रहे। और यदि उन्हें इस नीति में खामी नजर आ रही थी तो उसे सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया। प्रधानमंत्री चिदंबरम का बचाव तो कर रहे हैं पर अपनी सरकार की नीति का नहीं। उन्हें पता है कि चिदंबरम के जाते ही उनका रक्षा कवच ध्वस्त हो जाएगा। चिदंबरम के जाने के बाद प्रधानमंत्री को विपक्ष के हमलों से बचाना कठिन हो जाएगा। सोनिया गांधी के सामने यही कठिनाई है। मनमोहन सिंह को बचाने के लिए चिदंबरम को बचाना उनकी मजबूरी है। कांग्रेस और सोनिया गांधी की मुश्किल यह है कि पैराशूट होने के बावजूद सरकार लगातार गिरती जा रही है। पैराशूट खुले (राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद संभालने को तैयार हों) तभी सरकार सुरक्षित जमीन पर उतर सकती है। वरना सरकार का नीचे जाना तो तय है। सवाल केवल रफ्तार और समय का है। घोटालों का बोझ जितना बढ़ेगा गिरने की रफ्तार उतनी तेज होगी। विपक्ष और मीडिया को कोसने की बजाय प्रधानमंत्री और सोनिया को अपना घर दुरुस्त करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि मीडिया और विपक्ष जो कह रहा है देश की जनता उस पर अविश्वास नहीं कर रही। संकट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दरवाजे पर आ गया है। घर में आग लगी हो तो पड़ोसी की निंदा में समय गंवाना समझदारी नहीं मानी जाती। विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करके प्रधानमंत्री इस आग पर काबू नहीं पा सकते। इस समय विपक्ष पर हमला आग पर पानी की बजाय पेट्रोल का काम करेगा जो उनकी सरकार ने पहले ही काफी महंगा कर रखा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Wednesday, July 27, 2011

राजनीतिक प्रयोग का समय


आखिर हमारे देश में राष्ट्रस्तरीय नेतृत्व का अकाल क्यों है? सवाल यह भी बनता है कि आज राष्ट्र स्तरीय नेतृत्व की आवश्यकता ही किसे है? जवाबों की तलाश हमें हमारी राजनीतिक व्यवस्था की ओर ले जाती है। हमारी राजनीति आज अगर राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं पैदा कर रही है तो कहीं इसके लिएहमारी व्यवस्था तो जिम्मेदार नहीं है? हमारे राष्ट्रीय नेता तो आजादी के आंदोलन की उपज थे। राष्ट्रीय नेताओं की जाति का खत्म हो जाना एक बड़ा सरोकार है। कारण? क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता पर हावी हो चली है। हमने अनेक प्रधानमंत्री देखे हैं जिनको देश की जनता ने प्रधानमंत्री के रूप में सोचा ही नहीं था। सांसदगण द्वारा चुना गया नेता मूलत: सांसद होता है। अत: मात्र एक संसदीय क्षेत्र हमारे नेतृत्व की स्वत: सीमा बन जाता है। चूंकि संपूर्ण राष्ट्र किसी का चुनाव क्षेत्र नहीं बनता इसलिए राष्ट्रीय नेताओं की संभावनाएं समाप्त होती गई हैं। विकास की ओर अग्रसर इस देश में लीक से हटकर परिवर्तन के बारे में सोचना जरूरी हो गया है। गठबंधन की मजबूरियां हमें अपंग कर कहीं गुलाम न बना दें। अमेरिका में गवर्नर का सीधे जनता द्वारा चुनाव होता है। प्रतिनिधि सभाओं के चुने हुए प्रतिनिधि एक्ट पास कराने, बजट व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका तो निभाते हैं, लेकिन वे गवर्नर को हटा नहीं सकते। चार वषरें तक स्थिरता का वातावरण गवर्नर को विकास की सोच का अवसर देता है। इस कारण अमेरिका में राज्यपालों पर राजनीतिक दबाव की संभावनाएं बहुत कम हो जाती हैं। प्रतिनिधिगण कानून बनाने के दायित्वों का निर्वहन करते हैं। चूंकि प्रतिनिधि की मुख्यत: भूमिका विधिक होती है, अत: दबंगों, माफियाओं, दादाओं का प्रतिनिधि सभा में कोई काम ही नहीं है। इसलिए अमेरिका में कोई माफिया किस्म का आदमी चुनाव लड़ता नहीं दिखता। अमेरिकी राष्ट्रपति कोई भी हो, बराबर का शक्तिशाली होता है और हमारा प्रधानमंत्री? नेहरू बहुत शक्तिशाली थे लेकिन कुछ अन्य के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता? अब व्यवस्थाओं के बदलने से हमारी स्थितियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जैसे कि किसी राच्य की राजनीति में खनन माफियाओं की बड़ी भूमिका है। उनकी सशक्त लॉबी के सामने सरकारें, मुख्यमंत्री तक असहाय हो जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में नैतिक-अनैतिक, स्याह-सफेद प्रश्नों को दरकिनार कर सत्ताधारी दल येन-केन-प्रकारेण अपनी सरकार का अस्तित्व बचाने में लगा रहता है। नतीजन, बिना किसी जिम्मेदारी, जवाबदेही के एक अनैतिक सत्ता केंद्र का जन्म हो जाता है। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का प्रतिफल यह है कि हमें दिन-रात 24 घंटे की वह राजनीति झेलनी पड़ती है, जो 5 वर्ष के अंतराल में एक बार होनी चाहिए। फर्ज करें कि एक पुलिस अधीक्षक है, जो अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर अच्छा कार्य कर रहा है। उसका अच्छा होना राज्य के तो हित में है, लेकिन हो सकता है कि यह बात स्थानीय मठाधीश के हित के विपरीत हो। वह किसी थानेदार को उसकी अकर्मण्यता के कारण हटाना चाहता है तो अक्सर हटा नहीं पाता। दबावों, समीकरणों से प्रभावित प्रशासन में प्राय: राच्यों के लक्ष्यों के प्रति समर्पण में कमी हो जानी स्वाभाविक है। राच्यों के शीर्ष नेतृत्व के लिए स्थानीय सत्ता समीकरणों में प्रभावी बन चुके नेता को दरकिनार कर सकना संभव नहीं होता। हमारी राजनीति सत्ता की दहलीज तक पहुंच कर आगे लक्ष्यहीन हो जाती है। राजनीतिक बाध्यताओं के कारण बहुत से नीति-नियामक महत्वपूर्ण पदों को समझौतों में दे देना पड़ता है। हमने देखा है कि विकास का ककहरा भी न जानने वाले प्रदेशों के नेता बन बैठे हैं। वर्तमान लोकतंत्र ने जन जागरूकता, गरीब और उपेक्षित समाज तक सत्ता को पहुंचाने का काम बखूबी किया है, लेकिन अब से आगे के लिए राष्ट्रपति या अध्यक्षीय शासन प्रणाली ही अधिक उपयुक्त होगी। समझना जरूरी है कि देश का सबसे शक्तिशाली पद असहाय क्यों हो रहा है? क्षेत्रीय पार्टियों, छोटे राच्यों, जातीय-भाषिक समूहों को प्रश्रय मिलता दिख रहा है। इसके विपरीत राष्ट्रपति, राच्यपाल प्रणाली में विभाजन के स्थान पर संयोजन को सत्ता का माध्यम बनाना मजबूरी होगी। राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए अनिवार्य होगा कि वह मणिपुर, पांडिचेरी जैसे छोटे राच्यों से भी आवश्यक मत प्राप्त करें। अगर आप राष्ट्रपति के उम्मीदवार हैं तो आप बांग्ला भी सीखेंगे और मराठी भी। यहां से राजनीति के राष्ट्रीय एकता की दिशा में उन्मुख होने की शुरूआत हो सकती है। संविधान समिति की कार्यवाहियों में 8 एवं 9 जून 1947 को राष्ट्रपति प्रणाली का बिंदु इमाम हुसैन, शिब्बन लाल सक्सेना द्वारा उठाया तो गया था, किंतु गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 की पृष्ठभूमि के कारण यह बिंदु गहन विचार का विषय नहीं बना। बाबा साहब ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में कहा था लोकतांत्रिक कार्यपालिका प्रथमत: स्थिर होनी चाहिए और फिर जिम्मेदार होनी चाहिए। अमेरिकी व्यवस्था स्थिर अधिक है, जबकि ब्रिटिश व्यवस्था जिम्मेदार अधिक है। आज की स्थितियों के रूबरू बाबा साहब के विचार क्या होते, इसकी कल्पना की जा सकती है। जब स्थिरता ही न होगी तो जिम्मेदारी का प्रश्न ही गौण हो जाता है। राजनीति में प्रयोगशालाएं नहीं होतीं, फिर भी प्रयोगधर्मिता के लिए सदैव संभावनाएं हैं। हिमाचल, उत्तरांखड, झारखंड, सिक्किम, गोवा, पांडिचेरी आदि छोटे राज्यों में मुख्यमंत्रियों के स्थान पर जनता द्वारा निर्वाचित राज्यपालों की व्यवस्था पर सहमति बनाने का प्रयास किया जा सकता है। स्थिरता विकास की चाभी है। स्थिरता के लिए यह राजनीतिक प्रयोग करके देखा जा सकता है। यदि यह सफल हुआ तो इससे छोटे राज्यों के तर्क को मजबूती मिलेगी। वे व्यवस्थाएं जो परिवर्तनों के अनुरूप ढलने से इंकार करती हैं उनका समूल नाश क्रांतियों से होता है। राजनीतिक व्यवस्था में भी विकास की अपेक्षा है। क्या हमारी व्यवस्था संविधान निर्माताओं की अपेक्षा के अनुरूप परिणामपरक रही हैं? 24 घंटे की राजनीति का उलझाव हमारी शक्तियों का इस हद तक अपव्यय करता है कि हम राष्ट्र के प्रति समर्पित दृष्टि विकसित ही नहीं कर सके हैं। हिलेरी क्लिंटन इस दौरे में कह गई हैं कि भारत के लिए यह एशिया के नेतृत्व का समय है। हम क्या करें? राष्ट्र का कद बढ़ रहा है और नेतृत्व का कद छोटा हो रहा है। हमारे पास प्रदेश और देश की जनता से सीधे संवाद कर सकने, उनमें प्रेरणा भर देने वाले नेताओं का सर्वथा अभाव है। वर्तमान व्यवस्था में आसान रास्ता लेने वाले ऐसे नेताओं की गुंजाइशें बन गई हैं जिन्होंने जन-संघर्ष, जन-आंदोलनों का चेहरा तक नहीं देखा है। राजनीतिक व्यवस्था कोई धर्म नहीं है कि जो लिख दिया गया वह कभी मिटेगा नहीं। वक्त के साथ चलना राजनीति की जरूरत है। यह परिवर्तन, नई सोच और नए चरित्र के नेताओं की राह बनाएगा। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं).

Thursday, July 7, 2011

तेलंगाना का सियासी तूफान

आंध्र प्रदेश कांग्रेस के हाथ से तेजी से फिसल रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की वापसी में आंध्र प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण योगदान था। 2004 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में अलग तेलंगाना राज्य बनाने का समर्थन किया था। इसी आधार पर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्र समिति का चुनावी गठबंधन हुआ था। वाईएसआर राजशेखर रेड्डी की मर्जी के खिलाफ टीआरएस से गठबंधन गुलाम नबी आजाद ने करवाया था। केंद्र में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस न केवल अपना वायदा भूल गई, बल्कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष चंद्रशेखर राव और उनके साथियों का तिरस्कार भी किया। ज्यादा शोर मचा तो सरकार ने प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में एक उपसमिति बना दी। उपसमिति का गठन मामले का हल खोजने की बजाय उसे टालने के मकसद से किया गया था। विवादास्पद मामलों को हल करने के लिए सरकारें और नेता अक्सर टालमटोल की नीति का सहारा लेते हैं, लेकिन केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने निष्कि्रयता को राजनीतिक रणनीति बना लिया है। यह सरकार रुके हुए फैसलों की सरकार बन गई है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते आर्थिक सुधार के फैसले पिछले सात सालों से रुके हुए हैं। पहले चार साल वामपंथी दलों की अड़ंगेबाजी का बहाना था। तीन साल से वह भी नहीं है। चुनाव सुधार पर चुनाव आयोग की सिफारिशें हों या महिला आरक्षण विधेयक, सरकार ने आम सहमति बनाने की या तो कोशिश नहीं की या आधे-अधूरे मन से की। कांग्रेस के भाग्य से देश की मुख्य विपक्षी पार्टी आपस के झगड़ों और अपनी अकर्मण्यता से और बुरी हालत में है। भारतीय जनता पार्टी को भारत की पुरानी क्रिकेट टीम की तरह जीत के मुंह से हार छीन लाने में महारथ हासिल है। कांग्रेस तेलंगाना के मुद्दे पर क्या चाहती है, यह किसी को पता नहीं है। सिवाय इसके कि बिना कुछ किए समस्या हल हो जाए। 2004 के लोकसभा चुनाव में वह अपने घोषणा पत्र में अलग राज्य बनाने का वायदा करती है। चुनाव के बाद इस दिशा में आगे की कार्रवाई के लिए उपसमिति बनाती है और फिर पल्ला झाड़ लेती है। दिसंबर 2009 में देश के गृहमंत्री संसद में आश्वासन देते हैं कि केंद्र सरकार अलग तेलंगाना राज्य के गठन की प्रक्रिया शुरू करने जा रही है। घोषणा होते ही रायलसीमा और आंध्र के दूसरे क्षेत्रों में विरोध शुरू हो जाता है। सरकार के हाथ पांव फूल जाते हैं और वह एक बार फिर वायदे से मुकर जाती है। तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज हो जाता है। सौ से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। स्कूल कालेजों में पढ़ाई लगभग ठप हो जाती है। सरकार फिर टालने के लिए न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में एक समिति बना देती है। समिति अपनी सिफारिश में कई विकल्प सुझाती है। सारे विकल्प राज्य को एक रखकर ही सुझाए गए हैं। श्रीकृष्णा समिति की रिपोर्ट आने के छह महीने बाद तक सरकार उस पर अमल तो दूर किसी विकल्प पर राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास भी नहीं करती। न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा ने अपनी रिपोर्ट के अंत में सरदार पटेल का उद्धरण देते हुए सरकार को एक तरह से चेतावनी दी है कि-वास्तविकता को नजरअंदाज करना मूर्खता है। सच का सही तरीके से सामना न किया जाए तो वह पलटकर प्रतिशोध लेता है। तेलंगाना का सच कांग्रेस और केंद्र की संप्रग सरकार से अपना प्रतिशोध ले रहा है। तेलंगाना क्षेत्र के 119 (एक सीट इस समय खाली है) विधायकों में से सौ से ज्यादा इस्तीफा दे चुके हैं। सत्रह में से 14 सांसद इस्तीफा दे चुके हैं। विधानसभा अध्यक्ष नौ जुलाई तक विदेश में हैं इसलिए विधायकों के इस्तीफे अभी मंजूर नहीं हुए हैं। कांग्रेस की असली मुश्किल उससे पहले ही शुरू होने वाली है। वाईएसआर कांग्रेस के अध्यक्ष और दिवंगत मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगनमोहन रेड्डी की पार्टी का पहला महाअधिवेशन आठ जुलाई से कडप्पा में शुरू हो रहा है। जगनमोहन ने राज्य के विभाजन के विरोध की अपनी रणनीति बदल दी है। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन और उनकी पार्टी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा है। तेलंगाना क्षेत्र के जगन समर्थक विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया है। विपक्षी विधायकों को तो छोडि़ए कांग्रेस अपने विधायकों और सांसदों को नहीं समझा पा रही है। विपक्ष कांग्रेस के सांसदों और विधायकों के इस्तीफे को नाटक बता रहा है। कांग्रेस सांसदों और विधायकों का कहना है कि वे इस्तीफा इसी शर्त पर वापस लेंगे कि कांग्रेस कार्यसमिति तेलंगाना राज्य के गठन के समर्थन में प्रस्ताव पास करे और सरकार इस दिशा में कार्रवाई शुरू करे। इसके बिना उनके लिए अपने चुनाव क्षेत्र में जाना भी कठिन है। आंध्र प्रदेश संवैधानिक संकट की ओर बढ़ रहा है। राज्य सरकार के बहुमत या अल्पमत में होने का प्रश्न लगभग अप्रासंगिक हो गया है, क्योंकि सरकार बहुमत में हो तो भी सौ से ज्यादा विधायकों के इस्तीफे के बाद सरकार के बने रहने के नैतिक औचित्य पर सवाल उठेगा। किरण रेड्डी की सरकार बहुमत के आधार पर बनी रहती है तो विधायकों के इस्तीफे मंजूर होने के छह महीने के भीतर उसे इतनी बड़ी संख्या में उप चुनाव का सामना करना पड़ेगा। इन परिस्थितियों में आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगना तय है। अब सवाल है कि केंद्र सरकार और कांग्रेस के सामने विकल्प क्या हैं। श्रीकृष्णा कमेटी की सिफारिशों के बाद सरकार के सामने एक विकल्प था कि वह तेलंगाना क्षेत्रीय परिषद बनाकर उसके विकास के लिए और आर्थिक अधिकार देती। छोटे राज्यों की मांग के मूल में उस क्षेत्र विशेष के विकास की अनदेखी और उस क्षेत्र के लोगों को समावेशी विकास से वंचित रखना है। तेलंगाना के लोगों की इस शिकायत को दूर करने के लिए कांग्रेस और केंद्र सरकार के पास सात साल का समय था, जो उसने अपनी अकर्मण्यता से गंवा दिया। अलग राज्य के गठन का आंदोलन जिस मोड़ पर पहुंच गया है वहां से आंदोलनकारियों के लिए पीछे लौटना संभव नहीं है। सरकार ने अपने ही नहीं आंदोलनकारियों के विकल्प भी सीमित कर दिए हैं। किसी समस्या पर राजनीतिक आमराय बनाने के मामले में इस सरकार का रिकार्ड अच्छा नहीं रहा है। आंध्र प्रदेश की राजनीति को बवंडर में फंसाने के लिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर जिम्मेदार है। आंध्र की समस्या केंद्र सरकार ने पैदा की है और उसका हल भी दिल्ली से ही होगा। आंध्र प्रदेश की आंच दिल्ली तक आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। केंद्र सरकार और कांग्रेस के राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह कठिन परीक्षा की घड़ी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

Tuesday, July 5, 2011

राजनीति के तालाब में दो मछलियां


यह गुजरात सरकार ही बता सकती है कि उसने गोधरा की घटना के बाद भड़के दंगों के रिकार्ड सुरक्षित रखे हैं या नहीं, लेकिन यह सब जानते हैं कि जब उन्हें नष्ट किए जाने की खबर आई तो कांग्रेस ने भाजपा पर हल्ला बोल दिया। इससे भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने उसे 1984 के सिख दंगों की याद दिला दी। ऐसा हमेशा होता है। कांग्रेस जब भी गुजरात के दंगों की चर्चा करती है उसे भाजपा की ओर से यही सुनने को मिलता है कि वह 1984 में भड़के सिख विरोधी दंगों के दौरान अपनी भूमिका याद करे। हालांकि ये दोनों घटनाएं इन दोनों राष्ट्रीय दलों को शर्मिदा करने और यह याद दिलाने वाली हैं कि कैसे 1984 में केंद्र की कांग्रेस सरकार और 2000 में गुजरात की भाजपा सरकार ने अपने राजधर्म का पालन नहीं किया, लेकिन वे दोनों घटनाओं की चर्चा कर खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ जिम्मेदार होने का दम भरती रहती हैं। यह ऐसा इकलौता उदाहरण नहीं है। भाजपा जब भी ए राजा, सुरेश कलमाड़ी और अशोक चव्हाण का जिक्र करके कांग्रेस को घेरती है, वह उसे येद्दयुरप्पा की याद दिलाती है और कभी-कभी तो उन बेचारे बंगारू लक्ष्मण की भी, जिन्होंने सिर्फ एक लाख रुपये लेने का लालच किया था और इस चक्कर में कैमरे में कैद हो गए थे। ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, येद्दयुरप्पा और बंगारू लक्ष्मण भारतीय राजनीति में खलनायक सरीखे बन चुके हैं, लेकिन कांग्रेस-भाजपा एक-दूसरे को मात देने के लिए इन्हीं नेताओं की याद करती हैं। ये दो उदाहरण अपवाद मात्र नहीं हैं। सच तो यह है कि ये दोनों राष्ट्रीय दल इसी तरह एक-दूसरे की खामियों-कमजोरियों अथवा जाने-अनजाने में किए गए गलत कार्याें से ऊर्जा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में ये दोनों दल गडे़ मुर्दे उखाड़ने में भी संकोच नहीं करते। कश्मीर समस्या की चर्चा छिड़ने पर भाजपा नेहरू की भूलों को याद करने के लिए 1947-48 में चली जाती है तो कांग्रेस भी भाजपा को घेरने के लिए दशकों पुरानी घटनाओं का उल्लेख करने के लिए तैयार रहती है। वह देश को बताती है कि किस तरह भाजपा नेताओं ने देश की आजादी के संघर्ष में योगदान नहीं दिया और महात्मा गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे किस तरह कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था। क्या इससे बड़ी और कोई त्रासदी हो सकती है कि हमारे राष्ट्रीय दल अपने बचाव में एक-दूजे के गलत कार्यो को ढाल बनाएं? अभी हाल में जब पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़े और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस को घेरा तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह आंकड़ा लेकर सामने आ गए कि राजग शासन के समय किस तरह कितनी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए थे? जब तमाम कांग्रेसी नेता रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों को खदेड़े जाने को सही करार देने की कोशिश कर रहे थे तब उनमें से कुछ इस कार्रवाई को जायज बताने के लिए न जाने कब दिल्ली में हुए वकीलों पर लाठीचार्ज की याद कर रहे थे। स्पष्ट है कि एक प्रकृति की अथवा समान प्रभाव वाली घटनाओं को ही ढाल बनाना जरूरी नहीं और इसे बंगारू लक्ष्मण द्वारा ली गई एक लाख रुपये की घूस और सुरेश कलमाड़ी के सैकड़ों करोड़ रुपये और ए. राजा के हजारों करोड़ रुपये के गोलमाल से समझा जा सकता है। सुरेश कलमाड़ी और ए. राजा ने जो कुछ किया उसके सामने बंगारू लक्ष्मण का काम तो चवन्नी की चोरी जैसा था। नेपाल से अपहृत कर कंधार ले जाए गए भारतीय विमान के बंधकों को बचाने के लिए आतंकियों को रिहा करने और संसद हमले में दोषी करार दिए गए आतंकी अफजल को फांसी न देने के लिए हर संभव जतन करने में कहीं कोई साम्य नहीं है, लेकिन भाजपा कांग्रेस पर जब-जब यह तोहमत मढ़ती है कि वह आतंकवाद से निपटने में नरमी दिखा रही है तब-तब कांग्रेसी उन चार आतंकियों को उसके समक्ष खड़ा कर देते हैं जिन्हें बंधकों के बदले छोड़ना पड़ा था। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे की कमजोरियों को उजागर करते समय केवल कुतर्क ही नहीं कर रही होतीं, बल्कि खुद को श्रेष्ठ भी बता रही होती हैं। इसके अतिरिक्त वे यह छूट हासिल करने की कोशिश भी कर रही होती हैं कि तुम्हारे गलत काम के आधार पर हमें भी गलत काम करने का अधिकार प्राप्त है। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई महिला सिर्फ इसलिए अपने पति को पीटने लगे, क्योंकि उसकी पड़ोसन भी ऐसा करती है। इन दोनों दलों ने कई ऐसे काम किए हैं जो गलत थे, लेकिन अतीत में उपलब्ध उदाहरण उनकी आड़ बने। सत्ता में रहते समय अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में दोनों दलों का दामन एक जैसा ही दागदार है, लेकिन दोनों ऐसा प्रकट करते हैं जैसे उनके सरीखा नेक और नैतिकतावादी दल और कोई नहीं। नि:संदेह कांग्रेस और भाजपा एक जैसी नहीं हैं, लेकिन एक-दूसरे के गलत कामों को अपने लिए नजीर के रूप में इस्तेमाल करने में उनका कोई सानी नहीं। क्या इसमें कोई संदेह है कि तालाब रूपी भारतीय राजनीति को अब दो मछलियां गंदा कर रही हैं? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं).

Wednesday, June 29, 2011

इतिहास का काला पन्ना


लेखक आपातकाल को कांग्रेस के लोकतंत्र विरोधी दृष्टिकोण के प्रमाण के रूप में याद कर रहे हैं
देश के अंदर और बाहर हर कोई यह भलीभांति जानता है कि केंद्र सरकार के भीतर जो कुछ चलता है उसे एक संविधानेतर शक्ति केंद्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यह भी कोई रहस्य नहीं है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी 2004 के लोकसभा चुनाव में संप्रग की जीत के बाद सीधे-साधे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पश्चात सुपर संवैधानिक सत्ता बन गई थीं। सरकार पर पकड़ बनाए रखने के लिए वह नियमित तौर पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं। चूंकि कांग्रेस में इस प्रकार की संविधानेतर शक्तियों की परंपरा सी रही है, इसलिए कांग्रेस को इसमें किसी सिद्धांत, संविधान के उल्लंघन जैसी कोई बात नजर नहीं आती। नेहरू-गांधी परिवार कांग्रेस के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पार्टी इस धारणा पर चल रही है कि इस परिवार के सदस्य को सरकारी कामकाज में दखल देने के लिए किसी औपचारिक पद की आवश्यकता नहीं है। आम धारणा के विपरीत, यह प्रक्रिया नेहरू के दिनों में ही शुरू हो गई थी। उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी और 1950 के दशक के आखिरी वर्षो में नेहरू ने उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष भी बना दिया। इस परिवार के सदस्यों का आक्रामक रूप से संविधानेतर गतिविधियों में दखल 1970 के दशक के मध्य में देखने को मिला। तब युवक कांग्रेस के अध्यक्ष संजय गांधी ने केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को आदेश देने शुरू कर दिए थे। शासन की यह पद्धति आपातकाल के दौरान तमाम हदें पार कर गईं। अपनी मां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा प्रेरित संजय गांधी ने संघीय स्तर पर और राज्यों में समानांतर सत्ता केंद्र स्थापित कर लिया था। केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, आइएएस व आइपीएस अधिकारियों के पर कतर दिए गए थे और पूरे भारत में भय का शासन कायम कर दिया गया था। इंदिरा गांधी संजय गांधी के कारनामों से इस कदर अभिभूत थीं कि उन्होंने अपने प्रचंड बहुमत के बल पर 1971-76 के लोकसभा के कार्यकाल को एक साल का विस्तार दे दिया था। यह भयावह दौर तब खत्म हुआ जब लोगों ने चुनाव में कांग्रेस को उखाड़ फेंका। इंदिरा गांधी ने यह चुनाव इन खुफिया रिपोर्टो के बाद कराया था कि जनता उनका समर्थन करेगी। यह कांग्रेस के शासन का इतिहास है, किंतु बहुत से कांग्रेसी दिखावा करते हैं कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं या फिर यह लोगों की स्मृति से लोप हो गया है, किंतु वे लोग जिनका लोकतंत्र में अटल विश्वास है, फिर से ऐसा नहीं होने देना चाहते। आतंक के दिनों को भूलना मुसीबतों को फिर से न्योता देने के समान है। इसलिए लोकतंत्र की खातिर आपातकाल की वर्षगांठ 25 जून पर इसके स्याह दिनों को याद करना जरूरी है। इसी आलोक में कुछ संगठनों व व्यक्तियों पर समानांतर सत्ता खड़ी करने संबंधी केंद्रीय मंत्रियों के आरोपों की भ‌र्त्सना करनी जरूरी हो जाता है। उदाहरण के लिए, भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान करने की अनिच्छुक सरकार प्रधानमंत्री और सांसदों को लोकपाल के दायरे में लाने से पैर खींच रही है। यह ऐसा मसला है जो नागरिकों के बड़े तबके को परेशान कर रहा है। नेहरू के दिनों से ही कांग्रेस भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के कदम उठाने से हिचकिचाती रही है। उदाहरण के लिए आजादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी के वफादार सदस्यों को ही राज्यपाल के रूप में नियुक्त करती रही है। इसी प्रकार उसने हमेशा प्रयास किया है कि चुनाव आयुक्त ऐसा व्यक्ति न बन जाए जो स्वतंत्र रूप से फैसले कर सकता हो। आपातकाल के दौरान कांग्रेस खुलेआम स्वतंत्र मीडिया और न्यायपालिका के खिलाफ अभियान चलाती रही है। संविधान में 42वें संशोधन पर संसद में हुई बहस से ही साफ हो जाता है कि कांग्रेस न्यायपालिका, मीडिया और स्वतंत्र विचारों वाले नौकरशाहों के किस कदर खिलाफ है। सीएम स्टीफेन जैसे लोगों ने खुलेआम समर्पित न्यायपालिका की वकालत की थी। यह समर्पण संविधान के प्रति न होकर कांग्रेस के प्रति अभीष्ट था। इसके बाद भी हालात में कोई परिवर्तन नहीं आया। हमेशा यह प्रयास किया जाता रहा है कि पार्टी के समर्थक या फिर दागदार छवि वाले व्यक्ति संवैधानिक पदों पर तैनात कर दिए जाएं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है चुनाव आयुक्त के रूप में नवीन चावला की तैनाती, जिन्हें शाह जांच आयोग किसी भी सार्वजनिक पद के अयोग्य ठहरा चुका है। इसका दूसरा उदाहरण है कांग्रेस द्वारा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए भ्रष्टाचार के एक आरोपी को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के तौर पर तैनात करना। इस परिप्रेक्ष्य में कपिल सिब्बल और पी. चिदंबरम जैसे कुछ केंद्रीय मंत्रियों के प्रवचन सुनना अजीब लगता है, जो 1980 के दशक में मीडिया विरोधी बिल लाने के कर्णधार थे। कुछ दिन पहले उन्होंने संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित करते हुए मजबूत लोकपाल बिल लाने की पक्षधर सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर हमला किया कि बाहरी लोगों द्वारा लिए गए फैसलों के आधार पर सरकार चलाना सही नहीं है। मजबूत लोकपाल के खिलाफ एक अन्य दलील यह थी कि सरकार के समानांतर एक और ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता। इन मंत्रियों ने हैरानी जताते हुए कहा कि सरकार अपनी शक्तियों को कम करने का काम कैसे कर सकती है? किंतु क्या मनमोहन सिंह सरकार पिछले सात वर्षो से यही नहीं कर रही है? क्या उसने अपनी शक्तियां संवैधानेतर सत्ता सोनिया गांधी के हाथों में नहीं सौंप दीं? पी. चिदंबरम की दलील तो इससे भी अधिक हास्यास्पद थी कि देश में संविधान है, जिसके मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के दर्जनों सांसदों व नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित संविधान के मूलभूत ढांचे के विचार की संसद के भीतर और बाहर अनेक बार धज्जियां उड़ाई हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि उनके पास सुप्रीम कोर्ट के जजों को सबक सिखाने के अपने तरीके हैं। आपातकाल की वर्षगांठ पर हमें उन भयावह संवैधानिक संशोधनों पर भी नजर डालनी चाहिए जो कांग्रेस ने आपातकाल के दौरान किए थे। इनमें प्रधानमंत्री को संविधान से ऊपर स्थापित करना, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट की शक्तियों को कम करना और राष्ट्रपति को कार्यकारी आदेश के माध्यम से संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान करना शामिल था। इन संशोधनों ने संविधान के मूलभूत सिद्धांतों को ही ध्वस्त कर दिया था। कांग्रेस के रवैये में अभी भी कोई परिवर्तन नहीं आया है, इसलिए अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। हमें 25 जून को खुद को यह याद दिलाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए कि कांग्रेस अथवा उसके नेतृत्व वाली सरकार क्या-क्या शरारतें करने में समर्थ है? हमें विरोध से घृणा करने वाली कांग्रेस द्वारा आपातकाल के दौरान मारे गए, सताए गए और जेल में ठूंस दिए गए लाखों लोगों का स्मरण करना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)