Monday, April 23, 2012

राज्यों ने लगाया केंद्र पर उपेक्षा का आरोप


आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में कई राज्यों ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि आंतरिक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मामले में कोई भी फैसला लेने से पहले केंद्र सरकार को उन्हें पूरी तरह विास में लेना चाहिए। इस मामले में गैर यूपीए शासित सरकारों के मुख्यमंत्री मुखर थे। सैन्य व असैन्य इकाइयों के बीच तनाव से सुरक्षा पर प्रतिकूल असर : सेना के साथ हाल ही में हुए विवाद के लिए केंद्र की आलोचना करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को कहा कि असैन्य एवं सैन्य इकाइयों के बीच में तनाव से देश के आंतरिक सुरक्षा हालात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। सम्मेलन में उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौजूदा केंद्र सरकार आम आदमी में हमारी रक्षा तैयारियों को लेकर विास का संचार करने में विफल रही। देश की आंतरिक सुरक्षा को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता है क्योंकि यह बाह्य सुरक्षा हालात से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि केंद्र को अविास एवं संदेह के इस माहौल को खत्म करने के लिए सक्रि य कदम उठाने चाहिए जो हाल ही में हुए विवादों के कारण पैदा हुआ है। सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर राज्य सरकारों से सलाह-मशविरा नहीं करने के लिए केंद्र की आलोचना करते हुए मोदी ने कहा कि आरपीएफ व बीएसएफ कानून में संशोधन कर केंद्र राज्य के भीतर राज्यका गठन कर रहा है। सीबीआई सहित केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिकरण बढ़ रहा है। उनका इस्तेमाल केंद्र में सत्ताधारी दल के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाने में हो रहा है। इस रुख से सीबीआई जैसी एजेंसियों की विसनीयता के साथ समझौता हुआ है और यह चिन्ता की बात है क्योंकि ये एजेंसियां आंतरिक सुरक्षा के मसलों में शामिल हैं। उन्होंने केंद्र के इन दावों पर भी सवाल उठाया कि 97 फीसद खुफिया खबरें केंद्रीय एजेंसियों की ओर से आ रही है और राज्य एजेंसियों की ओर से केवल तीन प्रतिशत खबरें आती हैं। खुली भारत-नेपाल सीमा चिंता का विषय: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आज कहा कि प्रदेश से सटी नेपाल की 550 किलोमीटर लंबी सीमा पर निगरानी की विशेष व्यवस्था की आवश्यकता है ताकि किसी भी संभावित राष्ट्रविरोधी गतिविधि को रोका जा सके। अखिलेश ने पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए राज्य को आवंटित धनराशि 100 करोड रुपए से बढ़ाकर 800 करोड़ रुपए करने की मांग की। उन्होंने 2013 में होने जा रहे कुंभ मेले का जिक्र करते हुए केंद्र की मदद मांगी ताकि कुंभ मेले का आयोजन सफलतापूर्वक किया जा सके। उन्होंने गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर को मेगा सिटी पोलिसिंग परियोजनामें शामिल करने की मांग करते हुए कहा कि दोनों ही जिलों की पुलिस को अत्याधुनिक हथियार और उपकरण मुहैया कराए जाने चाहिए। राज्य पुलिस की क्षमता में सुधार और आबादी के हिसाब से पुलिस की उपलब्धता का अनुपात राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लाने के लिए 5000 करोड़ रुपए की केंद्रीय मदद मांगी। राज्यों के अधिकार छीन रहा है केंद्र : तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने विधेयकों को पारित कराकर केंद्र द्वारा राज्यों के अधिकार छीनने की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति सचेत करते हुए आज कहा कि ऐसा करना राज्य सरकारों के प्रति असम्मान दर्शाना है। सम्मेलन में जयललिता ने संप्रग सरकार पर चहुंतरफा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) के जरिए केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारक्षेत्र में घुसपैठ कर रही है। यह उन संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है जो राज्यों की सूची में पुलिस को तरजीही दर्जा प्रदान करता है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र ने बंगाल की खाड़ी में भारत-अमेरिकी संयुक्त नौसैनिक अभ्यास का एकतरफा फैसला किया और उसने राज्य सरकार को विास में नहीं लिया। एनसीटीसी का विरोध कर रही मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका मतलब यह होगा कि केंद्र सरकार संवैधानिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों का असम्मान कर रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र जब कभी भी कोई महत्वपूर्ण फैसला करेगा, राज्य सरकारों के साथ पहले से सलाह मशविरा करने के सिद्धांत का पालन करेगा। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का भय है कि विधेयक पारित कराके या अधिसूचना जारी कर राज्यों को प्रदत्त अधिकारों के हनन की प्रवृत्ति उभर रही है। आतंकवाद का मिलकर मुकाबला क्यों नहीं : मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह बात उनकी समझ से परे है कि जब हम वामपंथी उग्रवाद जैसी समस्या से संयुक्त रू प से लड़ सकते हैं तो इस माडल पर आतंकवाद से क्यों नहीं लड़ सकते। आंतरिक सुरक्षा की किसी भी स्थिति से निपटने का सर्वप्रथम दायित्व राज्य सरकारों का है। अत: राज्यों को मजबूत किए बिना आंतरिक सुरक्षा को सुदृढ़ नहीं किया जा सकता। चौहान ने कहा कि नीति निर्धारण एवं नये कानूनों के बनाने के पूर्व राज्य सरकारों से भी विचार-विमर्श किया जाए न कि स्वयंसेवी संस्थाओं एवं अन्य लोगों से ड्राफ्ट प्रस्ताव के आधार पर ड्राफ्ट तैयार कर राज्य सरकारों को टिप्पणी के लिए भेजा जाए। उन्होंने कहा कि यूएपी एक्ट में एकतरफा संशोधन इसका उदाहरण है। विगत समय में यह देखने में आया है कि केंद्र आंतरिक सुरक्षा के बहुत से विषयों पर एकतरफा निर्णय ले रही है। चाहे वह एनसीटीसी का गठन हो या फिर देश के अन्य भागों में लागू करने के लिए बीएसएफ एक्ट या आरपीएफ एक्ट के प्रस्तावित संशोधन हों। उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर सभी साझेदारों से विचार विमर्श किये बगैर इसे संसद में लाने का प्रयास किया गया। ऐसा प्रयास संघात्मक ढांचे की भावना के विपरीत और केन्द्रीयकरण की तरफ एक बढ़ता कदम है। एनसीटीसी पर राष्ट्रीय सहमति जरूरी : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा कि एनसीटीसी की स्थापना के लिए राष्ट्रीय सहमति आवश्यक है जिससे देश के संघीय ढांचे पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़े। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद व आतंकवाद से केंद्र एवं राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से ही निपटा जा सकता है। इसके लिए स्वयं उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति की आवश्यकता पर बल दिया है। एएफएसपीए और श्रीनगर से 24 बंकर हटें : जम्मू कश्मीर में सुरक्षाबलों की तैनाती कम करने पर जोर देते हुए राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सभी महत्वपूर्ण मुद्दों के समाधान के लिए वार्ता ही सबसे बढ़िया तरीका है। उमर ने सम्मेलन में भारत-पाक संबंधों से लेकर कश्मीर सहित कई मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून ( एएफएसपीए) को हटाने और श्रीनगर शहर से 24 बंकर हटाने का मुद्दा भी उठाया। पाकिस्तान के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने के लिए उन्होंने जम्मू कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर के बीच टेलीफोन कनेक्शन की बात की। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2011 के दौरान जो शांति रही, वह आगे भी रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्य के सुरक्षा माहौल में चूंकि अब काफी बदलाव आ गया है, एएफएसपीए को जारी रखने की समीक्षा होनी चाहिए । मैं उन जिलों और क्षेत्रों से एएफएसपीए हटाने की वकालत नहीं कर रहा हूं, जो अभी भी उग्रवाद से प्रभावित हैं लेकिन उन जिलों और क्षेत्रों से एएफएसपीए को हटाने की शुरूआत होनी चाहिए, जो आतंकवादी गतिविधियों से प्रभावित नहीं हैं।

Monday, April 16, 2012

58 फीसदी दिल्लीवालों ने डाले वोट


अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने के मामले में दिल्ली वाले इस बार दबंग निकले। तीन हिस्सों में विभाजित नगर निगम चुनाव में रविवार को रिकार्ड 55 से 58 फीसदी मतदान हुआ। कुछ बूथों पर मतदान रात नौ बजे तक चलता रहा। सबसे अधिक 65 फीसदी मतदान न्यू अशोक नगर वार्ड में हुआ। छावला में भी 62 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले। सबसे कम 43 फीसदी मतदान पॉश इलाके वसंत विहार में हुआ। हालांकि पिछले नगर निगम चुनाव में यहां केवल 28 फीसदी मतदान हुआ था। वोटिंग मशीनों में बंद 2423 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला अब 17 अप्रैल को होगा। बता दें कि 2007 के एमसीडी चुनाव में 42.78 प्रतिशत मतदान हुआ था। जबकि 2002 में करीब 52 फीसदी वोट पड़े थे। दिल्ली में गठित होने वाले तीन नए निगमों में पूर्वी दिल्ली नगर निगम में 64 वार्ड हैं जबकि उत्तरी व दक्षिणी दिल्ली नगर निगमों में 104-104 वार्ड हैं। मतदान करने में महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। 50 फीसदी हिस्सेदारी मिलने के बाद महिलाओं के मतदान में काफी बढ़ोतरी सामने आई है। साढ़े नौ घंटे तक मतदान प्रक्रिया में कुछ इलाकों में छिटपुट घटनाएं भी हुईं, तो दो गांवों सनौढ़ व लाडपुर के मतदाताओं ने चुनाव का बहिष्कार किया। हर बार की तरह पॉश कालोनियों में मतदान का प्रतिशत काफी कम रहा। 272 सीटों पर हुए मतदान में मतदाताओं की संख्या करीब 1.15 करोड़ थी, जिनमें से 44 प्रतिशत महिलाएं थीं। सुबह आयोग को कई इलाकों में वोटिंग मशीन खराब होने की सूचना मिली, जिसे समय रहते ठीक कर लिया गया। मतदान के बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त राकेश मेहता ने कहा कि काफी अच्छा अनुभव रहा। मतदान शांतिपूर्ण तरीके से हुआ। इसके लिए पुलिस आयुक्त बीके गुप्ता को फोन पर बधाई भी दी और मतदान में भारी संख्या में मतदाताओं के भाग लेने पर आभार भी जताया। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में मतदान का प्रतिशत काफी धीमा रहा। सुबह 11 बजे तक 15 से 18 फीसदी तक ही वोट पड़े थे। वोटिंग मशीन खराब होने की सूचना कई जगहों से मिली थी जिसे समय रहते ठीक करा लिया गया था। कुछ गांव के लोगों ने मतदान का बहिष्कार भी किया। उनके अनुसार सनौढ गांव के लोगों ने इसलिए मतदान का बहिष्कार किया क्योंकि उनके यहां वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट लगाया जा रहा है जिसका वे विरोध कर रहे हैं। गांव लाडपुर के बारे में उनका कहना था कि यहां के मतदाता कई सालों से चकबंदी की मांग कर रहे हैं जो अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। इन दोनों गांवों में करीब सात हजार वोट है। गांव सनौढ वार्ड नंबर तीन से संबंधित है जबकि लाडपुर वार्ड नंबर 29 से। कई प्रमुख लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब भी मिले। हाशमी नहीं डाल पाए वोट : दिल्ली से राज्यसभा के कांग्रेसी सांसद परवेज हाशमी रविवार को दिल्ली नगर निगम चुनाव में वोट नहीं डाल पाए। उनके परिवार के लोग भी वोट नहीं डाल पाए। हाशमी और उनके परिजनों का नाम मतदाता सूची से गायब था। हाशमी ने कहा कि वह इसकी शिकायत राज्य निर्वाचन आयोग से करेंगे। उन्होंने बताया कि जब वह परिजनों के साथ ओखला में वोट डालने गए, तो पता चला कि मतदाता सूची में उनका और उनके परिजनों का नाम ही नहीं है। सिनेमाघरों व इंडिया गेट का किया रुख : ्रदिल्ली नगर निगम चुनाव ने सिनेमाघरों तथा इंडिया गेट की भी रौनक बढ़ा दी। मतदान के बाद कुछ लोग अपने घरों में बैठे तो कुछ ने इंडिया गेट व सिनेमाघरों का रुख किया। दूसरी ओर इंडिया गेट की रौनक भी देखते ही बनी। वहां भीड़ अन्य दिनों की तरह ही थी, लेकिन यहां होने वाली चर्चाएं चुनाव विशेष ही थी। यहां बैठे अधिकांश लोग एमसीडी चुनाव पर ही चर्चा कर रहे थे। सड़क, सीवर, सफाई के नाम पर मतदान : सड़क, सीवर, सफाई के नाम पर हुए दिल्ली नगर निगम चुनावों में लोगों ने अपना-अपना मतदान किया। आजादी के बाद से मतदान कर रहे बुजुर्गो से लेकर पहली बार मतदान कर रहे युवाओं तक ने विकास के नाम पर ही अपने मत का प्रयोग किया। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें शायद निगम के निकाय चुनाव और दिल्ली सरकार व केंद्र सरकार के मुद्दे में फर्क के बारे में जानकारी नहीं थी। शायद यही वजह है कि दिल्ली नगर निगम के चुनाव में मतदाता देश में बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार को इस निकाय चुनाव से जोड़ रहे थे। नए निगमों के गठन की प्रशासनिक तैयारी पूरी : दिल्ली के तीनों नए नगर निगमों के गठन के लिए मतदान तो संपन्न हो ही गया, प्रशासनिक तैयारियां भी पूरी कर ली गई हैं। 21 अप्रैल तक तीनों निगमों का विधिवत गठन हो जाएगा। तीनों नए निगमों के बीच आपसी समन्वय स्थापित करने के लिए दिल्ली सरकार के तहत गठित स्थानीय निकाय निदेशालय ने नए निगमों को लेकर सभी प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली हैं।

Tuesday, March 20, 2012

अगर रेल किराया बढ़ाने पर मेरा इस्तीफा लिया गया तो ‘दादा’ का क्यों नहीं : दिनेश


रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिनेश त्रिवेदी का मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि उनसे मात्र इसलिए इस्तीफा लिया गया कि उन्होंने रेल किराया में वृद्धि का प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा कि अगर रेल किराया बढ़ाने पर उन्हें हटाया गया तो वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को भी हटाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भी तो आम बजट में विभिन्न वस्तुओं के दाम महंगे किए हैं। त्रिवेदी के चेहरे पर आज किसी तरह का तनाव नहीं दिखा और एक तरह से वे दार्शनिक मुद्रा में नजर आए। क्या आपको मोहरा बनाया गया, इस सवाल पर त्रिवेदी ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि मोहरा बनाया गया। पार्टी की लीडर (ममता बनर्जी) ने कहा कि इस्तीफा दो तो मैंने यह नहीं पूछा क्यों और इस्तीफा दे दिया। मैंने किसी का भरोसा नहीं तोड़ा।यह पूछे जाने पर कि उन्होंने क्या गलती की थी, त्रिवेदी ने कहा, ‘यह सवाल लोग पूछें। एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे यह सवाल नहीं करना चाहिए। रेलवे राष्ट्रीय संपदा है और एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे अनुशासन का पालन करना होगा।
क्या वह रेलवे को मझधार में छोड़कर जा रहे हैं, इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘व्यवस्था ऐसी ही है। मैं किसी को दोष नहीं दे रहा हूं और मुझे किसी से कोई शिकायत भी नहीं है। हम व्यवस्था का अंग हैं।त्रिवेदी ने कहा, ‘मैंने अपना काम किया, मुझे कोई अफसोस नहीं है। प्रधानमंत्री सहित हर व्यक्ति ने मुझे सहयोग दिया। मुझे खुशी है कि मैंने अपना कर्तव्य निभाया।दिनेश त्रिवेदी ने नए रेल मंत्री मुकुल राय पर कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘मुझे इसमें नहीं पड़ना है। पार्टी के ही लोगों द्वारा षडयंत्र की संभावना के सवाल पर त्रिवेदी ने कहा, ‘मैं इस बात में भी नहीं पड़ना चाहता कि मेरे साथ कोई षडयंत्र हुआ।
रेल भवन में उनके अनुभव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘यह एक बेहतर अनुभव रहा। अपने कार्यकाल के अंत में मैं एक बहुत संतुष्ट व्यक्ति के तौर पर विदा ले रहा हूं। मैं रेल परिवारके 14 लाख सदस्यों के स्नेह और प्यार से अभिभूत हूं। ज्ञान, अनुभव और भावनात्मक स्तर पर मैं एक बहुत समृद्ध व्यक्ति के तौर पर विदा ले रहा हूं।
रेल बजट, जिसकी वजह से उन्हें अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा, के बारे में त्रिवेदी ने कहा कि एक बार बजट जब संसद में पेश कर दिया जाता है तो फिर वह संसद का ही हो जाता है और संसद भारत की जनता की है। उन्होंने कहा, ‘मेरे साथ अहम की कोई समस्या नहीं है। मैंने केवल सही समय पर सही काम करना चाहा था।
लोकसभा में सोमवार को ज्यादातर समय दिनेश त्रिवेदी सत्ता पक्ष में कांग्रेस सदस्यों के साथ ही बैठे। फिर कुछ देर बाद वह आगे आ गए और गृह मंत्री के पास बैठे। कुछ कांग्रेस सदस्यों ने उनसे हाथ मिलाया और उनकी पीठ ठोंकी।
कहा, मेरे साथ अहं की कोई समस्या नहीं है। मैंने केवल सही समय पर सही काम करना चाहा था रेलवे राष्ट्रीय संपदा है और एक अनुशासित सिपाही के नाते मुझे अनुशासन का पालन करना होगा पार्टी की लीडर ने कहा कि इस्तीफा दो तो मैंने यह नहीं पूछा क्यों और इस्तीफा दे दिया

Wednesday, March 14, 2012

गहने-बंगले-बैंक बैलेंस-रिवाल्वर पर गाड़ी नहीं


आठ साल पहले की ही तो बात है। बसपा प्रमुख मायावती की माली हैसियत सिर्फ 11 करोड़ रुपये की थी, लेकिन 2012 में वह 111 करोड़ रुपये की हैसियत वाली बन गई हैं। यह बात खुद मायावती ने तीन चुनावों (2004 में राज्यसभा, 2010 में विधान परिषद और 2012 में राज्यसभा) के वक्त नामांकन पत्र के साथ अपनी संपत्तियों को लेकर जो हलफनामा दाखिल किया है उससे सामने आई है। 2004 में मायावती के पास लखनऊ में सरकारी मकान के अलावा दिल्ली में बस एक अदद मकान हुआ करता था। उसकी कीमत उस वक्त यही कोई पौने दो करोड़ रुपये के करीब थी, लेकिन आज बसपा प्रमुख दिल्ली और लखनऊ में चार-चार आलीशान भवनों की मालकिन बन चुकी हैं, जिनकी कीमत 96 करोड़ रुपये से ज्यादा है। दिल्ली के महंगे इलाकों में से एक कनाट प्लेस में मायावती के पास दो भवन हैं (बी-34 का ग्राउंड फ्लोर और फ‌र्स्ट फ्लोर)। मायावती ने अपने हलफनामे में इनमें से एक की वर्तमान कीमत नौ करोड़ 39 लाख और दूसरे की 9 करोड़ 45 लाख रुपये बताई है। दिल्ली में एसपी मार्ग पर भी उनका एक आवास है, जिसकी कीमत उन्होंने 61 करोड़ 86 लाख रुपये बताई है। लखनऊ में 9, माल एवन्यू उनका निजी आवास हो गया है और उसकी कीमत 15 करोड़ रुपये बताई गई है। आठ साल में माया का बैंक बैलेंस भी बढ़ा है। 2004 के चुनाव के वक्त उनके बैंक एकाउंट में नौ करोड़ 68 लाख रुपये थे। 2010 में वह 11 करोड़ रुपये हो गया और 2012 में 13 करोड़ 95 लाख रुपये। माया के पास आज की तारीख में दस लाख 20 हजार रुपये नकद हैं। मायावती के पास अपनी कोई गाड़ी नहीं है, लेकिन उनके पास जेवर खूब हैं। 2004 में उनके पास सिर्फ 30 लाख रुपये के जेवर थे, लेकिन आज उनके पास एक करोड़ रुपये से ज्यादा के गहने हैं। सोना यही कोई 1034 ग्राम है, हीरा 380 रत्ती है, जिनकी लागत 96 लाख 53 हजार रुपये थी। एक चांदी का डिनर सेट भी है, जिसका वजन 18 किलो के करीब है, इसके अलावा 15 लाख रुपये की अन्य संपत्तियां भी हैं। उनके पास एक रिवाल्वर भी है।

यूपी विधानसभा में 47 फीसदी दागी दो तिहाई सदस्य करोड़पति


उत्तर प्रदेश के 403 विधायकों में 189 यानी कुल 47 फीसदी ऐसे हैं, जिनके खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं। इनमें 98 ऐसे हैं जिन पर गंभीर अपराधों के तहत मुकदमे दर्ज हैं। वहीं दो तिहाई से कुछ ज्यादा यानी 271 विधायक करोड़पति हैं। उत्तर प्रदेश इलेक्शन वॉच ने रविवार को पत्रकार वार्ता में नवनिर्वाचित विधायकों के हलफनामे का विश्लेषण करते हुए संख्या जारी की। पिछली बार 140 दागी थे। सूबे में आपराधिक मामलों में लिप्त विधायकों की संख्या में 12 फीसदी की वृद्धि हुई है। आपराधिक आरोपों से घिरे विधायकों में बसपा के 29, सपा के 111, भाजपा के 25, कांग्रेस के 13, रालोद के दो, पीस पार्टी के दो, कौमी एकता दल के एक समेत पांच निर्दलीय भी हैं। यूपी इलेक्शन वॉच के मुताबिक सूबे में सबसे अमीर विधायक नवाब काजिम अली खान हैं जो रामपुर जिले के स्वार क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुने गए हैं। दूसरे नंबर पर मुबारकपुर विधानसभा क्षेत्र से बसपा से चुने गए शाह आलम व तीसरे नंबर पर नोएडा के भाजपा विधायक महेश शर्मा हैं। नवाब काजिम अली खान की संपत्ति 56.89 करोड़, शाह आलम की 54.44 करोड़ और महेश शर्मा की 37.45 करोड़ है। छह विधायकों ने अपनी संपत्ति पांच लाख या इससे भी कम घोषित की है। 22 विधायकों ने अपनी देनदारियां एक करोड़ या इससे ज्यादा घोषित की है। 2012 में चुने गए 271 विधायक करोड़पति हैं जबकि 2007 में इनकी संख्या सिर्फ 124 थी। करोड़पति विधायकों की संख्या में यह इजाफा करीब 37 फीसदी का है। इलेक्शन वॉच ने मुख्य राजनीतिक दलों के प्रत्येक उम्मीदवार की औसतन संपत्ति भी घोषित की है। इसमें बसपा की 4.44 करोड़, सपा की 2.52 करोड़, भाजपा की 4.01 करोड़ और कांग्रेस की 4.61 करोड़ है। सूबे के 239 विधायकों की शैक्षिक योग्यता स्नातक या इससे अधिक है। दस फीसदी भी नहीं महिलाएं : सूबे में कुल 32 महिला विधायक चुनी गई हैं। इनमें सपा की 19, बसपा की तीन, भाजपा की छह और कांग्रेस से जीतने वाली दो महिलाएं हैं। केवल 40 विधायक आठवीं पास और इससे भी कम हैं। इनमें 14 केवल साक्षर हैं। दसवीं पास 41 और 12वीं पास 76 विधायक हैं। इस बार विधान सभा चुनाव में 6839 उम्मीदवारों ने 223 दलों का प्रतिनिधित्व किया है। 2007 में 6086 उम्मीदवारों ने 131 दलों का प्रतिनिधित्व किया था। 2007 के मुकाबले 2012 में राजनीतिक दलों में 70 फीसदी और उम्मीदवारों में 12 फीसदी की वृद्धि है। विधानसभा के अबकी चुनाव में केवल 11 दलों के उम्मीदवार जीते, जिनमें छह निर्दलीय उम्मीदवार भी हैं।

वादें और भी हैं ....


हृ सरकारी व अनुदानित कॉलेजों में स्नातक स्तर तक लड़कियों को मुफ्त शिक्षा हृ असाध्य रोग हृदय का ऑपरेशन, कैंसर, लीवर, किडनी आदि के मरीजों का मेडिकल कालेज में मुफ्त इलाज हृ निजी उच्च व व्यावसायिक शिक्षा के लिए पांच लाख वार्षिक आय से कम वाले परिवारों के बच्चों की फीस माफ होगी हृ हाईस्कूल तक की शिक्षा प्राप्त लड़कियों को कन्या विद्या धन व अच्छे अंक पाने वाली लड़कियों को साइकिल हृ कक्षा दस पास मुस्लिम लड़कियों को आगे की शिक्षा या निकाह के लिए 30 हजार रुपये का अनुदान हृ विश्वविद्यालय व कालेजों में छात्रसंघ की बहाली हृ सरकारी उर्दू मीडियम स्कूलों की स्थापना हृ सच्चर आयोग व रंगनाथ मिश्र कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल हृ दहशतगर्दी के नाम पर बंद बेकसूर मुसलिम नौजवान की रिहाई और मुआवजा भी हृ मुसलमानों को दलित की तरह जनसंख्या के आधार पर अलग से आरक्षण हृ किसानों की उपज का लागत मूल्य निर्धारित करने के लिए आयोग का गठन हृ 65 वर्ष की उम्र प्राप्त करने वाले छोटी जोत के किसानों के लिए पेंशन का इंतजाम हृ दो फसल देने वाली जमीन के अधिग्रहण में किसानों को सर्किल रेट का छह गुना मुआवजा मिलेगा हृ शिक्षामित्रों का दो वर्ष में विनियमितीकरण हृ सिंचाई के सरकारी साधन नहर, सरकारी नलकूप से किसानों को मुफ्त पानी हृ किसानों का कर्ज माफ करना, सीमान्त किसानों को 4 फीसदी ब्याज पर कर्ज देना हृ अधिवक्ता कल्याण निधि होगी दो सौ करोड़ की व वृद्ध अधिवक्ताओं को मिलेगी पेंशन हृ सभी तरह के लाइसेंस दस वर्ष का एकमुश्त धन लेकर आजीवन करने हृ साइकिल व रिक्शा बनाने का कारखाना लगाने हृ 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करना हृ वैट की दरें पड़ोसी राज्यों के बराबर करना हृ पदोन्नति में आरक्षण संबंधी हाईकोर्ट के आदेश पर कार्यवाही करना।

भत्ते के लिए ही चाहिए 15 हजार करोड़


स्पष्ट बहुमत के साथ ही सूबे की सत्ता हासिल कर चुकी सपा के सामने अब सूबे के लोगों से किए वादों को पूरा करने की बड़ी चुनौती होगी। वादा निभाने के लिए सरकार को न केवल अरबों रुपये की दरकार होगी बल्कि कानून व्यवस्था दुरुस्त रखने के साथ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए कड़े फैसले भी लेने होंगे। बेरोजगारी भत्ते के लिए ही चाहिए डेढ़ हजार करोड़ : समाजवादी पार्टी ने सत्ता में आने पर बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा कर रखी है। पार्टी ने इससे पहले के कार्यकाल में जहां पांच सौ रुपये महीने भत्ता दिया था वहीं इस बार बेरोजगार नौजवानों को एक हजार रुपये देने का वायदा किया गया है। पिछले कार्यकाल में बेरोजगारी भत्ता देने से सरकारी खजाने पर हर वर्ष पांच सौ करोड़ रुपये का वित्तीय भार पड़ा था। वैसे तो बेरोजगारी भत्ता पाने के लिए पात्र बेरोजगार नौजवानों का अभी सही-सही आंकड़ा नहीं है, लेकिन भत्ते की राशि दुगनी करने के साथ ही सीमित सरकारी नौकरियों को देखते हुए मोटे तौर पर यह माना जा रहा है कि बेरोजगारी भत्ता देने से इस बार तकरीबन डेढ़ हजार करोड़ रुपये का सालाना वित्तीय भार आएगा। ज्यादा व मुफ्त बिजली देना होगी चुनौती : पार्टी ने दो वर्ष में गांवों के लिए 20 घंटे व शहर को 22 घंटे बिजली देने का वादा किया है। किसानों की तरह गरीब बुनकर को भी मुफ्त बिजली देने की बात घोषणा पत्र में कही गई है। उद्योग व कृषि क्षेत्र को भरपूर बिजली देने के साथ ही निजी व सरकारी क्षेत्र में बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देते हुए नए बिजलीघरों का निर्माण व पुराने का सुधार तथा बिजली चोरी रोकने को लाइन लॉस घटाने की घोषणा भी की गई है। गौर करने की बात यह है कि अभी बिजली के उत्पादन व उपलब्धता की जो स्थिति है उससे ज्यादातर शहरों को ही 16-18 घंटे बिजली नहीं मिल पा रही है जबकि गांवों को तो औसतन नौ घंटे बिजली ही आपूर्ति हो रही है। चूंकि बिजली घरों की स्थापना में ही करीब चार वर्ष लगते हैं इसलिए फिलहाल बिजली की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार होता नहीं दिखता। मुफ्त बिजली देने से डेढ़-दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ उस पावर कारपोरेशन पर पड़ेगा जो पहले से ही आठ हजार करोड़ रुपये से अधिक के घाटे में है। ऐसे में सपा सरकार के सामने इस वादे को पूरा करने के लिए न केवल महंगी दरों पर अतिरिक्त बिजली खरीदनी पड़ेगी बल्कि गरीब किसानों-बुनकरों को मुफ्त बिजली देने के लिए बिजली दर बढ़ाकर सूबे के लोगों पर बोझ डालने जैसे अप्रिय निर्णय लेने की चुनौती भी होगी। टैबलेट व लैपटॉप के लिए 3800 करोड़ की होगी दरकार : पार्टी ने हाईस्कूल व इंटर पास विद्यार्थियों को मुफ्त टैबलेट पीसी और लैपटॉप बांटने का वादा किया है। मोटे तौर पर इस वर्ष हाईस्कूल पास विद्यार्थियों की संख्या 25 लाख व इंटर पास 21 लाख रहने की उम्मीद है। अगर टैबलेट पीसी का न्यूनतम मूल्य 50 डालर यानी लगभग 2500 रुपये ही माना जाए तो हाईस्कूल उत्तीर्ण विद्यार्थियों को उसे देने के लिए सालाना 625 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। इसी तरह लैपटॉप की न्यूनतम कीमत 15000 रुपये मानने पर इंटरमीडिएट पास विद्यार्थियों को मुफ्त लैपटॉप मुहैया कराने पर प्रति वर्ष 3150 करोड़ रुपये का वित्तीय भार आएगा। इस तरह से मुफ्त टैबलेट पीसी तथा लैपटॉप देने के लिए ही सरकारी खजाने पर तकरीबन 3800 करोड़ का वित्तीय भार आएगा।