Wednesday, February 15, 2012

तीसरे चरण में दस जिलों की 56 सीटों पर मतदान आज


लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और मौका आ गया। इस बार इसकी जिम्मेदारी तीसरे चरण के मतदाताओं की उठानी है। उन्हें बुधवार को वोट डालने के लिए घरों से निकलना है। इस चरण में पहले दो चरणों के मुकाबले ज्यादा वोट पड़ने की संभावना है। इसकी वजह इस चरण में उन जिलों का शामिल होना है जिसने देश को कई प्रधानमंत्री दिये हैं। जाहिर है कि ऐसे में यहां के मतदाताओं से जागरूकता की ज्यादा उम्मीद की जा रही है। विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में दस जिलों की 56 सीटों पर मतदान होना है। ये जिले हैं- छत्रपति शाहूजी महराज नगर (अमेठी), सुल्तानपुर, कौशाम्बी, इलाहाबाद, जौनपुर, चंदौली, वाराणसी, संत रविदासनगर, मिर्जापुर और सोनभद्र। मतदान सुबह सात बजे से शुरू होगा। चंदौली जिले के चकिया और सोनभद्र जिले के राबर्टसगंज व दुद्धी निर्वाचन क्षेत्रों में सायं चार बजे तक मतदान होगा। बाकी सभी स्थानों पर शाम पांच बजे तक वोट पड़ेंगे। तीसरे चरण में 77 महिलाओं सहित कुल 1018 प्रत्याशी मैदान में हैं। करीब 1.77 करोड़ से अधिक मतदाता उनकी तकदीर का फैसला करेंगे। इनमें 97.50 लाख पुरुष और 80.30 महिलाएं शामिल हैं। इस चरण में 11607 मतदान केन्द्रों के कुल 18374 पोलिंग स्टेशनों पर मतदान होगा। मंगलवार को ज्यादातर उम्मीदवारों ने जहां बूथ मैनेजमेंट में अपनी ताकत झोंकी वहीं जनसम्पर्क के जरिये मतदाताओं को भी लुभाने का प्रयास किया। इससे पहले चुनाव प्रचार के दौरान भी सभी दलों के दिग्गज नेता जनता के बीच अपनी-अपनी बातें रख चुके हैं। प्रत्याशी भी अपने वादे-इरादे जाहिर कर चुके हैं। अब फैसला मतदाताओं को करना है कि वह अपना कैसा जनप्रतिनिधि चाहते हैं। ये दिग्गज हैं मैदान में इस चरण में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह भाजपा से, मायावती सरकार के मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी, इन्द्रजीत सरोज, विनोद सिंह व मंत्री पद से हटाये गये रंगनाथ मिश्र बसपा से, बसपा सरकार में मंत्री रहे राकेश धर त्रिपाठी निर्दलीय, पूर्व मंत्री अमिता सिंह कांग्रेस से और पूर्व मंत्री उज्जवल रमण सिंह सपा से चुनाव मैदान में हैं। दांव पर दलों की प्रतिष्ठा परिसीमन से पहले सन 2007 के विधानसभा चुनाव में इन दस जिलों की कुल 53 सीटों पर बसपा ने 31, सपा ने 11, भाजपा ने छह, कांग्रेस ने तीन व जदयू ने एक पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में बसपा पर जहां पूंजी बचाने का सर्वाधिक दबाव है वहीं सपा की कोशिश अपना दबदबा कायम करने की है। राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र के कारण यह चरण कांग्रेस की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा है। दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर होने के कारण भाजपा भी इस चरण को लेकर खासी फ्रिकमंद है। पिछली बार हुआ था 42.63 प्रतिशत मतदान तीसरे चरण के इन जिलों में पिछले विधानसभा चुनाव में 42.63 प्रतिशत मतदान हुआ था। सबसे अधिक मतदान इलाहाबाद जिले के बारा निर्वाचन क्षेत्र में 53.33 प्रतिशत और सबसे कम इलाहाबाद के ही उत्तरी निर्वाचन क्षेत्र में 24.01 प्रतिशत

झारखंड के 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार


नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई न करने पर गृह मंत्री पी.चिदंबरम से मिली फटकार के बाद अब केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने झारखंड की मुंडा सरकार को आइना दिखाया है। रमेश ने परोक्ष रूप से राज्य सरकार व नक्सलियों में समझौते का आरोप लगाते हुए यहां तक कह डाला कि 24 में से 17 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सरकार है। जयराम ने मंगलवार को उपमुख्यमंत्री व झामुमो नेता हेमंत सोरेन की मौजूदगी में एक कार्यक्रम में कहा, झारखंड में राजनीति कहां खत्म होती है और माओवाद कहां से शुरू होता है, इसका पता ही नहीं चलता। अर्जुन मुंडा सरकार को घेरते हुए कहा, हम माओवादियों का सहयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं। इससे फायदा होने वाला नहीं है। हम किसी भी हाल में माओवादियों से समझौता नहीं करेंगे। केंद्रीय मंत्री ने कहा, वे छह माह में पांच बार झारखंड का दौरा कर चुके हैं। सारंडा के घने जंगलों में गया तो स्थिति देखकर आंखों में आंसू आ गए। जयराम रमेश ने कहा, झारखंड सरकार मनरेगा के क्रियान्वयन में सुस्ती बरत रही है। आदिवासी मामलों के मंत्री ने भी राज्य सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि वे असंतुष्ट हैं। ग्राम पंचायत अगर मजबूत नहीं हुईं तो मनरेगा का काम नहीं होगा। पंचायतों को अधिकार की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, राज्य सरकार केंद्र से सत्ता के विकेंद्रीकरण की मांग उठाती है लेकिन राज्य में अधिकार देने से परहेज करती है।

पीएम ने युवाओं को दिया नौकरी का भरोसा

प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा है कि युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर है। भारतीय श्रम सम्मेलन में उन्होंने कहा कि युवाओं को अधिकाधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए उनके कौशल को भी बढ़ाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने माना कि युवाओं का कौशल बढ़ाने का काम धीमी गति से चल रहा है और इस गति को तेज करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि युवाओं के लिए हर साल रोजगार के अधिक और अच्छे अवसर सुलभ कराना हमारी जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह संभव है कि जब हम अपने युवाओं को उन क्षेत्रों में दक्ष बनाएंगे जो देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पकालिक श्रमिकों को भी पूर्णकालिक श्रमिकों जैसी सुविधाएं दिलाने के लिए भी सरकार काम कर रही है। डा. मनमोहन सिंह ने कहा कि वर्ष 2004 से अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार की वजह से देश में कौशल विकास प्रक्रि याओं की खामियां भी सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि तेज आर्थिक वृद्धि की राह में कौशल विकास एक बड़ी बाधा है और इससे उबरना भी बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में कौशल रफ्तार को तेज करने के लिए निजी क्षेत्र को ज्यादा दिलचस्पी लेनी होगी। गरीब छात्रों को सीखने के लिए आर्थिक मदद की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वह इसे उचित नहीं समझते कि कौशल निखारे बिना ही युवा रोजी-रोटी के जुगत में लग जाएं। उन्होंने कहा कि इसके लिए उद्योग और सरकार दोनों को मिलकर काम करना होगा। प्रधानमंत्री ने इस बात का अध्ययन करने की भी जरूरत बताई कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश का नियामक तंत्र श्रम कल्याण में वास्तविक योगदान देने की बजाय हमारे विकास, रोजगार के अवसर और उद्योग के बढ़ने में आड़े आ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार सभी श्रमिकों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसे प्रावधान लाने पर विचार कर रही है जिससे अल्पकालिक श्रमिकों को पूर्णकालिक श्रमिकों के सभी लाभ मिलें। प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके लिए अगर विधायी संशोधनों की आवश्यकता होगी तो हम उसके लिए भी तैयार हैं। उन्होंने बताया कि इसे वास्तविकता में बदलने के लिए इसके प्रारूप पर काम चल रहा है। उन्होंने इस पर खुशी जताई कि अब राज्य सरकारें श्रम संबंधी कानूनों को लेकर लचीला रुख अपना रही हैं जिससे श्रमिकों के हितों को अच्छा संरक्षण हो रहा है। प्रधानमंत्री डा. सिंह ने कहा कि सरकार श्रम कानूनों को मजबूत बनाने और उन्हें लागू करवाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि फैक्ट्री अधिनियम-1948 में संशोधन किए जाने की प्रक्रि या जारी है। देश की वृद्धि दर 9प्रतिशत तक ले जाने की अपनी इच्छा को जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को तभी पाया जा सकता है जब नियोक्ता और श्रमिक मिलकर काम करें। उन्होंने एक आधुनिक एवं औद्योगिक होती अर्थव्यवस्था के निर्माण और इसके त्वरित एवं समावेशी विकास के लिए देश में बेहतर औद्योगिक संबंधों को जरू री बताते हुए उद्योग, श्रमिक और सरकार से परस्पर साझेदारी की भावना से काम करने की अपील की। प्रधानमंत्री ने श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का भी जिक्र किया और कहा कि अब न्यूनतम 10 कर्मचारी रखने वाले प्रतिष्ठानों में भी ईएसआईसी की सेवाओं का लाभ देना अनिवार्य कर दिया गया है।

Tuesday, February 14, 2012

कांग्रेस के खोखले दावे


उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। जहां एक तरफ वह स्वयं, उनकी बहन और उनके बच्चे कांग्रेस के लिए वोट मांग रहे हैं वहीं कांग्रेस के अन्य नेता गांधी परिवार के प्रति अपनी स्वामिभक्ति व्यक्त करने के लिए एक-दूसरे से होड़ लेने में लगे हैं। प्रतिस्पद्र्धा में लगे इन नेताओं के ऐसे बयान सामने आ रहे हैं जो न केवल संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ते हैं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी खतरे की घंटी हैं। विधि एवं अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद द्वारा पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से मुसलमानों के लिए 9 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा को चुनाव आयोग ने गंभीरता से लिया। आयोग ने खुर्शीद को आचार संहिता का पालन करने का निर्देश देते हुए सावधानी बरतने के लिए चेताया था, किंतु पिछले दिनों उन्होंने एक और चुनाव रैली को संबोधित करते हुए कहा, चुनाव आयोग भले ही मुझे फांसी पर चढ़ा दे, मैं मुसलमानों के अधिकारों के लिए लड़ता रहूंगा। खुर्शीद केंद्रीय विधि मंत्री हैं, इसलिए स्वाभाविक तौर पर उनसे संवैधानिक निकायों के प्रति सम्मान प्रकट करने की अपेक्षा की जाती है। उन्हें चुनाव आयोग की मर्यादा और प्रतिष्ठा की रक्षा करनी चाहिए। इससे पूर्व जब आयोग ने भारतीय जनता पार्टी की शिकायत पर आचार संहिता उल्लंघन करने का संज्ञान लिया था तब भी उन्होंने अमर्यादित टिप्पणी करते हुए कहा था कि आयोग को चुनाव के बेसिक फंडे की जानकारी ही नहीं है। चुनाव आयोग का बार-बार इस तरह उपहास उड़ाए जाने पर भी प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का मौन रहना यह दर्शाता है कि खुर्शीद को उनका समर्थन प्राप्त है। कांग्रेस में चाटुकारिता का बहुत महत्व है। केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का हालिया बयान इसे रेखांकित करता है। पिछले दिनों पत्रकारों से बात करते हुए जायसवाल ने कहा, राहुल जब चाहें, देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सवाल कहां खड़ा होता है। वह इस राज्य में जो भी शासन देंगे उसके रिमोट कंट्रोल का सेंसर बहुत मजबूत होगा। केंद्र में स्थापित रिमोट कंट्रोल वाली व्यवस्था के कारण देश जिस बदहाली के दौर से गुजर रहा है उसको देखते हुए उत्तर प्रदेश का भविष्य सहज ही समझा जा सकता है। संविधान में रिमोट की कोई व्यवस्था नहीं है। 2004 के जनादेश के बाद संवैधानिक अड़चनों के कारण जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा टूटी तो पिछवाड़े से सत्ता की कमान थामे रखने के लिए इस तरह की अलोकतांत्रिक बुनियाद डाली गई। सोनिया के विदेशी मूल के कारण 2004 में कांग्रेस को समझौता करना पड़ा और एक नौकरशाह प्रधानमंत्री बने। लोकतंत्र के साथ किए गए इस नए प्रयोग का दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास पद तो है, पर शक्तियां नहीं। सोनिया गांधी संप्रग समन्वय समिति का अध्यक्ष बन सत्ता का रिमोट अपने पास रखे हुए हैं। इस विरोधाभास के कारण ही आज हमारे चारो ओर अव्यवस्था-कुशासन फैला है। सरकार में कायम नेतृत्वहीनता के कारण अर्थव्यवस्था दिशाहीन हो गई है। महंगाई बेलगाम है। नामचीन उद्योगपति सरकारी स्तर पर व्याप्त नेतृत्वहीनता को दूरकर अर्थव्यवस्था को संभालने की अपील कर रहे हैं। सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है। यदि न्यायपालिका ने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो न तो 2जी घोटाले के आरोपी तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा और न ही राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लूट के कसूरवार कलमाड़ी सलाखों के पीछे पहंुचते। सीएजी की रिपोर्ट में दिल्ली की मुख्यमंत्री पर भी अनियमितता बरतने के आरोप हैं, किंतु सरकार ने उन्हें संरक्षण प्रदान कर रखा है। नेता प्रतिपक्ष के विरोध के बावजूद सरकार ने एक दागदार व्यक्ति को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त बनाया था, जिसे अदालत के आदेश के बाद हटाना पड़ा। कैसी सरकार है यह और इसकी प्राथमिकताएं क्या हैं? आर्थिक, औद्योगिक और कृषि, तीनों क्षेत्रों में विकास की दर मंद है। राहुल गांधी पांच साल में उत्तर प्रदेश की सूरत बदल देने का दावा कर रहे हैं। वह विकास की आंधी से रोजगार के अवसरों की बाढ़ लाएंगे ताकि उत्तर प्रदेश के युवाओं को उनके बयान के अनुसार मुंबई और अन्य महानगरों में भीख मांगने के लिए नहीं जाना पड़े। जरा, केंद्रीय परियोजनाओं पर नजर डालें। आधारभूत संरचनाओं का विकास किए बिना किसी भी क्षेत्र में प्रगति करना संभव नहीं है। सरकार ने प्रतिदिन बीस किलोमीटर हाईवे बनाने का लक्ष्य रखा था, जबकि जमीनी वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। चालू केंद्रीय परियोजनाओं में से 65 प्रतिशत योजनाओं में इतनी देरी हो चुकी है कि तय लक्ष्य प्राप्त कर पाना सरकार के लिए असंभव हो गया है। देरी के कारण निर्माण सामग्री के दाम बढ़ जाने से सरकारी खजाने को 1800 करोड़ रुपये का चूना अलग लगा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में आक्रामक तेवर लिए घूम रहे कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी उत्तर प्रदेश की बदहाली के लिए गैर-कांग्रेसी दलों को भले ही कोस रहे हों, किंतु क्या इसके लिए कांग्रेस की जवाबदेही अन्य दलों से बड़ी नहीं है? प्राय: समूचे देश में आजादी के बाद के चार दशक तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है। व्यवस्था क्यों नहीं बदली? आज कांग्रेस मुसलमानों का मसीहा बनने का स्वांग कर रही है। पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक वर्ग के लिए तय करने की घोषणा कर कांग्रेस एक बार फिर मुसलमानों को ठगना चाहती है। मुसलमानों के कल्याण के लिए सच्चर कमेटी के बाद रंगनाथ मिश्र आयोग ने जो संस्तुतियां की थीं उनमें से कितनों को सरकार पूरा कर पाई? राहुल और सोनिया गांधी ने दावा किया है कि चुनाव बाद किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेंगे, किंतु केंद्र में गठबंधन करने से परहेज क्यों नहीं किया? प्रधानमंत्री सरकार की अक्षमता के पीछे गठबंधन दलों का दबाव बताते आए हैं। एक जनहितैषी पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस राजनीतिक अवसरवाद को ज्यादा प्राथमिकता क्यों देती है? वस्तुत: जैसा कि स्वयं राहुल गांधी ने भी पिछले दिनों कहा, कांग्रेस की नजर इन दिनों धनुर्धर अर्जुन की तरह सिर्फ सत्ता पर केंद्रित है। पिछले 22 सालों से यूपी ने कांग्रेस को हाशिए पर डाल रखा है। उस खोए जन विश्वास को वापस पाने के लिए कांग्रेस जिस तरह संवैधानिक निकायों पर हमला कर रही है और संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर वोट बैंक की राजनीति कर रही है उससे चुनावों में लाभ होना तो शायद संभव न हो, किंतु राष्ट्रहितों को क्षति पहुंचने का खतरा अवश्य है। (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

बदल दो यूपी की तस्वीर : राहुल


दिन रात मेहनत कर महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली को अमीर बनाने वालों से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी ने अब यूपी की तस्वीर बदलने का आह्वान किया है। राहुल ने सोमवार को प्रतापगढ़ और फतेहपुर में चुनावी सभाओं में कहा कि बहुत नाटक हो गया। गैर कांग्रेसी सरकारों को दिया गया 22 साल कम नहीं है। जब तक यूपी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, मैं यहां से हटने वाला नहीं हूं। राजग पर निशाना साधते हुए राहुल ने कहा कि गांवों में रोजगार नहीं था और 2004 के लोकसभा चुनाव में इंडिया शाइनिंग का नारा दिया जा रहा था। कांग्रेस की सरकार बनने पर मनरेगा के तहत गांव में 100 दिन के रोजगार दिया गया। हजारों करोड़ रुपया भेजे गए, लेकिन यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने इसको नाटक बताया। मुलायम सिंह रोजगार नहीं बेरोजगारी भत्ता देने की बात करते हैं। उन्होंने वादा नहीं काम करने में विश्वास रखने की बात करते हुए कहा कि राजग समेत विपक्ष भले ही विरोध कर रहा है, लेकिन भोजन के अधिकार की योजना को पास कराकर ही रहेंगे। इसके तहत हर गरीब परिवार को 33 किलो राशन मिलेगा। पूरे हिंदुस्तान में कोई भूखा नहीं रहने पाएगा। मुलायम पर निशाना साधते हुए कहा कि वे मुफ्त में बिजली देने की बात कर रहे हैं, जबकि हर कोई जानता है कि सपा की सरकार में बिजली नहीं मिली, बिल जरूर मुफ्त में आया।

मायावती के इशारे पर हुए यूपी में सभी घोटाले : कुशवाहा


कभी बसपा सुप्रीमो के बेहद करीबी रहे और एनआरएचएम घोटाले के घेरे में आने के बाद मंत्रिपद और पार्टी से निकाले गए उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने रविवार को प्रदेश के सभी घोटालों का सारा ठीकरा मुख्यमंत्री मायावती पर ही फोड़ दिया। उन्होंने यहां एक जनसभा में कहा कि यूपी में जो भी घोटाले हुए वे सब मायावती के इशारे पर हुए हैं। कुशवाहा के अनुसार उन्हें तो केवल ढाल की तरह उपयोग किया गया। जब फंसने लगीं तो उन पर कार्रवाई कर दी। उन पर जो आरोप लग रहे हैं वे निराधार हैं। सीबीआइ जांच में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। प्रशासन से सभा की अनुमति न मिलने पर कुशवाहा लोगों से घूम घूमकर मिले। बाद में पत्रकारों से कहा, मेरे सीने में बसपा शासनकाल के बहुत से राज छिपे हैं, जिन्हें समय आने पर उजागर करूंगा। बसपा को पिछड़ी जातियों की विरोधी बताते हुए कुशवाहा ने कहा कि केंद्र से साठगांठ करके पिछड़ों के 27 फीसदी आरक्षण में कटौती कराकर मुस्लिमों को दे दिया गया। भाजपा में शामिल होने पर बोले, मैंने भाजपा से खुद को अलग कर सवालों का जवाब दे दिया है।

सिर्फ वोट भुनाने का हथियार


पिछले दिनों सरकार ने पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समुदाय के पिछड़े वर्ग को आरक्षित करने की बात कही। हालांकि विधानसभा चुनावों के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने चुनाव संपन्न होने तक सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया है। मगर सवाल यह है कि इस तरह का जाल फेंकना क्या रेखांकित क्या करता है? तमाम विपक्षी पार्टियों की नजर में सरकार का यह पैंतरा सीधे-सीधे कांग्रेस को चुनावी फायदा पहुंचाता नजर आ रहा है, लेकिन इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे मुस्लिम समाज को फायदा होगा? अगर मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन सभी वर्गो की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। इन सभी वर्गो के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के लोग कैसे उठा पाएंगे? इसका अधिकांश लाभ तो ईसाइयों और बौद्ध समुदाय को मिलता नजर आ रहा है। दरअसल, सरकार ने बड़ी ही चालाकी से विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम समाज को ठगने का काम किया है ताकि मुस्लिम समाज का एकमुश्त वोट-बैंक कांग्रेस की झोली में आ गिरे, जबकि हकीकत यह है कि पंजाब में सिख समुदाय पर आरक्षण का लाभ मिलने का वादा किया गया तो गोवा में ईसाइयों पर दांव लगाया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश में इसका केंद्र मुस्लिम बन गए हैं। हमेशा की ही तरह इस बार भी कांग्रेस की बाजीगरी मुस्लिमों को ठगने का काम कर रही है। ऐसे में मुस्लिमों के बीच यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या उन्हें मात्र आरक्षण का झुनझुना चाहिए या वास्तव में उनके हितों तथा उनके सर्वागीण विकास के लिए ठोस और कारगर कदम उठाने होंगे? फिर देश में यह बहस भी शुरू हो गई है कि आरक्षण जब आजादी के 65 वर्षो बाद भी मुस्लिमों का भला नहीं कर पाया तो राजनीतिक शून्यता के इस दौर में आरक्षण से किसे और क्या फायदा होगा? एक और बड़ा मुद्दा यह कि क्या मजहब के आधार पर आरक्षण देना सही है? आजाद भारत में संविधान निर्माताओं ने हाशिए पर खड़े समाज के संरक्षण और उत्थान के लिए प्रावधान बनाए, मगर संविधान सभा में जब मजहब के आधार पर आरक्षण की मांग उठी तो सात में से पांच मुस्लिम सदस्यों मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना हिफजुर रहमान, बेगम एजाज रसूल, हुसैन भाई लालजी तथा तजामुल हुसैन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया था। वहीं 26 मई 1949 को संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, अगर आप अल्पसंख्यकों को ढाल देना चाहते हैं तो वास्तव में आप उन्हें अलग-थलग करते हैं..। हो सकता है कि आप उनकी रक्षा कर रहे हों, पर किस कीमत पर? ऐसा आप उन्हें मुख्यधारा से काटने की कीमत पर करेंगे। आज जब राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आरक्षण की मांग उठाते हैं या सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने की बात करते हैं तो दुख होता है कि एक ऐसे नेता का प्रपौत्र मजहबी आरक्षण का हिमायती है, जो उसका हर स्थिति में विरोध करते थे। नेहरू ही क्यों, 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तब राजीव गांधी ने इसका जोरदार विरोध किया था। विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर 1990 को राजीव गांधी ने संसद में अपने भाषण में मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की मांग की थी। आज जब कांग्रेस सत्ता में है तो उसे अपनी ही पार्टी के नेता का आरक्षण विरोधी रवैया याद नहीं रहा। जिस मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म करने की वकालत राजीव गांधी ने की थी, कांग्रेसी नेता आज उसी मंडल आयोग की संस्तुतियों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समाज खासकर मुस्लिम समाज को ठगने के लिए कर रहे हैं। वैसे भी मजहब के नाम पर आरक्षण का दुष्परिणाम यह रहा है कि आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदाय के क्रीमीलेयर ही उठा ले गए। अगर कांग्रेस वास्तव में मुस्लिम समाज की बेहतरी चाहती है तो सच्चर कमेटी तथा मिश्र आयोग की संस्तुतियों को पूर्णत: लागू करे तथा उनके प्रावधानों के अनुकूल मुस्लिमों को उचित लाभ दिलवाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)