जिस देश में राजनीति छल-छद्म और धोखों पर ही आमादा हो, वहां संवादों का कड़वाहटों में बदल जाना स्वाभाविक है। स्वस्थ संवाद के हालात ऐसे में कैसे बन सकते हैं। टीम अन्ना के साथ जो हुआ, वह सही मायने में धोखे की एक ऐसी पटकथा है, जिसकी बानगी खोजे न मिलेगी। लोकपाल बिल पर जैसा रवैया हमारी समूची राजनीति ने दिखाया, क्या वह कहीं से आदर जगाता है? एक छले गए समूह से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वह सरकारी तंत्र और सांसदों पर बलिहारी हो जाए? केजरीवाल जो सवाल उठा रहे हैं, उसमें नया और अनोखा क्या है? उनकी तल्खी पर मत जाइए, शब्दों पर मत जाइए। बस जो कहा गया है, उसके भाव को समझिए। इतनी तीखी प्रतिक्रिया कब और कैसे कोई व्यक्त करता है, उस मनोभूमि को समझने पर सब कुछ साफ हो जाएगा। टीम अन्ना का इस वक्त हाल हारे हुए सिपाहियों जैसा है। वह राजनीति के छल-बल और दिल्ली की राजनीति के दबावों को झेल नहीं पाई और सुनियोजित निजी हमलों ने इस टीम की विश्सनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए। टीम अन्ना पर कभी न्यौछावर हो रहा मीडिया भी उसकी लानत-मलामत में लग गया। जिस टीम अन्ना को कभी देश का मीडिया सिर पर उठाए घूम रहा था, मुंबई में कम जुटी भीड़ के बाद आंदोलन के खत्म होने की दुहाइयां दी जाने लगीं। आखिर यह सब कैसे हुआ? आज वही टीम अन्ना जब मतदाता जागरण के काम में लगी है तो उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। अब देखिए, केजरीवाल ने एक कड़वी बात क्या कह दी, मीडिया उन पर फिदा हो गया। एक वनवास सरीखी उपस्थिति से केजरीवाल फिर चर्चा में आ गए। यह उनके बयान का ही असर है। किंतु आप देखें तो केजरीवाल ने जो कहा, वह आज देश की ज्यादातर जनता की भावना है। आज संसद और विधानसभाएं हमें महत्वहीन दिखने लगी हैं तो इसके कारणों की तह में हमें जाना होगा। आखिर हमारे सांसद और जनप्रतिनिधि ऐसा क्या कर रहे हैं कि जनता की आस्था उनसे और इस बहाने लोकतंत्र से उठती जा रही है। अन्ना और उनके समर्थक हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सवाल भ्रष्टाचार के प्रश्न को संबोधित कर रहे थे। उनके उठाए सवालों में कितना वजन है, यह उन्हें मिले व्यापक समर्थन से ही जाहिर है। लेकिन राजनीति ने इस सवाल से टकराने और उसके वाजिब हल तलाशने के बजाए अपनी चालों-कुचालों और षड्यंत्रों से सारे आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की। यह एक ऐसा पाप था, जिसे सारे देश ने देखा। अन्ना से लेकर आंदोलन से जुड़े हर आदमी पर कीचड़ फेंकने की कोशिशें हुई। आप देखें तो यह षड्यंत्र इतने स्तर पर और इतने धिनौने तरीके से हो रहे थे कि राजनीति की प्रकट अनैतिकता इसमें झलक रही थी। ऐसी राजनीति से प्रभावित हुए अन्ना पक्ष से भाषा के संयम की उम्मीद करना तो बेमानी ही है, क्योंकि शब्दों के संयम का पाठ केजरीवाल से पहले हमारी राजनीति को पढ़ने की जरूरत है। आज की राजनीति में नामचीन रहे तमाम नेताओं ने कब और कितनी गलीज भाषा का इस्तेमाल किया है, यह कहने की जरूरत नहीं है। गांधी को शैतान की औलाद, भारत मां को डायन और जाने क्या-क्या असभ्य शब्दावलियां हमारे माननीय सांसदों और नेताओं के मुंह से ही निकली हैं। वे आज केजरीवाल पर बिलबिला रहे हैं, लेकिन इस कड़वाहट के पीछे राजनीति का कलुषित अतीत उन्हें नजर नहीं आता। हमारे लोकतंत्र को अगर माफिया और धनपशुओं ने अपना बंधक बना लिया है तो उसके खिलाफ कड़े शब्दों में प्रतिवाद दर्ज कराया ही जाएगा। भारत आज भ्रष्टाचार की मर्मातक पीड़ा झेल रहा है। ऐसे में जगह-जगह असंतोष हिंसक अभियानों में बदल रहे हैं। लोकतंत्र में प्रतिरोध की चेतना को कुचलकर हम एक तरह की हिंसा को ही आमंत्रित करते हैं। आंदोलनों को कुचलकर सरकारें जन-मन को तोड़ रही है। इसीलिए लोकपाल बिल बनाने की उम्मीद में सरकार के साथ एक मेज पर बैठकर काम करने वाले केजरीवाल की भाषा में इतनी कड़वाहट पैदा हो जाती है, लेकिन सत्ता के केंद्र में बैठी मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, बेनी वर्मा, सलमान खुर्शीद जैसों की राजनीति में इतना कसैलापन क्यों है। अगर सत्ता के प्रमुख पदों पर बैठे हमारे दिग्गज नेता सुर्खियां बटोरने के लिए हद से नीचे गिर सकते हैं तो केजरीवाल जैसे व्यक्ति को लांछित करने का कारण क्या है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Wednesday, February 29, 2012
अरविंद केजरीवाल का आचरण
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने के लिए जन जागृति अभियान चला रही टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल का कहना है कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी बैठे हैं। अरविंद का कहना है कि लालू, मुलायम और राजा जैसे लोग संसद में बैठकर देश का कानून बना रहे हैं, इनसे संसद को निजात दिलाने की जरूरत है। अरविंद का यह भी कहना है कि सभी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्ट हैं और वे देश को लूटने के लिए जीत दर्ज करना चाहती हैं। अरविंद केजरीवाल का यह कहना तो ठीक है कि संसद से बुरे तत्वों को निकालने के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी, लेकिन सवाल उठता है कि आप संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देकर किस तरह की लड़ाई की बात कर रहे हैं? यह बात ठीक है कि संसद में 163 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं और वाकई देश की जनता को ऐसे सांसदों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने से पहले सौ बार सोचना चाहिए, लेकिन क्या इस संदर्भ में अरविंद केजरीवाल के इस बयान को सही ठहराया जा सकता है कि संसद ही देश की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है? इसके पहले भी अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे को संसद से ऊपर बताने वाला बयान दे डाला था। क्या कभी भी कोई व्यक्ति फिर चाहे वह अन्ना हजारे जैसी शख्सियत ही क्यों न हो, किसी भी संस्था से ऊपर हो सकता है? देश की संसद हो या राज्यों की विधानसभा या फिर स्थानीय निकाय, जीत कर आने वाले कई सदस्य ऐसे होते हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं और वाकई ऐसे लोग देश के विकास में बाधक हैं। दागी उम्मीदवार के लोकसभा या विधानसभा पहुंचने पर जनता में नाराजगी हो सकती है कि उसकी नुमाइंदगी करने वाला नेता अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी नहीं निभा रहा है, लेकिन कोई शख्स फिर चाहे वह अन्ना हजारे हों या फिर अरविंद केजरीवाल, अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं को ललकारने का काम करेंगे तो जनता उनके साथ खड़ी नजर नहीं आएगी। देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर लोगों की आस्था बरकरार है। ऐसे में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की बात की जाए। व्यवस्था में परिवर्तन चंद मुट्ठी भर लोगों से नहीं हो सकता और यह तभी संभव है, जब नए मूल्यों को स्वीकार करने के लिए पूरा देश साथ खड़ा हो। इसमें कोई दो मत नहीं कि लोकपाल बिल के जरिए भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने जब आवाज उठाई तो रोजमर्रा की जिंदगी में भ्रष्टाचार से जूझने वाला आम आदमी इस आंदोलन में उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। 1974 में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुए संपूर्ण आंदोलन के बाद देश की नौजवान पीढ़ी के सामने यह अपनी तरह का अनोखा अनुभव था और उन्होंने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लिया। कुल मिलाकर आजादी के बाद भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझे रहे आम आदमी को इस आंदोलन ने एक उम्मीद जगाई थी, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन मुद्दे से भटककर व्यक्ति विशेष पर सिमटता दिखाई दिया। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह और गांधीवादी पीवी राजगोपाल जैसे लोगों ने अन्ना के आंदोलन से दूरी बना ली। राजेंद्र सिंह का कहना था कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल तानाशाह हैं और यह आंदोलन दलगत राजनीति की गलत दिशा में जा रहा है। राजेंद्र सिंह का यह भी कहना था कि इन दोनों को समझना चाहिए कि लाखों लोग अन्ना और केजरीवाल के लिए नहीं आए थे, वे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए जमा हुए थे। आंदोलन से मुद्दे गायब होते गए और तथाकथित अन्ना मंडली से जुड़े लोग खुद के चेहरे चमकाने में ज्यादा लगे रहे। ये वे लोग थे, जिन्हें यह पता था कि मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। अन्ना जैसी शख्सियत की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। रालेगण सिद्धि में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। बिजली और पानी की कमी से जूझ रहे इस गांव की उन्होंने तस्वीर बदल दी। अन्ना ने गांव के लोगों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी जमा करने के लिए न केवल समझाया, बल्कि खुद भी इस काम में उनके साथ खड़े दिखाई दिए। गांव में सौर ऊर्जा से लेकर गोबर गैस के जरिए बिजली आपूर्ति का इंतजाम किया गया। अन्ना के प्रयासों से रालेगण सिद्धि की तस्वीर बदल गई। महाराष्ट्र में अन्ना के अनशन की वजह से कई बार भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को अपना पद छोड़ना पड़ा। दरअसल, सवाल अन्ना का नहीं, बल्कि उनकी समूची मंडली का है, जिसने जनता और मीडिया का ध्यान खींचने के लिए कहीं न कहीं अन्ना की मौलिकता को भी खत्म करने की कोशिश की। यह ठीक है कि अन्ना हमेशा सफेद खादी के कपड़े पहनते रहे हैं और सिर पर गांधी टोपी पहनते हैं, लेकिन इस आधार पर अन्ना को पूरी तरह गांधीवादी नहीं कहा जा सकता और न ही अन्ना ने इस आंदोलन के पहले खुद को इस तरह कभी पेश किया। हालांकि आंदोलन के वक्त इसे अन्ना मंडली का प्रबंधन कहा जाए या फिर स्वप्रेरित होकर अन्ना हजारे गांधी टोपी पहनकर राजघाट पर जाकर मौन व्रत धारण करके बैठ गए, लेकिन इन बातों ने आम लोगों का ध्यान जरूर खींचा। सवाल यह उठता है कि अन्ना हों या फिर अन्ना मंडली, इन लोगों को देश की जनता को यह बताना होगा कि क्या वाकई उन्हें गांधीवादी मूल्यों पर भरोसा है? जनमत संग्रह के मसले पर जब अन्ना मंडली के सदस्य प्रशांत भूषण की पिटाई की गई तो अन्ना हजारे ने इसकी निंदा करते हुए यह बयान दिया था कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन केंद्रीय मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने वाली घटना पर खुद अन्ना हजारे का यह बयान आता है कि क्या एक ही थप्पड़ मारा? यह जरूरी नहीं कि गांधी टोपी पहनने वाला कोई भी शख्स पूरी तरह से गांधीवादी मूल्यों का समर्थक हो, लेकिन जनता अन्ना मंडली से यह जानना चाहती है कि समाज में आंदोलन और क्रांति का तरीका गांधीवादी होगा या फिर कोई दूसरे तरीके से देश में बदलाव की बात की जा रही है। कभी बाबा रामदेव के साथ मिलकर आवाज उठाने वाली टीम अन्ना ने वर्चस्व की लड़ाई के चलते उनसे दूरियां बना ली तो कभी मुंबई में अन्ना के आंदोलन को समर्थन नहीं मिलने के बाद इन लोगों ने एक बार फिर से बाबा रामदेव का समर्थन मांगा। दरअसल, टीम अन्ना के बड़बोलेपन और वर्चस्व की लड़ाई की वजह से देश में भ्रष्टाचार का मसला हाशिए पर आता दिख रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन टीम अन्ना का नहीं, बल्कि देश की जनता का आंदोलन था और इसे जनता का आंदोलन ही बनाए रखना चाहिए था। अन्ना और उनकी मंडली को समझना होगा कि देश की जनता लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती है। अगर ऐसा नहीं होता तो अब तक नक्सली आंदोलन देश में पूरे चरम पर होता। संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर अगर देश की राजनीति और समाज में सकारात्मक आंदोलन की बात होगी तो एक बार फिर पूरा देश अन्ना के साथ खड़ा दिखाई देगा। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
Saturday, February 18, 2012
कब टूटेगा जात-पांत का तिलिस्म
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कभी कहा था कि हिंदू मान्यताओं पर जातिवाद का प्रभाव बहुत ही गहरा है। इस जातिवाद ने जनता की भावनाओं को मार दिया है। यहां तक कि जाति ने जनसामान्य कि नैतिकता की सोच तक को बर्बाद कर दिया है। अब इन विचारों की प्रतिध्वनि विधानसभा के मौजूदा चुनावों में देखी-सुनी जा सकती है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए और उनके बड़े नेताओं के लिए यह विचार करना महत्वपूर्ण है कि क्या वे चुनाव विचारों पर लड़ रहे हैं या किसी और के नाम पर। उनके भाषणों और प्रचार के तरीकों से पता चलता है कि यह चुनाव जाति और धर्म के नाम पर लड़े जा रहे हैं। पारंपरिक जातिवाद देश में धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है, लेकिन देश के नेता इसे उभार कर हमारी राष्ट्रीय जीवन को खतरे में डाल रहे हैं। दुर्भाग्य से इस देश में सारे चुनाव जात-पात पर लड़े और जीते जाते हैं। उम्मीदवार अपनी जातियों के समर्थन से चुनाव लड़ते हैं और यही नेता जीतने के बाद जातिवाद को बरकरार रखते हैं और अपने जाति वालों को विशेष महत्व देते हैं। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जो जातिवादी राजनीति के शिखर पर हैं, वहां के नेताओं को जैसे सोने की खान ही मिल गई है और उन लोगों ने इतनी अकूत दौलत जमा कर ली है कि उनकी कई पीढ़ी बैठकर अय्याशी कर सकती है। चुनावों के दौरान दलित वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होता है। तथाकथित दलित नेता दलितों को कई समूहों में विभाजित कर देते हैं। 2008 में ओडिशा में हुए चुनाव में दलित ईसाइयों को धमकाया गया था कि अगर वे बताए गए उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देंगे तो उनके हाथ काट दिए जाएंगे या उनके घरों को जला दिया जाएगा। हमारे देशवासी अपने ही उन देशवासियों को प्रताडि़त करते हैं, जो दलित कहे जाते हैं। तथाकथित और स्वयंभू दलित नेता सभी दलितों से अपने पक्ष में मतदान करवाते हैं और अपार सफलता हासिल करते हैं। पर इसके बदले में वे दलितों को गरीबी और निरक्षरता के अलावा कुछ नही देते हैं। तमाम बदलावों के बावजूद दलित आज भी पहले जैसी हालत में हैं। जाति और धर्म की छाया में निर्वाचन आयोग ने चुनावी तिथियों की घोषणा से पहले उत्तर प्रदेश में एक सर्वे कराया था, जिसमें कई चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा हुआ। इससे पता चला था कि मतदाताओं में सभी नेताओं के प्रति खासी नाराजगी है और बड़ी संख्या में मतदाताओं की मांग थी कि जो राजनीतिक दल परिवारवाद पर चल रहे हैं, उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। सर्वेक्षण से साफ हुआ था कि मतदाता जाति से परे राजनीति के पक्षधर थे। वह चाहते थे कि भ्रष्टाचार के आरोपी उम्मीदवारों को चुनाव में टिकट नहीं दिया जाए और वोट डालते समय मतदाताओं की सुरक्षा की जाए। यह अच्छी बात है कि मतदाता इन सब विवादों से बाहर आकर जाति तथा संप्रदाय से प्रभावित हुए बिना वोट डालना चाहते हैं, लेकिन सवाल यही कि क्या यह संभव होगा या क्या हमारे राजनीतिक दल ऐसा होने देंगे? दरअसल, आज की प्रतिस्पर्धी भारतीय राजनीति में जातिवाद महत्वपूर्ण हो गया है। प्राचीनकाल में मनु ने भारतीय समाज को जाति-परंपरा में बदला था। तब से हर भारतीय की जिंदगी, विवाह, पूजा-पाठ और अन्य अधिकार जाति आधारित हो गए हैं। दुर्भाग्य से जाति प्रथा धीरे-धीरे और मजबूती से भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमाती जा रही है और इस बीच तत्कालीन शासक लगातार जाति आधारित राजनीति के बलबूते शासन करते रहे। आजादी के बाद जातिवादी राजनीति ने इतनी जबरदस्त भूमिका निभाई कि नए राज्यों का निर्धारण इसी आधार पर किया गया। आज की राजनीति पूरी तरह कारोबार हो गई है। हमारे देश की इस तरह की राजनीति में संस्थागत और गठबंधन सहयोग बहुत जरूरी हो गया है। इसके चलते राजनीति और जातिवाद का आपसी तालमेल अहम हो गया है। जाहिर है, इसका खामियाजा भी देश की आम जनता को ही भुगतना पड़ रहा है। बिहार विधानसभा चुनावों में जातिवादी राजनीति के खत्म होने की किरण दिखी थी। दरअसल, बिहार के लोग विकास और जनसुधार के लिए खड़े हुए थे। बिहार के मतदाताओं ने अपने नेताओं को यह साफ संकेत दिया था कि जब तक उनके सामान्य जीवन में विकास नहीं होगा, जाति की राजनीति नहीं चल पाएगी। बिहार के लोगों ने अच्छी शिक्षा, अच्छी आर्थिक स्थिति और सामाजिक परिवर्तन की मांग करते हुए मतदान किया था। अब वहां आर्थिक बदलाव की बयार बह रही है और बिहार बदल रहा है। बहरहाल, सच यह भी है कि अब दलितों की जीवनशैली तेजी से बदल रही है और वे अपने परंपरागत पेशे को छोड़कर आसपास के शहरों में अच्छी नौकरियां तलाश रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बसे आधे से अधिक दलित परिवारों का खर्च शहरों से आने वाले मनीऑर्डर पर निर्भर है। इस आर्थिक बदलाव से जातिवाद को लेकर उनके दिलो-दिमाग में बैठी हीन भावना कम हो रही है, क्योंकि शहरी दलित रहन-सहन, जाति और संप्रदाय से काफी दूर है। अब अच्छी शिक्षा, अच्छी आर्थिक स्थित और सामाजिक समानता पाने की उनकी अपेक्षा बढ़ गई है। देश के पहले सार्वजनिक चुनाव में अंबेडकर को महसूस हुआ था कि दलितों के हितों की सुरक्षा के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। संविधान में पिछड़ों को विशेष सुरक्षा मिली हुई है। इनके लिए आरक्षण के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक समानता दिलाने की कोशिश की गई है, लेकिन यही आरक्षण भारतीय राजनीति को गलत तरीके से प्रभावित कर रहा है। इस प्रकार से यही जातिवाद आज जातिविहीन समाज के निर्माण में सबसे बड़ा रोड़ा है। राजनेता भी एक तरफ तो चाहते हैं कि समाज में फैली ऊंच-नीच की भावना और भेदभाव को खत्म किया जाए तो दूसरी तरफ वे अच्छी तरह से जानते हैं कि यही भेदभाव उन्हें वोट दिलाने में सहायक है। इसी के चलते वे जातिवादी संस्थाओं को प्रोत्साहित करते हैं। इन जातिवादी गुटों में जितनी अधिक सदस्य संख्या होती है, उतना ही अधिक उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी मिलती है। चुनाव में सीटों का आरक्षण भी दलित राजनीति को और उलझा रहा है। दलित कोई एक जाति नहीं होती है। आज जितनी जातियां हैं, उतने ही दलित नेता बढ़ते जा रहे हैं। हर जाति का दलित नेता अपनी खुद की जाति पर अधिक ध्यान देता है। इस प्रकार आज सत्ता उन लोगों के हाथों में है, जो खुद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरोधी हैं। पर अब वक्त आ गया है कि असली सच्चाई की तरफ सबका ध्यान खींचा जाए। उत्तर प्रदेश और बिहार में वर्ष 1990 तक राष्ट्रीय दलों का दबदबा था, लेकिन उसके बाद यहां पिछड़ी जाति के नेताओं की राजनीतिक मामलों में पकड़ कायम हुई, जो आज भी बदस्तूर जारी है। (लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Tuesday, January 24, 2012
वायदों के भंवरजाल में राजनीति
कभी उत्तर प्रदेश में कंप्यूटर और अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश के मौजूदा विधानसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में दसवीं पास छात्रों को टैबलेट और बारहवीं पास छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया है। वायदों की झड़ी यहीं आकर नहीं रूकी, समाजवादी पार्टी ने दसवीं पास मुस्लिम छात्राओं को 30 हजार रुपये, छात्रों को मुफ्त चिकित्सा, एक हजार रुपये, बेरोजगारी भत्ता और किसानों को मुफ्त पानी और बिजली देने का भी ऐलान कर दिया। मुफ्त लैपटाप देने की घोषणा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने की तो पंजाब में अकालियों ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में मुफ्त लैपटॉप देने का वादा कर दिया। मुफ्त लैपटॉप, मुफ्त टैबलेट, मुफ्त बिजली और पानी जैसी चुनावी घोषणाएं अब तक तमिलनाडु जैसे राज्यों में सुनने को मिलती थी, लेकिन दक्षिण भारतीय राजनीति के लोक लुभावन प्रलोभन ने अब उत्तर भारत की राजनीति में भी दस्तक दे दी है। सवाल उठता है कि मुफ्त लैपटॉप और मुफ्त टैबलेट देकर क्या हम किसी राज्य की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त कर सकते हैं? क्या इस तरह की घोषणाओं से उत्तर प्रदेश या पंजाब में छात्र सूचना प्रौद्योगिकी में महारत हासिल कर लेंगे? क्या बेरोजगारी भत्ता देकर किसी प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या का हल निकाला जा सकता है, इत्यादि। हालात ये हैं कि देश में पैसा देकर भी किसानों को बिजली हासिल नहीं हो रही है तो ऐसे में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी देने जैसे वायदों का क्या औचित्य है। पिछले साल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने कुछ ऐसे ही वायदों की बौछार कर दी थी। चुनाव जीतने पर कोई लैपटाप देने की बात कर रहा था तो कोई विवाहित महिलाओं के गले में सोने के मंगलसूत्र देने का ऐलान कर रहा था। भले ही ऐसे राज्यों में गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिले, लेकिन इन राज्यों में गरीबों को मुफ्त अनाज देने का वादा पिछले कई चुनावों से किया जा रहा है। चुनावी राजनीति के इन खोखले वादों की असलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दक्षिण भारत के इस राज्य में किसानों को मुफ्त मिनरल वाटर दिए जाने का भी ऐलान किया गया था। दक्षिण भारत के इन राज्यों में नेताओं का राजनीति के साथ-साथ कारोबार का सिलसिला जमकर चलता है, लेकिन आम आदमी आज भी गरीबी और भुखमरी की मार से पीडि़त है। आम जनता से वायदा करने में कोई एक दल नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दल शामिल हैं जबकि हकीकत में आम लोगों की मुश्किलों को दूर करने में जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए जाते। आखिर कब तक राजनीतिक दल चाशनी में लिपटी योजनाओं को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करके आम जनता को धोखा देते रहेंगे? देश की आधी आबादी को अब भी भरपेट भोजन या पौष्टिक आहार नहीं मिलता, लेकिन राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणाओं से किसी तरह का कोई परहेज नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अभी कुछ दिनों पहले कुपोषण पर नाराजगी जताते हुए इसे राष्ट्रीय शर्म करार दिया था। इससे संबंधित रिपोर्ट जारी करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में 42 फीसदी बच्चे कम वजन के पैदा होते हैं। विश्व बैंक के 1998 के आंकड़ों के मुताबिक भारत कुपोषण के मामले में बांग्लादेश के बाद दूसरे नंबर पर आता है और जन्म के समय कम वजन के बच्चे सबसे ज्यादा भारत में ही पैदा होते हैं। तमाम साक्षरता मिशन लागू करने के बाद अब भी हम लोग सौ फीसदी साक्षरता के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके हैं। कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेता इन दिनों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड जैसे राज्यों में जाकर भ्रष्टाचार पर लंबी-चौड़ी बातें कर रहे हैं। प्रदेश में सरकार बन जाने पर बड़े-बड़े वादे और प्रदेश की पूरी तस्वीर बदलने की बात कर रहे हैं, लेकिन जनता जानना चाहती है कि आखिर केंद्र में इतने लंबे समय तक शासन करने के बाद देश के हालात में सकारात्मक सुधार क्यों नहीं हुआ? आजादी के इतने वर्षो के बाद भी अगर देश में लोग कुपोषण के शिकार हो रहे हैं तो इसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है? लोगों को दो जून की रोटी और घर का चौका-चूल्हा जलाने के लिए काम की तलाश है और समाजवादी पार्टी और अकाली दल जैसे राजनीतिक दल राज्य के विकास के लिए कुछ ठोस योजनाओं की बात करने की बजाय मुफ्त लैपटाप और मुफ्त टैबलेट देने का वायदा कर रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि पंचायती राज से गांवों के हालात में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन इन पंचायत चुनावों में झूठे वायदों के साथ ही लोग मतदाताओं को नकली सामान देकर भी वोट हासिल करने की कोशिश करते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में दलित बस्ती के कुछ लोगों का कहना था कि किसी प्रत्याशी ने इन इलाकों में सोने की पॉलिश लगे जेवरों को असली बताकर मतदाताओं के बीच में बांट दिया और चुनाव के बाद इन लोगों को पता चला कि ये जेवर सोने के नही हैं। दरअसल, चुनाव चाहे पंचायत या नगरीय निकायों के हों अथवा फिर लोकसभा या विधानसभा के ज्यादातर राजनीतिक दल सतही चुनावी घोषणाओं के जरिये जनता का भरोसा हासिल करने की कोशिश करते हैं। कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों राज्य विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दल आम जनता को यह यकीन दिलाने में लगे हैं कि अगर प्रदेश में उनकी सरकार बन जाए तो राज्य में हालात पूरी तरह बदल जाएंगे। पिछड़े और अल्पसंख्यकों की समस्याओं से भले ही इन राजनीतिक दलों को कोई सरोकार नहीं हो, लेकिन चुनाव आते ही हर दल अपने-अपने हिसाब से आरक्षण का राग अलापना शुरू कर देता है। किसी को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट याद आती है तो कोई रंगनाथ मिश्र आयोग की बात करता है। कुल मिलाकर सभी का मकसद एक ही रहता है, समाज के एक खास तबके का वोट उसके ही खाते में जाएं। राजनीतिक दलों को यह बात समझनी होगी कि काठ की हांडी को बार बार चुनावी चूल्हे पर नहीं चढ़ाया जा सकता। चुनावी वायदों की हकीकत को जनता समझने लगी है। समाज के कमजोर और पिछड़े तबकों को आरक्षण के झुनझुने की नहीं अवसर की तलाश है। राज्य के युवाओं को बेरोजगारी भत्ते की नहीं, बल्कि स्थाई रोजगार की जरूरत है। युवाओं के भविष्य के लिए यह जरूरी है कि उन्हें कंप्यूटर और आधुनिक संचार से जुड़े माध्यमों की जानकारी हो, लेकिन मुफ्त लैपटाप और मुफ्त टैबलेट देने से पहले हमें सरकारी स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाई-लिखाई के स्तर को सुधारने की ज़रूरत है। किसानों के लिए बड़े-बड़े वायदों को करने के बजाय जरूरत इस बात की है कि बिचौलियों का खात्मा हो और किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम मिले। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल हों या क्षेत्रीय पार्टियां, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए। बेशक राजनीतिक दल समाज में कमजोर और पिछड़े तबकों की मदद के लिए नई घोषणाओं का ऐलान करें, लेकिन मदद का मकसद समाज के इस तबके को आजीवन बैसाखी थमाना नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजर-बसर कर रहे समाज के कमजोर और पिछड़े लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिलना चाहिए ताकि वह भी पूरे आत्मसम्मान के साथ समाज और देश के विकास में भागीदार बने सकें। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Monday, December 5, 2011
सोनिया गांधी तोड़ें चुप्पी : गडकरी
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी स्वदेशी की बात करने वाले गांधी की पार्टी नहीं रह गई है। वरन यह भारतीयों को किसी लायक न समझने वाली सोनिया गांधी की विदेशी कांग्रेस पार्टी हो गई है। उन्होंने देश के मौजूदा हालातों पर सोनिया गांधी से चुप्पी तथा प्रधानमंत्री से असहाय बने रहने की स्थिति तोड़ने को कहा। उन्होंने ऐलान किया कि पार्टी राज्य में वापसी और 2014 में केंद्र की सत्ता में आयेगी तो राज्य को मौजूदा केंद्र सरकार द्वारा छीना गया औद्योगिक पैकेज वापस दिलाएंगे। रविवार को नगर के ऐतिहासिक डीएसए फ्लैट मैदान में आयोजित पार्टी की जनसभा में गडकरी ने कहा कि केंद्र सरकार अब खुदरा व थोक बाजार में विदेशी कंपनियों को ला रहे हैं। ऐसा स्वदेशी की बात करने वाले गांधी की कांग्रेस नहीं कर सकती। महंगाई केंद्र सरकार की गलत नीतियों और भ्रष्ट प्रशासन के कारण बढ़ी है। निशंक एवं खंडूड़ी दोनों सरकारों की तारीफ करते हुए उन्होंने जनता से अटल के सुशासन के अनुरूप भ्रष्टाचारमुक्त व स्वच्छ प्रशासन तथा पं. दीनदयाल के अंत्योदय के अनुरूप गरीबों के घर तक विकास पहुंचाने का वादा किया। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने खंडूड़ी सरकार की देश में पहला जन लोकपाल व जनसेवा का अधिकार लाने की सराहना की। राष्ट्रीय महामंत्री थावर चंद्र गहलौत ने कहा, जब-जब कांग्रेस आती है देश में महंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ता है। प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल ने नैनीताल आये राष्ट्रीय नेताओं का स्वागत किया तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को तलवार भेंट की। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने विपक्षी कांग्रेस पार्टी को राज्य की जनता की दुश्मन बताते हुए कहा कि सीएम खंडूड़ी द्वारा छोड़ी गई जन लोकपाल की मिसाइल के वार से वह 2012 में पस्त हो जाएगी तथा 2014 में खड़ी भी नहीं हो पाएगी। मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने अपनी सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी देते हुए उन्हें जारी रखने के लिए जनता से एक और अवसर देने की अपील की तथा दो दिन पूर्व आये केंद्र के पत्र का उल्लेख करते हुए टिहरी डैम से उत्पन्न बिजली का नियमानुसार राज्य को मिलने वाले 12 फीसद हिस्से में कटौती किये जाने की जानकारी देते हुए लगातार राज्य से अन्याय करने का आरोप लगाया। पूर्व सीएम डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि पूरी कांग्रेस सरकार ने राज्य को 16 हजार करोड़ के कर्ज में डुबो दिया। कांग्रेस पर 56 घोटाले करने का आरोप लगाया, और अपनी सरकार को बेदाग बताया। संचालन काबीना मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट ने किया।
Saturday, October 8, 2011
अन्ना का ठाकरे पर पलटवार
अन्ना हजारे द्वारा शिवसेना प्रमुख पर उम्रदराज होने संबंधी टिप्प्णी के बाद बाल ठाकरे ने शुक्रवार को वाक् युद्ध को आगे बढ़ाते हुए गांधीवादी नेता को अनावश्यक वैर नहीं लेने और संघर्ष की चेतावनी दी। ठाकरे(85) ने कहा,‘आप मुझसे छोटे हैं। यह बचपना आपको शोभा नहीं देता।’
शिवसेना की वाषिर्क दशहरा रैली में बृहस्पतिवार को पार्टी सुप्रीमो द्वारा हजारे पर की गई टिप्पणी से गांधीवादी नेता की नाराजगी के बीच यह बयान आया है। अपने भाषण के दौरान ठाकरे ने 74 वर्षीय हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को ‘मजाक’ बताया था। उन्होंने कहा,‘अन्ना, इस देश से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। बड़ी मछलियां इसमें शामिल हैं। आपका जाल फट जाएगा लेकिन ये मछलियां नहीं फंसेंगी।’ सेना प्रमुख की टिप्पणी का जवाब देते हुए हजारे ने ठाकरे की बढ़ती उम्र को लेकर टिप्पणी की थी। यहां जारी बयान में ठाकरे ने कहा,‘अन्ना ने जो कहा हम उसका उपयुक्त जवाब दे सकते हैं, क्योंकि हम गांधीवादी नहीं हैं। चूंकि आपने मेरी बढ़ती उम्र का जिक्र किया, मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आप मुझसे छोटे हैं और यह बचपना आपको शोभा नहीं देता।’ ठाकरे ने हजारे को चेतावनी देते हुए कहा,‘हमसे अनावश्यक वैर मत लीजिए।’ अन्ना हजारे पर निशाना साधते हुए ठाकरे ने कहा था कि गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता का अनशन ‘फाइव स्टार’ कार्यक्र म के समान था। उन्होंने कहा,‘यह एक फाइव स्टार उपवास था,भ्रष्टाचार (के मुद्दे) को हंसी-मजाक का विषय मत बनाइये।’ ठाकरे ने कहा,‘ अन्ना, भ्रष्टाचार के खिलाफ आप ईमानदारी से संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार का इस तरीके से खात्मा नहीं किया जा सकता..’
उन्होंने नई दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन स्थल पर 35,000 लोगों के लिए भोजन सहित भारी इंतजामों का भी हवाला दिया। इस पर प्रतिक्रि या देते हुए हजारे ने रालेगण सिद्धी में संवाददाताओं से कहा,‘उन्हें जो सही लगता है वह कहें। हमें जो सही लगता है वह हम करेंगे।’ हजारे ने कहा कि ‘अपमान सहन करने की शक्ति होनी चाहिए।’ इससे पहले शिवसेना ने हजारे के आंदोलन को अपना समर्थन दिया था और ठाकरे के पोते आदित्य ने अनशन के दौरान हजारे से मुलाकात भी की थी।
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