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Wednesday, February 29, 2012

सच कहा है तो कड़वा लगेगा ही


जिस देश में राजनीति छल-छद्म और धोखों पर ही आमादा हो, वहां संवादों का कड़वाहटों में बदल जाना स्वाभाविक है। स्वस्थ संवाद के हालात ऐसे में कैसे बन सकते हैं। टीम अन्ना के साथ जो हुआ, वह सही मायने में धोखे की एक ऐसी पटकथा है, जिसकी बानगी खोजे न मिलेगी। लोकपाल बिल पर जैसा रवैया हमारी समूची राजनीति ने दिखाया, क्या वह कहीं से आदर जगाता है? एक छले गए समूह से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वह सरकारी तंत्र और सांसदों पर बलिहारी हो जाए? केजरीवाल जो सवाल उठा रहे हैं, उसमें नया और अनोखा क्या है? उनकी तल्खी पर मत जाइए, शब्दों पर मत जाइए। बस जो कहा गया है, उसके भाव को समझिए। इतनी तीखी प्रतिक्रिया कब और कैसे कोई व्यक्त करता है, उस मनोभूमि को समझने पर सब कुछ साफ हो जाएगा। टीम अन्ना का इस वक्त हाल हारे हुए सिपाहियों जैसा है। वह राजनीति के छल-बल और दिल्ली की राजनीति के दबावों को झेल नहीं पाई और सुनियोजित निजी हमलों ने इस टीम की विश्सनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए। टीम अन्ना पर कभी न्यौछावर हो रहा मीडिया भी उसकी लानत-मलामत में लग गया। जिस टीम अन्ना को कभी देश का मीडिया सिर पर उठाए घूम रहा था, मुंबई में कम जुटी भीड़ के बाद आंदोलन के खत्म होने की दुहाइयां दी जाने लगीं। आखिर यह सब कैसे हुआ? आज वही टीम अन्ना जब मतदाता जागरण के काम में लगी है तो उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। अब देखिए, केजरीवाल ने एक कड़वी बात क्या कह दी, मीडिया उन पर फिदा हो गया। एक वनवास सरीखी उपस्थिति से केजरीवाल फिर चर्चा में आ गए। यह उनके बयान का ही असर है। किंतु आप देखें तो केजरीवाल ने जो कहा, वह आज देश की ज्यादातर जनता की भावना है। आज संसद और विधानसभाएं हमें महत्वहीन दिखने लगी हैं तो इसके कारणों की तह में हमें जाना होगा। आखिर हमारे सांसद और जनप्रतिनिधि ऐसा क्या कर रहे हैं कि जनता की आस्था उनसे और इस बहाने लोकतंत्र से उठती जा रही है। अन्ना और उनके समर्थक हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सवाल भ्रष्टाचार के प्रश्न को संबोधित कर रहे थे। उनके उठाए सवालों में कितना वजन है, यह उन्हें मिले व्यापक समर्थन से ही जाहिर है। लेकिन राजनीति ने इस सवाल से टकराने और उसके वाजिब हल तलाशने के बजाए अपनी चालों-कुचालों और षड्यंत्रों से सारे आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की। यह एक ऐसा पाप था, जिसे सारे देश ने देखा। अन्ना से लेकर आंदोलन से जुड़े हर आदमी पर कीचड़ फेंकने की कोशिशें हुई। आप देखें तो यह षड्यंत्र इतने स्तर पर और इतने धिनौने तरीके से हो रहे थे कि राजनीति की प्रकट अनैतिकता इसमें झलक रही थी। ऐसी राजनीति से प्रभावित हुए अन्ना पक्ष से भाषा के संयम की उम्मीद करना तो बेमानी ही है, क्योंकि शब्दों के संयम का पाठ केजरीवाल से पहले हमारी राजनीति को पढ़ने की जरूरत है। आज की राजनीति में नामचीन रहे तमाम नेताओं ने कब और कितनी गलीज भाषा का इस्तेमाल किया है, यह कहने की जरूरत नहीं है। गांधी को शैतान की औलाद, भारत मां को डायन और जाने क्या-क्या असभ्य शब्दावलियां हमारे माननीय सांसदों और नेताओं के मुंह से ही निकली हैं। वे आज केजरीवाल पर बिलबिला रहे हैं, लेकिन इस कड़वाहट के पीछे राजनीति का कलुषित अतीत उन्हें नजर नहीं आता। हमारे लोकतंत्र को अगर माफिया और धनपशुओं ने अपना बंधक बना लिया है तो उसके खिलाफ कड़े शब्दों में प्रतिवाद दर्ज कराया ही जाएगा। भारत आज भ्रष्टाचार की मर्मातक पीड़ा झेल रहा है। ऐसे में जगह-जगह असंतोष हिंसक अभियानों में बदल रहे हैं। लोकतंत्र में प्रतिरोध की चेतना को कुचलकर हम एक तरह की हिंसा को ही आमंत्रित करते हैं। आंदोलनों को कुचलकर सरकारें जन-मन को तोड़ रही है। इसीलिए लोकपाल बिल बनाने की उम्मीद में सरकार के साथ एक मेज पर बैठकर काम करने वाले केजरीवाल की भाषा में इतनी कड़वाहट पैदा हो जाती है, लेकिन सत्ता के केंद्र में बैठी मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, बेनी वर्मा, सलमान खुर्शीद जैसों की राजनीति में इतना कसैलापन क्यों है। अगर सत्ता के प्रमुख पदों पर बैठे हमारे दिग्गज नेता सुर्खियां बटोरने के लिए हद से नीचे गिर सकते हैं तो केजरीवाल जैसे व्यक्ति को लांछित करने का कारण क्या है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Tuesday, February 22, 2011

उपचुनावों में क्यों हुआ कांग्रेस का सफाया


देश के पांच राज्यों की छह विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के संदेश भारतीय जनता पार्टी के लिए अच्छी खबर लेकर आए हैं। मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात की पांच विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस ने कई राज्यों में मैदान उसके लिए छोड़ दिया है। यह एक संयोग ही है कि इन सभी राज्यों में भाजपा ही सत्तारूढ़ दल है। झारखंड की खरसांवा सीट की बात न करें, जहां राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा खुद उम्मीदवार थे तो बाकी सीटों पर बड़े अंतर से भाजपा की जीत बताती है कि कांग्रेस इन चुनावों में गहरे विभ्रम का शिकार थी, जिसके चलते मध्य प्रदेश की दोनों सीटें कुक्षी और सोनकच्छ उसके हाथ से निकल गई। ये दोनों कांग्रेस की परंपरागत सीटें थीं, जहां कांग्रेस का लंबे अंतर से हारना एक बड़ा झटका है। मध्य प्रदेश की ये दोनों सीटें गंवाना दरअसल कांग्रेस के लिए एक ऐसे झटके की तरह है, जिस पर उसे गंभीरता से विचार जरूर करना चाहिए। भाजपा के लिए मुस्कराने का मौका मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल तीन विधानसभा सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने तो यही हैं कि राज्यों में उसकी सरकारों पर जनता का भरोसा कायम है। ये चुनाव भाजपा के लिए जहां शुभ संकेत हैं, वहीं कांग्रेस के लिए एक सबक भी हैं कि उसकी परंपरागत सीटों पर भी भाजपा अब काबिज हो रही है। जाहिर तौर पर कांग्रेस को अपने संगठन कौशल को प्रभावी बनाते हुए मतभेदों पर काबू पाने की कला सीखनी होगी। भाजपा के लिए सही मायने में यह मुस्कराने का क्षण है। इस संदेश को पढ़ते हुए भाजपा शासित जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उन्हें समझना होगा कि इस समय कांग्रेस की दिल्ली की सरकार से लोग खासे निराश हैं और उम्मीदों से खाली हैं। भाजपा देश का दूसरा बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस के पहले स्थान की स्वाभाविक उत्तराधिकारी है। ऐसे में अपने कामकाज से जनता के दिल को जीतने की कोशिशें भाजपा की सरकारों को करनी होंगी। उपचुनाव यह प्रकट करते हैं कि भाजपा की राज्य सरकारों के प्रति लोगों में गुस्सा नहीं है, किंतु सरकार में होने के नाते उनकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने यह साबित किया है कि उसे जनभावनाओं का साथ प्राप्त है। अब उसे तीसरी पारी के लिए तैयार होना है। अति आत्मविश्वास न दिखाते हुए अपने काम से वापसी की राह तभी आसान होगी, जब जनभावना इसी प्रकार बनी रहे, क्योंकि राजनीति में सारा कुछ अस्थाई और क्षणभंगुर होता है। भाजपा के पीछे संघ परिवार की एक शक्ति भी होती है। मध्य प्रदेश का जीवंत संगठन भी एक बड़ी ताकत है, इसका विस्तार करने की जरूरत है। सत्ता के लिए नहीं विचार और जनसेवा के लिए संगठन सक्रिय रहे तो उसे चुनावी सफलताएं तो मिलती ही हैं। अरसे बाद देश की राजनीति में गवर्नेस और विकास के सवाल सबसे प्रभावी मुद्दे बन चुके हैं। भाजपा की सरकारों को इन्हीं सवालों पर खरा उतरना होगा। खुद को संभाले कांग्रेस कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति बेहतर न होने के कारण वह मुकाबले से बाहर होती जा रही है। एक जीवंत लोकतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण नहीं है। कांग्रेस को भी अपने पस्तहाल पड़े संगठन को सक्रिय करते हुए जनता के सवालों पर ध्यान दिलाते हुए काम करना होगा, क्योंकि जनविश्वास ही राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी है। हमें देखना होगा कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तीन सीटों पर हुए उपचुनावों में कांग्रेस का पूरा चुनाव प्रबंधन पहले दिन से बदहाल था। भाजपा संगठन और सरकार जहां दोनों चुनावों में पूरी ताकत से मैदान में थे, वहीं कांग्रेस के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों की छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के इन चुनावों में बहुत दिलचस्पी नहीं थी। इससे परिवार की फूट साफ दिखती है। कांग्रेस का यह बिखराव ही भाजपा के लिए विजयद्वार खोलता है। कुक्षी और सोनकच्छ की जीत मध्य प्रदेश में कांग्रेस की बदहवासी का ही सबब है। जहां जमुना देवी जैसी नेता की पारंपरिक सीट भी कांग्रेस को खोनी पड़ती है। अब सांसद बन गए सज्जन सिंह वर्मा की सीट भी भाजपा छीन लेती है। कांग्रेस को कहीं न कहीं भाजपा के चुनाव प्रबंधन से सीख लेनी होगी। खासकर उपचुनावों में भाजपा संगठन जिस तरह से व्यूह रचना करता है, उससे सबक लेनी लेने की जरूरत है। वह एक उपचुनाव ही था, जिसमें छिंदवाड़ा जैसी सीट भी भाजपा ने अपनी व्यूहरचना से दिग्गज नेता कमलनाथ से छीन ली थी। राज्यों में समर्थ नेतृत्व मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए इन चुनावों की जीत वास्तव में एक बड़ा तोहफा है। संगठन की शक्ति और सतत सक्रियता के इस मंत्र को भाजपा ने पहचान लिया है। मध्य प्रदेश में जिस तरह के सवाल थे, किसानों की आत्महत्याओं के मामले सामने थे, पाले से किसानों की बर्बादी के किस्सों के बीच भी शिवराज और प्रभात झा की जोड़ी ने करिश्मा दिखाया तो इसका कारण यही था कि प्रतिपक्ष के नाते कांग्रेस पूरी तरह पस्तहाल है। राज्यों में प्रभावी नेतृत्व आज भाजपा की एक उपलब्धि है। इसके साथ ही सर्वसमाज से उसके नेता आ रहे हैं और नेतृत्व संभाल रहे हैं। भाजपा के लिए साधारण नहीं है कि उसके पास आज हर वर्ग में सक्षम नेतृत्व है। उसके सामाजिक विस्तार ने अन्य दलों के जनाधार को भी प्रभावित किया है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश कभी एक भूगोल के हिस्से थे, दोनों क्षेत्रों से एक सरीखी प्रतिक्रिया का आना यह संकेत भी है कि ये इलाके आज भी एक-सा सोचते हैं और अपने पिछड़ेपन से मुक्त होने तथा तेजी से प्रगति करने की बेचैनी यहां के गांवों और शहरों में एक जैसी है। ऐसे समय में नेतृत्वकर्ता होने के नाते शिवराज सिंह चौहान और डॉ. रमन सिंह की जिम्मेदारियां बहुत बढ़ जाती हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में बसने वाले करोड़ों लोगों के जीवन और इन राज्यों के भाग्य को बदलने का अवसर समय ने उन्हें दिया है। उम्मीद है कि वे इन चुनौतियों को स्वीकार कर ज्यादा बेहतर करने की कोशिश करेंगें। कुल मिलाकर ये उपचुनाव देश के मानस का एक संकेत तो देते ही हैं। एक अकेली सीट सूदूर मणिपुर की भी कांग्रेस को नहीं मिली है, वहां भी इस उपचुनाव से तृणमूल कांग्रेस का खाता खुल गया है। वहां तृणमूल प्रत्याशी ने कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर यह सीट जीती है। ऐसे में कांग्रेस को निश्चय ही अपनी रणनीति पर विचार करना चाहिए। अपने विभ्रमों और बेचैनियों से आगे आकर उसे जनता के सवालों पर सक्रियता दिखानी होगी, क्योंकि हालात ये हैं कि आज सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का काम विरोधी दल और उससे जुड़े संगठन ही करते दिख रहे हैं। जैसे मध्य प्रदेश में किसानों के सवाल पर भारतीय किसान संघ ने ही सरकार की नाक में दम किया और एक बड़े सवाल को कांग्रेस के खाते में जाने से बचा लिया। ये जमीनी हकीकतें बताती हैं कि कांग्रेस के लिए अभी इन राज्यों में मेहनत की दरकार है, तभी वह अपनी खोई हुई जमीन बचा पाएगी। (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

Sunday, January 9, 2011

छात्र-युवा आंदोलन के बुरे दिन

कमोबेश सभी छात्र संगठन राजनीतिक दलों की चेरी बन गए हैं। उनके एजेंडे भी अब राजनीतिक पार्टियां  तय कर रही हैं। ये समूह किसी परिवर्तन का वाहक न बनकर पार्टी के साइनबोर्ड बनकर रह गए हैं। परिसरों में अब संवाद नदारद हैं, बहसें नहीं हो रहीं हैं, सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं……
सच कहें तों छात्र आंदोलन के यह सबसे बुरे दिन हैं। छात्र आंदोलनों का यह विचलन क्यों है अगर इस पर विचार करें तो हमें इसकी जड़ें हमारी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में दिखाई देंगी। आज के अधिकतर हिंसक अभियानों व आंदोलनों के पीछे और आगे युवा ही दिखते हैं। विघटनकारी तत्वों ने समाज को बदलने की ऊर्जा रखने वाले नौजवानों के हाथ में कश्मीर, पूर्वोत्तर के सात राज्यों समेत तमाम नक्सल पीड़ित राज्यों में हथियार पकड़ा दिए हैं। भारतीय युवा एवं छात्र आंदोलन कभी इतना दिशाहारा और थकाहारा न था। आजादी के पहले नौजवानों के सामने एक लक्ष्य था। अपने बेहतर करियर की परवाह न करके उस दौर में उन्होंने त्याग और बलिदान का इतिहास रचा। भाषा और प्रांत की दीवारें तोड़ते हुए देश के हर हिस्से के नौजवानों ने राष्ट्रीय आंदोलन में अपना योगदान किया। आजादी के बाद यह पूरा का पूरा चित्र बदल गया। नौजवानों के सामने न तो सही लक्ष्य रखे गए, न ही देश की आर्थिक संरचना में युवाओं का विचार कर ऐसे कार्यक्रम बनाए गए जिससे देश के विकास में उनकी भागीदारी तय हो पाती। इस सबके बावजूद देश के महान नेताओं के प्रभामंडल से चमत्कृत छात्र-युवा शक्ति, उनके खिलाफ अपनी जायज मांगों को लेकर भी न खड़ी हो पाई क्योंकि उस दौर के लगभग सभी नेता राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े थे और उनकी देशनिष्ठा-कर्त्तव्यनिष्ठा पर उंगली उठाना संभव न था। किंतु यह दौर 1962 में चीन-भारत युद्ध में भारत की हार के साथ खत्म हो गया। यह हताशा इस पराजय के बाद व्यापक छात्र- आक्रोश के रूप में प्रकट हुई। इसके तत्काल बाद सरकार ने महामना मदनमोहन मालवीय द्वारा स्थापित काशी हिंदू विविद्यालय का नाम बदलकर काशी विविद्यालय रखने का विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया। इस प्रसंग में पूरे देश के नौजवानों की तीखी प्रतिक्रिया के चलते सरकार को विधेयक वापस लेना पड़ा। अपनी सफलता के बावजूद इस प्रसंग ने छात्र राजनीति को धार्मिंक आधार पर बांट दिया। इन्हीं दिनों भाषा विवाद भी गहराया और इसने भी छात्रों को उत्तर-दक्षिण दो खेमों में बांट दिया। दक्षिण में छात्रों के अंग्रेजी समर्थक आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया। 1967 का यह दौर भाषा आंदोलन की तीव्रता का समय था। सरकार द्वारा अंग्रेजी को स्थायी रूप से जारी रखने के फैसले के खिलाफ उत्तर भारत में चले इस आंदोलन को समाज भी व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। छात्र आंदोलन की व्यापकता और सामाजिक समर्थन के बावजूद सरकारी हठधर्मिंता के चलते अंग्रेजी को स्थायित्व देने वाला विधेयक लोकसभा में पारित हो गया। इस आंदोलन ने छात्रों के मन में तत्कालीन शासन के प्रति गुस्से का निर्माण किया। इसी दौर में सत्ता से क्षुब्ध नौजवान हिंसक प्रयोगों की ओर भी बढ़े, जिसके फलस्वरूप नक्सली आंदोलन का जन्म और विकास हुआ। जिसके नेता चारू मजूमदार, जंगल संथाल और कानू सान्याल थे। इसके पीछे व्यवस्था से उपजा नैराश्य था जिसने नौजवानों के हाथ में बंदूकें पकड़ा दीं। इन अवरोधों के बावजूद नौजवानों का जज्बा मरा नहीं। वह निरंतर सत्ता से सार्थक प्रतिरोध करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की धार को तेज करने की कोशिशों में लगा रहा। इन दिनों अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, समाजवादी युवजन सभा, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया जैसी तीन राजनीतिक शक्तियां परिसरों में खासी सक्रिय थीं। तीनों की अपनी निश्चित प्रतिबद्धताएं थीं। इन संगठनों ने छात्रसंघ चुनावों में अपने हस्तक्षेप से छात्रों के जोश और उत्साह को रचनात्मक दिशा प्रदान की। छात्रों के भीतर जो उत्तेजनाएं थीं उन्हें जिंदा रखकर उसका सही ढंग से इस्तेमाल किया गया।
इस दौर में डा. राममनोहर लोहिया के व्यक्तित्व का नौजवानों पर खासा असर रहा। इस सदी के आखिरी बड़े छात्र आंदोलन की शुरुआत 1974 में गुजरात के एक विविद्यालय के मेस की जली रोटियों के प्रतिरोध के रूप में हुई और उसने राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की भावभूमि तैयार की। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व संभालने के बाद यह आंदोलन युवाओं की भावनाओं का प्रतीक बन गया। किंतु सत्ता परिवर्तन के बाद कुर्सी की रस्साकसी में संपूर्ण क्रांति का नारा तिरोहित हो गया। सपनों के इस बिखराव के चलते छात्र राजनीति में मूल्यों का स्थान आदशर्विहीनता ने ले लिया। राजनीति से हुई अपनी अनास्था और प्रतिक्रिया जताने की गरज से युवा रास्ते तलाशने लगे। आदशर्विहीनता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में तब तक संजय गांधी का उदय हो चुका था। उनके साथ विविद्यालयों में पढ़ने वाली उदंड नौजवानों की एक पूरी फौज थी जो सारा कुछ डंडे के बल पर नियंत्रित करना चाहती थी। जेपी आंदोलन में पैदा हुई युवा नेताओं की इफरात जमात,जनता पार्टी की संपूर्ण क्रांति की विफलता की प्रतिक्रिया में युवक कांग्रेस से जुड़ गई। इसके बाद शिक्षा मंदिरों में हिंसक राजनीति, छेड़छाड़, अध्यापकों से र्दुव्‍यवहार, गुंडागर्दी, नकल, अराजकता और अनुशासनहीनता का सिलसिला प्रारंभ हुआ। छात्रसंघ चुनावों में बमों के धमाके सुनाई देने लगे। संसदीय राजनीति की सभी बुराइयां छात्रसंघ चुनावों की अनिवार्य जरूरत बन गई। इसी दौर में लखनऊ विविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रवींद्र सिंह की हत्या हुई और कुछ परिसरों से छात्राओं के साथ दुराचार की खबरें भी आई। 1981 में असम छात्र आंदोलन की अनुगूंज सुनाई देने लगी। लंबे संघर्ष के बाद प्रफुल्ल कुमार महंत असम के मुख्यमंत्री बने। किंतु सत्ता में आने के बाद महंत की सरकार ने बहुत निराश किया जबकि यह सही मायने में पहली बार पूरी तरह छात्र आंदोलन से बनी सरकार थी। जिसकी निराशाजनक परिणति ने छात्र आंदोलनों की नैतिकता और समझदारी पर सवालिया निशान लगा दिए। इस घटाटोप के बीच राजीव गांधी जैसे युवा प्रधानमंत्री के उभार ने युवाओं को एक अलग तरीके से प्रेरित किया किंतु जल्दी ही बोफोर्स के धुंए में सब गुम हो गया। फिर विनाथ प्रताप सिंह राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के साथ प्रकट हुए। नौजवान उनके साथ पूरी ऊर्जा से लगे लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी। मंडल आयोग की रिपोर्ट को हड़बड़ी में लागू करने के चलते नौजवानों के एक तबके में अलग किस्म का आक्रोश नजर आया। इस आंदोलन में हुई आत्महत्याएं निराशा की चरमबिंदु थीं। ये परिस्थितियां बताती हैं कि कमोबेश सभी छात्र संगठन राजनीतिक दलों की चेरी बन गए हैं। छात्र संगठनों के एजेंडे भी अब राजनीतिक पार्टयिां तय कर रही हैं। ये समूह किसी परिवर्तन का वाहक न बनकर अपनी ही पार्टी के साइनबोर्ड बनकर रह गए हैं। इनके सपने, आदर्श सब कुछ कहीं और तय होते हैं। परिसरों का सबसे बड़ा संकट यही है कि वहां अब संवाद नदारद हैं, बहसें नहीं हो रहीं हैं, सवाल नहीं पूछे जा रहे हैं। हर व्यवस्था को ऐसे खामोश परिसर रास आते हैं- जहां फ्रेशर्स पार्टयिां हों, फेयरवेल पार्टयिां हों, फैशन शो हों, मेले-ठेले लगें, उत्सव और रंगारंग कार्यक्रम हों, फूहड़ गानों पर नौजवान थिरकें, पर उन्हें सवाल पूछते, बहस करते नौजवान नहीं चाहिए। सही मायने में हमारे परिसर एक खामोश मौत मर रहे हैं। राजनीति और व्यवस्था उन्हें ऐसा ही रखना चाहती है। राजनीतिक दलों ने नौजवानों और छात्रों को भी एक सामूहिक शक्ति के बजाए टुकड़ों-टुकड़ों में बांट दिया है। सो वे अपनी पार्टी के बाहर देखने, बहस करने और सच्चाई के साथ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते। एक लोकतंत्र में यह खामोशी खतरनाक है। खामोश परिसर हमारे लिए खतरे की घंटी हैं क्योंकि वे कारपोरेट के पुरजे तो बना सकते हैं पर मनुष्य बनाने के लिए संवाद, विमर्श और लड़ाइयां जरूरी हैं।