उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को चुनने के लिए जन जागृति अभियान चला रही टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल का कहना है कि संसद में हत्यारे और बलात्कारी बैठे हैं। अरविंद का कहना है कि लालू, मुलायम और राजा जैसे लोग संसद में बैठकर देश का कानून बना रहे हैं, इनसे संसद को निजात दिलाने की जरूरत है। अरविंद का यह भी कहना है कि सभी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्ट हैं और वे देश को लूटने के लिए जीत दर्ज करना चाहती हैं। अरविंद केजरीवाल का यह कहना तो ठीक है कि संसद से बुरे तत्वों को निकालने के लिए लड़ाई लड़ी जाएगी, लेकिन सवाल उठता है कि आप संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देकर किस तरह की लड़ाई की बात कर रहे हैं? यह बात ठीक है कि संसद में 163 सांसद ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं और वाकई देश की जनता को ऐसे सांसदों को अपना जनप्रतिनिधि चुनने से पहले सौ बार सोचना चाहिए, लेकिन क्या इस संदर्भ में अरविंद केजरीवाल के इस बयान को सही ठहराया जा सकता है कि संसद ही देश की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है? इसके पहले भी अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे को संसद से ऊपर बताने वाला बयान दे डाला था। क्या कभी भी कोई व्यक्ति फिर चाहे वह अन्ना हजारे जैसी शख्सियत ही क्यों न हो, किसी भी संस्था से ऊपर हो सकता है? देश की संसद हो या राज्यों की विधानसभा या फिर स्थानीय निकाय, जीत कर आने वाले कई सदस्य ऐसे होते हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज होते हैं और वाकई ऐसे लोग देश के विकास में बाधक हैं। दागी उम्मीदवार के लोकसभा या विधानसभा पहुंचने पर जनता में नाराजगी हो सकती है कि उसकी नुमाइंदगी करने वाला नेता अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी नहीं निभा रहा है, लेकिन कोई शख्स फिर चाहे वह अन्ना हजारे हों या फिर अरविंद केजरीवाल, अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं को ललकारने का काम करेंगे तो जनता उनके साथ खड़ी नजर नहीं आएगी। देश में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर लोगों की आस्था बरकरार है। ऐसे में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि देश में लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की बात की जाए। व्यवस्था में परिवर्तन चंद मुट्ठी भर लोगों से नहीं हो सकता और यह तभी संभव है, जब नए मूल्यों को स्वीकार करने के लिए पूरा देश साथ खड़ा हो। इसमें कोई दो मत नहीं कि लोकपाल बिल के जरिए भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने जब आवाज उठाई तो रोजमर्रा की जिंदगी में भ्रष्टाचार से जूझने वाला आम आदमी इस आंदोलन में उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। 1974 में जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुए संपूर्ण आंदोलन के बाद देश की नौजवान पीढ़ी के सामने यह अपनी तरह का अनोखा अनुभव था और उन्होंने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लिया। कुल मिलाकर आजादी के बाद भ्रष्टाचार और महंगाई जैसी समस्याओं से जूझे रहे आम आदमी को इस आंदोलन ने एक उम्मीद जगाई थी, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन मुद्दे से भटककर व्यक्ति विशेष पर सिमटता दिखाई दिया। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह और गांधीवादी पीवी राजगोपाल जैसे लोगों ने अन्ना के आंदोलन से दूरी बना ली। राजेंद्र सिंह का कहना था कि अन्ना और अरविंद केजरीवाल तानाशाह हैं और यह आंदोलन दलगत राजनीति की गलत दिशा में जा रहा है। राजेंद्र सिंह का यह भी कहना था कि इन दोनों को समझना चाहिए कि लाखों लोग अन्ना और केजरीवाल के लिए नहीं आए थे, वे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए जमा हुए थे। आंदोलन से मुद्दे गायब होते गए और तथाकथित अन्ना मंडली से जुड़े लोग खुद के चेहरे चमकाने में ज्यादा लगे रहे। ये वे लोग थे, जिन्हें यह पता था कि मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। अन्ना जैसी शख्सियत की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। रालेगण सिद्धि में उनके योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। बिजली और पानी की कमी से जूझ रहे इस गांव की उन्होंने तस्वीर बदल दी। अन्ना ने गांव के लोगों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी जमा करने के लिए न केवल समझाया, बल्कि खुद भी इस काम में उनके साथ खड़े दिखाई दिए। गांव में सौर ऊर्जा से लेकर गोबर गैस के जरिए बिजली आपूर्ति का इंतजाम किया गया। अन्ना के प्रयासों से रालेगण सिद्धि की तस्वीर बदल गई। महाराष्ट्र में अन्ना के अनशन की वजह से कई बार भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को अपना पद छोड़ना पड़ा। दरअसल, सवाल अन्ना का नहीं, बल्कि उनकी समूची मंडली का है, जिसने जनता और मीडिया का ध्यान खींचने के लिए कहीं न कहीं अन्ना की मौलिकता को भी खत्म करने की कोशिश की। यह ठीक है कि अन्ना हमेशा सफेद खादी के कपड़े पहनते रहे हैं और सिर पर गांधी टोपी पहनते हैं, लेकिन इस आधार पर अन्ना को पूरी तरह गांधीवादी नहीं कहा जा सकता और न ही अन्ना ने इस आंदोलन के पहले खुद को इस तरह कभी पेश किया। हालांकि आंदोलन के वक्त इसे अन्ना मंडली का प्रबंधन कहा जाए या फिर स्वप्रेरित होकर अन्ना हजारे गांधी टोपी पहनकर राजघाट पर जाकर मौन व्रत धारण करके बैठ गए, लेकिन इन बातों ने आम लोगों का ध्यान जरूर खींचा। सवाल यह उठता है कि अन्ना हों या फिर अन्ना मंडली, इन लोगों को देश की जनता को यह बताना होगा कि क्या वाकई उन्हें गांधीवादी मूल्यों पर भरोसा है? जनमत संग्रह के मसले पर जब अन्ना मंडली के सदस्य प्रशांत भूषण की पिटाई की गई तो अन्ना हजारे ने इसकी निंदा करते हुए यह बयान दिया था कि किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन केंद्रीय मंत्री शरद पवार को थप्पड़ मारने वाली घटना पर खुद अन्ना हजारे का यह बयान आता है कि क्या एक ही थप्पड़ मारा? यह जरूरी नहीं कि गांधी टोपी पहनने वाला कोई भी शख्स पूरी तरह से गांधीवादी मूल्यों का समर्थक हो, लेकिन जनता अन्ना मंडली से यह जानना चाहती है कि समाज में आंदोलन और क्रांति का तरीका गांधीवादी होगा या फिर कोई दूसरे तरीके से देश में बदलाव की बात की जा रही है। कभी बाबा रामदेव के साथ मिलकर आवाज उठाने वाली टीम अन्ना ने वर्चस्व की लड़ाई के चलते उनसे दूरियां बना ली तो कभी मुंबई में अन्ना के आंदोलन को समर्थन नहीं मिलने के बाद इन लोगों ने एक बार फिर से बाबा रामदेव का समर्थन मांगा। दरअसल, टीम अन्ना के बड़बोलेपन और वर्चस्व की लड़ाई की वजह से देश में भ्रष्टाचार का मसला हाशिए पर आता दिख रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन टीम अन्ना का नहीं, बल्कि देश की जनता का आंदोलन था और इसे जनता का आंदोलन ही बनाए रखना चाहिए था। अन्ना और उनकी मंडली को समझना होगा कि देश की जनता लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करती है। अगर ऐसा नहीं होता तो अब तक नक्सली आंदोलन देश में पूरे चरम पर होता। संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर अगर देश की राजनीति और समाज में सकारात्मक आंदोलन की बात होगी तो एक बार फिर पूरा देश अन्ना के साथ खड़ा दिखाई देगा। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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Wednesday, February 29, 2012
Friday, October 21, 2011
क्या असल मुद्दे से भटक रही है टीम अन्ना
भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे अन्ना हजारे की कोर कमेटी के सदस्य रहे मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह और गांधीवादी पीवी राजगोपाल ने अब इस कमेटी से इस्तीफा दे दिया है। राजेंद्र सिंह का कहना है कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल तानाशाह है और यह आंदोलन दलगत राजनीति की गलत दिशा में जा रहा है। राजेंद्र सिंह का यह भी कहना है कि इन दोनों को यह समझ आना चाहिए कि लाखों लोग अन्ना और केजरीवाल के लिए नहीं आए थे, वे देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए जमा हुए थे। इधर, एक अखबार में प्रकाशित खबर में किरण बेदी की हवाई यात्राओं को लेकर भी खुलासा किया गया है। इस खबर के मुताबिक किरण बेदी को 1979 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिला था और वर्ष 2001 के सरकारी दिशा-निर्देशों के मुताबिक वीरता पुरस्कार से सम्मानित सभी लोग एयर इंडिया के इकोनॉमी क्लास के किराये में 75 फीसदी छूट के हकदार हैं। अखबार का कहना है कि किरण बेदी जिन सेमिनार और आयोजनों में शामिल होती हैं, उन संस्थाओं से हवाई यात्रा किराया बिजनेस क्लास श्रेणी का लेती हैं, जबकि यात्रा इकोनॉमी क्लास में रियायती टिकट पर करती हैं। हालांकि किरण बेदी का कहना है कि ऐसा करने से उन्हें कोई निजी फायदा नहीं हुआ है और इकोनॉमी क्लास में यात्रा करके जो पैसा बचता है, वह उनकी गैर सरकारी संस्था के खाते में जाता है। अभी कुछ दिनों पहले कोर कमेटी के सदस्य प्रशांत भूषण ने कश्मीर में जनमत संग्रह को लेकर अपना विवादास्पद बयान दिया। अरविंद केजरीवाल जोश में आकर अन्ना हजारे को संसद से ऊपर बता चुके हैं। कुल मिलाकर कुछ लोगों के बड़बोलेपन और आंदोलन को मुद्दों से हटकर व्यक्ति विशेष पर केंद्रित करने की वजह से आज देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ किया गया बड़ा आंदोलन सही दिशा में बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा। वैसे तो टीम अन्ना शब्द अपने आप में सवालों के घेरे में है। चंद मुट्ठीभर लोगों ने अन्ना के इर्द-गिर्द घेरा बना लिया और तैयार हो गई टीम अन्ना। आज भी अन्ना हजारे जैसी शख्सियत की नीयत पर किसी को भी शक नहीं है। अन्ना के अनशन की वजह से कई बार भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों को अपना पद छोड़ना पड़ा है। अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों की नीयत पर भी सवाल नहीं खड़े किए जा सकते, लेकिन देश का असली मसला अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की समस्या है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आप देश की सबसे बड़ी समस्या से लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहकर किस तरह निपटते हैं? क्या टीम अन्ना के बड़बोलेपन की वजह से देश में भ्रष्टाचार का मसला हाशिए पर आता दिखाई नहीं दे रहा है? भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किसी टीम अन्ना का आंदोलन नहीं, बल्कि देश की जनता का आंदोलन था और इसे जनता का आंदोलन ही बनाए रखना चाहिए था। आजादी के बाद से अब तक देश की जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। महंगाई और भ्रष्टाचार की दोहरी मार झेल रही जनता को इस आंदोलन से उम्मीद की किरण दिखाई दी और इसके चलते ही इंडिया अगेंस्ट करप्शन की मुहिम के समर्थन में जनसैलाब उमड़ पड़ा। इंडिया अगेंस्ट करप्शन की मुहिम को अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, मेहमूद मदनी, सैयद रिजवी, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी जैसे कई लोगों ने शुरू किया था, लेकिन कुछ ही दिनों में चंद लोगों ने इस आंदोलन को अन्ना आंदोलन बना दिया और यही वजह है कि टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल अब अन्ना को संसद से ऊपर बता चुके हैं। एक तरफ अरविंद केजरीवाल अन्ना को संसद से ऊपर मानकर चल रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके प्रमुख सहयोगी प्रशांत भूषण कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का राग अलाप रहे हैं। हालांकि अन्ना ने अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण के इन बयानों पर नाराजगी जताई है। प्रशांत भूषण के जनमत संग्रह वाले बयान पर अन्ना का कहना है कि मैं हर उस आदमी का विरोधी हूं, जो देश को तोड़ने की बात करता है। अन्ना का यह भी कहना है कि अब हमारी कोर कमेटी इस मसले पर विचार करेगी कि प्रशांत भूषण को टीम में रखना है या नहीं। यह बात ठीक है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती और जनता को जागरूक करने की दिशा में उनकी पहल की भी सराहना की जानी चाहिए, लेकिन इस पूरे आंदोलन को व्यक्तिवादी आंदोलन बनाने में इन लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। अन्ना के अनशन के वक्त किरण बेदी ने मंच से नारा दिया था कि मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना। यह बात सही है कि सादगी, सरलता और ईमानदारी से भरा अन्ना का व्यक्तित्व देश के युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है, लेकिन फिर भी इस आंदोलन को अन्ना केंद्रित बना देना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं था। इसमें कोई दो मत नहीं कि कांग्रेस की अगुवाई में देश में संप्रग की सरकार है और अगर सरकार चाहे तो एक ऐसा प्रभावी लोकपाल बिल लाया जा सकता है, जिससे देश को काफी हद तक भ्रष्टाचार से निजात मिल सके। लेकिन हम यह देख चुके हैं कि इस मसले पर लगभग सभी पार्टियों ने बहुत दिनों तक चुप्पी साधी हुई थी। जनलोकपाल बिल को लेकर टीम अन्ना कांग्रेस से नाराज है और अब भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को अन्ना हजारे वोट बैंक की यात्रा बता रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि राजनीतिक फायदे के लिए सारे राजनीतिक दल कमोबेश एक जैसे ही हैं, लेकिन ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में हम किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ जाकर उसे चुनाव में हराने की अपील तभी करें, जब हम कोई दूसरा विकल्प जनता के सामने लेकर आ रहे हों। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह अन्ना और संघ के रिश्तों की चिट्ठियां सामने लेकर आ रहे हैं और खुद अन्ना हजारे और उनसे जुड़े लोग इस पूरे मसले पर सफाई देने में जुटे हैं। संघ की नीतियों से आप भले ही इत्तेफाक नहीं रखते हों, लेकिन अगर भ्रष्टाचार को लेकर संघ या कोई भी संगठन आपके साथ खड़ा हो तो इसमें आपको सफाई देने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? दिल्ली के रामलीला मैदान पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को जिस तरह से जनसमर्थन मिला था, जनता की उस ताकत को अन्ना से जुड़े लोग सही दिशा नहीं दे सके। जनलोकपाल बिल को लेकर भी जनता को जागरूक करना अपनी जगह बिल्कुल ठीक है, लेकिन हिसार उपचुनाव में जनता के बीच कांग्रेस को वोट नहीं देने की अपील करना अन्ना के सहयोगियों का हड़बड़ी में उठाया गया कदम लगता है। जस्टिस संतोष हेगड़े ने भी इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। अन्ना 15 अक्टूबर से उत्तर प्रदेश के दौरे पर जाने वाले थे, लेकिन उन्होंने फिलहाल अपनी इस यात्रा को टाल दिया है और इसके साथ ही उन्होंने मौन व्रत पर जाने की भी घोषणा कर दी। दरअसल, बढ़ते भ्रष्टाचार को देखते हुए आज जरूरत इस बात की है कि देश की जनता को जागरूक किया जाए। उसे भ्रष्टाचार के आगे हथियार डालने की बजाय उससे लड़ना सिखाया जाए। लोगों को बताया जाए कि राशन कार्ड हो या स्कूल में दाखिला, अस्पताल में इलाज की बात हो या फिर ड्राइविंग लाइसेंस, कोई भी व्यक्ति एक पैसा भी रिश्वत नहीं देगा। किसानों के भीतर यह आत्मविश्वास पैदा किया जाए कि उन्हें उनकी फसलों का वाजिब दाम मिलेगा और इस काम में किसान किसी भी दलाल या बिचौलियों को बर्दाश्त नहीं करें। देश का जनमानस अगर जागरूक हो गया तो फिर कोई भी राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए जनता के साथ धोखा नहीं कर सकेगा और तभी देश में ऐसे आंदोलन सार्थक हो सकेंगे। मौन व्रत के बाद अन्ना को अपने साथियों को यह बात समझानी होगी कि देश में सकारात्मक परिवर्तन के लिए की जाने वाली कोई भी पहल या सुधार का कोई भी लक्ष्य देश के संवैधानिक ढांचे या लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर हासिल नहीं किया जा सकता। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Wednesday, June 29, 2011
कलह के दौर में उमा की वापसी के मायने
आखिरकार संघ की त्योरियां चढ़ने के बाद उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो ही गई। इसमें कोई दो मत नहीं कि जमीन से जुड़ी इस नेता की वापसी से पार्टी को न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देश की सियासत में भी फायदा हो सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में पहले से चल रही अंदरूनी कलह के बीच यह कहना मुश्किल है कि उमा भारती अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह बखूबी निभा पाएंगी। नितिन गडकरी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह ऐलान किया था कि पार्टी छोड़कर जा चुके लोगों की वापसी होगी, लेकिन गुटबाजी के चलते उनकी यह घोषणा केवल बयानों में दर्ज होकर रह गई। उमा भारती की वापसी को लेकर पार्टी में पिछले कई सालों से चर्चा होती रही, लेकिन आपसी खींचतान के चलते उनकी वापसी पर अडं़गा लगाने वालों की कमी नहीं रही। मध्य प्रदेश भाजपा से लेकर आरएसएस तक में भी एक दो लोग ऐसे थे, जिन्हें यह लगता था कि अगर उमा भारती की वापसी हो गई तो उनके कई सिपहसालारों को नुकसान हो सकता है। बात चाहे पार्टी अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की हो या फिर मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी की, अनुशासनहीनता और गुटबाजी के पीछे पार्टी का कमजोर नेतृत्व ही जिम्मेदार रहा है। उमा भारती को भले ही दिसंबर 2005 में अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन अनुशासनहीनता और गुटबाजी के दूसरे कई मामलों पर पार्टी नेतृत्व आंखें मूंदे रहा। जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता हाशिए पर आते गए और टेलीविजन चैनलों पर बौद्धिक उछल-कूद के खेल में माहिर कई नेता अपनी ही पार्टी के लोगों के बीच शह और मात का खेल खेलते रहे। इन नेताओं का न तो किसी प्रदेश की राजनीति में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन से लेना-देना रहा और न ही केंद्रीय राजनीति में ही ये लोग कोई कमाल दिखा सके। लेकिन 11 अशोक रोड पर ऐसे ही चेहरे चमकते दिखाई दिए। आंतरिक लोकतंत्र का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मुखौटा कहने पर केएन गोविंदाचार्य को पार्टी से निष्कासित कर दिया था तो दूसरी तरफ झारखंड में भ्रष्टाचार का मसला उठाने वाले बाबूलाल मरांडी की बात को पार्टी ने अनसुना कर दिया था। पूर्व सांसद यदुनाथ पांडे को झारखंड में पार्टी का राज्य अध्यक्ष नियुक्त करने के फैसले पर बाबूलाल मरांडी ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। मरांडी का कहना था कि इस फैसले में पार्टी ने उनसे और प्रदेश के कई नेताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। आखिरकार मरांडी ने बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया तो अगस्त 2009 में शिमला में हो रही भाजपा की चिंतन बैठक में जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उस वक्त राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। जसवंत सिंह को निकाले जाने का ऐलान करते वक्त राजनाथ सिंह के हाव-भाव कुछ इस तरह के थे, जैसे कोई शख्स अगर अपने ताकतवर पड़ोसी से नहीं लड़ सके तो अपने बच्चे का कान उमेठकर ही सारा गुस्सा निकाल दे। यह बात अलग है कि 25 जून 2010 को जसवंत सिंह की फिर से पार्टी में वापसी हो गई। दरअसल, बात उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य या फिर जसवंत सिंह को निकाले जाने या फिर उनके पार्टी छोड़कर जाने की नहीं, बल्कि किसी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की है। उमा भारती ने पार्टी पर ऑफ द रिकॉर्ड प्रेस ब्रीफिंग करने का आरोप लगाया था, लेकिन आज तो ऑन रिकॉर्ड बातचीत में पार्टी के लोग एक दूसरे पर खुलकर निशाना साधने में लगे हैं। अभी कुछ दिनों पहले पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात से इनकार किया कि रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक कैबिनट में जगह दिलाने में उन्होंने कोई भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं, सुषमा का यह भी कहना था कि जब रेड्डी बंधु मंत्री बने थे, उस वक्त अरुण जेटली कर्नाटक भाजपा के प्रभारी थे, जबकि वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्य में वरिष्ठ नेता थे। सुषमा स्वराज ने अपने साक्षात्कार में कहा कि इन लोगों के बीच आपस में क्या बातचीत हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं हैं। रेड्डी बंधुओं की सुषमा स्वराज से नजदीकी उस वक्त सामने आई थी, जब उन्होंने 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि इस पूरे मसले पर भारतीय जनता पार्टी ने सफाई देते हुए कहा कि पार्टी में किसी तरह का कोई मनमुटाव नहीं है। अपनी चिंतन बैठकों में भारतीय जनता पार्टी चिंतन कम और चिंता ज्यादा करती नजर आती है। दरअसल, आज पार्टी पूरी तरह बिखरी दिखाई दे रही है और पार्टी के बड़े नेता कई खेमे में पहले से ही बंटे हुए हैं। चिंतन बैठकों में अक्सर अनुशासन को अहमियत देने की बात कही गई, लेकिन दरअसल पार्टी में अनुशासन का सबक देने वाले खुद कितने अनुशासनशील हैं? क्या पार्टी के बड़े नेता खुद एक दूसरे की टांग खींचते नजर नहीं आते? हुगली वाले मामले में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से हटाने का फैसला जब सार्वजनिक नहीं किया गया था, उस वक्त पार्टी की ही एक बड़ी महिला नेता ने मीडिया के कुछ लोगों से बड़े ही भद्दे अंदाज में इसका ऐलान कर दिया था कि इसकी तो छुट्टी हो गई। सवाल भारतीय जनता पार्टी या उसके नेताओं के बीच आपसी मनमुटाव या रस्साकशी का नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की सकारात्मक भूमिका का है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां अपने दल को आम जनता से जोड़कर देखने के बजाय कॉरपोरेट स्टाइल में कामकाज करती दिखाई दे रही है। कांग्रेस पार्टी इस कॉरपोरेट स्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है और यही वजह है कि आज राज्यों में कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर आती जा रही है, लेकिन इन सबके बावजूद दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का कहना रहा है कि चुनाव प्रबंधन से जीते जाते हैं। यह बात ठीक है कि आज कुछ राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही है, लेकिन अगर बात पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की हो तो उसके कामकाज का तरीका अब भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस की तरह यहां भी कुछ नेता पार्टी को कॉरपोरेट शैली में चलाने की कोशिश में जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार करने में जुटे हैं। आज देश में एक सशक्त विपक्ष की जरूरत है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी यह दायित्व बखूबी नहीं निभा पा रही है। कॉमनवेल्थ खेल से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम समेत कई घोटालों से घिरी कांग्रेस की अगुवाई वाली संप्रग सरकार के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार को घेरने में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नाकाम रहा है। भ्रष्टाचार, काले धन या लोकपाल के मसले को लेकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन को भले ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थन रहा हो, लेकिन पार्टी खुद अपनी तरफ से सरकार के खिलाफ कोई जनांदोलन नहीं खड़ा कर सकी। उमा भारती की वापसी भारतीय जनता पार्टी के लिए तभी कारगर सिद्ध होगी, जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर पूरी तरह लगाम कसने में कामयाब होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Saturday, June 4, 2011
लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री क्यों नहीं
लोकपाल बिल को लेकर सरकार की नीयत शुरू से ही सवालों के घेरे में थी और इस पूरे मसले को लटकाने की जुगत में भिड़ी सरकार अब अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब होती भी दिखाई दे रही है। जनवरी में तैयार सरकारी विधेयक के दायरे में प्रधानमंत्री भी शामिल थे, लेकिन अब सरकार को लगता है कि अगर लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाया गया तो प्रधानमंत्री का पद बेकार हो जाएगा। भारत स्वाभिमान के जरिए देश भर में काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने वाले बाबा रामदेव का भी कहना है कि प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को लोकपाल के दायरे में लाने के मामले में जल्दबाजी करना ठीक नहीं। अब सरकार का यह कहना है कि लोकपाल के अधिकारों को लेकर समाज के किसी भी वर्ग में एक राय नहीं है। यहां तक कि गैर सरकारी संगठनों में भी इस पर मतभेद हैं। कुल मिलाकर राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि अपने फायदे के लिए ये मतभेद जानबूझकर पैदा किए जा रहे हैं। इन विवादों का सहारा लेकर अब सरकार इस पूरे मसले पर राज्यों और राजनीतिक दलों से चर्चा करके इस मामले को एक बार फिर ठंडे बस्ते में डालने के मूड में है। आखिरकार प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं हो सकता? 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा के जेल जाने से कुछ दिनों पहले तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनका बचाव करते नजर आ रहे थे। कॉमनवेल्थ घोटाले में अब भले ही सुरेश कलमाड़ी को सलाखों के पीछे डाल दिया गया हो, लेकिन इस बड़े खेल आयोजन से पहले तमाम आपत्तियों पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने आंखें मूंद रखी थी। देश में आजादी के बाद से अब तक ऐसे एक नहीं, कई वाकये हो चुके हैं, जब प्रधानमंत्री की कुर्सी भी सवालों के घेरे में रही है। क्या लोकतंत्र में सरकार के मुखिया की जांच कोई नहीं कर सकता? क्या प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय में पारदर्शिता की कोई जरूरत नहीं है? लोकपाल बिल की ड्रॉफ्टिंग कमेटी की बैठक में सरकार ने प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और सांसदों के संसद में किए गए कार्यो को लोकपाल के दायरे में लाने का विरोध किया है। सरकार का तर्क है कि यदि प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई जांच शुरू हुई तो वह शासन करने और अहम फैसले लेने का हक खो देंगे। सिविल सोसाइटी का यह कहना ठीक है कि बोफोर्स मामले में भी प्रधानमंत्री जांच के दायरे में थे, लेकिन उन्होंने कामकाज बंद नहीं किया था। वैसे भी सात सदस्यों वाली लोकपाल बेंच के पूरे मामले को परखने के बाद ही किसी मामले में जांच के आदेश दिए जाएंगे। इस पूरे मामले में सरकार का यह भी कहना है कि लोकपाल के दायरे में आने की वजह से प्रधानमंत्री का पद महत्वहीन हो जाएगा। देश की जनता यह जानना चाहती है कि क्या भ्रष्टाचार से जुड़े कई अहम मसलों पर प्रधानमंत्री कार्यालय की चुप्पी की वजह से इस पद की अहमियत कम नहीं हुई? लोकतंत्र में शीर्ष पद पर बैठा व्यक्ति अगर भ्रष्टाचार में शामिल है तो क्या उसकी जांच नहीं की जा सकती? अगर ऐसा नहीं है तो क्या प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच भी उनके मातहत कोई एजेंसी करेगी? समाज सुधारक अन्ना हजारे के आंदोलन को देश भर से मिले जनसमर्थन के आगे सरकार ने भले ही घुटने टेक दिए थे और लोकपाल बिल पर सरकार की तरफ से बनी सहमति के बाद जब अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ा तो उस वक्त इस पूरे मसले पर सरकार की तरफ से वार्ताकार रहे कपिल सिब्बल को यह लोकतंत्र की जीत नजर आ रही थी, लेकिन कुछ दिन बाद ही सरकार के ये मंत्री लोकपाल संस्था की अहमियत पर सवाल खड़े करते नजर आ रहे थे। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का कहना था कि अगर गरीब बच्चों को स्कूल भेजे जाने की कोई व्यवस्था नहीं है या फिर गरीब के पास अस्पताल में दाखिल होने के लिए पैसे नहीं हैं तो इसमें लोकपाल क्या करेगा। मंत्री जी ने यह भी बयान दिया था कि अगर बात पीने के पानी या फिर शौचालय की व्यवस्था की हो तो इसमें लोकपाल के होने या नहीं होने से क्या फर्क पड़ेगा। सरकार को शायद यह समझने कि जरूरत नहीं है कि अगर देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा तो गरीब के बच्चे को बेहतर शिक्षा भी मिलेगी और इलाज भी बेहतर होगा। मौजूदा बजट में सरकार ने प्रारंभिक शिक्षा के लिए 21 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है और शिक्षा के लिए हजारों करोड़ रुपये के प्रावधान पहले भी किए जा चुके हैं, लेकिन आज भी अगर पढ़ाई-लिखाई के स्तर को लेकर अमीर गरीब में भेदभाव बना हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सामाजिक योजनाओं और विकास पर खर्च की जाने वाली धनराशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती जा रही है और आम आदमी को इसका पूरा फायदा नहीं मिल रहा है तो क्या इसके लिए सरकारी तंत्र की जड़ों में फैला भ्रष्टाचार नहीं है? सवाल लोकपाल के दायरे में सिर्फ प्रधानमंत्री के पद को लाने का नहीं, बल्कि देश में सुशासन और पारदर्शिता के जरिए भ्रष्टाचार पर लगाम कसने का है ताकि देश का हर पिछड़ा तबका किसी सरकार या राजनीतिक दल के लिए खाली वोट बैंक भर न रह जाए। भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठते रहे हैं और इस पूरे मसले पर सरकार के हर कदम उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा नजर आ रहे हैं। अब सरकार का यह भी कहना है कि संसद में किए जाने वाले भ्रष्टाचार की जांच लोकपाल नहीं कर सकेगा। सरकार का कहना है कि हम सांसदों को खुद पर नियंत्रण के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अगर वाकई सांसद खुद से प्रेरित हो रहे होते तो हमारे कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले कैमरे के सामने पैसे लेते नहीं दिखाई देते। सांसद निधि का दुरूपयोग या फिर संसद में किसी सांसद का भ्रष्ट व्यवहार लोकपाल के दायरे में क्यों नहीं होना चाहिए? इसमें कोई दो मत नहीं कि देश में आम जनता की सबसे ज्यादा उम्मीदें न्यायपालिका पर टिकी है और पिछले कुछ समय से न्यायपालिका की निष्पक्षता ने आम जनता को कहीं न कहीं राहत भी दी है। सरकार उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना चाहती है। दरअसल, मसला लोकपाल के जरिए प्रधानमंत्री, सांसद या न्यायपालिका की अहमियत को कम करने या फिर उनके कामकाज में अड़चन डालने का नहीं, बल्कि देश की शीर्ष संस्थाओं में पारदर्शिता लाने का है ताकि बड़े से बड़े पद पर बैठा व्यक्ति भी जांच के दायरे में हो। भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार के कदम दिखावटी ज्यादा नजर आ रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले योजना आयोग देश की जनता से भ्रष्टाचार से निपटने को लेकर सुझाव मांगता नजर आ रहा था। लोकपाल ही नहीं, सीएजी और सीवीसी जैसी संस्थाओं को भी और ज्यादा प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। यह बात ठीक है कि संविधान में कानून बनाने के लिए संसद सर्वोच्च है, लेकिन जब जनता की नुमाइंदगी करने वाले अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभा रहे हों तो उन पर लगाम लगाने की जरूरत है। कुल मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार को ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है, वरना देश की जनता इन मसलों पर एक बार फिर संप्रग सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा कर देगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Saturday, January 8, 2011
अलगाववादियों के मुखिया का कबूलनामा
मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक, अब्दुल गनी लोन और जेकेएलएफ के अब्दुल अहद वानी समेत कई अलगाववादी नेताओं को सेना या पुलिस ने नहीं, बल्कि उनके अंदर के लोगों ने ही मरवाया है। हुर्रियत कांफ्रेस के नरमपंथी धड़े के नेता अब्दुल गनी बट्ट के इस बयान ने कश्मीर पर सियासत का खेल खेलने वालों के चेहरे से एक बार फिर नकाब हटा दिया है। पिछले दो दशकों में आतंकवादियों की हिंसा, कट्टरवाद और पाकिस्तान की नीतियों पर सवाल खड़े करने वाले उदारवादी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया। इन हत्याओं का दोष सेना या पुलिस पर मढ़कर कट्टरपंथी और अलगाववादी ताकतें अपने नापाक इरादों में काफी हद तक कामयाब भी रही हैं। इन अलगाववादी ताकतों ने कभी अवाम की भावनाओं को भड़काकर तो कभी पैसे देकर पत्थरबाजी कराकर कश्मीर में अमन बहाली की हर कोशिशों में रुकावट डालने का काम किया है। सबसे हैरानी की बात यह है कि पीडीपी जैसे तमाम राजनीतिक दल सुलगते कश्मीर पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते नजर आते हैं और अरुंधति राय जैसे लोग यह कहने की हिमाकत करते हैं कि कश्मीर कभी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। उमर अब्दुल्ला हों या महबूबा मुफ्ती, ऐसे तमाम लोग हैं जो कभी घाटी की स्वायत्तता तो कभी ज्यादा अधिकारों की बात करके अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में जुटे हैं। खुद की नाकामियों की वजह से जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जब अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई देती है तो वह जम्मू-कश्मीर के विलय को अपूर्ण बता डालते हैं। केंद्र सरकार की तरफ से नियुक्त किए वार्ताकार बातचीत के लिए कट्टरपंथी ताकतों के घर का दरवाजा खटखटाते हैं और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए पाकिस्तान को शामिल किए जाने की बात करते हैं। हुर्रियत कांफ्रेंस के नरमपंथी धड़े के नेता अब्दुल गनी बट्ट के बयान के बाद अब अरुंधति राय जैसे लोग खामोश क्यों हैं? सेना या पुलिस की कार्रवाई पर उंगली उठाने वाले तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता बट्ट साहब के खुलासे के बाद अब अपने मुंह पर ताले क्यों डाले हुए हैं? पिछले दो दशक में यह पहला मौका है, जब किसी अलगाववादी नेता ने यह माना है कि उनके बड़े नेताओं को सेना या पुलिस ने नहीं, बल्कि उनके अंदर के लोगों ने ही मरवाया है। अब्दुल गनी लोन के साथी रहे बट्ट ने कट्टरपंथी गुट के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी को आत्मनिरीक्षण की सलाह भी दे डाली है। उदारवादी अब्दुल गनी लोन की हत्या 21 मई 2002 को कर दी गई थी। लोन एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्होंने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जाकर वहां धार्मिक कट्टरपंथियों की जमकर आलोचना की थी। कुल मिलाकर कश्मीर पर सियासत के इस खेल में पड़ोसी मुल्क अपने नापाक इरादों के जरिए घाटी में अशांति फैला रहा है और हम कोरी बयानबाजी और वार्ताकारों की जमात जुटाकर कश्मीर समस्या का हल निकालने में जुटे हैं। हिंदुस्तान की जनता के मन में यह सवाल बार-बार कौंधता है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए कोई ठोस पहल क्यों नहीं की गई? घाटी के बिगड़ते हालात को काबू में करने के लिए किसी भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार ने दमदारी के साथ अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया? केंद्र सरकार हो या फिर जम्मू-कश्मीर सरकार, कश्मीर समस्या के समाधान के लिए हमारा रवैया शुरू से ही ढुलमुल रहा है। अब तक हम तुष्टिकरण की राजनीति करते रहे और घाटी में अलगाववाद की जड़ें गहरी होती चली गई। 1990 से लेकर अब तक घाटी में सीमा पार आतंकवाद बेकसूर लोगों की जानें लेता रहा। सेना के जवान और अफसर शहीद होते रहे, लेकिन हमारी सरकारें कुछ ठोस कदम उठाने की बजाय कश्मीर की जनता को अलग-अलग मात्रा में स्वायत्तता दिलाने का राग अलापती रहीं। स्वायत्तता के नाम पर जम्मू-कश्मीर में राजनीति का खेल बरसों से खेला जा रहा है, लेकिन संविधान की धारा 370 (जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा) को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत केंद्र सरकार ने कभी भी नहीं उठाई। 7 अगस्त 1952 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की उस बात को राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठकर क्यों नहीं देखा गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि धारा 370 भारत को विखंडित कर देगी और यह उन लोगों को मजबूत कर सकती है, जो यह भरोसा रखते हैं कि भारत एक देश नहीं, बल्कि कई भिन्न राष्ट्रों का समूह है। शेख अब्दुल्ला की राज्य के लिए अलग झंडे की जिद पर मुखर्जी ने साफ कहा था कि आप निष्ठा को नहीं बांट सकते और यह कोई आधा-आधा वाला मामला नहीं है। 1952-53 के पहले की स्थिति को बहाल करने की मांग करने वालों को यह समझना होगा कि केंद्र सरकार राज्य की पंचवर्षीय योजना के लिए सारा धन मुहैया कराती है। इसके साथ ही गैर योजना खर्च के एक बड़े हिस्से को भी केंद्र वहन करता है। इतना ही नहीं, केंद्र की तरफ से जम्मू-कश्मीर को मिलने वाली धन राशि में 90 फीसदी सहायता के रूप में होती है और बाकी 10 फीसदी कर्ज के रूप में। जबकि दूसरे राज्यों में यह राशि 70 फीसदी कर्ज के तौर पर होती है और 30 फीसदी सहायता के रूप में होती है। कश्मीर को लेकर आज हमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू या फिर इतिहास की गलतियों का जिक्र करने की जरूरत नहीं, बल्कि हमें यह देखना होगा कि मौजूदा हालात में हम किस तरह इस समस्या का स्थायी समाधान ढूंढ़ सकते हैं? इसमें कोई शक नहीं कि कश्मीर घाटी में अमन-चैन की बहाली के लिए अर्थव्यवस्था में सुधार बेहद जरूरी है। हर आदमी के हाथ में रोजगार होगा तो पत्थर उठाकर फेंकने वाले हाथ भी अलगाववादियों को कम ही मिल सकेंगे, लेकिन इन सबके बावजूद कश्मीर में अलगाववाद की फैल चुकी जड़ों को किसी बड़े आर्थिक पैकेज भर से नहीं उखाड़ा जा सकता। यह बात केंद्र और राज्य सरकार भी जानती है कि घाटी से सेना की तादाद कम कर कश्मीर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। अलगाववादी ताकतों के घर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लेकर पहुंचने से हम विश्व बिरादरी को एक सकारात्मक संदेश तो दे सकते हैं, लेकिन अलगाववाद के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वालों को मुख्यधारा से नहीं जोड़ सकते। बंकरों को कम कर या सेना की तादाद कम कर घाटी में हालात नहीं सुधारे जा सकते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र सरकार राज्य में आर्थिक पैकेज के साथ-साथ घाटी में सेना के मनोबल को भी बरकरार रखे। इसके साथ ही हाशिए पर रहकर अपनी जिंदगी गुजर-बसर कर रहे कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास भी इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए उतना ही जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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