शिवसेना के बाद भाजपा के फायरब्रांड नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पर हमला बोला है। मोदी ने आरोप लगाया कि राहुल मीडिया में प्रचार के लिए गरीबों के घर जाते हैं और उनके बच्चों को गोद में उठाकर फोटो खिंचवाते हैं। शिवसेना ने भी सोमवार को अपने मुखपत्र सामना में मावल में किसानों पर हुई गोलीबारी को लेकर कांग्रेस महासचिव को घेरा था। पार्टी ने किसानों के मारे जाने पर भट्टा-पारसौल जाने वाले राहुल को लापता घोषित कर उनके मावल न आने पर करारा प्रहार किया था। खेड़ा जिले के नडियाद के एसआरपीएफ मैदान में मंगलवार को आयोजित स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में मुख्यमंत्री मोदी ने कांग्रेसनीत केंद्र सरकार और इसके महासचिव राहुल गांधी को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि देश कांग्रेस के कारण ही आज गरीब है। मीडिया में प्रचार पाने की खातिर राहुल गांधी गरीबों के घर जाकर खाना खाने जाते हैं। गरीबों के बच्चों को गोद में लेकर फोटो खिंचवाने को शर्मनाक बताते हुए मोदी ने कहा कि कांग्रेस के कारण ही आज देश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस सरकार संवैधानिक संगठनों का उपयोग गुजरात को बदनाम करने के लिए कर रही है, गुजरात विरोधियों को राज्य का विकास अवरूद्ध करने में लगा रखा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे अन्ना हजारे को बदनाम करने के लिए कांग्रेस उन पर लगातार झूठी बयानबाजी कर रही है। मोदी ने दावा किया कि पिछले एक दशक में देश की विकास दर को पीछे छोड़ते हुए गुजरात की विकास दर दस फीसदी को छू रही है।
Showing posts with label राष्ट्रीय संस्करण. Show all posts
Showing posts with label राष्ट्रीय संस्करण. Show all posts
Wednesday, August 17, 2011
Tuesday, August 16, 2011
शिव सेना के विज्ञापन में राहुल लापता
शिव सेना के मुख पत्र सामना में रविवार को लापता व्यक्तियों के विज्ञापन में कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पर कटाक्ष किया गया है। विज्ञापन में लिखा गया है कि राहुल महाराष्ट्र से लापता हैं, जबकि यहां किसानों को उनकी वाकई में जरूरत है। विज्ञापन में राहुल के पहनावे का जिक्र किया गया है। उनके कपड़े और उनके ठहरने के स्थान के साथ उनका चित्र प्रकाशित किया गया है। विज्ञापन में कहा गया है, महाराष्ट्र के बेचारे किसानों को उपरोक्त विवरण वाले व्यक्ति की बेसब्री से तलाश है। विज्ञापन में पुणे जिले के मावल गांव में 9 अगस्त को हुई गोलीबारी के समय राहुल की अनुपस्थिति पर सवाल खड़े किए गए हैं। गोलीबारी में तीन व्यक्तियों की मौत हो गई थी। राहुल के बारे में विज्ञापन में आगे कहा गया है कि उन्होंने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के साथ उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसौल गांव में किसानों के समर्थन में धरना दिया था। विज्ञापन में कहा गया है, उन्होंने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ महापंचायत आयोजित कर उनकी खिंचाई की थी। महाराष्ट्र के उत्पीडि़त और न्याय से वंचित किसान इस मसीहा का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। विज्ञापन में आगे कहा गया है, जब जैतापुर में किसानों पर गोली चलाई गई थी, उस समय भी यह गांधी महाराष्ट्र नहीं आए थे। अब जब कांग्रेस सरकार ने पुणे के मावल में पवन पाइपलाइन का विरोध कर रहे किसानों पर फिर गोलीबारी की है तब भी वह (राहुल) लापता हैं। राहुल से कहा गया है, भागने के लिए आपको कोई नहीं डांटेगा। यह विज्ञापन जैतापुर संघर्ष समिति और पवना-मावल खोरे बचाव समिति की ओर से जारी किया गया है।
Friday, August 12, 2011
मुरादाबाद दंगे पर मुलायम ने मांगा मायावती का इस्तीफा
नई दिल्ली उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में दंगे को लेकर विपक्षी दल मायावती सरकार की घेरेबंदी में जुट गए हैं। सपा और भाजपा ने गुरुवार को इस मामले को लोकसभा में उठाया। सपा ने तो दंगे को लेकर ही मायावती का इस्तीफा तक मांग लिया है। जबकि भाजपा ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की मांग की है। सपा के मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा में शून्यकाल में यह मामला उठाया। उन्होंने कहा कि मुरादाबाद में जब भी दंगे की शुरुआत होती है, वह गंभीर रूप ले लेता है। 1980 में भी ऐसा हो चुका है। सपा सदस्य ने आरोप लगाया कि मुरादाबाद में स्थानीय पुलिस संप्रदाय विशेष के लोगों को परेशान कर रही है। स्थिति और बिगड़ सकती है। सरकार को इस पर बयान देना चाहिए कि हालात के मद्देनजर उसकी तैयारी क्या है? मुलायम के इस मामले के उठाने के साथ ही सपा के दूसरे सदस्य अपने स्थानों पर खड़े हो गए और मायावती सरकार का इस्तीफा मांगने लगे। मुलायम ने जैसे ही इस मामले को उठाया बसपा के दारा सिंह चौहान, विजय बहादुर और सुरेंद्र नागर समेत दूसरे सदस्य भी खड़े के गए। उन्होंने मुलायम का कड़ा विरोध किया। बसपा सदस्यों का कहना था कि यह राज्य की कानून-व्यवस्था का मामला है। उसे यहां नहीं उठाया जा सकता है। मुरादाबाद में स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। सरकार हालात पर नजर रखे हुए है। सपा और बसपा सदस्यों के शोर-शराबे के बीच ही भाजपा के योगी आदित्यनाथ भी खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि चार दिनों से दंगे हो रहे हैं। हिंदुओं को उनके धार्मिक कार्यक्रमों से रोका जा रहा है। प्रशासन फेल हो गया है। लिहाजा मुरादाबाद में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की जानी चाहिए।
मोदी विरोधी एक और आइपीएस अफसर पर शिकंजा
अहमदाबाद आइपीएस अधिकारी संजीव भट्ट के बाद गुजरात सरकार ने राज्य के एक और आला पुलिस अधिकारी के खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार किया है। गुजरात दंगों के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय, सत्तारूढ़ भाजपा के कई अहम नेताओं और पुलिस के आला अधिकारियों द्वारा की गई फोन व मोबाइल कॉल्स से संबंधित सीडी नानावती आयोग व एसआइटी को सौंपने वाले आइपीएस राहुल शर्मा को गृह विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सरकार ने कहा है कि गोपनीयता भंग करने और अनुशासनहीनता के लिए क्यों न आप के खिलाफ कार्रवाई की जाए? शर्मा फिलहाल राजकोट में डीआइजी के पद पर तैनात हैं। गृह विभाग के अतिरिक्त सचिव वरेश सिन्हा ने बुधवार देर रात गुजरात कैडर के आइपीएस अधिकारी राहुल शर्मा के खिलाफ नोटिस जारी किया। उन पर राज्य सरकार की इजाजत के बिना फोन कॉल्स की सीडी विभिन्न जांच आयोग और एसआइटी को देने का आरोप है। सरकार ने शर्मा के खिलाफ कार्यालयी गोपनीयता विधेयक, सेवा नियमों का उल्लंघन और अनुशासनहीनता के आरोपों के तहत यह कार्रवाई की है। शर्मा ने सरकार की इस कार्रवाई को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार विरोधी पुलिस अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई को लेकर पुलिस विभाग में हड़कंप है। इस कार्रवाई को सरकार विरोधी पुलिस अधिकारियों को काबू में रखने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। इससे पहले राज्य सरकार ने गुजरात दंगों में मुख्यमंत्री मोदी की भी भूमिका बताने वाले आइपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को निलंबित कर दिया था। गुजरात दंगों के दौरान फरवरी, 2002 में भावनगर में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात रहते शर्मा ने हिंसक भीड़ को एक मदरसे पर हमला करने से रोक दिया था। इसके तत्काल बाद उनका तबादला अहमदाबाद पुलिस नियंत्रण कक्ष में कर दिया गया था। अहमदाबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त पीसी पांडे ने शर्मा को ही शहर के नरोड़ा पाटिया दंगे की जांच सौंपी थी। जांच के दौरान शर्मा ने दंगे के वक्त मुख्यमंत्री कार्यालय, राज्य सरकार व संगठन के कई शीर्ष नेताओं, विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारियों के साथ पुलिस के आला अधिकारियों के फोन और मोबाइल कॉल्स की जानकारी जुटाई थी। इसी जानकारी से संबंधित सीडी शर्मा ने नानावती-मेहता आयोग, बनर्जी आयोग और एसआइटी को उपलब्ध कराई थी। इसी सीडी के आधार पर महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद से हाथ धोना और जेल जाना पड़ा था। ताजा घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार सच बोलने वाले अधिकारियों की आवाज दबा रही है।
Sunday, August 7, 2011
विदेश जाने से पहले कई नेताओं को इधर-उधर कर गई सोनिया
: कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बीमारी और उनके इलाज के लिए अमेरिका जाने के बावजूद कांग्रेस का कामकाज दुरुस्त चल रहा है। कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं व देश को यह संदेश देने के लिए संगठन स्तर पर कई समितियों का एलान किया है। बताया जाता है कि विदेश रवानगी से पहले सोनिया संगठन व सरकार के बीच समन्वय के लिए शोध व समन्वय समिति पर मुहर लगा गईं। सुरेश पचौरी की अगुआई वाली समिति में संगठन व सरकार के बड़े पदाधिकारी और मंत्रियों को शामिल किया गया है। वह (सोनिया) खाली बैठे वरिष्ठ व मझोले नेताओं के पुनर्वास को भी मंजूरी दे गई हैं। पार्टी ने सोनिया की बीमारी का राज तो सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन 4 अगस्त को उनके सफल आपरेशन की घोषणा के साथ ही मीडिया से उनके स्वास्थ्य को लेकर निजता की भावनात्मक अपील की है। सोनिया अभी आइसीयू में हैं। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने शुक्रवार को नई कमेटियों के गठन और पुराने प्रकोष्ठों के पुनर्गठन की घोषणा कर दी है। इनमें सबसे अहम सुरेश पचौरी की अध्यक्षता में बड़े नामों वाली एक शोध एवं समन्वय कमेटी का गठन है। अरसे से कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर पार्टी और सरकार के बीच समन्वय की जरूरत महसूस की जा रही थी। इसी क्रम में समिति गठित कर पचौरी को इसका चेयरमैन बनाया गया है और इसमें कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी, दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, जयराम रमेश, पवन बंसल, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक के साथ रेणुका चौधरी, संदीप दीक्षित और मनीष तिवारी भी हैं। इस समिति का उप समूह भी बनाया गया है, जिसके संयोजक पचौरी ही हैं और उसमें पवन बंसल, जयराम रमेश और संदीप दीक्षित हैं। मीडिया विभाग की कमान जनार्दन द्विवेदी को चेयरमैन बनाकर रखी गई है। मनीष तिवारी और अभिषेक मनु सिंघवी के साथ-साथ रेणुका चौधरी और राशिद अल्वी को प्रवक्ता बनाया गया है। इसके अलावा कांग्रेस संदेश के संपादक अनिल शास्त्री को विवादास्पद संपादकीय की कीमत चुकानी पड़ी है। संपादकीय में शास्त्री ने रामदेव की अगवानी के लिए तीन मंत्रियों के जाने की आलोचना की थी। शास्त्री को हिंदी विभाग का अध्यक्ष और उनके सहयोगी पंकज शर्मा को सचिव बनाया गया है। कांग्रेस संदेश का संपादक पूर्व केंद्रीय मंत्री गिरिजा व्यास को बनाया गया है। संदेश के संपादकीय बोर्ड में सलमान खुर्शीद और जयराम रमेश भी रखे गए हैं। इसी तरह व्यास को विचार विभाग गठित कर उसका अध्यक्ष भी बनाया गया है।
Tuesday, July 26, 2011
यूपी में भाजपा के शासन में मुस्लिमों पर कम हुए जुल्म
, नई दिल्ली यूपी के विस चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोटों पर कब्जे को लेकर खुली जंग छिड़ गई है। राहुल गांधी की ओर से मुसलमानों को रिझाने की कोशिशों को सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने दिखावा करार दिया है। साथ ही आरोप लगाया कि कांग्रेस कभी भी मुस्लिमों की हितैषी नहीं रही है, बल्कि कुछ मामलों में तो उन पर (मुसलमानों) भाजपा के मुकाबले कांग्रेस शासन में ज्यादा अत्याचार हुआ है। मुलायम ने रविवार को यूपी का चुनाव अकेले लड़ने का एलान करते हुए मुस्लिम वोटों पर पकड़ बनाने की कोशिश की। उन्होंने सूबे के 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटरों को आगाह करते हुए कहा, 62 वर्षो में कांग्रेस ने उनके लिए कुछ नहीं किया। सच्चर कमेटी समेत दूसरी समितियों की रिपोर्ट वर्षो से धूल खा रही है, लेकिन सरकार चुप है। मुस्लिम क्षेत्रों में न तो स्कूल खुले और न ही चुने हुए 90 जिलों में फंड खर्च हुआ है। उन्होंने कहा, सीएम रहते मैने पीएसी में मुस्लिमों को आरक्षण दिया। कांग्रेस ने उन्हें कभी कुछ नहीं दिया। भाजपा शासन में भी मुसलमानों पर उतना अत्याचार नहीं हुआ जितना कांग्रेस शासन में होता रहा है। भाजपा से भी बराबर की दूरी बनाते हुए कहा, विवादित ढांचा गिराकर भाजपा ने जो किया उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता है, लेकिन कांग्रेस के दिखावे और धोखे को भी कोई मुसलमान नहीं भूल सकता। मुलायम ने मुसलमानों को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का समर्थन किया। मुलायम ने किया अमर का बचाव नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो : नोट के बदले वोट मामले में घिरे सपा के पूर्व नेता अमर सिंह को अपने पुराने नेताजी से समर्थन मिला है। मुलायम सिंह ने रविवार को उन्हें (अमर सिंह) निर्दोष करार देते कांग्रेस का षड्यंत्र बताया और भरोसा दिया कि जितना हो सकेगा वह उनकी मदद करेंगे। हालांकि यह भी साफ किया कि पार्टी में उनकी वापसी के लिए कोई जगह नहीं है। मुलायम ने कहा कि उस वक्त न तो सपा सरकार में शामिल हुई और न ही अमर व रेवती रमण मंत्री बने थे। फिर वह सांसदों की खरीद-फरोख्त में क्यों शामिल होते। दोनों नेताओं से पुलिस पूछताछ का विरोध करते हुए मुलायम ने कहा कि यह सपा को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश है। जब सरकार खतरे में थी, तो कांग्रेस समर्थन की गुहार लगा रही थी। सरकार गिराने की मुहिम का नेतृत्व भाजपा ने नहीं संभाला होता, तो सपा कभी सरकार का समर्थन नहीं करती। बहरहाल, मुलायम के समर्थन से अलग-थलग पड़े अमर सिंह का उत्साह बढ़ सकता है।
बेटे-बेटियों की पार्टी बन गई है भाजपा
भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा को पद से हटाने की सबसे पहले मांग करने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार ने पार्टी के शीर्ष नेताओं पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, भाजपा एक अलग तरह की पार्टी के रूप में सामने आई थी लेकिन अब हिमाचल प्रदेश से कर्नाटक तक यह बेटों, बेटियों और रिश्तेदारों की पार्टी बनती जा रही है। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार ने रविवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा, भाजपा एक अलग तरह के दल के रूप में सामने आई थी लेकिन बाद में यहां भी परिवार तंत्र ने लोकतंत्र की जगह ले ली। उन्होंने पार्टी की संरचना पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,पहले भाजपा कार्यकर्ताओं की पार्टी हुआ करती थी, लेकिन अब हिमाचल प्रदेश से कर्नाटक तक यह बेटों, बेटियों और रिश्तेदारों की पार्टी बनती जा रही है। शांता कुमार ने मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई न किए जाने के लिए पार्टी आलाकमान को ही कटघरे में खड़ा किया। शांताकुमार के मुताबिक, उन्होंने कर्नाटक के पार्टी प्रभारी पद पर रहने के दौरान ही राज्य की स्थितियों के बारे में पार्टी आलाकमान को सूचना दे दी थी, लेकिन उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया गया। जो बातें लोकायुक्त संतोष हेगड़े अभी बता रहे हैं, मैं वह सब पहले जानता था। मैंने एक-एक बात की जानकारी आलाकमान को दे दी थी। साथ ही कहा था कि अगर येद्दयुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी है तो उन्हें राज्य के प्रभारी के पद से मुक्त कर दिया जाए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, हेगड़े की रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए पार्टी को मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई जरूर करनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि शांता कुमार ने शनिवार को येद्दयुरप्पा को हटाने के लिए हाल ही में पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी और संसदीय दल के मुखिया लालकृष्ण आडवाणी को चिट्ठी लिखी थी। शांता कुमार ने अपने पत्र में लिखा था कि येद्दयुरप्पा को पद पर बनाए रखने से देश भर में पार्टी की छवि खराब होगी। इस मामले में पार्टी पहले ही काफी समझौता कर चुकी है। अब राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के लिए और ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने पत्र लिखने को जायज ठहराते हुए यह भी कहा था कि कर्नाटक सरकार में भ्रष्टाचार की खबरों पर वह चुप होकर नहीं बैठ सकते। इसलिए पत्र लिखने का फैसला किया। एकजुट होने लगे येद्दयुरप्पा विरोधी बेंगलूर : कर्नाटक में भी येद्दयुरप्पा विरोधियों ने लामबंदी शुरू कर दी है। राज्य के ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री जगदीश शेट्टर ने सोमवार को वरिष्ठ भाजपा नेता एच एन अनंत कुमार से भेंट की। अनंत कुमार को येद्दयुरप्पा विरोधी खेमे का माना जाता है। विधायकों की अयोग्यता के मामले में भी अनंतकुमार और मुख्यमंत्री विरोधी अन्य नेताओं ने लामंबदी कर येद्दयुरप्पा को हटाने की कोशिश की थी लेकिन केंद्रीय नेताओं का वरदहस्त होने के कारण येद्दयुरप्पा बच गए। येद्दयुरप्पा मामले में कार्रवाई के बाबत पूछे जाने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और येद्दयुरप्पा के करीबी समझे जाने वाले वेंकैया नायडू ने शनिवार को कहा था कि लोकायुक्त की रिपोर्ट आधिकारिक तौर पर सामने आने के बाद पार्टी आवश्यक कार्रवाई करेगी। नायडू ने कहा था कि भाजपा मीडिया में लीक हुई रिपोर्ट पर कोई प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं समझती। स्थिति अगले कुछ दिनों में साफ होगी।
चिदंबरम पर टिप्पणी को लेकर सोनिया ने फटकारा था
उत्तेजक टिप्पणियों को लेकर विवादों में रहने वाले कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने पहली बार स्वीकार किया कि पिछले साल जब उन्होंने माओवादी निरोधक रणनीति को लेकर गृहमंत्री पी चिदंबरम की आलोचना की थी, तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नाराजगी जताई थी। सिंह ने एक चैनल के कार्यक्रम में कहा कि मेरी बोलती केवल एक बार उस समय बंद हुई थी, जब मैंने चिदंबरम के खिलाफ कुछ टिप्पणी की थी। सोनिया गांधी ने टिप्पणी पर काफी नाराजगी जताई थी और मैंने चिदंबरम से खेद जताया था। सिंह ने चिदंबरम को बौद्धिक दंभी करार देकर विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा था कि माओवाद मुद्दे पर उनका दृष्टिकोण बहुत संकीर्ण है। वह इसे शुद्ध रूप से कानून व व्यवस्था समस्या के रूप में देखते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या उनके विवादास्पद बयानों से राहुल गांधी का नाम खराब हो रहा, उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से गलत है। मैं न तो राहुल गांधी का सलाहकार हूं और न ही मेंटर। आतंकवाद का सांप्रदायीकरण करने के आरोपों पर उन्होंने कहा कि वह ऐसा नहीं कर रहे हैं। अगर ऐसा है, तो इसके लिए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनकी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। सिंह ने कहा कि जिन लोगों ने इसका सांप्रदारीकरण किया कि है, वह लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग हैं, जो उस समय प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री के पास गए थे, जब महाराष्ट्र एटीएस ने श्रीकांत पुरोहित, प्रज्ञा ठाकुर, दयानंद पांडेय और अन्य को मालेगांव विस्फोट मामले में गिरफ्तार किया था। भाजपा प्रतिनिधिमंडल के साथ प्रधानमंत्री के पास गई। क्या वे मुद्दे का सांप्रदायीकरण नहीं कर रहे हैं?
Monday, July 18, 2011
राहुल की राजनीतिक सक्रियता
तमाम साधनों और सलाहकारों के बावजूद राहुल गांधी के बयानों में बार-बार गड़बड़ी होने पर हैरत जता रहे हैं एस. शंकर
राहुल गांधी स्वत: जब भी कुछ महत्वपूर्ण बोलने की कोशिश करते हैं तो गड़बड़ हो जाती है। प्राय: कांग्रेस के रणनीतिकारों को स्पष्टीकरण देने आना पड़ता है। राहुल को सक्रिय राजनीति में आए 13 वर्ष हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में ये अच्छे लक्षण नहीं कि बार-बार उनके बयान पर सफाई देनी पड़े। एक प्रतिशत आतंकी घटनाओं के न रुक सकने वाला नवीनतम कथन भी वैसा ही साबित हुआ। दो महीने पहले भट्टा-पारसौल में पुलिस की कथित ज्यादती के उनके आरोप बाद में असत्य साबित हुए। इससे पहले राहुल प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को एक जैसा बता चुके हैं। ऐसे बयानों से कांग्रेस को कुछ चुनावी लाभ भले मिले, किंतु देश का हित नहीं हो रहा। शत्रु और मित्र के प्रति ऐसी समदर्शिता से आतंकवाद विरोधी लड़ाई कमजोर ही हुई है। विवादित ढांचा विध्वंस विषय पर भी राहुल ने यह कहकर कांग्रेस को झेंपने को मजबूर कर दिया था कि यदि उनके परिवार का कोई व्यक्ति सत्ता में होता, तो ढांचा नहीं टूटता। यह तो परोक्ष रूप से कांग्रेस और उसके ही प्रधानमंत्री नरसिंह राव पर अशोभनीय लांछन था। इससे पहले राहुल ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को भी अपने परिवार की देन बताया था। उनके शब्द थे, एक बार मेरा परिवार कुछ तय कर लेता है तो उससे पीछे नहीं हटता। चाहे वह भारत की स्वतंत्रता हो, पाकिस्तान को तोड़ना हो या देश को 21वीं सदी में ले जाना हो। इस एक ही वाक्य में तीन विचित्र कथन थे। भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की हेठी, बांग्लादेश के मुक्ति-संग्राम का अपमान तथा काल-गति पर दावा। यह सब बचकाना ही कहा जा सकता है। जितने साधन, सलाहकार उन्हें उपलब्ध हैं और देश-विदेश देखने का जितना उन्हें अवसर मिला है उससे उनकी बातों में इतना हल्कापन देखकर आश्चर्य होता है। राहुल की राजनीतिक पहलकदमी भी अभी तक कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाई हैं। 13 वर्ष से भावी प्रधानमंत्री के रूप में राजनीतिक सक्रियता का यह परिणाम निराशाजनक है। क्या इसीलिए वसंत साठे जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी प्रियंका गांधी को लाने की मांग कर रहे हैं? राहुल के अटपटे वचन केवल भाषण देने की रौ में की गई अनचाही भूल नहीं हैं। सितंबर, 2005 में एक साप्ताहिक पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि वह तो 25 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बन सकते थे। केवल पुराने कांग्रेसियों पर दया करके उन्होंने ऐसा नहीं किया। राहुल गांधी के उस प्रथम विस्तृत साक्षात्कार पर जब हलचल मची तो कांग्रेस के रणनीतिकारों ने उसे साक्षात्कार मानने से ही इंकार कर दिया! सफाई दी कि वह तो अनौपचारिक बातचीत हो रही थी। चिंतनीय बात यह है कि 13 वर्ष के राजनीतिक अनुभव के बाद भी राहुल देश के लिए कोई रचनात्मक कार्यक्रम नहीं दे पाए हैं। उनके चाचा संजय और पिता राजीव, दोनों ही अपने-अपने विशिष्ट कार्यक्रमों से जाने गए थे। वे कार्यक्रम कितने सफल हुए, यह दूसरी बात है, जबकि राहुल देश में लंबे समय से मौजूद मुद्दों, तत्वों की पहचान तक करने में गड़बड़ा जाते हैं। जब पूरा देश अन्ना हजारे के बहाने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपना आक्रोश प्रकट कर रहा था, तो राहुल पूरे सीन से ही गायब रहे। वह कोई बयान तक नहीं दे पाए। ऐसी स्थिति में राजनीतिक समस्याओं का समाधान देने की संभावना अनुमान का ही विषय है। यदि बागडोर उनके हाथ आई, तब क्या वही होगा जैसे पुराने जमाने में होता था कि भोले शहजादे के नाम पर अदृश्य तत्व शासन करेंगे। बोफोर्स, क्वात्रोची और संदिग्ध मिशनरियों के मामले में परिवार की भूमिका ने पर्याप्त संकेत दे दिए हैं। परिवार के निकटवर्ती रहे नेता अरुण नेहरू ने भी कहा था कि भारत में अवैध रूप से रह रहे विदेशी मिशनरियों को बाहर करने के निर्णय पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने आपत्ति की थी। एक अन्य मामले में न्यायमूर्ति वाधवा आयोग ने एक ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी को अवैध मतांतरण कराने में लिप्त पाया था। उस मिशनरी की विधवा को कांग्रेस नेताओं ने बड़ा राष्ट्रीय सम्मान दिया। क्यों? अभी एक नक्सल समर्थक को एक सर्वोच्च आयोग की समिति में नियुक्त किया गया है, जबकि उसके विरुद्ध न्यायालय में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चल रहा है। यह सब कौन लोग कर रहे हैं और इस पर राहुल गांधी क्या सोचते हैं, कुछ सोचते भी हैं या नहीं? इन सब मुद्दों पर आम कांग्रेसियों की भावना निश्चय ही वह नहीं है जो उनके आला कर रहे हैं। अत: यह संदेह निराधार नहीं कि वास्तविक सत्ता अदृश्य लोगों के हाथ में जा रही है। ये बातें असंबद्ध नहीं हैं। देश-विदेश के मीडिया का एक प्रभावशाली हिस्सा 10, जनपथ का बचाव कर रहा है। वह कभी प्रश्न नहीं उठाता कि कुछ लोग देश की संवैधानिक प्रणाली से हटकर सत्ता का प्रयोग कर रहे हैं। जिस पद या समिति का देश के संविधान में कोई उल्लेख तक नहीं, वह हमारे सर्वोच्च नेताओं को निर्देश देती रहती है। यहां तक कि उनसे हिसाब तक मांगती है। ऐसे सलाहकार रूपी सुपर-शासक किसके प्रति जवाबदेह हैं? अभी सांप्रदायिकता के विरुद्ध एक ऐसे कानून का प्रस्ताव दिया गया है, जो कानूनी रूप से बहुसंख्यक समाज के मुंह पर ताला लगा देगा। देश भर में सांप्रदायिकता पर निगरानी करने वाली एक सुपर-अथॉरिटी होगी, जो इस नाम पर राज्य सरकारों तक को बर्खास्त कर देगी। इस अथॉरिटी के सदस्यों में बहुसंख्या अल्पसंख्यकों की होगी। अर्थात यह नया कानून स्थायी रूप से मानकर चलेगा कि हर हाल में, कहीं भी, कभी भी सांप्रदायिक गड़बड़ी निरपवाद रूप से बहुसंख्यक ही करेंगे। न्याय, सच्चाई और संविधान के साथ ऐसा भयंकर मजाक आखिर कौन लोग कर रहे हैं? क्या धीरे-धीरे भारत पर एक प्रकार का विजातीय शासन स्थापित हो रहा है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार
बम की फैक्ट्री बना रहा है आरएसएस
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने रविवार को आरोप लगाया कि आरएसएस बम की फैक्ट्री बना रहा है। उन्होंने मांग की है कि मुंबई में गत बुधवार को हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के संबंध में हिंदू संगठनों की भी जांच की जानी चाहिए। सिंह ने उज्जैन में संवाददाताओं से कहा, मैं पहले से कहता आ रहा हूं कि आरएसएस देश में आतंकवाद फैला रहा है। दिग्विजय ने कहा कि भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी पहले कहते थे कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता, मगर हर आतंकवादी मुसलमान क्यों होता है? उसके जवाब में मैं कहता हूं, हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता, मगर जो भी हिंदू आतंकवादी घटनाओं के संबंध में पकड़ा जाता है वो आरएसएस का क्यूं होता है? मालेगांव, मौंडासा, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए विस्फोटों में संघ का हाथ सामने आया है। एक निजी कार्यक्रम में हिस्सा लेने उज्जैन आए कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को भाजपा कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाए। इस कारण सिंह के साथ चल रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध कर रहे कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं को दूर तक दौड़ा दिया। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम स्थल पर जमकर हंगामा किया।
दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण, 18-07-2011
Subscribe to:
Posts (Atom)