हिसार के संसदीय उपचुनाव में मुद्दों पर फिलहाल जातिगत समीकरण हावी दिख रहे हैं। इस त्रिकोणीय मुकाबले में तीनों प्रमुख प्रत्याशी चुनावी प्रचार में विकास और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं, लेकिन वास्तव में जाति के अंडर करेंट का बोझ सब पर भारी है। दो दिग्गज जाट प्रत्याशियों के मैदान में होने से उनका वोट लेने की दौड़ तो है ही, लेकिन यहां दूसरी बिरादरी के मतदाताओं का रुख और ज्यादा अहम है। यही कारण है कि तीनों प्रमुख उम्मीदवार जातिगत समीकरणों को साधने में जुटे हैं। भजनलाल के निधन से खाली हुई इस सीट पर मुख्य मुकाबला उनके बेटे और हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप विश्नोई, इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अजय चौटाला और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश बरवाला के बीच सिमटा हुआ है। मतदान 13 अक्टूबर को है, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से लेकर ओम प्रकाश चौटाला समेत सभी दिग्गजों की आवाजाही से हिसार का की आबो-हवा पूरी तरह से सियासी रंग से सराबोर है। यह चुनाव दरअसल, कुलदीप विश्नोई और अजय चौटाला की भविष्य की सियासत के लिए अहम है, वहीं इनेलो और हजकां के बीच चौधर या दबदबे की लड़ाई भी है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश बरवाला उर्फ जेपी के साथ-साथ हरियाणा सरकार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। यही कारण है कि खुद मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपनी कैबिनेट के साथ यहां डेरा डाले हैं तो ओम प्रकाश चौटाला, अभय चौटाला और उनकी नई पीढ़ी दिग्विजय और दुष्यंत चौटाला भी हिसार में जम गए हैं। कुलदीप विश्नोई का तो यह गृह क्षेत्र है और वह खुद को भजनलाल का वारिस साबित कर गैर जाट वोटों के बीच अपनी जगह बनाने की पूरी मशक्कत कर रहे हैं। सुषमा स्वराज जैसे भाजपा के शीर्ष नेता भी उनके समर्थन में आएंगे, इससे पहले स्थानीय नेता माहौल तैयार करने में जुटे हैं। हिसार के करीब 12 लाख 50 हजार मतदाताओं में सबसे ज्यादा करीब 4.40 लाख वोट जाट बिरादरी का है। ऐसे में बाकी आठ लाख से ज्यादा वोटों के बीच पैठ बनाने की ज्यादा होड़ है। इनमें सबसे ज्यादा करीब 16 फीसदी यानी करीब सवा दो लाख दलितों का रुख बेहद अहम है। इसके अलावा पंजाबी, ब्राह्मण, वैश्य, यादव, विश्नोई, कुम्हार आदि के वोट बेहद अहम हैं। सभी प्रत्याशियों ने अपने चुनाव क्षेत्र के प्रभारियों की नियुक्ति में उस क्षेत्र विशेष के जातीय समीकरणों का ध्यान रखते ही वहां अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं।
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Friday, September 30, 2011
Wednesday, June 29, 2011
कांग्रेस मुंडे के स्वागत को तैयार
महाराष्ट्र में भाजपा के सबसे प्रभावी चेहरे और लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गोपीनाथ मुंडे लगातार कांग्रेस के संपर्क में बने हुए हैं। गडकरी से नाराज मुंडे के कांग्रेस से हाथ मिलाने के फार्मूले और शर्तो तक बात पहुंच चुकी है। हालांकि कांग्रेस अभी तक इस बारे में अंतिम फैसला नहीं कर सकी है, लेकिन मुंडे को लेकर पार्टी नेतृत्व खासा संजीदा जरूर है। मराठवाड़ा कांग्रेस की कमजोर कड़ी रहा है। मुंडे न केवल इस इलाके के बल्कि पिछड़े वर्ग के प्रभावी नेता हैं इसलिए कांग्रेस इस अवसर को एक झटके में गंवाना नहीं चाहती। यह जरूर है कि मुंडे को लाने के नफा-नुकसान पर कांग्रेस में मंथन जारी है। वह मुंडे के साथ वार्ता का चैनल भी खोले हुए है। सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल और महाराष्ट्र के पार्टी मामलों के प्रभारी मोहन प्रकाश के बीच लगातार इस बारे में बात हो रही है। सूत्रों के मुताबिक मुंडे के संदेशवाहकों की तरफ से कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने या शामिल होने का फार्मूला और शर्ते मोटे तौर पर भेजी जा चुकी हैं। मुंडे अपने साथ करीब 15 विधायकों और महाराष्ट्र के तीन सांसदों को कांग्रेस में शामिल कराने का दावा कर रहे हैं। जाहिर है कि वह महाराष्ट्र विधानसभा में पार्टी के एक तिहाई से ज्यादा विधायकों को तोड़कर गडकरी को झटका देने का मन बना चुके हैं। मुंडे की अपेक्षा महाराष्ट्र सरकार में दो और केंद्र में एक मंत्री पद की है। अलग दल बनाने से लेकर कांग्रेस में शामिल होने जैसे विकल्पों पर भी कांग्रेस को कुछ संदेश दिए गए हैं। खास बात यह है कि भाजपा नेताओं के मोबाइल पर नहीं आ रहे मुंडे की लगातार कांग्रेस नेताओं से बातचीत जारी है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि महाराष्ट्र में जब शिवसेना के फायरब्रांड नेता नारायण राणे के साथ कांग्रेस को कोई दिक्कत नहीं हुई तो मुंडे के साथ भी सांप्रदायिकता के मुद्दे पर समस्या नहीं होगी। अलबत्ता, उनके दावों, प्रभावों और शर्तो पर पार्टी जरूर मंथन कर रही है। कांग्रेस यह भी देख रही है कि कहीं ऐसा न हो कि मुंडे सिर्फ भाजपा को ब्लैकमेल करने के लिए ही कांग्रेस का इस्तेमाल कर रहे हों। मुंडे की जल्द ही कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता के साथ बातचीत भी हो सकती है।
Wednesday, June 15, 2011
अराजनीतिक लोगों की राजनीतिक मुहिम
क्या विडंबना है आदमी की फितरत की! हम बीच में नहीं रह सकते या तो इधर रहेंगे या उधर। जरूरी नहीं कि सत्य ठीक वहीं हो जहां हम उसे देखते हैं, लेकिन मन दिमाग पर भारी पड़ जाता है। पूर्वाग्रह इसी से पैदा होते हैं। जब एक बार पूर्वाग्रह पैदा हो गया तब सत्य को देखना और मुश्किल हो जाता है। पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दो व्यक्तित्व उभरकर हमारे सामने आए हैं। इन दोनों के समर्थकों का एक समूह है तो विरोधियों का भी अपना एक समूह विशेष है, जो अपने-अपने पक्ष का जबरदस्त समर्थन करते नजर आ रहे हैं। दोनों ही समूह एक-दूसरे की बात पर विचार करने से कतरा रहे हैं जिस कारण एक अलग ही तरह की संकट की स्थिति बनती दिख रही है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों ही अराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं। अन्ना हजारे ने समाज सुधार की दिशा में कुछ काम किया है। वह न कभी किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए और न ही शामिल होना चाहते हैं यानी उनकी ऐसी कोई मंशा भी नहीं है। इसके उलट दूसरी ओर बाबा रामदेव योग शिक्षक के रूप में मशहूर रहे हैं। बाद में वह काय चिकित्सक भी बन गए और तमाम तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा करने लगे। जब उनकी महत्वाकांक्षा और बढ़ी तो उन्होंने सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के बारे में भी बोलना शुरू कर दिया। कांग्रेस ही नहीं कुछ और लोगों का भी कहना है कि राजनीति करना इन लोगों का नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों का काम है। आखिर ये अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस क्षेत्र में क्यों कूद पड़े हैं? मैं नहीं समझता कि इससे बेहूदा कोई और प्रश्न हो सकता है। सभी व्यवस्थाएं राजनीतिक होती हैं। इन व्यवस्थाओं के सदस्य भी राजनीतिक होते हैं। जब कोई आदमी वोट देने के लिए घर से बाहर निकलता है तो वह राजनीति करने के लिए ही निकलता है। इस मायने में नागरिकता अपने आपमें एक राजनीतिक घटना है। इसीलिए विदेशी नागरिक भारत में राजनीति नहीं कर सकते और उन्हें इसके लिए प्रतिबंधित किया गया है। यदि ऐसी स्थिति में अन्ना हजारे या बाबा रामदेव अगर कोई राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं तो इसकी वैधता को ललकारा नहीं जा सकता। हमारे यहां युद्ध के बारे में कहा भी गया है कि यह इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ और सिर्फ सेनापतियों के हाथ में ही नहीं छोड़ा जा सकता। यही बात अब राजनीति के बारे में कही जा सकती है। किसी भी लोकतंत्र में राजनीति इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता। जब राजनेता कहते हैं कि हम राजनीति में हैं इसलिए राजनीति करना हमारे ही अधिकार क्षेत्र में आता है तो वे न केवल अपनी हंसी उड़ाते हैं, बल्कि दूसरों को भी हंसने के लिए मौका देते हैं। मेरे विचार से इन लोगों से साफ कहा जाना चाहिए आप जैसे लोग आज तक अकेले ही राजनीति की जो शोभा बढ़ाते रहे हैं इसीलिए तो हमारे देश का यह हाल हो गया है। देश की वर्तमान दुर्गति के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है अथवा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इस विषय पर यदि देशव्यापी जनमत सर्वेक्षण कराया जाए तो पहले नंबर पर राजनेताओं का ही नाम आएगा। जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे देश में आज इतना असंतोष दिखाई दे रहा है उसके शिरोमणि भी यही नेता लोग हैं। जब ये लोग सरकार चलाते हैं तो सरकार भी भ्रष्ट हो जाती है। कायदे से इस राजनीतिक पतन का उपचार यही हो सकता था कि राजनीति की वर्तमान शैली के विरुद्ध एक या दो नए राजनीतिक दल नए विचारों और कार्यशैली के साथ विकल्प के रूप में उभरते और राष्ट्रीय विनाश को रोकने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते। वर्ष 1980 के दशक में कुछ क्षेत्रीय दलों के उभरने के बाद आज तक कोई नया राजनीतिक दल नहीं बना है। उस समय के बने क्षेत्रीय दल भी अब राष्ट्रीय दलों की तरह भ्रष्ट और जनविरोधी हो चुके हैं। इसलिए किसी नई या वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है, लेकिन प्रकृति का यह सामान्य नियम है कि वह खाली हुए रिक्त स्थान को बर्दाश्त नहीं करती और उसे अपने अनुसार किसी न किसी तरह भर लेती है। राजनीतिक प्रक्रिया के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने के परिणामस्वरूप ही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ है, लेकिन वह कोई संसदीय पार्टी नहीं है, जिस कारण उसमें वह क्षमता नहीं जिसकी की आज वाकई में आवश्यकता है। इस तरह हम पाते हैं कि हमारे देश में एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति है। इस राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए ही अराजनीतिक लोगों को वे काम करने पड़ रहे हैं जो काम वस्तुत: राजनीतिक संगठनों का है। अथवा उनके द्वारा होना चाहिए था। आज भारतीय जनता पार्टी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ खड़ी है। हालांकि वह अन्ना हजारे के साथ कम और रामदेव के साथ ज्यादा दिख रही है, क्योंकि अन्ना हजारे के काम में हिंदूवाद की राजनीति की कोई संभावना नहीं है, जबकि बाबा रामदेव की मुहिम में इस बात की संभावना कोई भी देख सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की प्रसिद्धि इस बात के लिए कभी नहीं रही है कि यह पार्टी भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। यही वजह है कि अपने चरित्र को दूसरों से ऊंचा साबित करने के लिए उसे आज एक योग शिक्षक का सहारा लेना पड़ रहा है। पिछले तीस-चालीस वर्षो में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जो राजनीतिक फैसलों सफलतापूर्वक चुनौती दे चुके हैं। इनमें मेधा पाटेकर का पर्यावरण आंदोलन, अरुणा राय का सूचना का अधिकार आंदोलन और भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध स्थानीय समुदायों का आंदोलन। इन गैर राजनीतिक आंदोलनों की सार्थकता और सफलता साफ तौर पर आज हमें दिख रहे हैं। हमारे देश में मानव अधिकारों का आंदोलन भी अब जोर पकड़ रहा है । हालांकि इसका नेतृत्व भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं कर रहा है जिसके बारे में कहा जा सके कि वह राजनीति में है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। जाहिर है ये दोनों ही व्यक्ति कोई पूर्ण पुरुष नहीं हैं। इनमें कमियां और कमजोरियां हैं और हो सकता है इनकी अपनी कुछ महत्वाकांक्षाएं भी हों, लेकिन हमें यहां नहीं भूला जा सकता कि इन कमियों और कमजोरियों की चर्चा जरूर करनी चाहिए, लेकिन उन्हें पूरी तरह से खारिज करते हुए नहीं। इसी तरह जो लोग अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भक्त हैं अथवा इनके समर्थक और जो इन्हें युगपुरुष बता रहे हैं, उन्हें भी यह सोचने की जरूरत है कि कहीं वे अपनी अतिभक्ति का शिकार तो नहीं हो रहे हैं। कमियां होने से कोई व्यक्ति घृणास्पद नहीं हो जाता और पूर्ण पुरुष न होने से कोई व्यक्ति श्रद्धा का पात्र न रहे ऐसी भी बात नहीं हो सकती। इसी तरह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थन यदि भारतीय जनता पार्टी कर रही है तो यह मुहिम भाजपाई नहीं हो जाती। शैतान को भी बाइबल के अंश उद्धृत करने की आजादी होनी चाहिए, तभी तो उससे यह मांग की जा सकती है कि वह बाइबिल के अनुसार चल कर दिखाए।
Sunday, May 15, 2011
चुनाव में कॉमनसेंस की जीत
अब मेरा यह विश्वास पक्का हो गया है कि हर चुनाव में कॉमनसेंस की ही जीत होती है। 1977 से मैं चुनाव परिणामों पर गौर करता आ रहा हूं। तब भी यही लगा था और अब फिर लग रहा है कि जनता में कॉमनसेंस भरपूर मात्रा में है पर हमारे राजनीतिक दलों और नेताओं में बिल्कुल नहीं है। वे जब सत्ता में आते हैं तो अपने को भगवान समझने लगते हैं, जबकि उन्हें भी पता होता है कि असली भगवान कौन है? चुनाव से पहले आम जनता को वह भगवान बताते हैं और चुनाव के बाद खुद को भगवान मानने लगते हैं। पता नहीं भगवान गलती करता है या नहीं, लेकिन ये पार्थिव भगवान हमेशा चूक करते आए हैं और इसी कारण वह इसका फल भी भुगतते रहते हैं। अचरज की बात यह है कि तब भी इन्हें बुद्धि नहीं आती। न तो चुनाव हारने का सच्चा पश्चात्ताप होता है और न चुनाव जीतने पर इन्हें उस जनता के प्रति अपना कर्तव्य याद रहता है जिसने उन्हें वोट देकर जिताया होता है। केरल और तमिलनाडु की जनता में अपने नेताओं के प्रति बहुत सहानुभूति पायी जाती है। यह अलग बात है कि इन दोनों ही राज्यों की जनता हमेशा छली जाती है। इस सबके बावजूद वह जनता इन्हें बार-बार चुनने के लिए खुद को मजबूर पाती है। दक्षिण के कुछ राज्यों में राजनीतिक दलों और उनके नेतृत्व की हालत यह है कि 1967 के बाद से जनता के पास दो ही विकल्प मौजूद हैं। मजे की बात यह है कि दोनों एक ही दल के दो धड़े हैं। हालांकि यहां एकमात्र मूल पार्टी डीएमके थी जिसका तमिलनाडु की जनता पर असाधारण प्रभाव था। उसने एक तरह से तमिल भूमि से कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। तब से लेकर आज तक वहां कांग्रेस का पैर फिर कभी जम नहीं पाया। बाद में डीएमके का विभाजन हुआ और जयललिता के नेतृत्व में अन्ना डीएमके नाम से एक अलग पार्टी का गठन हुआ। इस तरह एक ही विकल्प दो राजनीतिक विकल्पों में बंट गया और जनता के पास आज तक इनके अलावा तीसरा कोई विकल्प नहीं मिल सका है। आज हालत यह है कि तमिलनाडु की जनता की नियति फुटबाल जैसी हो गई, जिसे दो राजनीतिक दलों के खिलाड़ी अपने मुताबिक कभी इधर तो कभी दूसरी तरफ खींचते रहते हैं। वह एक धड़े से निराश होकर जनता दूसरे धड़े को वोट देती है और फिर जब उससे भी निराश हो जाती है तो अपने पहले धड़े की ओर लौट आती है। इस तरह एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला चलता रहता है और आश्चर्य नहीं कि इस बार के चुनाव में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। कहा जा सकता है कि करुणानिधि और जयललिता, दोनों में कुछ कॉमनसेंस है। दोनों को ही सरकारी राजकोष को दुहकर राज्य की जनता में उपहार बांटने की प्रतियोगिता शुरू करने का श्रेय जाता है। ये राजनेता इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं कि राज्य की भोली-भाली और आवश्यक आवश्यकताओं की पहुंच से भी वंचित गरीब जनता मंगलसूत्र या कलर टीवी पाकर अभिभूत हो जाएगी और इन राजनीतिक दलों को अपने वोटों से मालामाल कर देगी। दरअसल, इसके पीछे कॉमनसेंस यह है कि पैसा सभी को खींचता है। इस दर्शन में कहीं कुछ गलत नहीं है, लेकिन राजनेता भूल जाते हैं कि जनता को सुशासन भी चाहिए और भ्रष्टाचार पर उसे गुस्सा भी आता है। इसलिए जनता प्रलोभन में नहीं आती और अपने विवेक के अनुसार ही वोट देती है। देशभर के दूसरे चुनाव क्षेत्रों में भी यही होता है। इस बात को हमारे राजनेता न समझते हों ऐसी बात नहीं है। वह जानते हैं कि मतदाता पैसा ले लेता है, मुफ्त में मिला शराब पी लेता है और चुनावी उपहार के रूप में मिली चांदी की तश्तरी भी रख लेता है, लेकिन जब वोट देने की बारी आती है या कहें जब वह बटन दबाने पहुंचता है तो मत अपने विवेक से देता है। कह सकते हैं यह जनता का कॉमनसेंस है जो नेताओं के कॉमनसेंस पर भारी पड़ता है। यही बात केरल और असम पर भी लागू होती है। तमिलनाडु की तरह ही केरल में भी कांग्रेस और सीपीएम के दो मोचरें के बीच सत्ता की अदला-बदली चलती रहती है। जो मोर्चा सत्ता में आ जाता है, वह मतदाताओं को निराश करना शुरू कर देता है। सो अगले चुनाव में वहां की जनता उसे दफा कर देती है और पहले वाले को चुन लेती है। असम की कहानी भी यही है, इस फर्क के साथ कि वहां का प्रतिद्वंद्वी नायक असम गण परिषद काफी कमजोर है। इसलिए वह कांग्रेस को हर बार चुनौती नहीं दे पाता। इस बार के चुनाव परिणामों में सबसे दिलचस्प है पश्चिम बंगाल में वामपंथ का पराभव। वहां वामपंथ चुनाव जीतने का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि हार की आशंका उसे होती ही नहीं है। इसके पीछे यह आत्मविश्वास रहा है कि मतदाता आखिर जाएंगे कहां उनके पास कोई और विकल्प ही नहीं है। यह सच भी है। अगर कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में विकल्प खड़ा करने की ईमानदार कोशिश की होती तो वाम मोर्चा 1977 के बाद दूसरे विधानसभा चुनाव में ही हार सकता था। कांग्रेस में सीपीएम का विकल्प बनने का कॉमनसेंस इसलिए पैदा नहीं हो सका, क्योंकि वह कम्युनिस्टों को अपना गुप्त सहयोगी मानती है। संकट काल में कम्युनिस्ट उसकी सहायता करते भी रहे हैं। नई आर्थिक नीति और अमेरिका के साथ परमाणु शक्ति के समझौते ने दोनों चचेरे भाइयों को अलग कर दिया, वरना कम्युनिस्ट अभी भी मनमोहन सिंह की सरकार का समर्थन करते होते। आज जिन ममता बनर्जी की जय जयकार हो रही है वह पहले कांग्रेस में ही थीं, लेकिन कांग्रेस ने उनके नेतृत्व को आगे बढ़ने नहीं दिया, बल्कि उन्हें कुंठित करने की पूरी कोशिश की। ममता बनर्जी के राजनीतिक व्यक्तित्व का वास्तविक विकास होना तब शुरू हुआ, जब उन्होंने कांग्रेस से हटकर तृणमूल कांग्रेस बना ली। उसके बाद से वह लगातार संघर्ष करती रहीं। सिंगुर और नंदीग्राम में अपने कॉमनसेंस के बल पर ही उन्होंने असंतुष्ट किसानों का साथ दिया। वामपंथ का कॉमनसेंस इतना भोथरा हो चुका है कि उन्होंने हालात की नजाकत को नहीं पहचाना और अपनी हिंसक जिद पर अड़ा रहा। ममता बनर्जी की इस भारी जीत के पीछे उनकी कॉमनसेंस की बढि़या राजनीति का निर्णायक हाथ है। वास्तव में ममता बनर्जी कॉमनसेंस की राजनीति का अद्भुत उदाहरण हैं। उनके पास कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है। कोई सुनिश्चित कार्यक्रम भी नहीं है। उनकी तृणमूल कांग्रेस भी इंदिरा कांग्रेस की तरह ही आला कमान के मूड पर चलती है, लेकिन ममता में जबरदस्त कॉमनसेंस है। उनके सतत संघर्ष की प्रेरणा भी यही रही है। इस समय देश में कोई विचारधारा नहीं है। हिंदुत्व की राजनीति काम करने की कोई नई शैली पैदा नहीं कर सकी। इसलिए फिलहाल तो वही राजनीति सफल होगी जिसके साथ कॉमनसेंस की शक्ति है। इसका एक और उदाहरण बिहार है, जहां नीतीश कुमार ने दूसरी बार सफलता हासिल की। ममता ऐसा कर पाएंगी या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि अपने कॉमनसेंस को वह कितना बचाए रखती हैं। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
ममता की जीत से कांग्रेस की भी जय
ममता बनर्जी की जीत के जुलूस में कांग्रेस भी जिंदाबाद है। भ्रष्टाचार की कसौटी पर कसे जा रहे तमिलनाडु के चुनाव में गठबंधन की करारी शिकस्त पश्चिम बंगाल में महाजोट की प्रचंड जीत में गुम हो गई। असम में स्पष्ट जीत पर कांग्रेस अपनी पीठ ठोक रही है, लेकिन केरल में उसकी अगुवाई वाले यूडीएफ को गिर-पड़कर मिली जीत ने उसे इतराने का मौका नहीं दिया। वाम मोर्चा के लिए तो ये नतीजे किसी दु:स्वप्न से कम नहीं, वहीं नए इलाकों में पैठ बनाने की भाजपा की योजना भी परवान न चढ़ सकी। इन चुनावी नतीजों के बाद फिलहाल कांग्रेस राहत तो महसूस कर सकती है, लेकिन कुछ नई चुनौतियों से भी उसे रूबरू होना पड़ेगा। पांचों राज्यों में सबसे अहम पश्चिम बंगाल में ममता लहर में कांग्रेस की नैया भी पार हो गई, लेकिन मंजिल पर भी उसका मुकद्दर दीदी ही लिखेंगी। महाजोट की ऐतिहासिक जीत के शोर में फिलहाल कांग्रेस की कमजोरियां और असफलताएं भी दब गई हैं। परमाणु करार के मुद्दे पर केंद्र की संप्रग सरकार को संकट में डालने वाले वामपंथियों का दुर्ग ढहाने का जश्न मनाने का कांग्रेस को पूरा हक है। हालांकि, सच्चाई है कि पिछली बार से दोगुनी सीटें लाने के बाद भी कांग्रेस की राज्य में कोई भूमिका नहीं बची है। ममता जहां अपने बूते सरकार बनाने में सक्षम हैं, वहीं कांग्रेस को केंद्र से लेकर पश्चिम बंगाल तक में तृणमूल पर आश्रित रहना पड़ेगा। इन हालात में ममता को काबू में रखना कांग्रेस के लिए लगभग नामुमकिन ही होगा। यह अजब सियासी सच्चाई है कि पश्चिम बंगाल में जहां संप्रग गठबंधन की प्रचंड जीत में कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, वहीं तमिलनाडु में गठबंधन की हार में भी उसकी जीत छिपी है। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता की जबर्दस्त जीत के बाद तमिलनाडु की प्रतिशोधात्मक राजनीति के इतिहास के मद्देनजर अब द्रमुक के लिए केंद्र सरकार का हिस्सा बने रहना उसकी मजबूरी होगी। हालांकि, तमिलनाडु की जनता से भ्रष्टाचार पर क्लीनचिट न मिलने को विपक्ष मुद्दा जरूर बनाता रहेगा। असम में अकेले दम पर सरकार बनाने की ताकत मिलना कांग्रेस के लिए उपलब्धि है, लेकिन केरल में थक-हारकर मिली सत्ता की टीस जीत की खुशी को फीका कर रही है। खासतौर से पूरे वाममोर्चा नेतृत्व द्वारा किनारे कर दिए गए बुजुर्ग वी.एस. अच्युतानंदन को परास्त करने में ही उसकी हालत खराब हो गई। ओमेन चंडी मुख्यमंत्री होंगे या कोई और, अभी यूडीएफ के भीतर यह जंग भी बाकी है। सरकार में शामिल होने पर कांग्रेस में ऊहापोह पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार में शामिल होने के मुद्दे पर कांग्रेस ऊहापोह में है। सरकार में शामिल होने का फैसला कांग्रेस ममता के प्रस्ताव और अपने विधायकों से विचार-विमर्श के बाद करेगी। कांग्रेस की कोर कमेटी की बैठक ने फैसला किया है कि प्रणब मुखर्जी शनिवार को कोलकाता जाकर ममता और अपने विधायकों से मुलाकात करेंगे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ विमर्श कर अंतिम फैसला लेंगे। दरअसल, ममता बनर्जी को मिले प्रचंड बहुमत ने कांग्रेस को सरकार में शामिल होने के मुद्दे पर भ्रमित कर दिया है। खुद ममता दो तिहाई बहुमत पा चुकी हैं। ऐसे में वह कांग्रेस को कितने और कौन से विभाग देंगी? संख्या और विभाग ग्रहण करने में कांग्रेस अपमानित नहीं होना चाहती।
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