देश का मुख्य विपक्षी दल होने के नाते भारतीय जनता पार्टी के सियासतदानों के बीच चल रही आपसी खींचतान और एक-दूसरे पर प्रत्यंचा चढ़ाने की निरर्थक कवायद न तो पार्टी के लिए शुभ कही जा सकती है और न ही देश के लिए यह संतोषजनक है। भारतीय जनता पार्टी को इस बात का अहसास होना चाहिए कि देश का जनमानस उसे संप्रग सरकार के विकल्प के तौर पर देख रहा है। कई राज्यों में उसकी स्वयं और गठबंधन की सरकारें भी चल रही हैं। ऊपर से संतोष वाली बात यह है कि इन सरकारों का प्रदर्शन कांग्रेस शासित राज्य सरकारों से बेहतर है। गुजरात की सरकार विकास का मॉडल पेश कर रही है तो बिहार में गठबंधन की सरकार सफलता का इतिहास रच रही है। ऐसे में उसके दो शीर्ष राजनेताओं के बीच कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को मंत्री बनाए जाने को लेकर पैदा हुआ विवाद उसकी साख को धक्का पहुंचाने वाला है। यह एक तथ्य है कि संप्रग सरकार के इशारे पर कर्नाटक राजभवन में आसन जमाए राज्यपाल हंसराज भारद्वाज एक अरसे से येद्दयुरप्पा सरकार को अस्थिर करने में जुटे हुए हैं, लेकिन उनकी चोंच सिर्फ इसलिए नहीं गड़ पा रही है कि येद्दयुरप्पा की सरकार बहुमत में है। यह ज्ञान रखते हुए भी अगर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार रेड्डी बंधुओं की आड़ में कर्नाटक विवाद को हवा देकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं तो यह न केवल निंदनीय है, बल्कि देर-सबेर इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना होगा। अक्सर भारतीय जनता पार्टी भ्रष्टाचार के मसले पर संप्रग सरकार को नैतिकता का मंत्रोच्चार सुनाती रहती है। राज्यपाल हंसराज भारद्वाज द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उलंधन किए जाने को मुद्दा बनाकर वह संप्रग सरकार पर हमलावर भी देखी जाती है। बचाव और प्रतिक्रिया में संप्रग सरकार भी कर्नाटक में आए दिन उठने वाले राजनीतिक बवंडर का हवाला देकर उसे घेरने में कोई कोताही नहीं करती है, लेकिन आश्चर्य तब होता है, जब खुद भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता ही पार्टी द्वारा लिए गए फैसले पर उंगलियां उठाना शुरू कर देते हैं। क्या यह विचित्र नहीं लगता है कि जिन मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी भारतीय जनता को घेरने का हरसंभव प्रयास कर रही है, उसका सुअवसर खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता ही उपलब्ध करा रहे हैं? पिछले दिनों लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने एक साप्ताहिक पत्रिका को दिए गए इंटरव्यू में कहा था कि कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने का निर्णय उनका नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा, राज्य के प्रभारी अरुण जेटली और अन्य नेताओं का था। सुषमा ने इस आरोप को गलत करार दिया कि उनके दबाव में ही रेड्डी बंधुओं को मंत्री बनाया गया था। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन सुषमा स्वराज के इस बयान ने भाजपा में वितंडा खड़ा कर दिया, जिसे लेकर उसका असहज होना स्वाभाविक है। आश्चर्य होता है कि ऐसे वक्त में जब पार्टी पांच राज्यों में हुए चुनाव में करारी चोट खाई हो और कर्नाटक में येद्दयुरप्पा सरकार जीवन-मरण से जूझ रही हो, फिर सुषमा स्वराज ने रेड्डी बंधुओं पर बयान देना इतना जरूरी क्यों समझा? क्या वाकई इस तर्क में दम है कि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार एक-दूसरे को नीचा दिखाकर आगे निकल जाना चाहते हैं? इसी तरह आजकल भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष गोपीनाथ मुंडे के बीच खटपट की भी खबरें हैं। यहां तक कि मुंडे के पार्टी छोड़ने इरादे भी जाहिर होने लगे थे। यह बात और है कि फिलहाल यह मामला थोड़ा शिथिल पड़ गया है। आज की तारीख में जब देश की संप्रग सरकार अपनी विश्वसनीयता लगातार खोती जा रही है, भाजपा के रणनीतिकारों का आपसी द्वंद्व निराशा पैदा करने वाला है। भाजपा को इस बात पर ध्यान टिकाना चाहिए कि जनता के बीच उसकी लोकप्रियता क्यों घट रही है? यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी ने सड़क से लेकर संसद तक संप्रग सरकार की नाकामियों का ढोल पीटने में अन्य राजनीतिक दलों की अपेक्षा अहम भूमिका निभाई है, लेकिन भाजपा के लिए यह त्रासदी ही कही जाएगी कि वह पांच राज्यों के चुनाव में इसका राजनीतिक फायदा उठाने में असमर्थ रही, जबकि चुनाव के दरम्यान भी भ्रष्टाचार और कालेधन का मसला जोरों पर था। आज भाजपा संप्रग सरकार पर हावी होने के बावजूद हल्के में दिख रही है। सिर्फ इसलिए कि उसके महारथी सरकार पर दबाव बनाने के बजाए अपनों को ही चित्त करने में जुटे हुए हैं। यह स्थिति भाजपा के लिए चिंता का विषय है।
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Wednesday, June 29, 2011
कलह के दौर में उमा की वापसी के मायने
आखिरकार संघ की त्योरियां चढ़ने के बाद उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो ही गई। इसमें कोई दो मत नहीं कि जमीन से जुड़ी इस नेता की वापसी से पार्टी को न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देश की सियासत में भी फायदा हो सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी में पहले से चल रही अंदरूनी कलह के बीच यह कहना मुश्किल है कि उमा भारती अपनी जिम्मेदारियों को किस तरह बखूबी निभा पाएंगी। नितिन गडकरी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह ऐलान किया था कि पार्टी छोड़कर जा चुके लोगों की वापसी होगी, लेकिन गुटबाजी के चलते उनकी यह घोषणा केवल बयानों में दर्ज होकर रह गई। उमा भारती की वापसी को लेकर पार्टी में पिछले कई सालों से चर्चा होती रही, लेकिन आपसी खींचतान के चलते उनकी वापसी पर अडं़गा लगाने वालों की कमी नहीं रही। मध्य प्रदेश भाजपा से लेकर आरएसएस तक में भी एक दो लोग ऐसे थे, जिन्हें यह लगता था कि अगर उमा भारती की वापसी हो गई तो उनके कई सिपहसालारों को नुकसान हो सकता है। बात चाहे पार्टी अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह की हो या फिर मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी की, अनुशासनहीनता और गुटबाजी के पीछे पार्टी का कमजोर नेतृत्व ही जिम्मेदार रहा है। उमा भारती को भले ही दिसंबर 2005 में अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था, लेकिन अनुशासनहीनता और गुटबाजी के दूसरे कई मामलों पर पार्टी नेतृत्व आंखें मूंदे रहा। जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता हाशिए पर आते गए और टेलीविजन चैनलों पर बौद्धिक उछल-कूद के खेल में माहिर कई नेता अपनी ही पार्टी के लोगों के बीच शह और मात का खेल खेलते रहे। इन नेताओं का न तो किसी प्रदेश की राजनीति में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन से लेना-देना रहा और न ही केंद्रीय राजनीति में ही ये लोग कोई कमाल दिखा सके। लेकिन 11 अशोक रोड पर ऐसे ही चेहरे चमकते दिखाई दिए। आंतरिक लोकतंत्र का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को मुखौटा कहने पर केएन गोविंदाचार्य को पार्टी से निष्कासित कर दिया था तो दूसरी तरफ झारखंड में भ्रष्टाचार का मसला उठाने वाले बाबूलाल मरांडी की बात को पार्टी ने अनसुना कर दिया था। पूर्व सांसद यदुनाथ पांडे को झारखंड में पार्टी का राज्य अध्यक्ष नियुक्त करने के फैसले पर बाबूलाल मरांडी ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई थी। मरांडी का कहना था कि इस फैसले में पार्टी ने उनसे और प्रदेश के कई नेताओं से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। आखिरकार मरांडी ने बीजेपी से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई। पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता बताया तो अगस्त 2009 में शिमला में हो रही भाजपा की चिंतन बैठक में जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उस वक्त राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। जसवंत सिंह को निकाले जाने का ऐलान करते वक्त राजनाथ सिंह के हाव-भाव कुछ इस तरह के थे, जैसे कोई शख्स अगर अपने ताकतवर पड़ोसी से नहीं लड़ सके तो अपने बच्चे का कान उमेठकर ही सारा गुस्सा निकाल दे। यह बात अलग है कि 25 जून 2010 को जसवंत सिंह की फिर से पार्टी में वापसी हो गई। दरअसल, बात उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, कल्याण सिंह, गोविंदाचार्य या फिर जसवंत सिंह को निकाले जाने या फिर उनके पार्टी छोड़कर जाने की नहीं, बल्कि किसी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन की है। उमा भारती ने पार्टी पर ऑफ द रिकॉर्ड प्रेस ब्रीफिंग करने का आरोप लगाया था, लेकिन आज तो ऑन रिकॉर्ड बातचीत में पार्टी के लोग एक दूसरे पर खुलकर निशाना साधने में लगे हैं। अभी कुछ दिनों पहले पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में इस बात से इनकार किया कि रेड्डी बंधुओं को कर्नाटक कैबिनट में जगह दिलाने में उन्होंने कोई भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं, सुषमा का यह भी कहना था कि जब रेड्डी बंधु मंत्री बने थे, उस वक्त अरुण जेटली कर्नाटक भाजपा के प्रभारी थे, जबकि वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्य में वरिष्ठ नेता थे। सुषमा स्वराज ने अपने साक्षात्कार में कहा कि इन लोगों के बीच आपस में क्या बातचीत हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं हैं। रेड्डी बंधुओं की सुषमा स्वराज से नजदीकी उस वक्त सामने आई थी, जब उन्होंने 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि इस पूरे मसले पर भारतीय जनता पार्टी ने सफाई देते हुए कहा कि पार्टी में किसी तरह का कोई मनमुटाव नहीं है। अपनी चिंतन बैठकों में भारतीय जनता पार्टी चिंतन कम और चिंता ज्यादा करती नजर आती है। दरअसल, आज पार्टी पूरी तरह बिखरी दिखाई दे रही है और पार्टी के बड़े नेता कई खेमे में पहले से ही बंटे हुए हैं। चिंतन बैठकों में अक्सर अनुशासन को अहमियत देने की बात कही गई, लेकिन दरअसल पार्टी में अनुशासन का सबक देने वाले खुद कितने अनुशासनशील हैं? क्या पार्टी के बड़े नेता खुद एक दूसरे की टांग खींचते नजर नहीं आते? हुगली वाले मामले में उमा भारती को मुख्यमंत्री पद से हटाने का फैसला जब सार्वजनिक नहीं किया गया था, उस वक्त पार्टी की ही एक बड़ी महिला नेता ने मीडिया के कुछ लोगों से बड़े ही भद्दे अंदाज में इसका ऐलान कर दिया था कि इसकी तो छुट्टी हो गई। सवाल भारतीय जनता पार्टी या उसके नेताओं के बीच आपसी मनमुटाव या रस्साकशी का नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल की सकारात्मक भूमिका का है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां अपने दल को आम जनता से जोड़कर देखने के बजाय कॉरपोरेट स्टाइल में कामकाज करती दिखाई दे रही है। कांग्रेस पार्टी इस कॉरपोरेट स्टाइल का सबसे बड़ा उदाहरण है और यही वजह है कि आज राज्यों में कांग्रेस पूरी तरह हाशिए पर आती जा रही है, लेकिन इन सबके बावजूद दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं का कहना रहा है कि चुनाव प्रबंधन से जीते जाते हैं। यह बात ठीक है कि आज कुछ राज्यों में भाजपा सरकारें अच्छा काम कर रही है, लेकिन अगर बात पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की हो तो उसके कामकाज का तरीका अब भी सवालों के घेरे में है। कांग्रेस की तरह यहां भी कुछ नेता पार्टी को कॉरपोरेट शैली में चलाने की कोशिश में जनाधार वाले नेताओं को दरकिनार करने में जुटे हैं। आज देश में एक सशक्त विपक्ष की जरूरत है, लेकिन आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी यह दायित्व बखूबी नहीं निभा पा रही है। कॉमनवेल्थ खेल से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम समेत कई घोटालों से घिरी कांग्रेस की अगुवाई वाली संप्रग सरकार के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार को घेरने में एक मजबूत विपक्ष के तौर पर भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नाकाम रहा है। भ्रष्टाचार, काले धन या लोकपाल के मसले को लेकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन को भले ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थन रहा हो, लेकिन पार्टी खुद अपनी तरफ से सरकार के खिलाफ कोई जनांदोलन नहीं खड़ा कर सकी। उमा भारती की वापसी भारतीय जनता पार्टी के लिए तभी कारगर सिद्ध होगी, जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर पूरी तरह लगाम कसने में कामयाब होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
भाकपा-माकपा का सफर
लेखक भाकपा और माकपा के विलय संबंधी विचार की सार्थकता पर संदेह जता रहे हैं…
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विलय क्या भारतीय राजनीति में डूबते साम्यवाद को त्राण दिला पाएगा? क्या वामपंथी विचारधारा वर्तमान समय में भारत का कोई कल्याण कर सकती है? क्या साम्यवादी दर्शन आज की बदलती परिस्थितियों में प्रासंगिक है? वस्तुत: पश्चिम बंगाल में चौंतीस सालों के अनवरत राज में बने लाल दुर्ग के ध्वस्त होने के बाद से मार्क्सवादी पार्टी सकते में है। केरल में माकपा नीत एलडीएफ चार सीटों के अंतर के कारण सत्ता से बेदखल हो गई। स्वाभाविक है कि वामपंथी विचारधारा को लेकर इस तरह का आत्ममंथन चल रहा है और इसी मंथन से दोनों दलों के एक बार फिर से एक होने का सुझाव भी आया है। भारत में आर्थिक और सामाजिक स्तर पर जो विरूपताएं हैं उसका सबसे बड़ा कारण साम्यवादी चिंतन ही है। वर्ष 1800 में विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत थी। ब्रितानी शोषण के चलते 1947 तक यह आंकड़ा दो प्रतिशत पर आ गया। भारतीय अर्थव्यवस्था को नेहरू के समाजवादी ढर्रे पर चलाने के प्रयास के कारण 1991 तक विश्व व्यापार में भारत का प्रतिशत 0.4 (अर्थात नगण्य) तक आ पहुंचा। अंतरराष्ट्रीय देनदारियों के लिए हमें अपना स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा और भारत, जो किसी समय सोने की चिडि़या कहलाता था को प्रत्येक आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के लिए जमाखोरी व कालाबाजारी से जूझना पड़ा। वामपंथियों के विकृत सामाजिक दर्शन के कारण जहां हिंदू समाज को जातियों में विभाजित करने का कुप्रयास किया गया, वहीं मजहब के नाम पर मुसलमानों का एकीकरण किया गया, जिसकी परिणति भारत के रक्तरंजित विभाजन व अलग पाकिस्तान में हुई। कम्युनिस्ट आंदोलन की सर्वाधिक अंतर्घाती भूमिका और अक्षम्य अपराध अलगाववादी ताकतों को प्रोत्साहन देना है। धर्म को जनता की अफीम पुकारने वाले कम्युनिस्टों ने जिन्ना को वे सारे तर्क-कुतर्क उपलब्ध कराए, जो एक अलग मजहबी राष्ट्र के लिए जरूरी थे। कम्युनिस्टों का यह आत्मघाती आचरण अनवरत जारी है। आज भी मुसलमानों के कट्टरवादी धड़े को कम्युनिस्टों का त्वरित समर्थन सहज प्राप्त हो रहा है। गुजरात दंगों के बहाने नरेंद्र मोदी, गुजरात और देश को कलंकित करने की मुहिम में लगी तीस्ता सीतलवाड, अरुंधति राय, मेधा पाटकर जैसी स्वयंभू सामाजिक कार्यकर्ता वामपंथी आभा से ही ग्रस्त हैं। केरल में मुस्लिम बहुल जिले-मल्लपुरम का सृजन कराने वाले मार्क्सवादियों को केरल के विधानसभा चुनाव में पराजय का स्वाद इसलिए भी चखना पड़ा, क्योंकि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानंद द्वारा की जा रही इस्लामी कट्टरवाद की आलोचना के साथ खुद को जोड़ नहीं पाया। भारत में साम्यवाद का इतिहास इस बात का गवाह है कि बीसवीं सदी के भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण क्षणों में कम्युनिस्टों ने भारी गलतियां कीं। कम्युनिस्टों ने भारत की अखंडता की बजाए उसे टुकड़ों में बांटे रखने की हर संभव कोशिश की। इसी कारण केएम अशरफ और हिरेन मुखर्जी जैसे कामरेडों ने भारत को राज्यों का संघ बनाने का सिद्धांत उछाला था। उन्होंने 15 अगस्त, 1947 को आजादी मिल जाने के बावजूद भारत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा और 1948 में भारतीय सेना के खिलाफ हैदराबाद के रजकरों को अपनी पूरी मदद दी। सैद्धांतिक तौर पर भारतपरस्ती और चीनपरस्ती के कारण माकपा दो फाड़ भले हुई हो, किंतु दोनों का इतिहास भारतीय संस्कृति के खिलाफ उनकी वैमनस्यता का गवाह है। माओ त्से तुंग के जन्मदिवस 26 दिसंबर, 1926 को शुरू हुए भारतीय कम्युनिस्ट दल का नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया रखा गया। यदि उन्हें अपने राष्ट्र पर गर्व होता तो वे इसका नाम इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी भी रख सकते थे। आजादी के बाद लोकतंत्र का हिस्सा बनना कम्युनिस्टों का स्वांग मात्र है। 1954 में कम्युनिस्ट नेता पी.राममूर्ति ने एक राष्ट्रीय मोर्चे के गठन की सलाह दी, जो पं. नेहरू की सरकार की प्रगतिवादी नीतियों को अपना समर्थन देती। सोवियत संघ और चीन समर्थक कम्युनिस्ट खेमे में से सोवियत प्रेमी कम्युनिस्ट नेहरू सरकार के नजदीक आने लगे। 1964 में मोहन कुमारमंगलम ने औपचारिक रूप से कम्युनिस्टों के कांग्रेस में शामिल होने की परंपरा शुरू की। यह अंतर्विरोधों का लाभ उठाते हुए वस्तुत: देश को कमजोर करने की साजिश का हिस्सा था। इंदिरा गांधी की सरकार में कुमारमंगलम जैसे कई मंत्री उनके नजदीकी सलाहकार थे। कम्युनिस्टों की घुसपैठ का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी था। न्यायपालिका और कार्यपालिका को सरकार के प्रति वफादार बनाने का विचार कम्युनिस्टों का ही था, जिसकी अंतिम परिणति आपातकाल के रूप में हुई। कुमार मंगलम, एचआर गोखले जैसे बुद्धिजीवी प्रतिबद्ध न्यायपालिका के साथ प्रतिबद्ध नौकरशाही की भी पुरजोर वकालत करते थे। (लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)
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