Showing posts with label पृष्ठ संख्या ९. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या ९. Show all posts

Wednesday, July 6, 2011

एक किंकर्तव्यविमूढ़ प्रधानमंत्री


अमूमन कुछ दूरी तय करने के बाद सरकारें ओजविहीन हो जाती हैं। थक-सी जाती हैं। दुनियाभर में ऐसा होता है। जिस उत्साह से सरकारें अपने क्रियाकलाप की शुरुआत करती हैं, धीरे-धीरे वह उत्साह घटता जाता है। जो वादे सरकारें करती हैं, वे बीती बात बनकर रह जाते हैं। जो योजनाएं सरकारें हाथ में लेती हैं, वे अंजाम तक नहीं पहुंच पातीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के बारे में यह स्पष्टीकरण सटीक बैठता है। मनमोहन सरकार की कोई दिशा ही नहीं है। ऐसे में यह सरकार राष्ट्र को कैसे दिशा प्रदान कर सकती है। अब जबकि यह सरकार अपने दूसरे कार्यकाल की लगभग आधी अवधि पूरी कर चुकी है, उसके अब तक के कार्यो के लेखा-जोखा से तो यही कहा जा सकता है कि यह नकारा सरकार है। विडंबना यह भी है कि केंद्र सरकार के खिलाफ कितना जनाक्रोश यह सरकार महसूस ही नहीं कर पा रही है। कम से कम अन्ना हजारे के आंदोलन और इसे मिल रहे जन समर्थन से संप्रग सरकार को समझ जाना चाहिए कि जमीनी स्तर पर देश की जनता किस कदर सरकार के खिलाफ है। अलबत्ता सरकार ने जनता के मूड को उस समय कुछ हद तक समझा और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के साथ लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए तैयार हो गई, लेकिन अब वह अपनी ओर से शर्ते थोपने पर आमादा हो गई है। इस बीच सरकार ने कैबिनेट में फेरबदल के भी संकेत दे दिए, लेकिन सिर्फ कैबिनेट में फेरबदल करने से भ्रष्टाचार का मुद्दा गायब नहीं हो जाता और न ही इससे जनता का आक्रोश कम हो जाएगा। देश की जनता को यह दिखना चाहिए कि भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार को यह भी स्पष्टीकरण देना होता कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए मौजूदा प्रणाली क्यों नहीं काम कर रही है। भ्रष्टाचार के मसले पर तो केंद्र सरकार की नाकामी जाहिर हो ही रही है, पिछले दिनों सुरक्षा के सवाल पर सरकारी लापरवाही भी सामने आई। दिल्ली के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले नार्थ ब्लॉक में स्थित वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के कार्यालय में कई जगह च्युंगम चिपके हुए मिले। यह भारत सरकार की समग्र सुरक्षा को मुंह चिढ़ाना नहीं है तो क्या है। विभागों में बदलाव भर से प्रधानमंत्री विभागों में दक्षता सुधार नहीं ला सकते और निर्णयों के क्रियान्वयन में तेजी भी नहीं लाई जा सकती। और हां, आप निष्ठा के बारे में क्या कर सकेंगे। व्यावहारिक तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधिकतर मंत्री किसी न किसी कॉरपोरेट घराने या कारोबार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में हम इन मंत्रियों से जनहितकारी कार्यो की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। अगर आप भ्रष्टाचार को छोड़ भी दें, जो आजादी के बाद से ही व्यापक रूप ले चुका है तो भी आपको प्रशासन में आलस्य और प्रमाद के असंख्य उदाहरण मिल जाएंगे। हो सकता है कि इसके पीछे भी एक उद्देश्य हो, संभवत: यह कि मंत्रियों और नौकरशाहों के बीच नापाक गठजोड़ पर परदा डालने का ही उपक्रम हो। दूसरी ओर सरकार इस भ्रांति से भी ग्रस्त लगती है कि सिर्फ सब्सिडी और निर्धनों को राहत देने वाली कागजी योजनाओं से आम आदमी प्रसन्न हो जाएगा। वास्तव में सरकारी योजनाएं भले ही कम हों, सब्सिडी भले ही ज्यादा न मिले, लेकिन इसका लाभ हरेक को मिलना चाहिए। आज यह सच किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी योजनाओं का आधा लाभ भी हर किसी को नहीं मिल पाता। मुझे जिस बात से अत्यधिक निराशा होती है, वह है प्रधानमंत्री की यह धारणा कि सरकार तो कहीं भी गलत नहीं है। उसकी छवि को मीडिया और कुछ हद तक न्यायपालिका से क्षति पहुंची है। अब सरकार को कौन समझाए कि इसका मौका तो उसके जनविरोधी कारनामों और सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने दिया है। सरकार का काला सच अगर मीडिया सामने नहीं लाएगा तो यह जिम्मेदारी कौन निभाएगा। न्यायपालिका भ्रष्ट तंत्र की खिंचाई नहीं करेगी तो उसकी भूमिका में कौन होगा। दरअसल, नौकरशाह और मंत्री जो बताते-सुझाते हैं, मनमोहन सिंह उस पर भरोसा कर बैठते हैं। वे जनता से कटे-से हैं और उसकी सोच के बारे में भी नहीं जान पाते या जानने की कोशिश नहीं करते। मनमोहन सिंह खुद नौकरशाह रहे हैं, उन्हें तो यह पता होना ही चाहिए कि प्रशासन को कैसे चुस्त-दुरुस्त किया जा सकता है। समय तेजी से गुजर रहा है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री यह महसूस ही नहीं कर पा रहे हैं कि यह वक्त सख्त और त्वरित फैसले लेने वाला है। उन्हें अब निश्चय पूर्वक कदम उठाना ही चाहिए। अपने पिछले कार्यकाल की तुलना उन्हें वर्तमान कार्यकाल से करनी चाहिए। गठबंधन के सहभागियों के दबाव के बावजूद वह अपनी राह पर चले हैं। सच है कि उनका कार्य निष्पादन उम्मीद से कम रहा है, लेकिन आज जैसी स्थिति तब नहीं थी। मौजूदा कार्यकाल में वह कुछ भी ठीक से करते हुए नहीं दिखते। यह तो समझ आता है कि वह अपने कार्यकाल को अनिश्चित-सा महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें 24 दलों को साथ लेकर चलना पड़ता है। अब वामदलों का पहले जैसा 60 के लगभग सदस्यों का कोई गुट भी नहीं है। बहरहाल, गठबंधन धर्म का यह तात्पर्य तो नहीं है कि अपनी सरकार के नुमाइंदों के भ्रष्टाचार को अनदेखा कर दिया जाए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के बीच जो पत्र व्यवहार हुआ था, वह दर्शाता है कि उन्हें कैबिनेट में द्रमुक सदस्यों के भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी थी। फिर भी इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं किया। मनमोहन सिंह को कम से कम द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि को रिझाने के बजाए उन्हें चेतावनी तो दे ही देनी चाहिए थी। सच है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही शर्ते तय करती हैं और वे द्वितीय कार्यकाल के प्रारंभ में ही गठजोड़ व्यवस्था को गड़बड़ाने की इच्छुक नहीं थीं। मूल्य वृद्धि भी एक गंभीर समस्या है। इसके निर्बाध बढ़ते जाने देने की जो स्थिति बनी है, उसमें कहीं न कहीं सरकार के स्तर से कोई भूल तो हुई ही है। यह कहकर कि मुद्रा स्फीति चिंता बढ़ा रही है, सरकार जनता के आक्रोश को शांत नहीं कर सकती। मुझे लगता है कि सरकार के सामने सतत बढ़ते मूल्यों से निपटने की कोई दूरदर्शी सोच ही नहीं है। जब यह स्पष्ट करने को कहा जाता है कि महंगाई इतनी बढ़ती जा रही है तो एक रटा-रटाया जवाब यह दिया जाता है कि हमारे पास जादू की कोई छड़ी नहीं है। यहां पहला सवाल तो यह है कि सरकार ने आखिर स्थिति को इतना बिगड़ने ही क्यों दिया? सरकार को यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह मांग और आपूर्ति का सवाल है। जिसकी आवश्यकता है, वह है उत्पादकता। उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार की कोई त्वरित योजना नहीं है। संभवत: सरकार ने यह मामला योजना आयोग को सौंप दिया है, जो हमें शुभ समय पर बताएगा कि क्या कदम उठाए जाने हैं। अब सरकार को कौन बताए कि तब तक मुद्रास्फीति और चढ़ चुकी होगी। क्या सरकार ने कभी अपने खर्चो में कटौती करने का प्रयास किया है? मैंने अब सरकारी क्षेत्रों में मितव्ययता शब्द ही अब नहीं सुना है। लगभग 75 प्रतिशत पेट्रोल और डीजल का उपभोग सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के अधिकरणों के केंद्र और राज्यों के वाहनों द्वारा ही किया जाता है। सरकार एक मंत्री या अति विशिष्ट व्यक्ति के साथ कारों और सुरक्षाकर्मियों के काफिले में कमी क्यों नही करती? मेरे विचार में भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी इस मामले में संवेदनशील रहे हैं। कम से दिल्ली में तो अपने सफर के दौरान उन्होंने कारों के काफिले और सुरक्षाकर्मियों की संख्या में कमी कर दी है। दरअसल, देश में सभी विपक्षी नेताओं को अपने पीछे चलने वाले वाहनों को सरेंडर कर देना चाहिए। सिर्फ एक वाहन को छोड़कर, जिसमें सुरक्षाकर्मी जाते हों। सरकार को शर्मसार करने का यह एक उपाय हो सकता है। बहरहाल, एक सरकार जो ओजविहीन-सी लगती हो, वह प्रधानमंत्री द्वारा कुछ संपादकों को संबोधित करने भर से अपनी गतिशीलता को प्रमाणित नहीं कर सकती। प्रधानमंत्री को अकसर परदे से बाहर आना चाहिए और राष्ट्र का सामना करना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं).

Wednesday, June 29, 2011

वादाखिलाफी की पराकाष्ठा


सरकार ने सिविल सोसाइटी से टकराव का जो रास्ता चुना है, वह सरकार और देश दोनों के लिए बहुत घातक होगा। दमन की राजनीति से किसी का भला नहीं होगा। एक के बाद एक कई घोटालों के कारण केंद्र सरकार पहले से ही सवालों के घेरे में है। बाबा रामदेव की मुहिम से निपटने के लिए दमन और बदले की कार्रवाई का सहारा लेकर सरकार अपनी साख को ही क्षति पहुंचा रही है। काले धन और भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई को लेकर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल इसलिए उठते हैं, क्योंकि कई मामलों में सरकार ने भ्रष्टाचारियों और दागी अधिकारियों का बचाव किया है। 2जी मामले में पूरी सरकार पहले राजा का बचाव करती रही, बाद में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर राजा को जेल जाना पड़ा। यह वही कपिल सिब्बल हैं, जिन्होंने कहा था कि 2जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई घपला और घोटाला नहीं हुआ है। मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को जिस तरह से केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय सही ठहराने की कोशिश में लगा हुआ था, उससे भी उसकी नीयत का पता चलता है। बाद में अदालत के आदेश पर ही पीजे थॉमस को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी और तब जाकर प्रधानमंत्री ने अपनी गलती मानी। हसन अली के मामले में भी सरकार ने कार्रवाई तब शुरू की, जब अदालत की फटकार पड़ी। पर अब वह फिर भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ शुरू हुई जंग को सांप्रदायिक तत्वों की साजिश बताकर कुचलना चाहती है। इसलिए उसने अन्ना हजारे के अनशन को भी जंतर-मंतर पर नहीं होने दिया और अब उसे भी सांप्रदायिक सिद्ध करने की कोशिश कर रही है। लेकिन अन्ना हजारे और उनकी टीम लोकपाल बिल के तहत जो मांग कर रही है, उसमें से एक मांग के बारे में खुद गृहमंत्री पी चिदंबरम ने माना था कि प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच का अधिकार लोकपाल का होना चाहिए। उन्होंने लोकपाल विधेयक के सरकारी मसौदे में प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कई मामलों में दी गई छूट को भी ज्यादा बताया था। चिदंबरम अपने ये विचार गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक तौर पर सरकार के सामने रख चुके हैं। अब वह इससे मुकर रहे हैं। इसलिए आज अगर नागरिक समाज को लोकपाल के लिए आंदोलन और अनशन करना पड़ रहा है तो इसके लिए राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जो संसद की सर्वोच्चता और पवित्रता की थोथी दुहाई दे रहे हैं। पिछले 42 साल में लोकपाल विधेयक का कानून का रूप न ले पाना यह बताता है कि राजनीतिक दलों ने संसद की शक्तियों को सही तरीके से इस्तेमाल करने के स्थान पर उसका दुरुपयोग किया। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार केंद्र की सत्ता संभालते समय लोकपाल विधेयक लाने का वचन दिया था। दरअसल, लोकपाल विधेयक के मामले में बार-बार की वादाखिलाफी का ही परिणाम है कि आम जनता यह महसूस कर रही है कि राजनीतिक दल लोकपाल का निर्माण करना ही नहीं चाहते। यदि अन्ना हजारे और उनके साथियों की मानें तो केंद्र सरकार अब भी एक सक्षम लोकपाल व्यवस्था के निर्माण में अड़ंगे डाल रही है। काला धन और भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जो आज भारतीय जनमानस को आंदोलित कर रहा है। अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव तो उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बन चुके हैं। उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। सरकार जिस टकराव के रास्ते पर जा रही है, उससे उसकी अधिनायकवाद की प्रवृत्ति का संकेत मिल रहा है। लोकतंत्र में जनता ने यदि आप को चुनकर भेजा है और आप सत्ता में हैं तो लोगों के लिए रोटी-पानी का इंतजाम कीजिए। भ्रष्टाचारियों और कालेधन के खातेदारों को जेल भेजिए। यदि लोगों की बात लोकतांत्रिक तरीके से नहीं सुनी जाती है और दमन के सहारे दबाने की कोशिश की जाएगी तो समाज में ऐसी अव्यवस्था और अराजकता फैल सकती है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं होगा। आतंकवादी और नक्सली हिंसा के दौर से गुजर रहे इस देश के लिए यह जरूरी है कि सरकार जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और आन्दोलन का दमन न करके उनकी बात को सुने। भ्रष्टाचारियों एवं काले धन के खातेदारों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई करे, जिससे जनता का सरकार पर विश्वास और भरोसा बढ़े। पर जब भी विदेश में जमा काले धन पर चर्चा होती है तो सरकार कानूनी पेचीदगियां और अपनी असमर्थता की बात करने लगती है। इससे यही संदेश जाता है कि सरकार अपराधियों को बचा रही है।


संप्रग के बड़बोले मंत्री


तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता माया और मुलायम की तरह नहीं हैं, जो बिना मांगे समर्थन देने के लिए होड़ मचाए रहते हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री से मिलने के बाद जयललिता का गृहमंत्री पी चिदंबरम पर सधा हुआ वार करना अपने पुराने हिसाब को चुकता करने की तैयारी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि 2009 लोकसभा चुनाव में चिदंबरम ने धोखाधड़ी कर चुनाव जीता है। जयललिता का यह हमला भले ही सरकार और विपक्ष के राजनीतिक धुरंधरों को अचंभित करता हो, लेकिन उनके द्वारा सियासी शतरंज की बिसात पर चला जाने वाला हर दांव उनकी झोली को भरने वाला ही होता है। तमिलनाडु में करुणानिधि को बेदखल करने के बाद अब वह दिल्ली से भी उनका पत्ता साफ कर देना चाहती हैं। जयललिता ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में चिदंबरम के बने रहने को लेकर भी सवाल उठा दिया है। जयललिता की मानें तो चिदंबरम को गलत तरीके से गत लोकसभा चुनावों में विजयी करार दिया गया है। आज की तारीख में यह मामला न्यायालय में है। अपने बचाव में चिदंबरम ने जयललिता के आरोप को बेबुनियाद बताया और इसे न्यायालय की अवमानना तक कहा है, लेकिन जयललिता ने चिदंबरम के खिलाफ बयानबाजी कर उनके खिलाफ माहौल तैयार कर दिया है। अवसर की ताक में जुटी भाजपा ने भी गृहमंत्री को अपने निशाने पर ले लिया है। उसने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में उन पर धन खाने का गंभीर आरोप लगाया है। भाजपा ने मीडिया के हवाले से आरोप लगाया है कि तिहाड़ जेल में बंद पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा ने एक कॉरपोरेट लॉबिस्ट से कहा था कि स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदंबरम ने काफी धन लिया है। जयललिता और भाजपा दोनों ही एक सुर में चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहे हैं। विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष के सहयोगी दलों को भी पी चिदंबरम फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं। उनका बड़बोलापन और कार्य करने का शाही अंदाज सरकार के अन्य नुमाइंदों को बिल्कुल ही रास नहीं आ रहा है। सरकार में बैठे लोगों को लग रहा है कि चिदंबरम के बड़बोलेपन से समाज में अच्छा मैसेज नहीं जा रहा है। पिछले दिनों आतंकवाद के मसले पर उन्होंने जिस तरह भगवा आतंकवाद का जुमला उछालकर हिंदू समाज की घेराबंदी की, उससे उनकी छवि बिगड़ी है। सरकार के कई नुमाइंदों ने भी भगवा रंग से आतंकवाद को जोड़े जाने पर अपनी नाराजगी जताई। चिदंबरम की बची-खुची साख को रामलीला मैदान में घटी हिंसक घटना ने चौपट कर दिया। माना जा रहा है कि उन्हीं के इशारे पर सत्याग्रहियों पर लाठियां तोड़ी गई। गृहमंत्री के तौर पर चिदंबरम प्रधानमंत्री से यह कहलवाने में भले ही सफल रहे हों कि इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं था, लेकिन सरकार अब भी डरी हुई है। गृहमंत्री की नाकामी की यह कोई पहली बानगी नहीं है। अभी पिछले दिनों ही पाकिस्तान को भेजी गई 50 वांछित आतंकियों-अपराधियों की सूची में शामिल दो आतंकियों की भारत में मौजूदगी को लेकर सरकार की तो नाक कटी ही, गृहमंत्री की भी खूब फजीहत हुई। लेकिन गृहमंत्री तो ठहरे चिकना घड़ा। वह अपनी नाकामी का ठीकरा किसी और के सिर फोड़ते देखे गए। विकिलीक्स ने भी गृहमंत्री की राजनीतिक गंभीरता की पोल खोलकर रख दी है। विकिलीक्स ने खुलासा किया कि भारत में अमेरिका के तत्कालीन राजदूत टिमोथी रोएमर से चिदंबरम ने कहा था कि अगर केवल दक्षिण और पश्चिम भारत होते तो भारत कहीं अधिक वृद्धि दर हासिल करता, क्योंकि देश के शेष भाग ने वृद्धि को रोक रखा है। विकास की अतार्किक अवधारणा और बुनियादहीन आर्थिक सिद्धांतों के अंध पैरोकार चिदंबरम की इस देशतोड़क चुगली ने उनकी ठग मानसिकता के सच को उजागर कर दिया। पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर बम विस्फोट की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। खुफिया तंत्र की नाकामी के कारण ही एक बार फिर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठन सिर उठाने लगे हैं। हो सकता है कि कल गृहमंत्री को इसमें भी भगवा रंग देखने को मिल जाए। संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु की फांसी में हो देरी के लिए शीला सरकार को दोषी ठहराने वाले गृहमंत्री अब क्यों इस मसले पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि फाइल उनके मंत्रालय में पहुंच चुकी है। बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी नाकामियों के बाद भी क्या गृहमंत्री अपने पद पर बने रहेंगे? संभावना कम ही लगती है। जिस दिन दस जनपथ को जयललिता की अदा भा गई, चिदंबरम की आहुति तय है।


चौतरफा घिरते चिदंबरम


हमारे माननीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के अधीन काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने 4-5 जून की रात्रि रामलीला मैदान में स्वामी रामदेव और उनके समर्थकों पर हुई कार्रवाई को न्यायोचित ठहरा रही है। उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत अपने शपथ पत्र में दिल्ली पुलिस ने कहा है कि उसने किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं किया, केवल आंसू गैस के गोले छोड़े। उस रात की घटना का जो भी फुटेज उपलब्ध है, उसे देखने वाले लाखों देशवासी सच जान चुके हैं। लाठी चार्ज की तकनीकी परिभाषा अपनी जगह है, लेकिन उतनी भारी संख्या में पुलिस बलों द्वारा रामलीला मैदान से लोगों को हटाने के दौरान लाठियां भांजते, चलाते, मारते, सामान उठाकर तोड़ते फाड़ते, फेंकते साफ देखा जा सकता था। जितनी बड़ी संख्या में पुलिस मंच की ओर चढ़ती दिख रही थी, उससे कोई भी आम नागरिक भयभीत हो सकता था। अगर हिंसा हुई ही नहीं तो फिर उतने लोग घायल कैसे हुए? बल प्रयोग नहीं हुआ तो लोग अपना सामान तक छोड़कर वहां से भागने पर क्यों मजबूर हुए? अगले दिन वहां लोगों के आम उपयोग के सामानों के ढेर किस बात के गवाह थे? लेकिन चिदंबरम के मातहत काम करने वाली पुलिस से हम इससे अलग व्यवहार और जवाब की उम्मीद कर भी नहीं सकते। वास्तव में यह सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र देकर अपनी बर्बरता और गैर लोकातांत्रिक कार्रवाई को सही ठहराने का एक शर्मनाक प्रसंग है। हालांकि पुलिस और गृह मंत्रालय को इस बात का जवाब देना शेष है कि अगर रामदेव ने योग की अनुमति लेकर अनशन करते हुए कानून तोड़ा या पांच हजार की संख्या की जगह उसके आकलन में 20 हजार लोगों को एकत्रित किया तो कार्रवाई 1 बजे रात के बाद क्यों की गई और मैदान खाली करने के लिए केवल 80 मिनट का समय क्यों दिया गया? उच्चतम न्यायालय सरकार और पुलिस से निपटने में सक्षम है और वहां से इनके जवाबों का प्रत्युत्तर मिलेगा, लेकिन देश के आम नागरिक को यह अधिकार तो है ही कि वह अपने गृहमंत्री की भूमिका का मूल्यांकन कर उनका भविष्य तय करे। इस दृष्टि से विचार करें तो यह साधारण हैरत की बात नहीं है कि तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा चिदंबरम के इस्तीफे की मांग के बाद देश का ध्यान उनकी नाकामियों, गलतियों, पापों, अपराधों की ओर गया है। जयललिता का आरोप है कि चिदंबरम पिछले लोकसभा चुनाव में हार गए थे, लेकिन गलत तरीके से उन्हें विजीत घोषित किया गया। चुनाव परिणामों पर नजर रखने वालों को याद होना चाहिए कि ज्यादातर समाचार चैनलों पर उनके हारने की खबर आ गई थी। लगातार उनके हारने का टिकर चलता रहा, लेकिन बाद में खबर आई कि वे 3,354 मतों से जीत गए। उनके क्षेत्र शिवगंगा में अन्नाद्रमुक के लोग अपने उम्मीदवार राज कन्नप्पन की विजय का जश्न मनाना शुरू कर चुके थे। उनकी विजय पुनर्गणना के बाद हुई और मद्रास उच्च न्यायालय में इसके विरुद्ध याचिका लंबित है। चिदंबरम ने इसी याचिका को आधार बनाते हुए जया को न्यायायल की अवमानना का दोषी करार दिया। वस्तुत: यह न्यायालय की अवमानना का भय दिखाकर लोगों का मुंह बंद करने की रणनीति है। न्यायालय की अवमानना मूलत: उसके फैसले के विरुद्ध टिप्पणी या उसके आचरण पर प्रश्न उठाने से होती है। उनके इस्तीफे की मांग में न्यायालय की अवमानना का प्रश्न कतई निहित नहीं है। इसके अलावा चिदंबरम के विरुद्ध ऐसे भी मामले हैं, जिनमें वे न्यायालय का नाम लेकर आम नागरिकों का मुंह बंद नहीं करा सकते। थोड़ा पीछे लौटिए और विकिलीक्स के खुलासे को याद करिए। उसमें अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के अधिकारी ने यह संदेश भेजा था कि चिदंबरम ने चुनावों में मतदाताओं तक रुपये पहुंचाए। संदेश के अनुसार यह भूमिका उनके पुत्र ने निभाई। तमिलनाडु चुनाव में मतदाताओं को घूस देने के प्रचलन से पूरा देश परिचित है। विकिलीक्स को चिदंबरम किस न्यायालय की अवमानना का दोषी मानेंगे? अगर न्यायालय के प्रति चिदंबरम के मन में इतना ही सम्मान है तो मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला आने तक उन्हें मंत्री पद से स्वयं अलग हो जाना चाहिए, लेकिन न चिदंबरम में इतना नैतिक साहस है और न मनममोहन सिंह सरकार में इतना आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बचा है कि कोई दूसरा उनसे ऐसा करने के लिए कहे। जरा सोचिए, पाकिस्तान को सर्वाधिक वांछित खूंखार आतंकियों एवं अपराधियों की गलत सूची प्रदान करने के लिए केवल सीबीआइ के कुछ निचले स्तर के अधिकारी ही दोषी हैं या हमारे गृहमंत्री भी? ऐसा भारत में और मनमोहन सिंह सरकार के अंदर ही संभव है कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेवार व्यक्ति के मंत्रालय से इतनी बड़ी गलती हो गई, जिसकी भरपाई तक कठिन है, लेकिन उसके ऊपर कोई प्रश्न तक नहीं उठा। इससे देश की साख को ही केवल बट्टा नहीं लगा, भारत में जारी आतंक की जड़ें पाकिस्तान में हैं, इसे साबित करने का अभियान भी कमजोर पड़ा। पाकिस्तान ने सूची खारिज कर दी। अगर आप नई सूची देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि वांछितों की पूरी सूची दोषपूर्ण थी। कांग्रेस के अंदर भी इस पर सुगबुगााहट हुई, लेकिन चिदंबरम जैसे 10 जनपथ एवं मनमोहन सिंह के विश्वासपात्र के खिलाफ कौन सवाल उठाए! किंतु चिदंबरम के चारों ओर धीरे-धीरे घेरा बढ़ रहा है। यह स्थिति आसानी से किसी के गले नहीं उतरती कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के आरोप में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा तो जेल में रहें और उस समय के वित्तमंत्री पर कोई आंच नहीं आए। अगर 2जी स्पेक्ट्रम का 2001 के मूल्यों पर आवंटन भ्रष्टाचार है और इससे सरकारी खजाने को जानबूझकर निजी लाभ के लिए हानि पहुंचाई गई तो इसमें वित्तमंत्री की भूमिका क्यों नहीं हो सकती। राजा के साथ चिदंबरम की इस मुद्दे पर कई बैठकें होने का प्रमाण है। बुद्धिमान होने के कारण उन्होंने केवल अपनी खाल बचाने के लिए पत्रों में अपने लिखित मंतव्य अंकित किए। सुब्रमण्यम स्वामी ने उच्चतम न्यायालय में उनका नाम भी आरोपियों में शामिल करने के लिए विशेष याचिका दायर की हुई है। नीरा राडिया और ए. राजा का टेप जिनने भी सुना होगा, उसमें चिदंबरम को धन दिए जाने की बात साफ तौर पर कई बार कही जा रही है। उनको सीधे या परोक्ष धन मिला या नहीं, इस बारे में भले अंतिम राय नहीं बनाई जा सकती, लेकिन टेप के आधार पर जांच तो होनी चाहिए। क्या सीबीआइ या केंद्रीय सतर्कता आयुक्त देश के गृहमंत्री के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर सकती है? 2जी से बाहर निकलिए तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट का जो अंश लीक हुआ है, उसमें कहा गया है कि रिलायंस उद्योग का कृष्णा गोदावरी बेसिन में अनुचित समर्थन किया गया। इसके अनुसार वर्ष 2004-2006 के बीच मुकेश अंबानी के रिलायंस उद्योग को कृष्णा गोदावरी बेसिन के विकास के नाम पर अनुचित लाभ दिया गया और इस बीच नियमों में उसके अनुकूल लगातार परिवर्तन किया गया। इसमें वित्त मंत्रालय एवं पेट्रोलियम मंत्रालय दोनों की भूमिका थी। कैग रिपोर्ट के अनुसार तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग द्वारा गैस के निर्धारित मूल्य प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट 1.80 अमेरिकी डॉलर की जगह 4.20 डॉलर करने के निजी कंपनियों के प्रस्ताव से सहमति जताना गलत था। चिदंबरम वित्तमंत्री होने के साथ मंत्रियों के उस समूह के सदस्य भी थे, जिसने इस प्रस्ताव को हरी झंडी दी। मूल्य बढ़ाने से केवल निजी कंपनियों को फायदा हुआ व सरकारी खजाने को चपत लगी। इस प्रकार मनमोहन सिंह सरकार के रत्न माने जाने वाले चिदंबरम के पीछे गहरा स्याह काफी घना हो चुका है। देश यह न भूले कि आम आदमी के महंगाई के आग में झुलसने की प्रक्रिया चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते हुए ही हुई थी। वे ऐसे वित्तमंत्री थे, जो चीजों का नाम लेकर उत्पादकों-निर्माताओं से दाम घटाने की अपील करते थे और बाजार में दाम बढ़ते जाते थे। उस बीच शेयर बाजार में हुए घपलों की यहां याद दिलाने की आवश्यकता नहीं। बहरहाल, चिदंबरम का मंत्री बने रहना मनमोहन सरकार पर एक और ऐसा काला गहरा धब्बा होगा, जिसे धो पाना उसके लिए कतई संभव नहीं होगा। इसका एकमात्र समाधान चिदंबरम की मंत्रिमंडल से छुट्टी ही हो सकती है। ऐसे व्यक्ति के हाथों गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग की बागडोर रहना देश के लिए भी ठीक नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)