हिसार के संसदीय उपचुनाव में मुद्दों पर फिलहाल जातिगत समीकरण हावी दिख रहे हैं। इस त्रिकोणीय मुकाबले में तीनों प्रमुख प्रत्याशी चुनावी प्रचार में विकास और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं, लेकिन वास्तव में जाति के अंडर करेंट का बोझ सब पर भारी है। दो दिग्गज जाट प्रत्याशियों के मैदान में होने से उनका वोट लेने की दौड़ तो है ही, लेकिन यहां दूसरी बिरादरी के मतदाताओं का रुख और ज्यादा अहम है। यही कारण है कि तीनों प्रमुख उम्मीदवार जातिगत समीकरणों को साधने में जुटे हैं। भजनलाल के निधन से खाली हुई इस सीट पर मुख्य मुकाबला उनके बेटे और हजकां-भाजपा उम्मीदवार कुलदीप विश्नोई, इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अजय चौटाला और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश बरवाला के बीच सिमटा हुआ है। मतदान 13 अक्टूबर को है, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से लेकर ओम प्रकाश चौटाला समेत सभी दिग्गजों की आवाजाही से हिसार का की आबो-हवा पूरी तरह से सियासी रंग से सराबोर है। यह चुनाव दरअसल, कुलदीप विश्नोई और अजय चौटाला की भविष्य की सियासत के लिए अहम है, वहीं इनेलो और हजकां के बीच चौधर या दबदबे की लड़ाई भी है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जयप्रकाश बरवाला उर्फ जेपी के साथ-साथ हरियाणा सरकार की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। यही कारण है कि खुद मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपनी कैबिनेट के साथ यहां डेरा डाले हैं तो ओम प्रकाश चौटाला, अभय चौटाला और उनकी नई पीढ़ी दिग्विजय और दुष्यंत चौटाला भी हिसार में जम गए हैं। कुलदीप विश्नोई का तो यह गृह क्षेत्र है और वह खुद को भजनलाल का वारिस साबित कर गैर जाट वोटों के बीच अपनी जगह बनाने की पूरी मशक्कत कर रहे हैं। सुषमा स्वराज जैसे भाजपा के शीर्ष नेता भी उनके समर्थन में आएंगे, इससे पहले स्थानीय नेता माहौल तैयार करने में जुटे हैं। हिसार के करीब 12 लाख 50 हजार मतदाताओं में सबसे ज्यादा करीब 4.40 लाख वोट जाट बिरादरी का है। ऐसे में बाकी आठ लाख से ज्यादा वोटों के बीच पैठ बनाने की ज्यादा होड़ है। इनमें सबसे ज्यादा करीब 16 फीसदी यानी करीब सवा दो लाख दलितों का रुख बेहद अहम है। इसके अलावा पंजाबी, ब्राह्मण, वैश्य, यादव, विश्नोई, कुम्हार आदि के वोट बेहद अहम हैं। सभी प्रत्याशियों ने अपने चुनाव क्षेत्र के प्रभारियों की नियुक्ति में उस क्षेत्र विशेष के जातीय समीकरणों का ध्यान रखते ही वहां अपने प्रतिनिधि नियुक्त किए हैं।
Showing posts with label पृष्ठ संख्या ४. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या ४. Show all posts
Friday, September 30, 2011
उपचुनाव में ममता की शानदार जीत
राज्य के दो विधानसभा उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस की शानदार जीत हुई है। भवानीपुर विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 54 हजार 213 वोटों से विजयी हुई हैं। यहां से माकपा की नंदिनी मुखर्जी को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा। उन्हें 19 हजार 442 वोट पाकर ही संतोष करना पड़ा। ममता को 73 हजार 635 वोट मिले। बसीरहाट उत्तर से तृणमूल कांग्रेस के एटीएम अब्दुल्ला ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सुबेदअली गाजी को 30 हजार 941 वोटों से हराया। तृणमूल कांग्रेस यह सीट माकपा से छीनने में सफल रही। माकपा विधायक मुस्तफा बिन कासिम की मौत से यह सीट रिक्त हुई थी। मुख्यमंत्री के लिए परिवहन मंत्री सुब्रत बक्शी के विधायक पद से इस्तीफा देने के कारण भवानीपुर सीट रिक्त हुई थी। ममता को अपने क्षेत्र में जीतने पर किसी को शक-संदेह नही था, लेकिन जीत के अंतर को लेकर अटकलों का बाजार गरम था। बक्शी ने पिछली बार माकपा के नारायण जैन को 49 हजार से कुछ अधिक वोटों से हराया था। ममर्ता बक्शी की तुलना में कितनी अधिक वोट से जीतती हैं, इस पर ही तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे। बारिश के कारण भवानीपुर में मतदान की गति धीमी होने के कारण तृणमूल कांग्रेस नेताओं की चिंता बढ़ी थी। खुद ममता बनर्जी भी मतदान के समय प्रतिकूल मौसम को लेकर कुछ विचलित हुई थीं, लेकिन चुनाव नतीजा उम्मीद से बेहतर हुआ। उन्होंने 79.13 प्रतिशत वोट पाकर जीतने का रिकार्ड बनाया। विधानसभा उपचुनाव में भी वाममोर्चा को करारा झटका लगा। विधानसभा में वाममोर्चा की सीटें घटकर 63 हो गई। केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भवानीपुरा विधानसभा सीट पर जीत दर्ज करने के लिए बधाई दी और इसे एक बड़ी जीत करार दिया। प्रणब दा ने कहा कि उपचुनाव में ममता को मिली 54 हजार मतों से अधिक की जीत उनकी सरकार के अब तक के फैसलों पर जनता के समर्थन की मुहर है।
जिलों की बिसात पर जातीय वोटों की चाल
पश्चिमी उप्र में चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में करने को अगर बसपा सरकार ने तीन नये जिलों के गठन की घोषणा की तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। दरअसल वोटों की जुगत में सूबे में नये जिलों के गठन का खेल अब पुराना हो चुका है। इसे सूबे की सियासत में गठबंधन युग की देन माना जाता है। शायद यही वजह है 1994 से अब तक राज्य में 20 जिले बढ़ चुके हैं। यह सिलसिला थमने वाला भी नहीं है। अलग-अलग इलाकों से नये जिलों के गठन की मांग उठ रही और राजनीतिक दल उन्हें अपनी सरकार आने पर अमली जामा पहनाने का वादा कर रहे हैं। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल के करीब एक वर्ष बाद मुख्यमंत्री मायावती ने एटा जिले के एक हिस्से को अलग कर 15 अप्रैल 2008 को बसपा के संस्थापक कांशीराम के नाम पर कांशीराम नगर बनाया था। इस पर प्रमुख विपक्षी दल सपा ने यह कह कर आपत्ति जताई थी कि कांशीराम का उस क्षेत्र से कोई लेना देना नहीं रहा है। मायावती ने दलित राजनीति में उनके योगदान का जिक्र करते हुए इस कदम के जरिए वोट बैंक को पुख्ता करने की कोशिश की थी। बीते वर्ष एक जुलाई को छत्रपति साहूजी महराज नगर नाम से बने सूबे के 72वें जिले का मामला भी खासा विवादित रहा। मायावती जब 2003 में मुख्यमंत्री थीं, तब उन्होंने यह जिला बनाया था और उस समय विपक्ष ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि अमेठी का एतिहासिक महत्व है। इसे देखते हुए जिले का नाम अमेठी ही रखा जाए। उसी साल सत्ता बदल गई। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए और उन्होंने नवम्बर 2003 में छत्रपति शाहू जी महाराज के नाम से जिले के गठन की अधिसूचना को निरस्त कर दिया। इस मामले में कोर्ट के फैसले के आधार पर पिछले साल नये सिरे से छत्रपति शाहूजी महाराज जिले का गठन किया गया। मायावती ने पहले मुख्यमंत्रित्वकाल में वर्ष 1995 में उधम सिंह नगर और अंबेडकरनगर को नया जिला बनाया था। उधम सिंह नगर अब उत्तराखंड में है। फैजाबाद से काट कर बनाए गए अंबेडकरनगर जिले पर भी सपा ने खासा एतराज जताया था। सपा की मांग थी कि समाजवादी चिंतक डा. राममनोहर लोहिया की जन्मस्थली होने के कारण उसका नाम लोहिया पर होना चाहिए। वैसे मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में 1994 में कुशीनगर व संत रविदास नगर और 1995 में महोबा के नाम से नया जिला बनाया था। संत रविदास नगर के मुख्यालय को लेकर खासा विवाद छिड़ा था। मायावती ने सर्वाधिक जिले दूसरे शासनकाल में बनावाए। वर्ष 97 में उन्होंने कौशाम्बी, ज्योतिबा फूलेनगर, महामायानगर (हाथरस), चंदौली, गौतमबुद्धनगर, श्रावस्ती, संतकबीरनगर, औरैया, बागपत व कन्नौज को जिला बनावाया। यही नहीं उन्होंने सहारनपुर, मिर्जापुर व बस्ती मंडल का सृजन भी किया था। बाद में मुलायम सरकार ने बागपत व कन्नौज को छोड़कर बाकी सभी को समाप्त कर दिया। मामला कोर्ट में पहुंचा। उसने इसे विभेदकारी करार देते हुए बसपा सरकार के फैसले पर मुहर लगाई। मजबूरन सपा सरकार को इन जिलों और मंडलों को बहाल करना पड़ा।
Wednesday, June 29, 2011
राजद-लोजपा में बढ़ने लगी दूरियां
बिहार में करीब दो साल तक गठबंधन की राजनीति करने के बाद राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी की दूरियां बढ़ने लगी है। पूर्णिया उपचुनाव में समर्थन के सवाल पर भी दोनों दलों में मतभेद उभरे हैं। राजद माकपा को समर्थन दे रही है, तो लोजपा कांग्रेस को। राजद-लोजपा के गठबंधन में दरार को केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार की अटकलों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। लालू व रामविलास दोनों के ही मंत्रिमंडल में शामिल होने की चर्चा है। कांग्रेस के लिए रामविलास की उपयोगिता तो है। अगले साल उत्तर प्रदेश चुनाव में मायावती के मुकाबले पासवान का इस्तेमाल वह कर सकती है। बिहार के कांग्रेसी भी रामविलास से तालमेल तो चाहते हैं पर लालू प्रसाद से नहीं। दोनों दलों में दूरियां बढ़ने का एक कारण यह भी है। अररिया के फारबिसगंज पुलिस फायरिंग को लेकर भी दोनों दलों एप्रोच में अंतर है। पुलिस फायरिंग का यह इलाका लोजपा विधायक जाकिर हुसेन के प्रभुत्व का है। शायद इसी वजह से फायरिंग की घटना को जिस आक्रामक तरीके से लोजपा ने उठाया वैसा राजद ने नहीं किया। बिहार विधानसभा के 2005 में हुये चुनाव में हार के बाद दोनों दलों ने 2009 का लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा। इसमें गठबंधन को कोई खास सफलता नहीं मिली पर कुछ महीने बाद हुये उपचुनाव में गठबंधन को अच्छी कामयाबी मिली। इससे उत्साहित दोनों दल के नेताओं ने गत नवंबर का विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ा। इस विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद दोनों दलों ने चुप्पी साध रखी थी। 3 जून को अररिया में पुलिस फायरिंग ने विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका दे दिया। पासवान और नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी 6 जून को साथ साथ घटना स्थल पर गए। पर बाद में राजद का रूख पुलिस फायरिंग पर नर्म पड़ता गया। इस घटना पर लोजपा के तेवर आज भी हमलावर है। वह इसे हरसंभव भुनाने की कोशिश कर रही है। इस बहाने वह अल्पसंख्यकों को एनडीए से दूर करने की कोशिश में लगी है। इसी बीच पूर्णिया विधानसभा के उपचुनाव में समर्थन को लेकर दोनों दलों में मतभेद उभर कर सामने आया। राजद ने माकपा को समर्थन देने की घोषणा कर दी। प्रदेश राजद अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे के मुताबिक कांग्रेस ने उनसे समर्थन मांगा नहीं। माकपा ने समर्थन मांगा तो हमने इसकी घोषणा कर दी। रामविलास पासवान ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया। लोजपा का तर्क था कि कांग्रेस प्रत्याशी गत चुनाव में दूसरे स्थान पर थे। लोजपा का कहना है कि जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव में राजद कांग्रेस को बिना मांगे समर्थन दे सकती है तो पूर्णिया में क्यों नहीं।
गोरखालैंड पर त्रिपक्षीय समझौता चाहती हैं ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गोरखालैंड मसले के समाधान के लिए केंद्र के साथ त्रिपक्षीय समझौता करना चाहती हैं। राज्य सरकार और गोरखा मुक्ति मोर्चा के बीच हुए समझौते से गठित नई पर्वतीय परिषद को जहां ताकत मिल जाएगी, वहीं उसे अधिक स्वायत्तता मिल जाएगी। ममता बनर्जी ने उम्मीद जताई की इसी समझौते से वहां के विकास को गति मिल जाएगी। ममता बनर्जी ने मंगलवार को यहां प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा गोरखालैंड उनका ड्रीम लैंड है, जिसे हम स्विट्जरलैंड बनाना चाहते हैं। वहां के विकास के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए उन्होंने कहा कि वह उसे स्विट्जरलैंड बनाएंगी। दार्जिलिंग के विकास के लिए हर संभव उपाय किए जाएंगे। ममता बनर्जी ने पर्वतीय क्षेत्र के साथ जंगल महल क्षेत्र के विकास को भी प्राथमिकता देने के अपने वादे को पूरा करने का संकल्प दुहराया। भूमि अधिग्रहण विधेयक की राह में रोड़ा बनती आ रही ममता बनर्जी ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह नहीं चाहती हैं कि किसी किसान की जमीन का अधिग्रहण उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन किया जाए। पश्चिम बंगाल की बेहाली की चर्चा करते हुए उन्होंने पूर्ववर्ती वाम सरकार की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा कि आर्थिक अनियमितताओं की जांच के लिए स्पेशल ऑडिट के साथ श्वेत पत्र भी जारी किया जाएगा। ताकि राज्य की जनता को उनकी पूर्ववर्ती सरकार की करतूतों का पता चल सके। राज्य की प्रशासनिक प्रणाली के बारे में पूछे सवाल पर ममता ने कहा कि वामपंथी सरकार ने उसका राजनीतिकरण कर रखा था। अब उन्हीं अफसरों को काम करने का अच्छा मौका दिया जाएगा, जो बिना किसी भेदभाव के लोगों की सेवा करेंगे, सितंबर से हर सरकारी कर्मचारी को बैंकों से वेतन मिलने लगेगा। राज्य में माओवादियों से वार्ता के सवाल पर उन्होंने कहा कि वह हमेशा इसकी पक्षधर रहीं हैं। जंगल महल इलाके का अध्ययन कराने के बाद पैकेज तैयार हैं।
Friday, June 17, 2011
भट्टा पारसौल से 2420 लोग गायब : कलराज
यमुना एक्सप्रेस वे प्रभावित क्षेत्रों में किसान बचाओं यात्रा समाप्त कर लौटे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने किसानों के उत्पीड़न पर रिपोर्ट जारी करते हुए आरोप लगाया कि भट्टा पारसौल में हुए पुलिसिया अत्याचार के बाद 2420 लोग अभी गायब है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से घटना की जांच कराने की मांग की। भाजपा सरकार आने पर बसपा शासन काल में भूमि अधिग्रहण के मामलों की आयोग से जांच कराने की बात कही। मिश्र रविवार को पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने किसान यात्रा को कामयाब बताते हुए आरोप लगाया कि सात मई को भट्टा पारसौल के किसानों पर हुए बर्बर अत्याचार का आतंक क्षेत्र में आज भी कायम है। उन्होंने सरकार की भूमि अधिग्रहण की नई नीति को धोखा बताया। बोले, जिन किसानों की पुश्तैनी जमीनें लूटी जा चुकी है। उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। प्राइवेट बिल्डर्स आज भी मजे में है। उन्होंने बताया कि भाजपा के दबाव में प्रशासन ने भट्टा पारसौल से धारा 144 हटा ली। इसके बाद वहां शनिवार को पंचायत हुई, जिसमें ग्रामीणों ने पुलिस के अत्याचारों के बारे में जानकारी दी। कहा कि वीभत्स कांड की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच कराने के बाद ही सच्चाई सामने आ सकेगी। पत्रकारों को रिपोर्ट जारी करते हुए मिश्र ने बताया कि 22 किसान आज भी जेल में है। करीब 12 हजार की आबादी में से लगभग 2420 लोग आज भी गायब है, हालांकि गायब किसानों की सूची देने से उन्होंने आनाकानी की। उनका कहना था कि नब्बे प्रतिशत भूसे का स्टाक जला देने के कारण पशुओं के भूखे मरने की नौबत है। खाद्यान्न की व्यवस्था न होने से खाने पीने की किल्लत हो रही है। लोगों को कई कई दिन भूखा रहना पड़ता है। किसानों के कृषि यंत्र भी आग के हवाले कर दिए, घरों में तोड़फोड़ हुई। गांवों में ईधन का संकट भी पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आई तो बसपा शासन में हुए भूमि अधिग्रहण के मामलों की जांच होगी। गड़बड़ी मिली तो अधिग्रहण निरस्त होगा। किसानों की कानूनी लड़ाई भाजपा लड़ेगी। आंदोलन में मरे किसानों को शहीद का दर्जा दिलाएंगे। दोषी अधिकारी दंडित होंगे। किसानों की मर्जी बिना भूमि अधिग्रहण नहीं होने देंगे। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी किसान यात्राएं जुलाई माह से निकाली जाएगी। यात्रा में साध्वी उमा भारती के शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।
Thursday, June 16, 2011
भट्टा पारसौल से 2420 लोग गायब : कलराज
यमुना एक्सप्रेस वे प्रभावित क्षेत्रों में किसान बचाओं यात्रा समाप्त कर लौटे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कलराज मिश्र ने किसानों के उत्पीड़न पर रिपोर्ट जारी करते हुए आरोप लगाया कि भट्टा पारसौल में हुए पुलिसिया अत्याचार के बाद 2420 लोग अभी गायब है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से घटना की जांच कराने की मांग की। भाजपा सरकार आने पर बसपा शासन काल में भूमि अधिग्रहण के मामलों की आयोग से जांच कराने की बात कही। मिश्र रविवार को पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों से बात कर रहे थे। उन्होंने किसान यात्रा को कामयाब बताते हुए आरोप लगाया कि सात मई को भट्टा पारसौल के किसानों पर हुए बर्बर अत्याचार का आतंक क्षेत्र में आज भी कायम है। उन्होंने सरकार की भूमि अधिग्रहण की नई नीति को धोखा बताया। बोले, जिन किसानों की पुश्तैनी जमीनें लूटी जा चुकी है। उन्हें सरकार ने कोई राहत नहीं दी। प्राइवेट बिल्डर्स आज भी मजे में है। उन्होंने बताया कि भाजपा के दबाव में प्रशासन ने भट्टा पारसौल से धारा 144 हटा ली। इसके बाद वहां शनिवार को पंचायत हुई, जिसमें ग्रामीणों ने पुलिस के अत्याचारों के बारे में जानकारी दी। कहा कि वीभत्स कांड की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से जांच कराने के बाद ही सच्चाई सामने आ सकेगी। पत्रकारों को रिपोर्ट जारी करते हुए मिश्र ने बताया कि 22 किसान आज भी जेल में है। करीब 12 हजार की आबादी में से लगभग 2420 लोग आज भी गायब है, हालांकि गायब किसानों की सूची देने से उन्होंने आनाकानी की। उनका कहना था कि नब्बे प्रतिशत भूसे का स्टाक जला देने के कारण पशुओं के भूखे मरने की नौबत है। खाद्यान्न की व्यवस्था न होने से खाने पीने की किल्लत हो रही है। लोगों को कई कई दिन भूखा रहना पड़ता है। किसानों के कृषि यंत्र भी आग के हवाले कर दिए, घरों में तोड़फोड़ हुई। गांवों में ईधन का संकट भी पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आई तो बसपा शासन में हुए भूमि अधिग्रहण के मामलों की जांच होगी। गड़बड़ी मिली तो अधिग्रहण निरस्त होगा। किसानों की कानूनी लड़ाई भाजपा लड़ेगी। आंदोलन में मरे किसानों को शहीद का दर्जा दिलाएंगे। दोषी अधिकारी दंडित होंगे। किसानों की मर्जी बिना भूमि अधिग्रहण नहीं होने देंगे। प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी किसान यात्राएं जुलाई माह से निकाली जाएगी। यात्रा में साध्वी उमा भारती के शामिल होने के सवाल पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की।
Wednesday, June 15, 2011
उमा भारती से सधेंगे कई निशाने
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मंशा के मुताबिक उमा भारती को भाजपा में एडजस्ट कराने में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को भले ही छह महीने मशक्कत करनी पड़ी हो, लेकिन पार्टी साध्वी के सहारे कई निशाने साधने की उम्मीद लगाए है। उमा ही मिशन उप्र में पार्टी का चेहरा होंगी और भाजपा का सत्ता वनवास खत्म कराना पहला टारगेट रहेगा। छह साल पूर्व निष्कासित हुई उमा भारती को यूपी में सक्रिय करने की रणनीति कुछ बड़े नेताओं का विरोध होने के बावजूद यूं ही नहीं बनी है। मिशन दिल्ली विजय के लिए नेतृत्व हर दांव लगाने को तैयार है। फ्रिक, पिछड़े वर्ग की वोटों को लौटाने और ग्रामीण इलाकों में लगातार घट रहे जनाधार को बढ़ाने की भी है। कल्याण सिंह की विदाई के बाद से गड़बड़ाई सोशल इंजीनियरिंग दुरुस्त नहीं हो पाई। खासकर लोध बाहुल्य इलाकों में आउट हो चुकी पार्टी की जड़ें फिर से जमाने का जिम्मा भी उमा पर होगा। मंदिर आंदोलन में भाजपा की रीढ़ रही अतिपिछड़ी जातियों पर बसपा प्रेम हावी है। असली चिंता प्रदेश में कई चेहरे बदलने का प्रयोग करने के बाद भी भाजपा 90 के दशक वाले तेवरों में नहीं लौट पा रही है। गुटबाजी के चलते विधायकों की संख्या घटकर 50 से नीचे पहुंच गई, तो सांसदों की गिनती दस से आगे नहीं बढ़ पा रही है। पिछले कुछ माह से प्रदेशीय नेता और कार्यकर्ता सड़कों पर भले ही जूझ रहे हो, लेकिन जनता साथ नहीं मिल पा रहा है। इस करिश्मे की आस भी पार्टी उमा भारती से लगाए है। राम मंदिर आंदोलन में अग्रणी रही उमा भारती इस बार गंगा मैया की जयकार करती दिखे, तो अजरज न होगा। पार्टी में वापसी के समय राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने गंगा अभियान संयोजक की जिम्मेदारी उमा को सौंपी। मंदिर के बजाए रामराज (सुशासन) लाने की मुहिम जोरों से चलेगी। भ्रष्टाचार और महिला अत्याचार जैसे मुद्दों पर सरकार विरोधी माहौल को भाजपा के पक्ष में लाने का जिम्मा भी उमा पर होगा। प्रदेश प्रवक्ता हृदयनारायण दीक्षित का मानना है कि सपा व बसपा के भ्रष्टाचार और कुशासन को उजागर करना अब अधिक आसान होगा। बसपा, सपा और दिग्गी राजा : भाजपाइयों को भरोसा है कि मप्र से दिग्गी राजा की सल्तनत उखाड़ने का श्रेय लेने वाली उमा को अब यूपी में कांग्रेस की वापसी के लिए दिग्विजय सिंह द्वारा तैयार चक्रव्यूह ध्वस्त करना होगा। उमा के जरिए ही भाजपा और संघ पर बढ़ते दिग्गी राजा के हमलों का माकूल जवाब मिल सकेगा। बसपा और कांग्रेस के महिला नेतृत्व पर जवाबी हमले कराने में साध्वी अधिक असरदार साबित होगी। महामंत्री विंध्यवासिनी का कहना है कि विपक्ष पर भाजपा के वार अधिक धारदार और असरदार होंगे।
बसपा के विकल्प की जिद्दोजहद
समाजवादी पार्टी का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन मंगलवार को आगरा में शुरू हो गया। इसमें पार्टी का पूरा फोकस सूबे में खुद को बसपा का असली विकल्प साबित करने पर केंद्रित रहा। उसने इसे साबित करने करने के लिए यह दलील भी दी कि बसपा भी सपा को ही अपना दुश्मन नंबर एक मानती है। कांग्रेस के उभार और भाजपा के उमा भारती को आगे कर पिछड़ा वर्ग कार्ड खेलने की कोशिश को लेकर पार्टी खासी चिंतित नजर आई। पार्टी का पूरा जोर विधानसभा चुनाव में वोटों के विभाजन को रोकने पर रहा। पार्टी का मानना है कि चुनावों में वोटों का बिखराव हो गया तो सूबे में सत्ता हासिल करने का उसका ख्वाब-ख्वाब ही रह जाएगा। मुस्लिम वोट बैंक की चिंता : अधिवेशन में सपा मुस्लिम मतों के बिखराव और विशेषकर कांग्रेस के प्रति उनके झुकाव को लेकर वह खासी चिंतित नजर आई। पार्टी को यह डर है कि लोकसभा की तर्ज पर यदि विधानसभा चुनावों में भी मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया तो उसे खासी दुश्वारियां हो सकती हैं। यही वजह रही कि पार्टी ने अधिवेशन में सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की रिफारिशों को लागू न करने पर कांग्रेस को निशाना बनाया। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने साफ किया कि जब तक केंद्र, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण नहीं देता, तब तक इस कौम का भला नहीं होगा।
लक्ष्य यूपी, निगाह केंद्र पर : अधिवेशन में सपा का सतही लक्ष्य तो सूबे की सत्ता रहा,लेकिन उसकी निगाह केंद्र के मौजूदा हालात पर भी लगी है। मुलायम ने इसे छिपाया भी नहीं। उन्होंने कहा कि पार्टी का लक्ष्य 2012 में राज्य में सरकार बनाना तो है ही साथ में 2014 के लोकसभा चुनाव में इतनी सीटें जीतना है कि उसके बिना सहयोग के केंद्र में सरकार न बन सके। उन्होंने केंद्र और प्रदेश दोनों ही सरकारों को भ्रष्टाचारी करार देते हुए तीखा हमला बोला। हालांकि उन्होने सीधे तौर पर बाबा रामदेव का जिक्र तो नहीं किया, लेकिन विदेशों में जमा कालेधन का मुद्दा उठाकर बाबा के आंदोलन का समर्थन कर इरादे जाहिर कर दिए।
सीमाओं पर बढ़ता खतरा : सपा मुखिया सीमाओं के प्रति केंद्र की उदासीनता का मुद्दा अर्से से उठा रहे हैं। विशेषकर चीन की सीमा पर सक्रियता का मामला। इसका जिक्र अधिवेशन में भी कर केंद्र को निशाना बनाया। सीमा पर पाक प्रायोजित आतंवाद के मुद्दे को उठाकर उन्होंने अपनी चिंताएं जाहिर की। आतंकी ओसामा बिन लादेन की मौत के साथ पाकिस्तान की स्वायत्तता पर अमेरिकी हस्तक्षेप को अफगानिस्तान और इराक पर हमला जैसा ही गंभीर मामला बताया। इसके अलावा 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल घोटालों का जिक्र करते हुए कहा कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार से लड़ने का हौसला नहीं है। महंगाई का जिक्र कर आम जनता की नब्ज छूने की कोशिश की। साथ पार्टी कार्यकर्ताओं को इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने और सरकार को बेनकाब करने को कहा।
आजम रहे गैरहाजिर : अधिवेशन के पहले दिन फायरब्रांड नेता मोहम्मद आजम खां की गैर मौजूदगी भी आश्चर्यजनक रही। वैसे पार्टी का कहना रहा कि वह बुधवार को अधिवेशन में शामिल होंगे।
Subscribe to:
Posts (Atom)