क्या विडंबना है आदमी की फितरत की! हम बीच में नहीं रह सकते या तो इधर रहेंगे या उधर। जरूरी नहीं कि सत्य ठीक वहीं हो जहां हम उसे देखते हैं, लेकिन मन दिमाग पर भारी पड़ जाता है। पूर्वाग्रह इसी से पैदा होते हैं। जब एक बार पूर्वाग्रह पैदा हो गया तब सत्य को देखना और मुश्किल हो जाता है। पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दो व्यक्तित्व उभरकर हमारे सामने आए हैं। इन दोनों के समर्थकों का एक समूह है तो विरोधियों का भी अपना एक समूह विशेष है, जो अपने-अपने पक्ष का जबरदस्त समर्थन करते नजर आ रहे हैं। दोनों ही समूह एक-दूसरे की बात पर विचार करने से कतरा रहे हैं जिस कारण एक अलग ही तरह की संकट की स्थिति बनती दिख रही है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों ही अराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं। अन्ना हजारे ने समाज सुधार की दिशा में कुछ काम किया है। वह न कभी किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए और न ही शामिल होना चाहते हैं यानी उनकी ऐसी कोई मंशा भी नहीं है। इसके उलट दूसरी ओर बाबा रामदेव योग शिक्षक के रूप में मशहूर रहे हैं। बाद में वह काय चिकित्सक भी बन गए और तमाम तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा करने लगे। जब उनकी महत्वाकांक्षा और बढ़ी तो उन्होंने सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के बारे में भी बोलना शुरू कर दिया। कांग्रेस ही नहीं कुछ और लोगों का भी कहना है कि राजनीति करना इन लोगों का नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों का काम है। आखिर ये अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस क्षेत्र में क्यों कूद पड़े हैं? मैं नहीं समझता कि इससे बेहूदा कोई और प्रश्न हो सकता है। सभी व्यवस्थाएं राजनीतिक होती हैं। इन व्यवस्थाओं के सदस्य भी राजनीतिक होते हैं। जब कोई आदमी वोट देने के लिए घर से बाहर निकलता है तो वह राजनीति करने के लिए ही निकलता है। इस मायने में नागरिकता अपने आपमें एक राजनीतिक घटना है। इसीलिए विदेशी नागरिक भारत में राजनीति नहीं कर सकते और उन्हें इसके लिए प्रतिबंधित किया गया है। यदि ऐसी स्थिति में अन्ना हजारे या बाबा रामदेव अगर कोई राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं तो इसकी वैधता को ललकारा नहीं जा सकता। हमारे यहां युद्ध के बारे में कहा भी गया है कि यह इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ और सिर्फ सेनापतियों के हाथ में ही नहीं छोड़ा जा सकता। यही बात अब राजनीति के बारे में कही जा सकती है। किसी भी लोकतंत्र में राजनीति इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता। जब राजनेता कहते हैं कि हम राजनीति में हैं इसलिए राजनीति करना हमारे ही अधिकार क्षेत्र में आता है तो वे न केवल अपनी हंसी उड़ाते हैं, बल्कि दूसरों को भी हंसने के लिए मौका देते हैं। मेरे विचार से इन लोगों से साफ कहा जाना चाहिए आप जैसे लोग आज तक अकेले ही राजनीति की जो शोभा बढ़ाते रहे हैं इसीलिए तो हमारे देश का यह हाल हो गया है। देश की वर्तमान दुर्गति के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है अथवा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इस विषय पर यदि देशव्यापी जनमत सर्वेक्षण कराया जाए तो पहले नंबर पर राजनेताओं का ही नाम आएगा। जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे देश में आज इतना असंतोष दिखाई दे रहा है उसके शिरोमणि भी यही नेता लोग हैं। जब ये लोग सरकार चलाते हैं तो सरकार भी भ्रष्ट हो जाती है। कायदे से इस राजनीतिक पतन का उपचार यही हो सकता था कि राजनीति की वर्तमान शैली के विरुद्ध एक या दो नए राजनीतिक दल नए विचारों और कार्यशैली के साथ विकल्प के रूप में उभरते और राष्ट्रीय विनाश को रोकने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते। वर्ष 1980 के दशक में कुछ क्षेत्रीय दलों के उभरने के बाद आज तक कोई नया राजनीतिक दल नहीं बना है। उस समय के बने क्षेत्रीय दल भी अब राष्ट्रीय दलों की तरह भ्रष्ट और जनविरोधी हो चुके हैं। इसलिए किसी नई या वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है, लेकिन प्रकृति का यह सामान्य नियम है कि वह खाली हुए रिक्त स्थान को बर्दाश्त नहीं करती और उसे अपने अनुसार किसी न किसी तरह भर लेती है। राजनीतिक प्रक्रिया के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने के परिणामस्वरूप ही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ है, लेकिन वह कोई संसदीय पार्टी नहीं है, जिस कारण उसमें वह क्षमता नहीं जिसकी की आज वाकई में आवश्यकता है। इस तरह हम पाते हैं कि हमारे देश में एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति है। इस राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए ही अराजनीतिक लोगों को वे काम करने पड़ रहे हैं जो काम वस्तुत: राजनीतिक संगठनों का है। अथवा उनके द्वारा होना चाहिए था। आज भारतीय जनता पार्टी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ खड़ी है। हालांकि वह अन्ना हजारे के साथ कम और रामदेव के साथ ज्यादा दिख रही है, क्योंकि अन्ना हजारे के काम में हिंदूवाद की राजनीति की कोई संभावना नहीं है, जबकि बाबा रामदेव की मुहिम में इस बात की संभावना कोई भी देख सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की प्रसिद्धि इस बात के लिए कभी नहीं रही है कि यह पार्टी भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। यही वजह है कि अपने चरित्र को दूसरों से ऊंचा साबित करने के लिए उसे आज एक योग शिक्षक का सहारा लेना पड़ रहा है। पिछले तीस-चालीस वर्षो में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जो राजनीतिक फैसलों सफलतापूर्वक चुनौती दे चुके हैं। इनमें मेधा पाटेकर का पर्यावरण आंदोलन, अरुणा राय का सूचना का अधिकार आंदोलन और भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध स्थानीय समुदायों का आंदोलन। इन गैर राजनीतिक आंदोलनों की सार्थकता और सफलता साफ तौर पर आज हमें दिख रहे हैं। हमारे देश में मानव अधिकारों का आंदोलन भी अब जोर पकड़ रहा है । हालांकि इसका नेतृत्व भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं कर रहा है जिसके बारे में कहा जा सके कि वह राजनीति में है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। जाहिर है ये दोनों ही व्यक्ति कोई पूर्ण पुरुष नहीं हैं। इनमें कमियां और कमजोरियां हैं और हो सकता है इनकी अपनी कुछ महत्वाकांक्षाएं भी हों, लेकिन हमें यहां नहीं भूला जा सकता कि इन कमियों और कमजोरियों की चर्चा जरूर करनी चाहिए, लेकिन उन्हें पूरी तरह से खारिज करते हुए नहीं। इसी तरह जो लोग अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भक्त हैं अथवा इनके समर्थक और जो इन्हें युगपुरुष बता रहे हैं, उन्हें भी यह सोचने की जरूरत है कि कहीं वे अपनी अतिभक्ति का शिकार तो नहीं हो रहे हैं। कमियां होने से कोई व्यक्ति घृणास्पद नहीं हो जाता और पूर्ण पुरुष न होने से कोई व्यक्ति श्रद्धा का पात्र न रहे ऐसी भी बात नहीं हो सकती। इसी तरह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थन यदि भारतीय जनता पार्टी कर रही है तो यह मुहिम भाजपाई नहीं हो जाती। शैतान को भी बाइबल के अंश उद्धृत करने की आजादी होनी चाहिए, तभी तो उससे यह मांग की जा सकती है कि वह बाइबिल के अनुसार चल कर दिखाए।
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Wednesday, June 15, 2011
अराजनीतिक लोगों की राजनीतिक मुहिम
क्या विडंबना है आदमी की फितरत की! हम बीच में नहीं रह सकते या तो इधर रहेंगे या उधर। जरूरी नहीं कि सत्य ठीक वहीं हो जहां हम उसे देखते हैं, लेकिन मन दिमाग पर भारी पड़ जाता है। पूर्वाग्रह इसी से पैदा होते हैं। जब एक बार पूर्वाग्रह पैदा हो गया तब सत्य को देखना और मुश्किल हो जाता है। पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दो व्यक्तित्व उभरकर हमारे सामने आए हैं। इन दोनों के समर्थकों का एक समूह है तो विरोधियों का भी अपना एक समूह विशेष है, जो अपने-अपने पक्ष का जबरदस्त समर्थन करते नजर आ रहे हैं। दोनों ही समूह एक-दूसरे की बात पर विचार करने से कतरा रहे हैं जिस कारण एक अलग ही तरह की संकट की स्थिति बनती दिख रही है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों ही अराजनीतिक व्यक्ति रहे हैं। अन्ना हजारे ने समाज सुधार की दिशा में कुछ काम किया है। वह न कभी किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए और न ही शामिल होना चाहते हैं यानी उनकी ऐसी कोई मंशा भी नहीं है। इसके उलट दूसरी ओर बाबा रामदेव योग शिक्षक के रूप में मशहूर रहे हैं। बाद में वह काय चिकित्सक भी बन गए और तमाम तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा करने लगे। जब उनकी महत्वाकांक्षा और बढ़ी तो उन्होंने सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के बारे में भी बोलना शुरू कर दिया। कांग्रेस ही नहीं कुछ और लोगों का भी कहना है कि राजनीति करना इन लोगों का नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों का काम है। आखिर ये अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस क्षेत्र में क्यों कूद पड़े हैं? मैं नहीं समझता कि इससे बेहूदा कोई और प्रश्न हो सकता है। सभी व्यवस्थाएं राजनीतिक होती हैं। इन व्यवस्थाओं के सदस्य भी राजनीतिक होते हैं। जब कोई आदमी वोट देने के लिए घर से बाहर निकलता है तो वह राजनीति करने के लिए ही निकलता है। इस मायने में नागरिकता अपने आपमें एक राजनीतिक घटना है। इसीलिए विदेशी नागरिक भारत में राजनीति नहीं कर सकते और उन्हें इसके लिए प्रतिबंधित किया गया है। यदि ऐसी स्थिति में अन्ना हजारे या बाबा रामदेव अगर कोई राजनीतिक प्रश्न उठाते हैं तो इसकी वैधता को ललकारा नहीं जा सकता। हमारे यहां युद्ध के बारे में कहा भी गया है कि यह इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ और सिर्फ सेनापतियों के हाथ में ही नहीं छोड़ा जा सकता। यही बात अब राजनीति के बारे में कही जा सकती है। किसी भी लोकतंत्र में राजनीति इतना गंभीर मामला है कि इसे सिर्फ राजनीतिज्ञों के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता। जब राजनेता कहते हैं कि हम राजनीति में हैं इसलिए राजनीति करना हमारे ही अधिकार क्षेत्र में आता है तो वे न केवल अपनी हंसी उड़ाते हैं, बल्कि दूसरों को भी हंसने के लिए मौका देते हैं। मेरे विचार से इन लोगों से साफ कहा जाना चाहिए आप जैसे लोग आज तक अकेले ही राजनीति की जो शोभा बढ़ाते रहे हैं इसीलिए तो हमारे देश का यह हाल हो गया है। देश की वर्तमान दुर्गति के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है अथवा इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इस विषय पर यदि देशव्यापी जनमत सर्वेक्षण कराया जाए तो पहले नंबर पर राजनेताओं का ही नाम आएगा। जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे देश में आज इतना असंतोष दिखाई दे रहा है उसके शिरोमणि भी यही नेता लोग हैं। जब ये लोग सरकार चलाते हैं तो सरकार भी भ्रष्ट हो जाती है। कायदे से इस राजनीतिक पतन का उपचार यही हो सकता था कि राजनीति की वर्तमान शैली के विरुद्ध एक या दो नए राजनीतिक दल नए विचारों और कार्यशैली के साथ विकल्प के रूप में उभरते और राष्ट्रीय विनाश को रोकने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते। वर्ष 1980 के दशक में कुछ क्षेत्रीय दलों के उभरने के बाद आज तक कोई नया राजनीतिक दल नहीं बना है। उस समय के बने क्षेत्रीय दल भी अब राष्ट्रीय दलों की तरह भ्रष्ट और जनविरोधी हो चुके हैं। इसलिए किसी नई या वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है, लेकिन प्रकृति का यह सामान्य नियम है कि वह खाली हुए रिक्त स्थान को बर्दाश्त नहीं करती और उसे अपने अनुसार किसी न किसी तरह भर लेती है। राजनीतिक प्रक्रिया के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने के परिणामस्वरूप ही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ है, लेकिन वह कोई संसदीय पार्टी नहीं है, जिस कारण उसमें वह क्षमता नहीं जिसकी की आज वाकई में आवश्यकता है। इस तरह हम पाते हैं कि हमारे देश में एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति है। इस राजनीतिक शून्यता को भरने के लिए ही अराजनीतिक लोगों को वे काम करने पड़ रहे हैं जो काम वस्तुत: राजनीतिक संगठनों का है। अथवा उनके द्वारा होना चाहिए था। आज भारतीय जनता पार्टी अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के साथ खड़ी है। हालांकि वह अन्ना हजारे के साथ कम और रामदेव के साथ ज्यादा दिख रही है, क्योंकि अन्ना हजारे के काम में हिंदूवाद की राजनीति की कोई संभावना नहीं है, जबकि बाबा रामदेव की मुहिम में इस बात की संभावना कोई भी देख सकता है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की प्रसिद्धि इस बात के लिए कभी नहीं रही है कि यह पार्टी भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करती है। यही वजह है कि अपने चरित्र को दूसरों से ऊंचा साबित करने के लिए उसे आज एक योग शिक्षक का सहारा लेना पड़ रहा है। पिछले तीस-चालीस वर्षो में ऐसे अनेक आंदोलन हुए हैं जो राजनीतिक फैसलों सफलतापूर्वक चुनौती दे चुके हैं। इनमें मेधा पाटेकर का पर्यावरण आंदोलन, अरुणा राय का सूचना का अधिकार आंदोलन और भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध स्थानीय समुदायों का आंदोलन। इन गैर राजनीतिक आंदोलनों की सार्थकता और सफलता साफ तौर पर आज हमें दिख रहे हैं। हमारे देश में मानव अधिकारों का आंदोलन भी अब जोर पकड़ रहा है । हालांकि इसका नेतृत्व भी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं कर रहा है जिसके बारे में कहा जा सके कि वह राजनीति में है। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। जाहिर है ये दोनों ही व्यक्ति कोई पूर्ण पुरुष नहीं हैं। इनमें कमियां और कमजोरियां हैं और हो सकता है इनकी अपनी कुछ महत्वाकांक्षाएं भी हों, लेकिन हमें यहां नहीं भूला जा सकता कि इन कमियों और कमजोरियों की चर्चा जरूर करनी चाहिए, लेकिन उन्हें पूरी तरह से खारिज करते हुए नहीं। इसी तरह जो लोग अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भक्त हैं अथवा इनके समर्थक और जो इन्हें युगपुरुष बता रहे हैं, उन्हें भी यह सोचने की जरूरत है कि कहीं वे अपनी अतिभक्ति का शिकार तो नहीं हो रहे हैं। कमियां होने से कोई व्यक्ति घृणास्पद नहीं हो जाता और पूर्ण पुरुष न होने से कोई व्यक्ति श्रद्धा का पात्र न रहे ऐसी भी बात नहीं हो सकती। इसी तरह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का समर्थन यदि भारतीय जनता पार्टी कर रही है तो यह मुहिम भाजपाई नहीं हो जाती। शैतान को भी बाइबल के अंश उद्धृत करने की आजादी होनी चाहिए, तभी तो उससे यह मांग की जा सकती है कि वह बाइबिल के अनुसार चल कर दिखाए।
भटकी हुई रणनीति
लेखक भ्रष्टाचार के खिलाफ सिविल सोसायटी के आंदोलन के प्रति केंद्र के रवैये में खामी देख रहे हैं...
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के अनशन-आंदोलन के चलते केंद्र सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ कमर कसती अवश्य दिख रही है, लेकिन उसके द्वारा उठाए गए कदमों से अभी न तो अन्ना संतुष्ट दिख रहे हैं, न बाबा और न ही आम जनता। यही कारण है कि जहां बाबा रामदेव अनशन जारी रखे हुए हैं वहीं अन्ना हजारे भी इस अल्टीमेटम पर कायम है कि यदि 15 अगस्त तक लोकपाल विधेयक पारित नहीं हुआ तो वह 16 अगस्त से फिर अनशन पर बैठेंगे। अब केंद्र सरकार यह भी संकेत दे रही है कि वह इन दोनों अनशनकारियों के दबाव में नहीं आएगी। बाबा रामदेव द्वारा संचालित ट्रस्टों की जांच कराने के साथ ही केंद्र सरकार यह भी संकेत दे रही है कि वह अन्ना हजारे और उनके साथियों के प्रति कठोर रवैया अपनाएगी। केंद्र सरकार से यह गुहार लगाई जा रही है कि वह बाबा रामदेव का अनशन समाप्त कराए, लेकिन वह मौन साधे हुए है। नि:संदेह भारतीय संविधान इसकी इजाजत नहीं देता कि सिविल सोयायटी सरकार को अपने मनमाफिक कानून बनाने के लिए बाध्य करे। यह काम तो संसद का है। यह बात बाबा रामदेव ओर अन्ना हजारे, दोनों ही समझते हैं, लेकिन इस समय वे केंद्र सरकार पर दबाव बनाए रखना चाहते हैं। शायद दोनों यह मानकर चल रहे हैं कि पहले की भांति या तो सोनिया गांधी या फिर मनमोहन सिंह कोई ऐसा आश्र्वासन देने के लिए तैयार हो जाएंगे जिससे पलटना उनके लिए आसान न हो और यदि वे ऐसा करेंगे तो उनकी साख पर बन आएगी। अन्ना हजारे ने इस वर्ष अप्रैल में जब पहली बार दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन किया था तो सोनिया गांधी ने एक हद तक उनका समर्थन किया था। अब वह चुप्पी साधे हुए हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आक्रामक रूख प्रदर्शित किए हुए हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार रामलीला मैदान में मध्य रात्रि को दिल्ली पुलिस की ओर से रामदेव और उनके समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी हो गई थी, जबकि इसी कार्रवाई के चलते केंद्र सरकार आम जनता और विपक्षी दलों के निशाने पर है। सच तो यह है कि केंद्र सरकार के लिए इस कार्रवाई को जायज ठहराना महंगा पड़ रहा है, लेकिन वह अपने रवैये पर अड़ी है। बेहतर हो कि वह अडि़यल रवैया छोड़कर इस पर विचार करे कि अन्ना हजारे या रामदेव को अनशन करने की जरूरत क्यों पड़ी? अन्ना हजारे का पिछला अनशन जब समाप्त हुआ था तब केंद्र सरकार की किरकिरी जरूर हुई थी, लेकिन आम जनता को इससे संतुष्टि मिली थी कि सरकार सिविल सोसायटी से मिलकर लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाने के लिए तैयारहो गई। जब बाबा रामदेव ने काले धन के मुद्दे पर अनशन करने की ठानी तो केंद्र सरकार ने उन्हें मनाने के लिए चार वरिष्ठ मंत्रियों को एयरपोर्ट भेज दिया। सरकार चाहती तो उन्हें इतना महत्व दिए बगैर उनसे वार्ता कर सकती थी। बाद में इसी सरकार ने रामदेव और उनके समर्थकों को रामलीला मैदान से खदेड़ने के लिए रात में पुलिस भेज दी। वैसे बाबा रामदेव का अनशनतमाम देशवासियों के गले नहीं उतर रहा है। अगर उनके समर्थकों और अनुयायियों को छोड़ दिया जाए तो तमाम लोग ऐसे हैं जो उन्हें केवल योगाचार्य के रूप में देखते हैं। वे यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक योगगुरु भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनशन क्यों कर रहा है? कुछ लोग उनकी अकूत संपदा का भी राज जानना चाहते हैं। जहां रामदेव की साख सवालों के घेरे में आ गई है वहीं गांधीवादी समाजेसवी अन्ना हजारे की छवि साफ-सुथरी है। सरल-सादगीपूर्ण जीवन बिताने के कारण जब वह भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे तो जो हुजूम उनके समर्थन में आया उसमें सभी तबके के लोगों के अलावा बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी वर्ग भी था। बाबा रामदेव के समर्थकों में भी बुद्धिजीवी हैं, लेकिन उनके ज्यादातार समर्थक उनके वे अनुयायी हैं जो उनकी विशेष जीवनशैली से प्रभावित हैं। चूंकि वह संन्यासी हंै लिहाजा तमाम हिंदू संत भी उनके साथ है। भाजपा और संघ के नेता भी उनका समर्थन कर रहे हैं। अब तो संघ और भाजपा के नेता बाबा रामदेव के समर्थन में खुलकर सामने भी आ गए हैं। बाबा की संघ और भाजपा नेताओं से करीबी के चलते सरकार को यह प्रचारित करने में आसानी हो रही है कि उनके अनशन-आंदोलन के पीछे आरएसएस का हाथ है। कांग्रेस की नजर में बाबा अनशन के जरिये संघ-भाजपा की राजनीति कर रहे हैं। अशोक सिंघल और सुषमा स्वराज जिस तरह बाबा रामदेव से मिलने हरिद्वार गए और वहां जाकर उन्होंने उनकी वकालत की उससे इसमें संदेह नहीं रह गया कि उनके अनशन-आंदोलन के पीछे संघ और भाजपा का हाथ है। जनता के बीच यह भी संदेश गया है कि बाबा रामदेव भ्रष्टाचार विरोधी अपने अनशन के जरिये कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं। वैसे केवल कांग्रेसी ही भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है और न ही सिर्फ कांग्रेस भ्रष्टाचार की अनदेखी कर रही है। यही काम भाजपा नेता भी कर रहे हैं और वे भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं। भाजपा बाबा रामदेव का साथ तो खुलकर दे रही है, लेकिन वह अन्ना हजारे का समर्थन नहीं कर रही है। चूंकि अन्ना हजारे का आंदोलन गैर राजनीतिक है इसलिए आम जनता के बीच उनकी साख अधिक है। केंद्र सरकार बाबा रामदेव के दबाव से तो मुक्त होती दिख रही है, लेकिन वह अन्ना हजारे के दबाव का सामना शायद ही कर पाए। अन्ना हजारे द्वारा सरकार पर जो दबाव बनाया जा रहा है उसे गैर जरूरी नहीं कहा जा सकता। यह अन्ना हजारे के दबाव का ही नतीजा है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय दिख रही है। इस पर बहस हो सकती है कि 15 अगस्त तक लोकपाल विधेयक पारित करने के लिए अल्टीमेटम देना कितना सही है, लेकिन इससे इंकार नहीं कि केंद्र सरकार पर मजबूत लोकपाल के निर्माण के लिए दबाव बनाना जरूरी है। यदि केंद्र सरकार अपने अहं की खातिर अन्ना की अनदेखी करती है और उनके खिलाफ बाबा रामदेव की तरह आक्रामक रवैया अपनाती है तो न उसका भला होने वाला है और न ही देश का। इस मामले में उसे दंभ भरे रवैये का प्रदर्शन करने से बचना चाहिए। उसे यह अहसास हो जाए तो अच्छा है कि रामदेव के भक्तों को जिस तरह रामलीला मैदान से खदेड़ा गया वह शर्मनाक था। इस समय केंद्र के जो रणनीतिकार उसे सिविल सोसायटी से कड़ाई बरतने और रामदेव की अनदेखी करने का सुझाव दे रहे हैं वे गलती कर रहे हैं। ऐसा करने से आम जनता को सही संदेश नहीं जाएगा। केंद्र का अहंकारी रवैया विपक्षी दलों को आग में घी डालने का मौका देगा। केंद्र का दमनकारी रवैया उसकी लुटिया डुबो सकता है। उसे यह बात समझ लेनी चाहिए कि भ्रष्टाचार इस समय देश की विकराल समस्या है। कुछ ही दिनों में संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। सरकार को इस सत्र में तमाम काम निपटाने हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि वह कम से कम अन्ना हजारे के साथ जो बातचीत चल रही है उसे पटरी पर बनाए रखे, जिससे आम जनता को यह आभास हो कि वह भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए वास्तव में गंभीर है।
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