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Friday, September 30, 2011

रिश्ते हों बेहतर पर आतंकवाद से समझौता नहीं


आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई में नाकामी को लेकर अमेरिकी दबाव से घिरा पाकिस्तान जहां भारत से संबंध सुधार की पींगें बढ़ाने के मौके बटोर रहा है। वहीं इस पाकिस्तानी पेशबंदी पर सतर्क भारत दोस्ती का हाथ थामने के साथ ही यह हर हाल में साफ कर देना चाहता है कि आतंकवाद पर उसका रुख समझौते से परे है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हाशिए पर पाक की ओर से सौहार्द की हर पहल को तवज्जो देने के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आतंकवाद को सींचने में आइएसआइ की भूमिका पर अमेरिका में उठ रहे सवालों का खुल कर समर्थन किया। वतन वापसी के दौरान मीडिया से बातचीत में प्रधानमंत्री ने शीर्ष अमेरिकी जनरल एडमिरल माइक मुलेन द्वारा आइएसआइ पर लगाए आरोपों के बारे में पूछे जाने पर कहा कि इसमें कुछ भी नया नहीं है। भारत तो यह बात हमेशा से कहता रहा है। खुशी इस बात की है कि अब दुनिया को भी यह सच्चाई नजर आने लगी है। साथ ही पीएम ने इस बात पर भी जोर दिया कि पहले भारत जब आतंकवाद के पीछे आइएसआइ की भूमिका का मामला उठाता था तो दुनिया भरोसा नहीं करती थी। उल्लेखनीय है कि एडमिरल मुलेन ने बीते दिनों काबुल में अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के लिए सीधे आइएसआइ को जिम्मेदार ठहराया था। अमेरिका में शीर्ष सैन्य स्तर से आए इन आरोपों ने पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों को तलहटी में पहुंचा दिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में शिरकत के लिए पहुंची पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का पूरा दौरा इन सवालों पर सफाई देते ही बीता। हालांकि इस बढ़ते दबाव के बीच हिना ने पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की पहल की। वहीं बाद में भारतीय विदेश मंत्री एसएम कृष्णा को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तानी मिशन की ओर से आयोजित पार्टी का न्योता भेजा गया। भारतीय विदेश मंत्री ने भी प्रोटोकॉल को दरकिनार कर पार्टी में शिरकत की। हालांकि इस मुलाकात में भी कृष्णा ने अपनी पाकिस्तानी समकक्ष को यह जरूर याद दिलाया कि पाक को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के वादे नहीं भूलने चाहिए।

Wednesday, June 29, 2011

राजनीति में अपने अंदाज से दखल देंगे हजारे


अन्ना हजारे न तो सभी राजनेताओं के खिलाफ हैं और न ही मौजूदा संसदीय व्यवस्था के। यहां तक कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपने सक्रिय हस्तक्षेप की योजना भी तैयार कर ली है। अन्ना न तो अपनी पार्टी बनाएंगे और न ही किसी पार्टी का समर्थन करेंगे, बल्कि ईमानदार लोगों को संसद पहुंचाने के लिए चुनाव में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह चुनावी समर्थन सिर्फ जन लोकपाल के साथ आने के बदले में नहीं होगा। अन्ना हजारे ने दैनिक जागरण के साथ विशेष बातचीत में अपनी इस योजना के बारे में जानकारी दी। मौजूदा चुनावी व्यवस्था में वे किस तरह का हस्तक्षेप करेंगे, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा, यह प्रयोग हमने महाराष्ट्र में चुनाव से पहले किया है। एक मूवमेंट चलाया था कि भ्रष्ट लोगों को वोट मत दो। जो भ्रष्ट है, लुटेरा है ऐसे व्यक्ति को वोट मत दो। दूसरे कई लोगों के नाम हमने दिए थे कि ये लोग चुनाव में खड़े हुए तो उनको समर्थन करना। लोगों ने 12 में से आठ लोगों को चुनकर भेजा। अच्छे लोगों के व्यवस्था के अंदर जाने के लिए यह भी रास्ता है। हालांकि अन्ना ने स्पष्ट किया कि सिर्फ जन लोकपाल के समर्थन के आधार पर वे किसी नेता या पार्टी का चुनावी समर्थन नहीं करेंगे। न ही वे अपनी पसंद की संसद बनाने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। वे मानते हैं कि बड़ी संख्या में ईमानदार लोगों का राजनीति में आना काफी मुश्किल है। साथ ही यह भी कहते हैं कि महाराष्ट्र का प्रयोग देश भर में आसानी से कामयाब होना मुश्किल है। भ्रष्टाचार से धन और ताकत हासिल करने वाले इसे उतनी आसानी से नहीं होने देंगे। कुछ खास उम्मीदवारों को अपना समर्थन देने से आप विवादों में नहीं घिर जाएंगे? इस पर अन्ना कहते हैं कि आरोपों से वे नहीं डरते। उन्हें बदले में उन सांसदों से भी कुछ नहीं चाहिए। यहां तक कि वे जन लोकपाल को लेकर भी उस सांसद से इतना ही कहेंगे कि वह सिर्फ अपने क्षेत्र की जनता की भावना का सम्मान करें। अन्ना कहते हैं कि चाहे एक ही उम्मीदवार मिले, लेकिन जांच-परख कर ही वे किसी का समर्थन करेंगे। अन्ना इस बात से भी इंकार करते हैं कि वे सभी नेताओं को बेईमान बताते हैं। वे कहते हैं कि सभी पार्टियों के ईमानदार सांसदों को अपने पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाना चाहिए।


राजनीतिक दलों को टटोलने में जुटी टीम अन्ना


लोकपाल विधेयक पर सरकारी रुख से बेजार अन्ना हजारे की टीम अब दूसरे राजनीतिक दलों को भी अपने साथ खड़ा करने की कोशिश में जुट गई है। यह और बात है कि उन्हें भी अहसास है कि लोकपाल की उनकी सभी शर्तो पर शायद ही कोई पार्टी उनके साथ खड़ी होगी। शुक्रवार की उनकी पहली कवायद में जहां भाजपा ने सलाह मशविरा का हवाला देकर फिलहाल मुद्दे को टाल दिया। वहीं भाकपा ने पीएम को दायरे में लाने पर तो समर्थन दिया पर न्यायाधीशों के मामले में असहमति जता दी। पहली अगस्त से शुरू हो रहे मानसून सत्र से पहले टीम अन्ना दूसरे दलों को भी टटोलने की कोशिश करेगी। पिछले दिनों में सरकार की ओर से आरएसएस का राजनीतिक हथियार बनने का आरोप झेल रही टीम अन्ना की नई कोशिश अहम है। संसद में विधेयक पेश होने से पहले जहां टीम अन्ना राजनीतिक दलों से बातचीत कर सरकार पर दबाव बनाने में जुट गई है। वहीं मतभेद बरकरार रहे तो स्पष्ट हो जाएगा कि वह किसी राजनीतिक दल के प्रभाव में नहीं है। इस क्रम में शुक्रवार को अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और मनीष सिसोदिया ने भाजपा के संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी व भाकपा महासचिव एबी वर्धन से मुलाकात की। दोनों नेताओं के साथ मुलाकात में अन्ना की टीम ने लोकपाल पर अपने मसौदे व सरकार के मसौदे के अंतर को सामने रखा और उनके विचार जानने की कोशिश की है। आडवाणी ने फिलहाल कोई विचार नहीं दिया। उन्होंने कहा कि कहा कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी व दोनों सदनों में विपक्ष के नेता सुषमा स्वराज व अरुण जेटली इस समय दिल्ली से बाहर हैं। इनके लौटने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बारे में विचार करेंगे। आडवाणी ने आश्वस्त किया कि सर्वदलीय बैठक से पहले भाजपा नेता उनसे बात करेंगे। ब‌र्द्धन ने कुछ मुद्दों पर अपनी सहमति और असहमति स्पष्ट कर दी। पीएम को दायरे में लाने पर तो वह अन्ना के साथ हैं, पर जजों को वह इससे बाहर रखना चाहते हैं। उनका मानना था कि जजों का मामला न्यायाधीश उत्तरदायित्व विधेयक में होना चाहिए। संसद के अंदर सांसदों के चरित्र व व्यवहार के मामले में लोकपाल के अधिकार को लेकर भी ब‌र्द्धन को थोड़ी आपत्ति थी। हालांकि उन्हें यह समझाने की कोशिश की गई कि संसद सदस्यता खत्म करने का अधिकार सदन के संबंधित अध्यक्षों को ही होगा। उनके प्रस्तावित विधेयक में लोकपाल को केवल भ्रष्टाचार के मामले की जांच करने का अधिकार होगा। मानसून सत्र से पहले टीम दूसरे राजनीतिक दलों से भी मिलेगी।


लोकपाल पर एकजुटता दिखाने में कांग्रेस सफल


लोकपाल विधेयक को राजनीतिक प्रक्रिया के चक्रव्यूह में लाने की शुरुआत सरकार ने अपने घटक दलों यानी यूपीए की बैठक के साथ की है। प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को लोकपाल की जांच के दायरे में लाने के सिविल सोसाइटी के प्रस्ताव का विरोध कर रही कांग्रेस अपने कुनबे में तो समर्थन हासिल करने में सफल रही है। अब प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में लोकपाल मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला हुआ है। प्रबल संभावना है कि सर्वदलीय बैठक 3 जुलाई को बुलाई जाए। सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की उपस्थिति में हुई यूपीए बैठक में सरकार के सभी अहम घटक एकजुट दिखे। वे इस बात पर सहमत रहे कि नीतिगत विषयों पर सिविल सोसाइटी से विचार-विमर्श करना तो ठीक, लेकिन उनके आगे विधायिका का समर्पण घातक होगा। तृणमूल सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो दिन में ही बिना किसी लाग-लपेट के टीम अन्ना को राजनीति में आने की चुनौती दे दी। ममता ने कहा कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए उसके अंदर आना होगा, जो लोग भ्रष्टाचार से लड़ने की बात कर रहे हैं, वे आगे आएं, वह स्वागत करेंगी। खास बात है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली आईं ममता ने तो यूपीए की बैठक में शिरकत की, लेकिन राजधानी में होने के बावजूद तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि बैठक में नहीं गए। उन्होंने संसदीय दल के डीएमके नेता व पूर्व मंत्री टी.आर. बालू को भेजा। डीएमके एकमात्र यूपीए घटक है जो प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन कर रहा है। वहीं, एनसीपी ने तो खुलकर इसका विरोध किया। एनसीपी महासचिव और प्रवक्ता डी.पी. त्रिपाठी ने कहा कि हम पूरे देश में सबसे पहले से यह कहते आ रहे हैं कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका के ऊपर कोई नहीं हो सकता। लोकपाल को द्वारपाल होना चाहिए, न कि दंडपाल। यूपीए की बैठक के बाद नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने बताया कि प्रणब मुखर्जी ने सभी दलों के सामने लोकपाल पर दोनों ड्राफ्ट रखे और उनका ब्यौरा दिया। अब सरकार जल्द ही सर्वदलीय बैठक बुलाएगी। सूत्रों के मुताबिक 3 जुलाई को सर्वदलीय बैठक हो सकती है। प्रधानमंत्री पर मंगलवार को हुई बैठक में आईयूएमएल के ई. अहमद, कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री ए.के. एंटनी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल भी शामिल रहे।


भाजपा छोड़ने के मूड में मुंडे


गोपीनाथ मुंडे के बगावती तेवरों ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को गहरे संकट में डाल दिया है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व मुंडे को गंवाना भी नहीं चाहता है और उनके सामने समर्पण करते हुए भी नहीं दिखना चाहता है। इसके लिए वह उनकी अधिकांश मांगों को मानने के लिए तैयार भी है, लेकिन मुंडे के कांग्रेस के साथ संपर्क और पार्टी तोड़ने की कोशिश से उसकी मुसीबतें बढ़ी हैं। इसी बीच, महाराष्ट्र में अपने विधायकों एवं सांसदों को संभालने के लिए पार्टी ने मंगलवार को मुंबई में इन सभी की बैठक भी बुलाई है। मुंडे को लेकर भाजपा नेतृत्व पिछले तीन दिनों से माथापच्ची कर रहा है। सोमवार को उनके द्वारा पार्टी तोड़ने की कोशिशों की भनक लगने के बाद शाम सात बजे आडवाणी के निवास पर वरिष्ठ नेताओं की आपात बैठक शुरू हुई। इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू, अनंत कुमार, रामलाल मौजूद थे। बैठक में मुंडे के पार्टी से जाने से होने वाले नुकसान का आकलन करने के साथ उनको रोके रहने के लिए उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया गया। सूत्रों के अनुसार भाजपा नेतृत्व मुंडे को अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी की कमान सौंपने एवं विधान परिषद में नेतृत्व परिवर्तन न करने के लिए तो तैयार है, लेकिन वह मुंडे को राज्य का प्रभारी बनाने और केंद्र से वापस राज्य में भेजने के पक्ष में नहीं है। बैठक के बाद वेंकैया नायडू ने कहा कि पिछली बैठक में सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह नहीं थे, इसलिए उनके साथ भी चर्चा की गई है। सूत्रों का कहना है कि पार्टी अब अपनी तरफ से कोई और पहल करने के बजाय मुंडे के अगले कदम को देखना चाहती है। इसके पहले रविवार को देर रात पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ गडकरी और मुंडे की बैठक भी हुई, लेकिन इसमें भी कोई हल नहीं निकला। सोमवार को जब मुंडे के कांग्रेस में जाने और 15 विधायकों एवं तीन सांसदों को तोड़ने की भनक लगी तो पार्टी ने इसे गंभीरता से लिया। गडकरी ने प्रदेश अध्यक्ष सुधीर मुंगटीवार को मुंबई रवाना करते हुए वहां सभी विधायकों, सांसदों व प्रदेश पदाधिकारियों की बुधवार सुबह 11 बजे बैठक बुलाने के निर्देश दिए ताकि मुंडे के पार्टी तोड़ने के मंसूबों को पलीता लगाया जा सके। इन सारे घटनाक्रमों राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की मुसीबतें भी बढ़ गई हैं, क्योंकि इस बार संकट उनके गृह राज्य से सामने आया है। अगर वह मुंडे के सामने झुकते हैं तो अपने गृह प्रदेश में ही कमजोर हो जाएंगे और अगर मुंडे पार्टी से बाहर जाते हैं तो सबको साथ लेकर साथ चलने की उनकी क्षमता पर पार्टी के भीतर ही सवाल खड़े होने लगेंगे।


भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को पक्ष रखने का निर्देश


आधी रात में रामलीला मैदान खाली कराने के मामले में दिल्ली पुलिस के हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट ने बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम व न्यायमूर्ति एके. पटनायक की पीठ ने घटना पर दिल्ली पुलिस के जवाबी हलफनामे को देखने के बाद भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष आचार्य वीरेन्द्र विक्रम को नोटिस जारी किया। पीठ ने कहा कि दिल्ली पुलिस आयुक्त के हलफनामे में कहा गया है कि रामलीला मैदान में योग शिविर लगाने के लिए अनुमति मांगी गई थी, लेकिन दूसरे ही दिन सुबह वहां करीब एक लाख की भीड़ एकत्र हो गई। पीठ ने कहा कि दिल्ली पुलिस के इस दावे पर वे ट्रस्ट से जवाब चाहते हैं। पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव से भी हलफनामा दाखिल कर बाबा रामदेव व उनके साथियों पर हमले की खुफिया सूचना के बारे में जवाब देने को कहा है। इससे पहले सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस आयुक्त की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता यूयू ललित ने लाठीचार्ज से इंकार किया और कहा कि किसी भी वरिष्ठ अधिकारी ने लाठीचार्ज के आदेश नहीं दिए थे। बाबा रामदेव के समर्थकों ने पत्थरबाजी और गमले फेंक कर पुलिस को कार्रवाई के लिए उकसाया था। इसी बीच वकील अजय अग्रवाल ने खड़े हो कर कहा कि पुलिस ने बड़े पैमाने पर क्रूरता दिखाई। इस हमले में घायल महिला राजबाला अभी भी जीवन-मृत्यु से संघर्ष कर रही है। उन्होंने सीसी टीवी कैमरे जमा कराने और घटना की जांच के लिए एसआइटी गठित करने की मांग की। हालांकि ललित ने अग्रवाल का विरोध किया और कहा कि उनकी याचिका खारिज हो चुकी है और उन्हें इस मामले में बोलने का हक नहीं है। पीठ ने अग्रवाल से कहा कि घटना के संबंध में उनके पास पर्याप्त तथ्य हैं। पुलिस आयुक्त के हलफनामे में बताया गया है कि कुल 74 लोग घायल हुए थे, जिनमें 49 आम नागरिक थे और 24 पुलिसकर्मी। 49 में से 41 को उसी शाम अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी, जबकि 5 अन्य को दूसरे दिन सुबह अस्पताल से छुट्टी मिली। दो लोगों को प्राथमिक उपचार के बाद भेज दिया गया। सिर्फ एक व्यक्ति अस्पताल में है। कोर्ट ने कहा कि अगर उन्हें भविष्य में जरूरत लगी तो वे उनकी (अग्रवाल) मदद ले लेंगे फिलहाल उनकी दलीलें सुनना ठीक नहीं होगा, क्योंकि पहले वाली पीठ उनकी याचिका खारिज कर चुकी है। इसके साथ ही कोर्ट ने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को नोटिस जारी करते हुए मामले की सुनवाई 11 जुलाई तक टाल दी।


निगमानंद की मौत पर राजनीति गरमाई


गंगा में खनन व स्टोन क्रेशर के खिलाफ अनशन करते हुए जान देने वाले स्वामी निगमानंद का मामला उत्तराखंड सरकार के लिए मुसीबत बन गया है। कांग्रेस ने तो राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया ही है, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक के एन गोविंदाचार्य ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। दोनों ने ही मामले की सीबीआइ जांच की मांग की है। भाजपा नेता उमा भारती ने भी प्रशासन की भूमिका स्पष्ट करने को कहा है। हालांकि भाजपा ने अपनी सरकार का पक्ष लेते हुए कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह केवल सरकार को अस्थिर करना चाहती है। बाबा रामदेव के मामले में कांग्रेस को कठघरे में खड़ी करने वाली भाजपा अब भाजपा को निगमानंद की मौत पर सवालों का जवाब देते नहीं बन रहा है। हालांकि पार्टी ने इस मामले में अपने विरोधियों को करारा जवाब देते हुए कहा है कि राज्य सरकार इस मामले में किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार है। राज्य सरकार स्वामी निगमानंद के लगातार संपर्क में थी और उसने उन्हें बेहतर चिकित्सीय सुविधाएं देने व उनकी मांगों के लिए पूरी कोशिश की। राज्य सरकार में मंत्री मदन कौशिक पूरी तरह से निगमानंद के संपर्क में थे। पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा है कि स्वामी निगमानंद का अनशन राज्य की निशंक सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि निशंक सरकार के निर्णय पर हाईकोर्ट की रोक के खिलाफ था। हालांकि दूसरी तरफ कांग्रेस प्रवक्ता जयंती नटराजन ने स्वामी निगमानंद की मौत पर राज्य की भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए सीबीआइ जांच की मांग की है। नटराजन ने कहा कि निगमानंद को जहर देने का मामला सामने आया है जो बेहद गंभीर है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता हरक सिंह रावत ने भी निगमानंद की मौत के लिए राज्य की निशंक सरकार को दोषी ठहराया है। भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा झटका उमा भारती व गोविंदाचार्य के बयानों से लगा है। उमा भारती ने इस मामले में राज्य प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने न्याय विभाग की भूमिका व मातृ सदन में स्वामी से मिलने-जुलने वालों की भूमिका भी साफ करने को कहा है। उमा भारती निगमानंद के अनशन के बाद से लगातार उनके संपर्क में थीं। दूसरी तरफ गोविंदाचार्य ने भी इस मामले की सीबीआइ जांच की मांग करते हुए राज्य सरकार से मांग की है कि वह जहर दिए जाने वाले मामले में दर्ज रिपोर्ट के आरोपियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करे। अनशन के दौरान कोमा में जाना, जांच के दौरान खून में जहर के अंश का पता चलना और उसे दूर किए जाने के लिए दवाइयां दिया जाना इस मामले की कलई खोलता है.

Wednesday, June 15, 2011

आधा दर्जन मुद्दों पर भाजपा ने मांगी सरकार से सफाई


केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए भाजपा ने अन्ना हजारे व बाबा रामदेव से आग्रह किया है कि वह कांग्रेस व केंद्र सरकार के मंत्रियों के बयानों को संज्ञान न लें। पार्टी ने कहा है कि जिस दल के प्रतिनिधि आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हो, उनके आरोपों को कोई मतलब नहीं है, देश की जनता को इन दोनों पर पूरा भरोसा है। भाजपा ने लोकपाल मामले पर कांग्रेस व सरकार के परस्पर विरोधाभासी बयानों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा है कि वे खुद साफ करें कि प्रधानमंत्री को इसके दायरे में आना चाहिए या नहीं? भाजपा केंद्र सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने लगभग आधा दर्जन मुद्दों पर सरकार पर आरोपों की झड़ी लगाते हुए उससे सफाई मांगी है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए आरोपों को रूड़ी ने सरकार व कांग्रेस की हताशा करार दिया है। मुखर्जी की देश में आपातकाल जैसे हालात होने की तरफ संकेत किए जाने पर उन्होंने कहा कि इससे भाजपा के रुख की ही पुष्टि हुई है, जो लगातार देश को आगाह कर रही है। रूड़ी ने कहा कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को लाने व न लाने पर कांग्रेस व सरकार में ही परस्पर विरोधी राय सामने आ रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखने की बात कह रहे हैं, जबकि प्रणब मुखर्जी ने मसौदा समिति में इसका विरोध किया है। ऐसे में मनमोहन सिंह को खुद साफ करना चाहिए कि वे प्रधानमंत्री को इसके दायरे में रखने के पक्ष में है या नहीं। भाजपा प्रवक्ता ने अन्ना हजारे व बाबा रामदेव के आंदोलनों का समर्थन करते हुए कहा कि उनको देश की जनता का पूरा समर्थन व विश्वास हासिल है। इसलिए सरकार के अनर्गल आरोपों का जवाब देने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी केंद्र सरकार के मंत्रियों को इस बारे में सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं है। भाजपा नेता ने एयर इंडिया के हालातों पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए सरकार से इस मामले में श्वेत पत्र लाने की मांग की है। रूड़ी ने कहा कि इस सरकारी कंपनी को 40 हजार करोड़ का घाटा हो चुका है और हर रोज 22 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। एयर इंडिया के कई कर्मचारियों को 2-3 महीनों से वेतन न मिलने की खबरें भी सामने आ रही हैं, जो चिंताजनक है।