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Sunday, May 15, 2011

ममता ने दिखा दी क्षमता


पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे का चौंतीस वर्षो का अखंड राजयोग खत्म हो गया। बंगाल में इसे वाम युग का अवसान कहना चाहिए। राज्य की राजनीति में बंगाल गौरव के प्रतीक वाले तीन युग हैं। एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस युग, दूसरा विधान चंद्र राय युग और तीसरा वाम युग। वाममोर्चा ने पहली बार 21 जून 1977 को बंगाल की बागडोर थामी थी, उसके बाद राज्य विधानसभा चुनावों में बहुमत पाकर लगातार सात बार सरकार बनाने का प्रतिमान उसने बनाया। लगातार आठवीं बार सत्ता हासिल करने का इतिहास रचने का गौरव उसे इस बार नहीं मिला, क्योंकि इस मर्तबा जनता ने वाम की जगह ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस को अपने भरोसे का साथी माना। मतदाताओं द्वारा वाम को नकारे जाने का एक आशय यह भी है कि वाममोर्चा जनता से कट गया है। बंगाल में वाम को नकारने की शुरुआत तो तीन साल पहले जून 2008 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों से ही हो चुकी थी। पंचायत चुनावों के बाद हुए लोकसभा चुनाव, विधानसभा की दस सीटों के उपचुनाव और 81 पालिकाओं के चुनावों में भी जनादेश वाममोर्चा के विरुद्ध गए थे। वाम नकार की वह धारावाहिकता इस विधानसभा चुनाव में भी अक्षुण्ण रही। इसकी एक नहीं, अनेक वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की औद्योगिक लाइन रही है। नंदीग्राम, सिंगूर, लालगढ़ और राजारहाट में स्थानीय आबादी ने वाम की औद्योगिक लाइन के विरोध में विद्रोह किया तो उसे कुचलने के लिए वाम सरकार ने दमन चक्र चलाया, तब तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता संकट में पड़ी जनता के साथ खड़ी हुई। सिंगुर के किसानों की जमीन बचाने के लिए ममता ने 26 दिनों का अनशन भी किया था और तभी वे बंगाल के किसानों के भरोसे की स्वाभाविक मित्र बन गई। ग्रामीण पश्चिम बंगाल को लगा कि उनकी जमीन ममता ही बचा सकती हैं। जमीन बचेगी तो जीविका और जीवन बचेगा। ग्रामीण बंगाल ही वाममोर्चे की भित्ति रहा है। वाममोर्चे से उसके आंखें फेरने से परिवर्तन की बुनियाद पुख्ता पड़ गई थी। ममता के मां, माटी और मानुष के नारे में किसानों व आदिवासियों को उद्धार नजर आया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने और रिजुवानुर रहमान की हत्या के बाद तो राज्य के अल्पसंख्यकों का भी वाममोर्चे से मोहभंग होने लगा। राज्य की आबादी के 27 प्रतिशत मुसलमान हैं और उनके मोहभंग से सत्ता से माकपा की विदाई बिल्कुल तय हो गई। इस आबादी ने भी ममता पर विश्वास किया तो इसलिए कि ममता ने पश्चिम बंगाल की जनता की पीड़ा से खुद को लंबे समय से जोड़े रखा है। जहां पीडि़त जनता, वहीं ममता। याद रखना चाहिए कि लंबे समय से सड़क से लेकर संसद तक अपने ढंग से लड़ने-भिड़ने वाली ममता व्यक्तिगत राजनीतिक लड़ाई के बल पर ही एक बड़ी जननेता के रूप में उभरी हैं। उनका संग्राम इस नाते भी बेहद महत्वपूर्ण है कि वह जातिवाद, क्षेत्रवाद या धर्मवाद से परे हैं। यही ममता की राजनीतिक क्षमता है। ममता की राजनीतिक क्षमता और उनके करिश्माई व्यक्तित्व के आगे माकपा के कई दिग्गज तक इस चुनाव में नहीं टिक पाए। मुख्यमंत्री बुद्धदेव, उद्योग मंत्री निरूपम सेन, आवासन मंत्री गौतम देव, वित्तमंत्री असीम दासगुप्त, शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य, स्वास्थ्य मंत्री सूर्यकांत मिश्र, सुंदरवन विकास मंत्री कांति गांगुली जैसे दिग्गज वाम नेता चुनाव हार गए हैं। भारी बहुमत पाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती जनता के विश्वास पर खरा उतरने की है। वाममोर्चे को हराने की चुनौती से ज्यादा बड़ी चुनौती उसके सामने बंगाल में सत्ता में टिके रहना और उसे सुचारू रूप से चलाते जाना है। इस प्रचार को झूठा साबित करने की चुनौती ममता के समक्ष है कि उनकी पार्टी में सरकार चलाने लायक लोग नहीं हैं। सत्ता में परिवर्तन चूंकि ममता के कारण आया है, इस परिवर्तन की वाहक चूंकि खुद ममता हैं, इसलिए उनसे उम्मीदें ज्यादा हैं। सबसे पहले तो राज्य की बिगड़ी कानून-व्यवस्था की स्थिति पर उन्हें काबू पाना होगा। हर तरह के रक्तपात को बंद करना होगा। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह माकपा नेता गौतम देव, अनिल बसु व सुशांतो घोष द्वारा ममता के बारे में लगातार अशोभनीय बातें कही गई, लेकिन किसी पर ममता ने प्रतिक्ति्रया नहीं देकर अपार संयम का परिचय दिया, इसी तरह की राजनीतिक परिपक्वता वह आगे भी दिखाएंगी, यह उम्मीद लाजिमी है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


वामदलों पर आवाम की मार


ममता को मिले जनादेश की आंधी में वामपंथ का अभेद्य किला आखिरकार भर-भराकर गिर ही गया। मा‌र्क्स के चेलों की दहाड़ अब मंद हो चली है। विकल्पहीनता को विजय का औजार समझने वाले कॉमरेड अंत तक ममता बनर्जी को घरेलू नायिका की तर्ज पर ही देखते-समझते रहे, लेकिन ममता ने 34 साल तक राजनीतिक उत्थान के शिखर पर आसन जमाए वामपंथियों को पतन का पाताल दिखाकर साबित कर दिया कि लोकतंत्र को सत्ता के घातक हथियारों से दीर्घकाल तक हांका नहीं जा सकता है। लोकतंत्र में जनता-जनार्दन ही सत्ता की संरचना पर अपनी अंतिम मुहर लगाती है और उसकी अनदेखी सत्ता के हिमालय को भी दरका देती है, लेकिन वामपंथियों ने इस कड़वी सच्चाई को समझने में भूल की। फिर जनता ने भी वामपंथी सरकार की हेकड़ी को तोड़ते हुए ममता के दामन में सत्ता की कुंजी सौंप दी। ममता बनर्जी की झोली में दो तिहाई से अधिक सीटें देकर पश्चिम बंगाल की जनता ने साबित कर दिया कि वह वामपंथियों की अधिनायकवादी सत्ता से मुक्ति पाने के लिए किस हद तक बेचैन थी। ममता ने अपनी जीत को मां, माटी और मानुष की जीत बताने के साथ उसे गुरु रवींद्रनाथ टैगोर को समर्पित कर लोगों के दिल में जगह बनाने की पहल कर दी है। वामपंथी जमात अपनी हार के लिए अब चाहे जितना भी तर्क गढ़े, मंथन करे या अपना माथा धुने, लेकिन सच तो यही है कि अगर उसकी ताकत महज छह दर्जन सीटों तक ही सिमट कर रह गई है तो इसके लिए उसकी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। साढ़े तीन दशक का शासनकाल एक लोकतांत्रिक सरकार को काम करने के लिए कम नहीं होता है। इस दरम्यान चाहे तो कोई भी सरकार विकास की गंगा बहाकर नए कीर्तिमान स्थापित कर सकती है। राज्य का कायाकल्प कर समृद्धि का ताना-बाना बुन सकती है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि जनपक्षधरता की बात करने वाली वामपंथी सरकार इस दिशा में क्यों विफल रही? विकास करना तो दूर, वह विकास का ब्लू प्रिंट तक तैयार नहीं कर सकी। पश्चिम बंगाल में दीर्घकालीन वामपंथी शासन के उग्र तेवर और विकास के कोरे बकवास ने सब कुछ स्वाहा कर दिया। वामपंथी सरकार की कोख से पैदा हुए राजनीतिक गुंडों और अराजकवादियों ने साम्यवाद के भोथरे नारे से सरकार की शह पर पश्चिम बंगाल में यत्र-तत्र फैले कल-कारखानों को बंद कराने के साथ आम आदमी के हक और अधिकार को भी कुचल डाला। प्रतिष्ठित ट्रेड यूनियनों पर मजदूर वर्ग के नेतृत्व की पकड़ ढीली कर वामपंथपोषित अराजकतावादी कॉमरेडों ने अलोकतांत्रिक ढंग से अपनी कब्जादारी जमाई। वामपंथी सरकार ने सुनियोजित साजिश के तहत गांव-गांव में अधिनायकवादी संगठनों को खड़ा किया और पंचायतों को अराजक और लंपट किस्म के कामरेडों के हाथों में गिरवी रख लोकतंत्र की ताकत को कमजोर किया। विष भरी इसी संजीवनी से ही माओवादियों का जन्म हुआ और उसके रक्तबीज से धीरे-धीरे पूरा पश्चिम बंगाल लहूलुहान हो उठा। पंचायतों पर काबिज वामपंथी गुंडों और माओवादियों की दबंगई गुल खिलाने लगी। उनकी भस्मासुरी ताकत ने वामपंथी सरकार को साढ़े तीन दशक तक विधानसभा चुनावों में अपना परचम लहराने का सुनहरा अवसर प्रदान किया, लेकिन विकास की अनदेखी और जनता के साथ राजनीतिक ठगी का खेल लोकतंत्र में दीर्घकाल तक कारगर साबित नहीं होता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अगर आज पश्चिम बंगाल की धरती से साम्यवादी तंबू को उखाड़ने में ममता बनर्जी को कामयाबी मिली है तो इसके लिए वामपंथी सरकार की विनाशकारी आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार हैं। साढ़े तीन दशक पूर्व जब कामरेड पश्चिम बंगाल की सत्ता पर अपना पांव पसारे तो उनके कुटिल इंकलाबी अभियान को कोई समझ नहीं पाया। उन्होंने जमीनों का तो बंटवारा किया, लेकिन उनके द्वारा दिखाया गया सब्जबाग कि वामपंथी सरकार समाज में आर्थिक बराबरी लागू करने के साथ कृषि को बढ़ावा देगी और छोटे-छोटे लघु व कुटीर उद्योगों की स्थापना कर राज्य का चहुमुखी विकास करेगी, सब कोरी बकवास ही साबित हुआ। वामपंथी सरकार द्वारा विकास का दावा और फिजूल का नारा हुगली की तेज धार में बहता चला गया। वामपंथियों ने अपने राजनीतिक नकारेपन से पश्चिम बंगाल को देश के पिछड़तम राज्यों में शुमार कर दिया। जहां देश के अन्य राज्य विकास के नए-नए पैमाने गढ़ते देखे गए, वहीं पश्चिम बंगाल के साम्यवादी पैरोकार पंथनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की खिचड़ी पकाने में मशगुल रहे। पंथनिरपेक्षता का चोंगा ओढ़ रखे इन राजनीतिक बहुरुपियों ने समझ लिया कि उनके निरर्थक गाल बजाने मात्र से ही उनकी हुकूमत बची रहेगी। वामपंथी सरकार की विकास की अधकचरी व्याख्या ने शिक्षा और स्वास्थ्य को रसातल में पहुंचा दिया। गरीबी मिटाने के नाम पर वामपंथी गुंडों ने सरकारी संरक्षण में सार्वजनिक धन को लूटना शुरू कर दिया। सांप्रदायिकता का भूत खड़ा करने में माहिर वामपंथी नुमाइंदों ने अल्पसंख्यक हितों की पैरोकारी कर हर बार उन्हें छलने का काम किया और उनकी ताकत से सत्ता तक पहुंचने की जुगत भिड़ाई, लेकिन इस बार के चुनाव में धर्मनिरपेक्षता का चोंगा पहन रखी वामपंथी जमात का घिनौना चेहरा अल्पसंख्यकों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सका। ममता के मैदान में आ डटने से वामपंथियों का धर्मनिरपेक्षता भरा स्वांग और उनकी जुगाली धरी की धरी रह गई। ममता बनर्जी ने वामपंथियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया। उन्होंने भी आरक्षण का चारा डालकर अल्पसंख्यक मतों को अपने पक्ष में धु्रवीकरण करने का खेल खेला। वामपंथ की सरकार जब तक चेतती, बंगाल की शेरनी ममता चुनावी बिसात पर अपना अंतिम पासा फेंक गई। बंगाल की जनता के मन में राजनीतिक बदलाव का भाव हिलोरें मारने लगा। ममता की सक्रियता को देखकर सरकार की व्याकुलता बढ़नी स्वाभाविक थी। वामपंथी सरकार ममता की काट के लिए आम जनता को विकास का अमृत चखाने के बहाने कल-कारखानों की स्थापना की मुनादी पीटने लगी। मा‌र्क्स के तथाकथित शिष्यों को भी पूंजी और औद्योगिकरण की सार्थकता समझ में आने लगी। साम्यवादी विचारधारा से उकता चुके मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को यहां तक कहना पड़ा कि पश्चिम बंगाल के औद्योगिकरण के लिए पूंजीवाद एकमात्र रास्ता है। पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय ज्योति बाबू ने भी गुहार लगाई थी कि हमें पूंजी चाहिए, भले ही वह देसी हो या विदेशी। लेकिन त्रासदी यह रही कि विकास की चिंता और पूंजी के प्रभाव को वामपंथियों ने तब समझा, जब उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक चुकी थी। वाम सरकार ने हड़बड़ी दिखाते हुए जमीनों का ताबड़तोड़ अधिग्रहण करना शुरू कर दिया, लेकिन वाम सरकार द्वारा उपजाऊ जमीनों का अधिग्रहण बर्रे के छत्ते में हाथ डालने जैसा साबित हुआ। सिंगूर और नंदीग्राम में उपजाऊ जमीनों का जबरन अधिग्रहण वामपंथी सरकार के विनाश का कारण बन गया। सिंगूर में टाटा उद्योग समूह की नैनो कार परियोजना के लिए सरकार द्वारा अधिग्रहित की गई एक हजार एकड़ जमीन और किसानों द्वारा उसका जबरदस्त विरोध सरकार के गले की फांस बन गया। मैदान में ममता बनर्जी के कूद जाने से न सिर्फ टाटा को सिंगूर छोड़कर भागना पड़ा, बल्कि वामपंथी सरकार के खिलाफ पश्चिम बंगाल में एक नया मोर्चा खुल गया। सिंगूर और नंदीग्राम में किसानों का बहने वाला खून वामपंथी सरकार के चेहरे को इतना वीभत्स बना दिया कि हर ओर सरकार के खिलाफ विद्रोह के स्वर बुलंद होने लगे। ममता ने सिंगूर और नंदीग्राम में उठी आग की लपटों को अपने दामन में समेट सरकार के खिलाफ मुहिम तेज कर दी। ममता की लड़ाई रंग लाने लगी। पराजय के इस संकेत ने आईने की तरह साफ कर दिया कि कॉमरेडों के हाथ से पश्चिम बंगाल की लगाम अब तेजी से छूटती जा रही है। राजनीतिक पाखंड के बूते राजकाज चलाने वाली वामपंथी सरकार को उस वक्त और करारा झटका लगा, जब उसे विधानसभा उपचुनावों से लेकर शहरी निकायों एवं पंचायत चुनावों में मुंह की खानी पड़ी। वामपंथ के पहरूओं को भी अपना लालदुर्ग हिलता दिखाई देने लगा, लेकिन दुर्ग को बचाने के सारे विकल्प बंद थे। ऐतिहासिक कालखंड पर लिखी इबारत तो यही बताती है कि जो बोया जाता है, उसे काटना ही पड़ता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


जनता का सबक


पांच राज्यों के चुनाव नतीजेइस अर्थ में चकित करते हैं कि न तो किसी को यह आशा थी कि ममता बनर्जी इतनी शानदार जीत हासिल करेंगी और न ही कोई यह मान रहा था कि तमिलनाडु में करुणानिधि जयललिता के हाथों इतनी बुरी तरह पराजित होंगे। इसी तरह किसी को इस पर भरोसा नहीं था कि असम में तरुण गोगोई लगातार तीसरी बार जीत हासिल करेंगे और वह भी करीब-करीब दो तिहाई बहुमत से। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे की जीत तय मानी जा रही थी और वैसा ही हुआ, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चुनाव लड़ने से वंचित किए जा रहे मुख्यमंत्री अच्युतानंदन के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। सबसे प्रत्याशित नतीजे रहे केंद्र शासित राज्य पुद्दुचेरी में। पुद्दुचेरी ने हमेशा की तरह तमिलनाडु का अनुसरण किया, लेकिन यह उल्लेखनीय है कि यहां कांग्रेस को उन्हीं रंगासामी ने जयललिता से मिलकर सबक सिखाया जिन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था। चूंकि चुनाव परिणाम महज हार-जीत ही तय नहीं करते इसलिए पांच राज्यों के नतीजों का एक मात्र निष्कर्ष कुछ दलों अथवा नेताओं का उत्थान-पतन भर नहीं है। ये चुनाव परिणाम यह भी बता रहे हैं कि अब आम जनता कुशासन के किसी भी रूप को सहन करने के लिए तैयार नहीं है। यदि तमिलनाडु में करुणानिधि मतदाताओं को एक तरह से नकद रिश्वत देने के बाद भी खेत रहे और उनके कुशासन के दुष्परिणाम कांग्रेस को भी भोगने पड़े तो इस पर किसी को चकित नहीं होना चाहिए। तमिलनाडु के संदर्भ में राजनीतिक पंडितों की इस धारणा का ध्वस्त होना शुभ संकेत है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का असर केवल शहरी आबादी तक रहेगा। ऐसी धारणाएं ध्वस्त होनी ही चाहिए। नि:संदेह पश्चिम बंगाल में वाम दलों का कुशासन तमिलनाडु जैसा नहीं था, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि था वह भी कुशासन ही। वाम दलों के अराजक और मनमाने शासन को ममता बनर्जी ने जिस तरह अकेले दम पर ढहाया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। पश्चिम बंगाल में 34 वर्षो बाद वाम दलों का सत्ता से बाहर होना भारत ही नहीं, विश्व राजनीति की भी एक बड़ी घटना है। ममता की सफलता इसलिए करिश्माई है, क्योंकि वह पहली ऐसी महिला नेता हैं जिन्होंने अपने बलबूते राजनीतिक सफलता के एक कठिन नजर आने वाले शिखर को छुआ। यदि केवल त्रिपुरा की सत्ता तक सिमटे और केरल में किसी तरह लाज बचाने में सफल वाम दल यह बुनियादी सबक नहीं सीखते कि महज नारेबाजी के जरिये जनता के हितों की रक्षा नहीं हो सकती तो फिर विचारधारा के स्तर पर भी उनका पराभव हो सकता है। यह शुभ संकेत है कि ममता बनर्जी अपनी चुनौतियों से परिचित हैं, लेकिन बात तब बनेगी जब वे आम जनता की उम्मीदों पर खरी उतरेंगी। बंगाल की शेरनी की संज्ञा से विभूषित ममता के जुझारू नेता होने में कोई संदेह नहीं, लेकिन उन्हें अभी खुद को एक कुशल प्रशासक सिद्ध करना है। उन्हें सीख लेनी चाहिए तरुण गोगोई जैसे नेताओं से जिन्होंने यह साबित किया कि यदि आम आदमी को संतुष्ट किया जा सके तो सत्ता विरोधी पहलू को भी आसानी से मात दी जा सकती है। दरअसल तरुण गोगोई की सफलता से सभी नेताओं को सीख लेनी चाहिए, क्योंकि असम के साथ-साथ पांच राज्यों के चुनाव परिणाम यही कह रहे हैं कि अब जनता नेताओं के कोरे वायदों पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं।