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Monday, February 27, 2012

परिवारवाद की राजनीति का नया पहलू


अमेठी में प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने जिस तरह जनता के बहाने अपनी महत्वाकांक्षाओं को जाहिर किया है, उससे साफ है कि देश के पहले राजनीतिक परिवार का रिश्तेदार होने के चलते उनके मन के किसी कोने में राजनीति में उतरने को लेकर दबी-ढकी आकांक्षा जरूर है। रॉबर्ट वाड्रा का यह कहना कि अगर जनता ने चाहा तो वह राजनीति में आ सकते हैं, कांग्रेसी राजनीति के गलियारों में इसे पत्रकारों के सवालों के फौरी जवाब के तौर पर बताकर टालने की कोशिशें तेज हो गई हैं। यह भी बताने की कोशिश हो रही है कि रॉबर्ट वाड्रा की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन इसे उनके सामान्य बयान की तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि सबसे पहले उनके बयान को उनकी पत्नी प्रियंका गांधी ने ही खारिज किया। जैसा कि हर बार ऐसे बयानों में होता है कि पूरा दोष मीडिया पर थोप दिया जाता है। प्रियंका ने भी कुछ ऐसा ही कहा। उन्होंने मीडिया को जिम्मेदार ठहराते हुए कह दिया कि मीडिया ने उनसे सवाल पूछा और इसका उन्होंने जवाब दे दिया। प्रियंका ने कहा, लोग मुझे राजनेता के तौर पर देखना चाहते हैं, लेकिन मेरा और मेरे पति का फिलहाल सक्रिय राजनीति में आने का कोई इरादा नहीं है। हम राहुल गांधी के मिशन उत्तर प्रदेश को सफल बनाने के लिए काम कर रहे हैं। रॉबर्ट वाड्रा की राजनीति में आने की सचमुच कोई इच्छा है या नहीं, इसकी पड़ताल से पहले यह देखना जरूरी है कि प्रियंका को लेकर आम कांग्रेसी क्या सोचते हैं। कांग्रेस शायद ही इसे स्वीकार करे कि मौजूदा विधानसभा चुनावों में हाथ के पंजे के सहारे चुनाव मैदान में उतरे लोगों की एक ही चाहत रही है कि प्रियंका उनके यहां आएं, प्रचार करें। हर बार जब भी चुनाव आते हैं, कांग्रेसी हलकों में यह हसरत नए सिरे से परवान चढ़ने लगती है। अगर आम चुनाव हो रहे हों तो प्रियंका को लेकर लोगों में उत्सुकता बढ़ जाती है। कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता तो चाहते ही हैं कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में आएं और उनकी नैया को चुनावी राजनीति से पार ले जाकर राजनीति की उस ऊंचाई पर पहुंचा दें, जो कम से कम अस्सी के दशक तक विकल्पहीन रही है। जिस विकल्पहीनता के चलते कांग्रेस इस देश की स्वाभाविक पार्टी रही है, कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं और नेताओं का अब भी यही मानना है कि अतीत का उसका सियासी ऐश्वर्य कोई वापस दिला सकता है तो वह प्रियंका गांधी ही हैं। आम चुनाव और उत्तर प्रदेश के चुनावों के ठीक पहले इस तरह की हसरतें सिर्फ कांग्रेस का कार्यकर्ता या नेता ही पालना शुरू नहीं करता, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी इस हसरत को पूरा होते देखने के लिए मचल उठती है। यही वजह है कि कांग्रेस के चुनावी अभियान के तहत अमेठी और रायबरेली में उतरी प्रियंका गांधी की तरफ देश का प्रदर्शनकारी मीडिया दौड़ लगा पड़ता है। प्रदर्शनकारी मीडिया टीआरपी के दबावों का लाख हवाला दे, लेकिन हकीकत तो यही है कि उसके मन में भी कहीं न कहीं कांग्रेसी कार्यकर्ताओं जैसी हसरत रहती है। हो सकता है कि प्रदर्शनकारी मीडिया की दिलचस्पी कांग्रेस के गौरवमयी अतीत की वापसी में उतनी नहीं हो, लेकिन यह तय है कि प्रियंका के राजनीति में सक्रिय होने को लेकर हसरतमंद तो वह है ही। मीडिया का एक धड़ा अपनी इस प्रियंका प्रियता के तहत कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की चाहत को ही सार्वजनिक अभिव्यक्ति करार देता है। यही वजह है कि प्रियंका के रोड शो से लेकर रॉबर्ट वाड्रा तक के मोटरसाइकिल जुलूस को पूरा फोकस मिलता है। उत्तर प्रदेश के मौजूदा चुनाव में कई और लोग भी लगे हुए हैं। खुद समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव पूरा सूबा अपने क्रांति रथ के सहारे नाप चुके हैं, लेकिन मीडिया का उन्हें वह अटेंशन हासिल नहीं हो पाया है, जो प्रियंका या रॉबर्ट वाड्रा को मिल रहा है या मिला है। इसे लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहे हैं, होते रहेंगे। लेकिन एक तथ्य तो साफ है कि प्रियंका की तरफ देश में एक खास तरह की उत्सुकता जरूर है। ऐसे माहौल में अगर राबर्ट वाड्रा कहते हैं कि जनता अगर चाहेगी तो वह भी सक्रिय राजनीति में आ सकते हैं तो दरअसल वह भी कांग्रेसी हसरतों को ही नई अभिव्यक्ति दे रहे होते हैं। इसमें उनकी राजनीति हसरतें भी ढूंढ़ी जा सकती हैं। उनकी हसरतों का चीरफाड़ होना जरूरी भी है, लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस का सर्वोच्च परिवार इस हसरत को कैसे लेता है। राजनीति में आने की रॉबर्ट वाड्रा की हसरतों को जिस तरह से तत्काल खारिज किया गया, उसके संकेत तो यही हैं कि फिलहाल कांग्रेस का सर्वोच्च परिवार अभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे राहुल की सर्वस्वीकार्यता पर सवाल उठे और कांग्रेसी नेताओं में कोई गलत संकेत जाए। राहुल गांधी लाख कहें कि वह प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहते। प्रियंका भी राजनीति में आने से लाख इनकार करें, लेकिन कांग्रेस का कार्यकर्ता तो यही मानता है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। उसे उम्मीद है कि प्रियंका राजनीति में जरूर आएंगी। विपक्ष के रस्मी विरोध को भी छोड़ दें तो वह भी राहुल को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देख रहा है। उसे भी लगता है कि अगर 2014 के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला या सरकार बनाने की हैसियत हासिल हुई तो निश्चित है कि राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री होंगे। ऐसे में अगर रॉबर्ट वाड्रा अपनी राजनीतिक आकांक्षा को जाहिर करते हैं तो निश्चित तौर पर इसे राहुल के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखे जाने की आशंका बढ़ सकती है और कांग्रेस आलाकमान इस तरह का खतरा क्यों उठाने लगा। वैसे भी राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जिंदा करने के लिए जिस तरह से दिन-रात एक कर रखा है, उससे उनकी साख दांव पर लगी है। उत्तर प्रदेश में सुप्त पड़ी कांग्रेस में वे प्राण का संचार कर चुके हैं, लेकिन मौजूदा चुनावों में वह ताकतवर होकर उभरती है तो निश्चित तौर पर इसका पूरा श्रेय उन्हें ही जाएगा, जिसकी कांग्रेस आलाकमान को काफी दिनों से उम्मीद है। बिहार चुनावों में राहुल गांधी की तमाम मेहनत के बावजूद कांग्रेस कोई कमाल नहीं दिखा सकी, उलटे उसका प्रदर्शन शर्मनाक ही रहा। ऐसी हालत में उत्तर प्रदेश में अगर कांग्रेस उभर कर सामने आती है तो राहुल के खाते में चमत्कारिक नेतृत्व की एक उपलब्धि जुड़ सकती है, जो उनके प्रधानमंत्री बनने के लिए एक और मजबूत आधार मुहैया करा सकती है। लेकिन ठीक चुनावों के बीच रॉबर्ट द्वारा राजनीति में आने की इच्छा जाहिर करना राहुल की भावी कामयाबी को भी कमजोर कर सकता है। अगर कांग्रेस आलाकमान ने रॉबर्ट की आकांक्षाओं से सहमति जता दी तो इससे राहुल और प्रियंका के बीच सियासी तुलनाओं का दौर शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। निश्चित तौर पर यह कांग्रेस और उसके पहले परिवार के लिए मुफीद नहीं होगा, लेकिन राबर्ट ने एक तथ्य की ओर इशारा कर दिया है कि मौका मिले तो वे भी हाथ आजमाने को तैयार हैं। इन अर्थो में चुनावी राजनीति में उतरने को लेकर अपनी दावेदारी उन्होंने जता ही दी है, लेकिन कांग्रेस के मौजूदा क्रम में उन्हें राहुल को सर्वस्वीकार्य बनने तक इंतजार करना ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, June 15, 2011

भाजपा में उमा की वापसी के मायने


उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी के समय जिस उत्साह की उम्मीद की जा रही थी, दिल्ली के पार्टी मुख्यालय में वैसा तो कुछ नजर नहीं आया, लेकिन जिस उत्तर प्रदेश की कमान उन्हें सौंपी गई है वहां से उनके खिलाफ पहला बयान जरूर आ गया। पार्टी उपाध्यक्ष और कभी भारतीय जनता पार्टी के बजरंगी चेहरा रहे विनय कटियार ने उनका वैसा स्वागत नहीं किया जैसी सदाशयता और उत्साही प्रतिक्रिया शिवराज सिंह चौहान ने दिखाई। विनय कटियार की तरफ से ठंडी प्रतिक्रिया के अपने खास अर्थ हैं, जिन्होंने तेरहवीं और बारहवीं लोकसभा का नजारा देखा है उन्हें पता है कि भारतीय जनता पार्टी की तब की हल्ला ब्रिगेड को संसदीय कार्यमंत्री मदन लाल खुराना या बाद में प्रमोद महाजन तक चुप कराने का अपना संवैधानिक और पार्टीगत दायित्व नहीं निभा पाते थे। हालांकि उस हल्ला ब्रिगेड को उमा भारती अपने एक इशारे से चुप करा देती थीं। मध्य प्रदेश से सांसद प्रह्लाद पटेल, राजस्थान से सांसद श्रीचंद कृपलानी और उत्तर प्रदेश से विनय कटियार भारतीय जनता पार्टी की हल्ला ब्रिगेड के प्रमुख सदस्य थे और कांग्रेसी आरोपों का तल्ख जवाब देने में माहिर थे। उसी ब्रिगेड के सदस्य विनय कटियार को अगर उमा भारती की पार्टी में वापसी सहजता से स्वीकार्य नहीं है तो सवाल उठेंगे ही। हालांकि विनय कटियार ने अगले ही दिन अपना बयान बदलने में देर नहीं लगाई। उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीसरे स्थान पर खिसक चुकी भारतीय जनता पार्टी को पहले स्थान पर लाने की नितिन गडकरी की कोशिशों के बीच विनय कटियार की ठंडी और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया से साफ है उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह आसान नहीं है। उमा भारती की वापसी के दौरान यूं तो गडकरी के अलावा दूसरे कोई बड़े नेता मौजूद नहीं थे, सिवाय शहनवाज हुसैन के। 10 नवंबर, 2004 को भारतीय जनता पार्टी की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में आडवाणी को खरी-खोटी सुनाने के बाद जब उमा भारती बाहर निकली थीं तो उस वक्त मौजूद भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता हक्के-बक्के रह गए थे, लेकिन किसी ने उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं दिखाई। उस वक्त उन्हें शांत करते हुए रोकने की कोशिश सिर्फ और सिर्फ राजनाथ सिंह ने की थी। उमा की वापसी के दौरान पार्टी मुख्यालय में राजनाथ सिंह की गैर मौजूदगी इसीलिए खलती रही। शहनवाज हुसैन की मौजूदगी की वजह यह है कि भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते उमा भारती ने शहनवाज को अपनी कार्यसमिति में शामिल किया था। हालांकि शहनवाज बहुत आगे निकल चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी में उनकी हैसियत बदल चुकी है। उमा की वापसी के वक्त पार्टी मुख्यालय में मौजूद रहकर उन्होंने सदाशयता का परिचय दिया। 2008 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के पहले भारतीय जनता पार्टी और उमा भारती के कुछ शुभचिंतकों ने उमा भारती को पार्टी में लौट जाने का सुझाव दिया था। उन शुभचिंतकों की सलाह थी कि उमा जैसी नेता भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है और उमा के पास भारतीय जनता पार्टी जैसा संगठन नहीं है। उमा के लिए मजबूत संगठन बनाना आसान नहीं था तो पार्टी के लिए उमा जैसा नेता मिलना कठिन था। ऐसे में दोनों एक-दूसरे के पूरक बन सकते थे, लेकिन उमा को लगता था कि 2003 के जिस प्रचंड जनादेश के सहारे उन्होंने मध्यप्रदेश में दस साल के दिग्विजयी शासन को उखाड़ फेंका था, उसमें सिर्फ और सिर्फ उनका ही योगदान था। उमा जैसी नेता यह भूल गई कि कैडर आधारित पार्टियों में कार्यकर्ता अपने नेता के साथ सहानुभूति तो रख सकते हैं उसका आदर भी कर सकते हैं, लेकिन वोट डालने का मौका आने पर वह पार्टी की डोर छोड़ने में हिचकते हैं। कैडर आधारित पार्टियों के साथ एक और मजबूरी होती है कि वहां के नेता के लिए अपनी पार्टी से अलग ताकत हासिल कर पाना आसान नहीं होता। यह सिद्धांत सिर्फ भारतीय जनता पार्टी पर ही लागू नहीं होता, उसकी धुर विरोधी वामपंथी पार्टियों के लिए भी यही सच है। एक दौर में मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में सैफुद्दीन चौधरी की तूती बोलती थी, लेकिन सीपीएम से अलग होने के बाद उनकी कोई पहचान नहीं है। हालांकि उन्होंने भी अपनी अलग पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल में वामपंथी पार्टियों का विकल्प बनने की कोशिश की। और तो और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सियासत भी इसका उदाहरण है। अगर इस सियासत का थोड़ा-बहुत कोई अपवाद है तो वह हैं झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, जो भाजपा से अलग होने के बाद भी अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने में कामयाब हैं। रही बात उत्तर प्रदेश में उमा भारती के आने के बाद बदलते चुनावी समीकरणों की तो उसे लेकर अंकगणितीय फार्मूला देना आसान नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में सरकार चला चुकी भारतीय जनता पार्टी की हालत यह है कि वह तीसरे नंबर पर खिसक गई है। पिछले दो-तीन चुनावों से माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मतदाता मजबूत नेतृत्व के अभाव में उससे दूर भागते जा रहे हैं। 1991 में जब पहली बार कल्याण सिंह की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिला था तो उसमें पिछड़े वर्ग के वोटरों का बड़ा योगदान था। ब्राह्मण और बनिया की पार्टी मानी जाती रही भारतीय जनता पार्टी को पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहां चौहान यानी नोनिया, कोइरी, कुर्मी और राजभर जातियों का भरपूर सहयोग मिला था। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उसे लोध राजपूतों का एकमुश्त समर्थन मिला था। पूर्वी उत्तर प्रदेश से पार्टी के पास ओमप्रकाश सिंह जैसा पिछड़ा नेतृत्व था, लेकिन पार्टी की गुटबाजी में ओमप्रकाश सिंह किनारे लगा दिए गए। 1999 के लोकसभा चुनावों में कल्याण सिंह की बेरुखी ने लोध राजपूतों को भारतीय जनता पार्टी से अलग कर दिया, जिसकी वजह से पार्टी 23 लोकसभा सीटें हार गईं। उमा भारती भी उसी लोध राजपूत समुदाय से आती हैं और माना जा रहा है कि कल्याण सिंह की नाराजगी की वजह से जो लोध वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी से दूर चला गया था उसे वापस खींचने में मदद मिलेगी, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में जिस तरह भारतीय समाज पार्टी ने अपना दबदबा बनाया है उसमें नोनिया और राजभर जातियों के वोट वापस भारतीय जनता पार्टी की तरफ मोड़ना आसान नहीं होगा। इसके लिए उमा भारती को कोशिश करनी होगी। हालांकि उनकी कोशिशों का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक उत्साही और मजबूत की नेतृत्व की कमी से जूझ रही उत्तर प्रदेश इकाई के भारतीय जनता पार्टी के सभी प्रमुख नेता उमा भारती का सहयोग करें। वैसे दो-तीन चुनावों से उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं के मोहभंग की वजह राज्य में दमदार नेतृत्व की कमी भी रही। भारतीय जनता पार्टी का आलाकमान कलराज मिश्र और लालजी टंडन पर चाहे जितना भरोसा करे, लेकिन उनकी राजनीतिक हनक वैसी नहीं है जैसी जनता नेतृत्व से उम्मीद करती है। चूंकि उमा राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र और लालजी टंडन की तुलना में जवान हैं, घोटाले और भ्रष्टाचार के खुलासों के दौर में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप नहीं हैं फिर उनका अतीत फायर ब्रांड नेता का रहा है। ऐसे में पार्टी के लिए उनसे उम्मीदें बांधना गलत भी नहीं है। उमा के उत्तर प्रदेश की चुनावी कमान संभालने के बाद अगर किसी पार्टी की परेशानी बढ़ सकती है तो वह कांग्रेस हो सकती है, क्योंकि ऐसा माना जा रहा था कि ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस की तरफ झुक रहा है, लेकिन हकीकत तो यही है कि भ्रष्टाचार, महंगाई और बाबा रामदेव से निबटने के तरीकों को लेकर ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस से नाराज नजर आ रहा है। पिछले दो चुनावों से अगर वह कभी कांग्रेस और कभी बहुजन समाज पार्टी की तरफ तैरता रहा है तो इसकी बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी के पास राज्य में मजबूत नेतृत्व का अभाव रहा है। चूंकि उमा दमदार रहीं हैं लिहाजा भारतीय जनता पार्टी का पारंपरिक मतदाता उन पर भरोसा कर सकता है। (लेखक पत्रकार हैं)


Sunday, January 23, 2011

राजनीति के भंवर में खाद्य सुरक्षा का अधिकार


जून 2004 में सोनिया गांधी की अध्यक्षता में जब राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया, तभी इसका विरोध शुरू हो गया था। खासकर विपक्षी दलों का आरोप था कि सोनिया की अध्यक्षता के चलते यह परिषद सुपर कैबिनेट की तरह व्यवहार करेगी। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकारों ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी के सुझावों को जिस तरह खारिज किया, उससे विपक्षी दलों के आरोप गलत साबित होते नजर आ रहे हैं। मनरेगा के तहत मजदूरी की दरें सरकारों द्वारा तय मजदूरी की न्यूनतम दरों जितना करने का राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सलाह दी, उसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने नामंजूर कर दिया। यह बात और है कि मनरेगा की मजदूरी दरों को उपभोक्ता सूचकांक से जोड़ते हुए इंकार के दो दिन बाद ही एक हद तक मान लिया गया। ताजा मसला खाद्य सुरक्षा विधेयक का है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने काफी विचार-विमर्श के बाद इसे प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपा, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से गठित रंगराजन समिति ने इसे अव्यवहारिक बताते हुए खारिज कर दिया। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली परिषद की सलाह को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा या फिर मनरेगा की तरह देर-सबेर मंजूरी मिल जाएगी। प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के बीच खींचतान फिलहाल मीडिया की सुर्खियों में है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने कुछ साल पहले देश के नागरिकों को भोजन का अधिकार देने का फैसला किया था। इसके अगले दौर में देश की चौथाई आबादी को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए शामिल करने की बात कही गई थी। इसे भी अव्यावहारिक मानते हुए पहले खारिज किया गया और फिर प्रस्ताव करके नए कानून की सिफारिश की गई। जिस पर भी अभी विचार-विमर्श जारी है। इसके तहत परिषद ने 46 प्रतिशत ग्रामीण और 28 प्रतिशत शहरी आबादी को 7 किलो प्रति व्यक्ति की दर से हर महीने अनाज देने की सिफारिश की है। इसके अलावा देश की करीब 75 फीसदी आबादी को दो किलो अनाज प्रति व्यक्ति की दर से हर महीने देने की बात की गई है। प्रधानमंत्री की समिति ने 46 फीसदी ग्रामीण और 28 फीसदी शहरी आबादी को 7 किलो प्रति व्यक्ति हर महीने अनाज देने की बात तो स्वीकार कर ली है, लेकिन बाकी लोगों को सरकारी आदेश के जरिये अनाज देने की बात कही जा रही है। यह अनाज उपलब्धता के आधार पर तय होगा। विवाद केवल इस पर नहीं है कि कितना अनाज दिया जाए, बल्कि विवाद इस बात पर भी है कि अगर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की योजना को ज्यों का त्यों लागू कर दिया जाएगा तो सरकारी खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा। सलाहकार समिति के मुताबिक इस योजना पर 80 हजार करोड़ रुपये सालाना का खर्च बैठेगा, जबकि रंगराजन समिति का अनुमान है कि इस पर 92 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि भूख खत्म करने की इस महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने के लिए प्रधानमंत्री की समिति ने सिर्फ 69 हजार करोड़ रुपये ही सालाना खर्च करने की सिफारिश की है। राष्ट्रीय सलाहकार समिति के मुताबिक यदि विधेयक पारित होता है तो देश को सालाना 540 लाख टन अनाज की जरूरत होगी, जबकि रंगराजन समिति के मुताबिक 690 लाख टन सालाना अनाज की जरूरत होगी। रंगराजन समिति का यह आकलन 2013-14 में अनाज उत्पादन के अनुमान की परिधि में ही है। समिति का अनुमान है कि 2013-14 में 570 लाख टन अनाज का उत्पादन हो सकता है। समिति का तर्क है कि अगर उसके मुताबिक योजना लागू हुई तो योजना के तहत आने वाले लोगों को भोजन तो मिलेगा ही, पांच लाख टन का बफर स्टॉक भी बनाए रखा जा सकेगा। प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के बीच टकराव के इन बिंदुओं पर विचार से ज्यादा महत्वपूर्ण भारतीय स्थिति को जानना भी है। देश में अनाज की जरूरत को जिस तरह दोनों समितियों ने आंका है पहले तो वही गलत है, क्योंकि विकासशील देशों की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत और उपलब्धता घटी है। विकासशील देशों में जहां यह आंकड़ा 182.1 किलोग्राम सालाना है, वहीं अपने यहां यह आंकड़ा महज 174.2 किलोग्राम है। 2008 की आर्थिक मंदी और विश्वव्यापी महंगाई के लिए तब अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भारतीयों द्वारा ज्यादा भोजन खाने को जिम्मेदार बताया था। हालांकि हकीकत तो यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, नार्वे, जर्मनी जैसे विकसित देशों में प्रति व्यक्ति अनाज की सालाना खपत 44 फीसदी कम है। इसी तरह झारखंड या दूसरे अति पिछड़े इलाकों से भुखमरी की आने वाली खबरों को हालांकि अधिकारी भुखमरी मानने से इंकार करते रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि भारत में अनाज की न सिर्फ उपलब्धता, बल्कि खपत भी घटी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का सुझाव इस स्थिति में बदलाव ला सकता है। एक अर्थशास्त्री आमतौर पर आर्थिक नजरिए से ही आंकड़ों का विश्लेषण औरआकलन करते हैं और वह मानवीय पक्ष को कम महत्व देते हैं। यही बात रंगराजन समिति के आकलन पर भी लागू होती है। वैसे खामियां तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के आकलन में भी है। अगर उसे भी ज्यों का त्यों मान लिया जाए तो ग्रामीण आबादी का 50 प्रतिशत और शहरी का 70 प्रतिशत हिस्सा उसमें नहीं शामिल हो पाएगा। सलाहकार परिषद ने 46 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पूर्वाधिकार सूची में रखा है। यह आंकड़ा तेंदुलकर कमेटी के आकलन से थोड़ा ही ज्यादा है। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रहे सुरेश तेंदुलकर की समिति ने 41.8 फीसदी आबादी को गरीबी रेखा के नीचे बताया था। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इसी तरह 28 फीसदी शहरी आबादी को इस श्रेणी में रखा है। यह तेंदुलकर समिति के 27.8 प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा है। ज्यां द्रेज की मेहनत के बाद राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इस अहम विधेयक की सिफारिश की है। उन्हें इस बात पर एतराज है कि प्रधानमंत्री की समिति ने उनके सुझाव को खारिज करते वक्त पिछले तीन साल के औसत अनाज उत्पादन को ही आकलन का आधार बनाया। पिछले तीन साल में औसत 550 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ है, लेकिन ज्यां द्रेज को लगता है कि इसमें सालाना 5 फीसदी की बढ़ोतरी संभव है। जिस तरह देश की उपजाऊ जमीन पर कारपोरेट घरानों का कब्जा बढ़ रहा है उससे उपजाऊ भूमि की कमी हो रही है, जिस पर शरद यादव को छोड़कर बाकी राजनेता सवाल नहीं उठा रहे। कई बार गरीबी रेखा के नीचे आने वाले वास्तविक हकदार भी वंचित रह जाते हैं, क्योंकि गरीबी रेखा के नीचे खुद को मनवाने के लिए इनके पास जरूरी कागजात नहीं होते। उसकी सूखी चमड़ी और काया भी इस गवाही में कमजोर साबित होती है। फिर समाज में जिस तरह नैनो परिवारों का चलन बढ़ रहा है और समाज में उपभोक्तावाद बढ़ रहा है, उससे वृद्ध और कमजोर लोगों की हिफाजत करने व उनका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से परिवार के लोग भी मुंह मोड़ रहे हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के प्रस्तावित विधेयक में इन तथ्यों का भी ध्यान रखा गया है, लेकिन दुख की बात यह है कि प्रधानमंत्री की समिति ने इन तथ्यों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। पिछली यूपीए सरकार में नरेगा को लागू करने के लिए वामपंथियों का दबाव कारगर रहा था, लिहाजा मंदी का भारत में उतना असर नहीं हुआ जैसा कि पश्चिमी देशों में देखा गया। मौजूदा यूपीए सरकार में वामपंथियों की दखल नहीं है, जिस कारण राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली सलाहकार परिषद कमजोर पड़ रही है, लेकिन इसके प्रस्तावों को ठुकराने से यह सवाल उठना लाजिमी है कि मानवता और नागरिकों के हितों को तरजीह देने वाली योजनाएं भी राजनीति और अर्थवाद की भेंट चढ़ रही हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


Tuesday, January 4, 2011

कौन होगा इस साल का सिकंदर



नए साल को हर कोई उम्मीद के साथ देखता है और सबकी तमाम ख्वाहिशें भी होती हैं। राजनीति की दुनिया भी इससे अलग नहीं है। राजनीति की दुनिया में विगत के अच्छे-बुरे हर कदमों की बुनियाद नई संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर आ खड़ी होती है। जाहिर है, 2011 भी राजनीति की दुनिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आएगा

नए साल की आहट के साथ ही मन के कोने में दुबकी एक इच्छा जोर मारने लगती है। हर शख्स की यही ख्वाहिश होती है कि नए साल में विगत की दुश्वारियों का सामना न हो। राजनीति की दुनिया की ख्वाहिशें इससे अलग नहीं होतीं, लेकिन वहां ऐसा संभव नहीं होता। राजनीति की दुनिया में विगत के अच्छे-बुरे हर कदमों की बुनियाद नई संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर आ खड़ी होती हैं। जाहिर है, 2011 भी राजनीति की दुनिया के लिए नई चुनौतियां लेकर आएगा। भावी घटनाओं का सटीक विवरण शायद भविष्यवक्ता भी न बता पाएं, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह नया साल न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी खासा अहम होगा। राहुल गांधी को जिस तरह भारतीय राजनीति में प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उससे साफ है कि अगले साल भी उनकी सक्रियता बनी रहेगी। इस साल तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल, असम और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। अगर असम को छोड़ दें तो इन विधानसभा चुनावों में भाजपा का कुछ खास दांव पर नहीं लगा है। लिहाजा, उसे इन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन का उतना दबाव नहीं होगा, जितना कांग्रेस पर होगा। चूंकि राहुल गांधी को ही कांग्रेस का भावी खेवनहार माना जा रहा है। लिहाजा, उनकी कोशिश यही होगी कि केरल में कांग्रेस की वापसी हो। केरल के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में कांग्रेस की पकड़ मजबूत हो, ताकि किसी राजा को मंत्रिमंडल में रखने की कांग्रेस की मजबूरी कम हो। जैसा कि केरल की राजनीति का अब तक का इतिहास रहा है, ऐसा माना जा रहा है कि वहां इस बार कांग्रेस की बारी है। वैसे भी वीएस अच्युतानंदन की अगुआई में वामपंथियों की सरकार का केरल में दोबारा सत्तारूढ़ होना खुद वामपंथियों को ही हजम नहीं होगा। केरल की मा‌र्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में जितनी गुटबाजी है, उससे तय है कि उनकी आपसी लड़ाई ही केरल में कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगी यानी इस बार केरल में कांग्रेस की वापसी लगभग तय मानी जा सकती है। भारतीय राजनीति कितनी विडंबनापूर्ण है कि जिस आरएसएस को गांधी के हत्यारे और सांप्रदायिक के तौर पर कांग्रेस पूरे देश में प्रचार करती रहती है, केरल में वामपंथियों के विरोध के लिए उसी आरएसस का साथ लेने से नहीं हिचकती। लेकिन जिस तरह संघ ने बीजेपी की कमान अपने हाथों में थाम रखी है, उससे संभव है कि संघ इस बार केरल में बीजेपी को तीसरे मोर्चे के तौर पर उभारने की कोशिशें जरूर तेज करेगा। पश्चिम बंगाल में तो माना ही जा रहा है कि वामपंथ का तंबू इस बार उखड़ जाएगा। निश्चित तौर पर इसका श्रेय ममता बनर्जी को ही जाएगा। ममता की जैसी राजनीतिक अदाएं रही हैं, उससे साफ है कि कांग्रेसियों को इस कामयाबी के लिए राहुल का जयगान करना आसान नहीं होगा। अब तक के माहौल के मुताबिक ममता का साथ देना कांग्रेस की मजबूरी है, लेकिन यह भी संभव है कि तृणमूल कांग्रेस को बिहार में जनता दल यूनाइटेड की तरह भारी बहुमत मिल जाए। अगर ऐसा होता है तो वे कांग्रेस का साथ छोड़ने से भी नहीं हिचकेंगी। ऐसे में कांग्रेस की राजनीतिक राह में मुश्किलें खड़ी हो सकतीं हैं। रही बात असम की तो पिछले विधानसभा चुनावों में ही अगर असम गण परिषद दो फाड़ नहीं हुआ होता तो हितेश्वर सैकिया की वापसी संभव नहीं होती, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह जयश्री गोस्वामी सारे गिले-शिकवे भूलकर पति के राजनीति पुनर्वास की तैयारियों में जुटी हुई हैं, असम गण परिषद के दूसरे धड़े के अध्यक्ष चंद्रमोहन पटवारी प्रफुल्ल कुमार महंत के साथ गलबहियां डाले घूम रहे हैं, उससे असम में कांग्रेस की दुश्वारियां बढ़नी तय है। हालांकि प्रवासी बंगाली वोटरों में भाजपा की पकड़ बनी हुई है। लिहाजा, उसने हार नहीं मानी है और 1999 की तरह एक बार फिर असम गण परिषद को अपने साथ लाने की कोशिशों में जुटी हुई है। विधानसभा चुनावों को ही ध्यान में रखते हुए पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक अगले महीने गुवाहाटी में करने जा रही है यानी अगले साल असम में नए तरह के राजनीतिक समीकरण देखने को मिलें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। इन राज्यों की जीत-हार का हिंदी हृदय प्रदेशों में भले ही ज्यादा असर न पड़े, लेकिन यह तय है कि अगर वामपंथी अपने गढ़ वाले दोनों राज्यों में सत्ता की दुनिया से दूर हुए तो उनका राजनीतिक दिमाग कांग्रेस को परेशान करने से नहीं चूकेगा। कांग्रेस विरोध की लहर पैदा करने में जितनी महारत वामपंथियों को हासिल है, उतना भाजपा का भी नहीं है। यह बात दीगर है कि सांप्रदायिकता के नाम पर वामपंथियों की भाजपा से राजनीतिक दूरी बनी रहेगी। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह संसद और उसके बाहर वामपंथियों ने महंगाई और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मसले पर भाजपा के साथ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के खिलाफ मोर्चा खोला है, उससे उम्मीद बनती है कि दोनों एक बार फिर 1989 की तरह कांग्रेस के खिलाफ अभियान में शामिल न हो जाएं। 1989 में भाजपा और वामपंथियों को साथ लाने का मोहरा विश्वनाथ प्रताप सिंह बने थे, इस बार नीतीश कुमार और शरद यादव बन सकते हैं। राजनीति जितनी संभावनाओं का खेल है, आशंकाओं का मेल भी है। लिहाजा, आज जिन्हें लग रहा है कि अब लालू प्रसाद यादव खत्म हो गए और नीतीश कुमार के साथ वे कभी नहीं जा सकते, वही लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान भी वामपंथियों के साथ कांग्रेस विरोधी अभियान में शामिल हो सकते हैं। वामपंथी मुखौटे के साथ सांप्रदायिकता विरोधी छवि बनाए रखते हुए सत्ता विरोधी अभियान में शामिल होना उनकी राजनीतिक मजबूरी होगी। इसके आसार कांग्रेस के सवा सौ साल पूरे होने पर आई किताब के तथ्यों को लेकर आई प्रतिक्रियाओं में भी देखा जा सकता है। कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन नामक किताब में पार्टी ने जयप्रकाश नारायण को अधिनायकवादी और लोकतंत्र विरोधी करार दिया है। जेपी को लेकर की गई ऐसी प्रतिक्रिया पर बिफरे लालू यादव और शरद यादव की भाषा एक जैसी रही। दोनों का कहना था कि कांग्रेस को अपने गुनाहों की कीमत चुकानी होगी। इस बयान को ही सूत्र वाक्य मानें तो एक हद तक 2011 के राजनीतिक परिदृश्य का खुलासा हो सकता है। अगर गैर कांग्रेसवाद के पुराने अलंबरदार एक बार फिर एक हो गए तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ जाएंगी, लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक संकट यह है कि इस पूरे अभियान में जिस पार्टी को अगुआई करनी चाहिए, उस भाजपा में आपसी समन्वय और एकता नजर नहीं आ रही। कांग्रेस की कमी यह है कि वह दूसरी लाइन के लिए भ्रष्ट और अक्षम लोगों पर ज्यादा भरोसा करती है। दोनों पार्टियों में यह संकट हर साल की तरह 2011 में ही नजर आएगा। यह सच है कि उत्तर प्रदेश में 2011 में चुनाव नहीं होने जा रहा है, लेकिन इसके ठीक अगले साल यानी 2012 की शुरुआत में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। बहुजन समाज पार्टी में मायावती के लिए कोई चुनौती तो नहीं होगी, लेकिन उन्हें बाहरी चुनौतियां मिलती रहेंगी। पंचायत चुनावों में जिस तरह कुछ जिलों में बीएसपी विरोधी तमाम ताकतें साथ नजर आई हैं, उसे लिटमस टेस्ट माना जा सकता है। यानी मायावती को हराने के लिए बाकी दलों में अंदरखाने में एक हद तक एकता होने की संभावना नजर आ रही है। इसी तरह हरियाणा में कांग्रेस को फिलहाल कोई चुनौती नजर नहीं आ रही, लेकिन 2010 के आखिरी महीने में हरियाणा जनहित कांग्रेस नेता कुलदीप विश्नोई ने जिस तरह हुंकार भरी है, उससे उनकी राजनीतिक वकत बढ़ी है। इस पर भाजपा की निगाह है। हरियाणा जनहित कांग्रेस अपने विधायकों का भूपिंदर सिंह हुड्डा द्वारा ले उड़ना पचा नहीं पाई है। लिहाजा, आने वाले वक्त में भाजपा और हरियाणा जनहित कांग्रेस में नजदीकी बढ़ सकती है। पंजाब में बादल सरकार भी भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही है। प्रकाश सिंह बादल को घर से लेकर अमरिंदर सिंह से चुनौती मिल रही है। जिनसे उन्हें पूरे साल जूझना पड़ेगा। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान अब तक उमा भारती को भाजपा से दूर रखने में कामयाब रहे हैं। केंद्र में सुषमा स्वराज उनकी सरपरस्त बनी हुई हैं, लेकिन एक बार उमा अगर पार्टी में शामिल हो गई तो सबसे ज्यादा चुनौती शिवराज की ही बढ़ेगी। यह ठीक है कि दक्षिण में कमल खिलाने वाले येदयुरप्पा अपनी गद्दी बचाने में कामयाब रहे, लेकिन उन पर आरोपों की फेहरिस्त अभी कम नहीं हुई है। उन्हें पूरे साल विपक्ष से कहीं ज्यादा अपनी ही पार्टी की चुनौतियों से जूझना पड़ेगा। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की भूख हड़ताल भले ही कामयाब रही हो, लेकिन वहां कांग्रेस के लिए असल खतरा जगनमोहन रेड्डी ही होंगे। अभी उन्होंने अपनी अलग पार्टी तो नहीं बनाई है, लेकिन यह तय है कि यदि एक बार उन्होंने पार्टी बनाई तो उनकी तरफ कांग्रेसी विधायकों का जाना शुरू हो जाएगा और निश्चित तौर पर यह मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार को जितना खतरा शिवसेना और भाजपा से नहीं है, उससे कहीं ज्यादा दोनों पार्टियों के आपसी अंतर्विरोधों से खतरा है। घोटाले दर घोटाले की खबरों से कांग्रेस पार्टी को दो-चार होना पड़ रहा है। इन घोटालों को उजागर करने में निश्चित तौर पर मीडिया की भूमिका है, लेकिन इन्हें हवा कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अंदर सत्ता संतुलन साध रहे लोग ही दे रहे हैं। चूंकि ऐसे लोगों के बीच आपसी राजनीतिक तालमेल बनता नहीं दिख रहा है, लिहाजा अगले साल तय है कि पृथ्वीराज चव्हाण की मुश्किलें बनी रहेंगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)