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Friday, September 30, 2011

राज्यपाल की मर्यादा का उल्लंघन


राज्यपाल का पद एक बार फिर विवादों में है। इस बार गुजरात की राज्यपाल की नीयत पर उंगली उठाई जा रही है। घटना की पृष्ठभूमि में गुजरात के लोकायुक्त की नियुक्ति में किया जाने वाला मनमानापन है। गत माह राज्यपाल ने अवकाश प्राप्त न्यायाधीश आरए मेहता को गुजरात का लोकायुक्त नियुक्त कर दिया। इस मामले में उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री या मंत्रिमंडल से कोई सलाह नहीं ली। राज्यपाल का तर्क है कि उन्होंने गुजरात लोकायुक्त अधिनियम 1986 के अनुसार काम किया है। उनका कहना है कि गुजरात लोकायुक्त अधिनयम की धारा-3(1) में लोकायुक्त की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा किए जाने की व्यवस्था है और यह भी कि ऐसा करते समय गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा विधानसभा के विपक्ष के नेता से परामर्श किए जाने की बाध्यता है। उसमें मुख्यमंत्री का नाम नहीं लिखा हुआ है इसलिए मुख्यमंत्री से परामर्श करना उनके लिए जरूरी नहीं था। ऐसे में प्रश्न उठता है कि भारतीय संविधान के अंतर्गत क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श के बिना इस तरह की नियुक्तियां कर सकता है? यदि हां, तो यह विवेकाधिकार किस सीमा तक है? यही सवाल मोदी से उपवास का हिसाब मांगने पर भी उठता है। संविधान सभा में आशंका व्यक्त की गई थी कि केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकार होने पर केंद्र राज्यपालों के माध्यम से राज्य के कामकाज में दखलंदाजी कर सकता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 30 दिसंबर, 1948 को संविधान सभा में कहा था कि राष्ट्रपति की तरह ही राज्यों में राज्यपाल केवल संवैधानिक तथा प्रतीकात्मक प्रधान होगा। संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्राध्यक्ष के पास सीमित विशेषाधिकार ऐसे होते हैं जिनका इस्तेमाल वे अपने विवेक के अनुसार कर सकते हैं। उनका मानना था कि राज्यपालों की स्थिति और उनके विवेकाधिकार वही होंगे जो राष्ट्रपति के हैं और राज्यपाल को राज्य मंत्रिमंडल के परामर्श से ही काम करना होगा। राज्यपाल और राज्य मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद-163 में की गई है। उसमें तीन महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। पहला यह कि राज्यपाल की सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी और कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें उसे अपने विवेक के अनुसार काम करने का अधिकार होगा। दूसरा यह कि उन मामलों को तय करने का अधिकार राज्यपाल के पास होगा कि कहां पर उसे मंत्रिपरिषद की सलाह माननी है और कब अपने विवेक के अनुसार काम करना है। तीसरा प्रावधान यह कि मंत्रियों द्वारा राज्यपाल को दी गई सलाह के संबंध में जांच करने का अधिकार न्यायालय को नहीं होगा। गुजरात की राज्यपाल अनुच्छेद-163 का अर्थ अपने तरीके से निकाल रही हैं जो संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुकूल नहीं है। गुजरात की राज्यपाल ऐसी अकेली शख्यिसत नहीं हैं जिन्होंने अनुच्छेद-163 का अपने मन मुताबिक अर्थ निकाला हो। राज्यपालों ने राज्य शासन के साथ सैकड़ों बार खिलवाड़ किया है। एक बार तो नौबत ऐसी आ गई थी कि केंद्र सरकार के इशारे पर राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रकरणों की बाढ़ आ गई थी। इसकी शुरुआत 1952 में ही हो गई थी, जब तत्कालीन मद्रास राज्य के राज्यपाल श्रीप्रकाश ने स्पष्ट बहुमत नहीं होने के बावजूद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। सन 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व वाली सरकार को गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया। शुरू में अदालतें इस तरह के दुरुपयोगों में हस्तक्षेप करने से बचती रहीं किंतु जब पानी नाक से ऊपर पहुंच गया तो न्यायालय को दखलंदाजी करनी पड़ी। कम से कम चार मामले ऐसे आए जिनमें न्यायालय ने राज्यपाल के आचरण पर गंभीर टिप्पणी की। सन 1998 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रमेश भंडारी ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करके दूसरे मंत्रिमंडल को शपथ दिला दी। जगदंबिका पाल बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट को निर्देश देना पड़ा कि विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के समर्थकों की संख्या का पता लगाया जाए। सन 2005 में झारखंड के तत्कालीन राज्यपाल ने संविधान की अपेक्षाओं के प्रतिकूल आचरण किया और राज्य सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की। अनिल कुमार झा बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा के अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वह सदन में शक्ति परीक्षण कराएं। सदन में मतदान से यह साबित हो गया कि राज्यपाल गलत थे। एसआर बोम्बई बनाम भारत संघ (सन 1994) मामले में राज्यपाल के अधिकार और उसकी मर्यादा से जुड़े विषयों पर व्यापक दिशानिर्देश किए गए। मंशा यह थी राज्यपाल अपने को तानाशाह न समझे बल्कि संविधानिक मर्यादा के अनुरूप आचरण करे। इसके बाद रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि कोई राज्यपाल बहुमत के दावे को इस आधार पर नकार नहीं सकता कि उसकी व्यक्तिगत राय या अनुमान के मुताबिक बहुमत हासिल करने के लिए अनैतिक या गैरकानूनी साधनों का इस्तेमाल किया गया। गुजरात के मामले में एक बार फिर इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है। (लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ हैं)