यह गुजरात सरकार ही बता सकती है कि उसने गोधरा की घटना के बाद भड़के दंगों के रिकार्ड सुरक्षित रखे हैं या नहीं, लेकिन यह सब जानते हैं कि जब उन्हें नष्ट किए जाने की खबर आई तो कांग्रेस ने भाजपा पर हल्ला बोल दिया। इससे भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने उसे 1984 के सिख दंगों की याद दिला दी। ऐसा हमेशा होता है। कांग्रेस जब भी गुजरात के दंगों की चर्चा करती है उसे भाजपा की ओर से यही सुनने को मिलता है कि वह 1984 में भड़के सिख विरोधी दंगों के दौरान अपनी भूमिका याद करे। हालांकि ये दोनों घटनाएं इन दोनों राष्ट्रीय दलों को शर्मिदा करने और यह याद दिलाने वाली हैं कि कैसे 1984 में केंद्र की कांग्रेस सरकार और 2000 में गुजरात की भाजपा सरकार ने अपने राजधर्म का पालन नहीं किया, लेकिन वे दोनों घटनाओं की चर्चा कर खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ जिम्मेदार होने का दम भरती रहती हैं। यह ऐसा इकलौता उदाहरण नहीं है। भाजपा जब भी ए राजा, सुरेश कलमाड़ी और अशोक चव्हाण का जिक्र करके कांग्रेस को घेरती है, वह उसे येद्दयुरप्पा की याद दिलाती है और कभी-कभी तो उन बेचारे बंगारू लक्ष्मण की भी, जिन्होंने सिर्फ एक लाख रुपये लेने का लालच किया था और इस चक्कर में कैमरे में कैद हो गए थे। ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी, अशोक चव्हाण, येद्दयुरप्पा और बंगारू लक्ष्मण भारतीय राजनीति में खलनायक सरीखे बन चुके हैं, लेकिन कांग्रेस-भाजपा एक-दूसरे को मात देने के लिए इन्हीं नेताओं की याद करती हैं। ये दो उदाहरण अपवाद मात्र नहीं हैं। सच तो यह है कि ये दोनों राष्ट्रीय दल इसी तरह एक-दूसरे की खामियों-कमजोरियों अथवा जाने-अनजाने में किए गए गलत कार्याें से ऊर्जा प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में ये दोनों दल गडे़ मुर्दे उखाड़ने में भी संकोच नहीं करते। कश्मीर समस्या की चर्चा छिड़ने पर भाजपा नेहरू की भूलों को याद करने के लिए 1947-48 में चली जाती है तो कांग्रेस भी भाजपा को घेरने के लिए दशकों पुरानी घटनाओं का उल्लेख करने के लिए तैयार रहती है। वह देश को बताती है कि किस तरह भाजपा नेताओं ने देश की आजादी के संघर्ष में योगदान नहीं दिया और महात्मा गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे किस तरह कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था। क्या इससे बड़ी और कोई त्रासदी हो सकती है कि हमारे राष्ट्रीय दल अपने बचाव में एक-दूजे के गलत कार्यो को ढाल बनाएं? अभी हाल में जब पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़े और भाजपा नेताओं ने कांग्रेस को घेरा तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह आंकड़ा लेकर सामने आ गए कि राजग शासन के समय किस तरह कितनी बार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए गए थे? जब तमाम कांग्रेसी नेता रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के समर्थकों को खदेड़े जाने को सही करार देने की कोशिश कर रहे थे तब उनमें से कुछ इस कार्रवाई को जायज बताने के लिए न जाने कब दिल्ली में हुए वकीलों पर लाठीचार्ज की याद कर रहे थे। स्पष्ट है कि एक प्रकृति की अथवा समान प्रभाव वाली घटनाओं को ही ढाल बनाना जरूरी नहीं और इसे बंगारू लक्ष्मण द्वारा ली गई एक लाख रुपये की घूस और सुरेश कलमाड़ी के सैकड़ों करोड़ रुपये और ए. राजा के हजारों करोड़ रुपये के गोलमाल से समझा जा सकता है। सुरेश कलमाड़ी और ए. राजा ने जो कुछ किया उसके सामने बंगारू लक्ष्मण का काम तो चवन्नी की चोरी जैसा था। नेपाल से अपहृत कर कंधार ले जाए गए भारतीय विमान के बंधकों को बचाने के लिए आतंकियों को रिहा करने और संसद हमले में दोषी करार दिए गए आतंकी अफजल को फांसी न देने के लिए हर संभव जतन करने में कहीं कोई साम्य नहीं है, लेकिन भाजपा कांग्रेस पर जब-जब यह तोहमत मढ़ती है कि वह आतंकवाद से निपटने में नरमी दिखा रही है तब-तब कांग्रेसी उन चार आतंकियों को उसके समक्ष खड़ा कर देते हैं जिन्हें बंधकों के बदले छोड़ना पड़ा था। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे की कमजोरियों को उजागर करते समय केवल कुतर्क ही नहीं कर रही होतीं, बल्कि खुद को श्रेष्ठ भी बता रही होती हैं। इसके अतिरिक्त वे यह छूट हासिल करने की कोशिश भी कर रही होती हैं कि तुम्हारे गलत काम के आधार पर हमें भी गलत काम करने का अधिकार प्राप्त है। यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई महिला सिर्फ इसलिए अपने पति को पीटने लगे, क्योंकि उसकी पड़ोसन भी ऐसा करती है। इन दोनों दलों ने कई ऐसे काम किए हैं जो गलत थे, लेकिन अतीत में उपलब्ध उदाहरण उनकी आड़ बने। सत्ता में रहते समय अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में दोनों दलों का दामन एक जैसा ही दागदार है, लेकिन दोनों ऐसा प्रकट करते हैं जैसे उनके सरीखा नेक और नैतिकतावादी दल और कोई नहीं। नि:संदेह कांग्रेस और भाजपा एक जैसी नहीं हैं, लेकिन एक-दूसरे के गलत कामों को अपने लिए नजीर के रूप में इस्तेमाल करने में उनका कोई सानी नहीं। क्या इसमें कोई संदेह है कि तालाब रूपी भारतीय राजनीति को अब दो मछलियां गंदा कर रही हैं? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं).
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Tuesday, July 5, 2011
Wednesday, May 25, 2011
नाकामी-बदनामी के दो बरस
लेखक भ्रष्टाचार और कुशासन के कारण संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे होने के जश्न को निरर्थक मान रहे हैं...
यदि 22 मई को संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे नहीं हो रहे होते तो उसके पास जश्न मनाने के बहाने आम जनता से कुछ भी कहने के लिए नहीं होता। चूंकि सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हो रहे थे इसलिए जश्न मनाने की औपचारिकता पूरी करनी ही थी। यह जिस तरह पूरी की गई उससे स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि जश्न मनाने का काम मजबूरी में किया गया। आखिर इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि कोई सरकार अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे करे और इस मौके पर उसके नेता केवल डिनर करें। इस अवसर पर सरकार की ओर से 74 पेज की अपनी कथित उपलब्धियों की जो रपट जारी की गई उस पर यदि किसी ने गौर नहीं किया तो उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। वैसे भी अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत ढांचे, कृषि आदि के क्षेत्र में जो उपलब्धियां गिनाई गईं उनमें छिपी नाकामियां साफ नजर आती हैं। अपनी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री के इस कथन से कोई उत्साहित होने वाला नहीं है कि कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन सरकार उन्हें ठीक करने के लिए प्रतिबद्ध है और हताश होने का कोई सवाल नहीं उठता। यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री हताश नहीं हैं, लेकिन आम जनता की मनोदशा उनसे सर्वथा भिन्न है और इससे उन्हें न सही सोनिया गांधी को अवश्य अवगत होना चाहिए। संप्रग सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित समारोह में सोनिया गांधी की ओर से भी यह कहा गया कि हम भ्रष्टाचार से लड़ेंगे और इस संदर्भ में जो कह रहे हैं वह करके दिखाएंगे। अब ऐसे वक्तव्य इसलिए दिलासा नहीं दे सकते, क्योंकि कांग्रेस के बुराड़ी महाअधिवेशन में ऐसी ही बातें की गई थीं और फिर भी भ्रष्टाचार से न लड़ने के संकेत दिए जाते रहे। काले धन के मामले में प्रवर्तन निदेशालय अथवा आयकर विभाग जब-जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है, तब-तब वह उसकी फटकार सुनकर बाहर आता है। काले धन के कुख्यात कारोबारी और सबसे बड़े कर चोर माने जाने वाले हसन अली के खिलाफ हो रही जांच यही बताती है कि कैसे किसी मामले की सही तरह से जांच नहीं की जानी चाहिए। संप्रग सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के चाहे जैसे दावे क्यों न करे, उसकी कार्यप्रणाली और भाव-भंगिमा यही बताती है कि या तो उसमें ऐसा करने की इच्छाशक्ति नहीं या फिर यह काम उसके वश में नहीं। भ्रष्टाचार विरोधी सोनिया गांधी के पांच सूत्रों पर विचार करने के लिए गठित मंत्री समूह अभी विचार-विमर्श करने में ही मशगूल है। प्रधानमंत्री का ताजा बयान यह भी बता रहा है कि सरकार अभी तक यह नहीं तय कर सकी है कि मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के विशेषाधिकार खत्म किए जाएं या नहीं? संप्रग सरकार के नीति-नियंताओं को यह अहसास होना चाहिए कि सरकार के साथ-साथ खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लग चुकी है और इसके लिए वही जिम्मेदार हैं, क्योंकि जब सुरेश कलमाड़ी मनमानी कर रहे थे तब उन्हें लिखित और मौखिक रूप से चेताया गया था। ऐसा ही काम ए.राजा की मनमानी के मामले में भी किया गया था, लेकिन उन्होंने उन्हें क्लीनचिट देने का काम किया। वह दागी पीजे थॉमस को भी तब तक क्लीनचिट देते रहे जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें सीवीसी की कुर्सी से जबरन उतार नहीं दिया। एंट्रिक्स-देवास घोटाला तो खुद प्रधानमंत्री कार्यालय की ही गफलत की देन था। सरकार में बैठे लोग यह स्वीकार नहीं करेंगे, लेकिन वास्तविकता यही है कि भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ प्रधानमंत्री की अकर्मण्यता और निष्कि्रयता ने देश में हजारों कलमाड़ी और राजा पैदा कर दिए हैं। यदि प्रधानमंत्री अपने ही कार्यालय पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं तो फिर पूरी सरकार को कैसे नियंत्रित करेंगे? इस पर आश्चर्य नहीं कि अपने दूसरे कार्यकाल में वह अपने मंत्रियों पर और मंत्री अपने अमले पर लगाम लगाने में समर्थ नहीं दिख रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण है पाकिस्तान को सौंपी गई भगोड़ों की सूची। गृहमंत्री पी. चिदंबरम की मानें तो इस सूची में गफलत के लिए सीबीआइ जिम्मेदार है। उन्होंने इस सूची के लिए अपनी आलोचना के जवाब में यह भी स्पष्ट किया कि सीबीआइ उनके तहत काम नहीं करती। यह शीर्ष एजेंसी प्रधानमंत्री के तहत काम करती है और उसके कुछ अधिकारियों ने तब शेखचिल्लियों को भी मात दे दी जब वे मियाद खत्म हो चुके वारंट को लेकर एक भगोड़े के प्रर्त्यपण के लिए डेनमार्क पहुंच गए। ऐसा तभी होता है जब शासन के शीर्ष पर बैठे लोग शासन करने की इच्छा खो देते हैं। ऐसे ही लोग जब मजबूरी में अपनी कथित कामयाबी का जश्न मनाते हैं तो यह कहते हैं कि हताश होने की जरूरत नहीं है, लेकिन जनता की मजबूरी यह है कि वह यह देख रही है कि अभी तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जो भी कार्रवाई हुई है वह या तो न्यायपालिका या फिर विपक्ष के दबाव में ही हुई है। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
Tuesday, April 19, 2011
नेक नेताओं, तुम कहां हो!
हमारे देश का राजनीतिक नेतृत्व कितना शिष्ट, नेक, ईमानदार और समाज एवं राष्ट्र के हितों की चिंता करने वाला है, इसका एक अनुमान अन्ना हजारे और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत लोकपाल बनाने की उनकी पहल के खिलाफ हर स्तर पर हो रहे दुष्प्रचार से लगाया जा सकता है। शर्मनाक यह है कि इस दुष्प्रचार में कथित बुद्धिजीवियों का एक तबका भी शामिल है। इससे भी शर्मनाक यह है कि मीडिया का एक हिस्सा भी इस दुष्प्रचार को हवा दे रहा है। कई राजनेताओं को इस पर आपत्ति है कि अन्ना हजारे सभी नेताओं को भ्रष्ट साबित कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने इतना ही कहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मौन रहने वाले नेता समाज के लिए उपयोगी नहीं, लेकिन उनसे चिढे़ हुए नेता इसकी व्याख्या इस रूप में कर रहे हैं कि उनके हिसाब से देश में नेक एवं ईमानदार नेताओं का अभाव है। नि:संदेह सभी नेता भ्रष्ट नहीं हैं, लेकिन जिस तरह खोटे सिक्के अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं उसी तरह भ्रष्ट नेताओं ने भी नेक एवं ईमानदार नेताओं को निष्प्रभावी बना दिया है। यदि विभिन्न दलों के ईमानदार नेता सक्षम और सजग हैं तो कृपा कर वे यह बताएं कि लोकपाल विधेयक 43 साल से क्यों अटका है? 1967 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने लोकपाल विधेयक की सिफारिश की थी, लेकिन किसी भी दल-यहां तक कि शुचिता और ईमानदारी का उपदेश देने वाली भाजपा की सरकार भी उस पर अमल नहीं कर सकी। यदि नेक नेताओं को अपनी छवि और साथ ही देश की तनिक भी परवाह है तो कृपा कर देश को बताएं कि वे द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट लागू करने की मांग करने में संकोच क्यों कर रहे हैं? क्या यह लज्जाजनक नहीं कि मनमोहन सरकार कई वर्षो से द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रपट पर कुंडली मारे बैठी है और फिर भी पक्ष-विपक्ष के ईमानदार नेताओं की बोलती बंद है? निर्वाचन आयोग पिछले कई वर्षो से चुनाव सुधार के लिए सक्रिय है, लेकिन राजनीतिक दलों की अडं़गेबाजी के कारण उसकी सक्रियता के सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पा रहे। आखिर विभिन्न दलों के नेक एवं ईमानदार नेता अपने-अपने दलों पर इसके लिए कोई दबाव क्यों नहीं बना पा रहे कि वे चुनाव सुधारों की दिशा में आगे बढ़ें ताकि काले धन की राजनीति और राजनीति के अपराधीकरण से छुटकारा मिले? क्या कारण है कि ईमानदार नेताओं के होते हुए भी राजनीतिक दल अपने आय-व्यय के खातों का विवरण देने के लिए तैयार नहीं? आखिर देश की जनता इस नतीजे पर क्यों न पहुंचे कि जिस तरह मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार और भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ नितांत निष्प्रभावी और निष्कि्रय हैं वैसी ही स्थिति शेष नेक एवं ईमानदार नेताओं की भी है? अन्ना हजारे के आंदोलन के समक्ष नतमस्तक होने के बाद कांग्रेस और केंद्रीय सत्ता यह प्रचारित करने में लगी हुई है कि जो अन्ना चाहते हैं वही हम भी चाहते हैं। यदि वास्तव में ऐसा है तो कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कुतर्को की पोटली खोलकर क्यों बैठ गए हैं? कभी वे यह कहते हैं कि अन्ना के सहयोगी भाजपा के करीबी हैं और कभी यह कि क्या हम लोग अनसिविल सोसायटी के सदस्य हैं? उन्हें इस पर भी एतराज है कि अन्ना के अनशन स्थल जंतर-मंतर पर भारत माता की तस्वीर क्यों लगी थी? क्या वहां पर अमेरिका या ईरान की तस्वीर लगाई जानी चाहिए थी? यदि यह मान भी लिया जाए कि अन्ना के सहयोगी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीबी हैं तो क्या यह कोई गुनाह है? क्या ये संगठन उल्फा अथवा हिजबुल मुजाहिदीन से भी खतरनाक हैं? अन्ना के सहयोगी शांतिभूषण को बदनाम करने के लिए लाई गई फर्जी सीडी और दिग्विजय सिंह के बयानों में अंतर करना मुश्किल है। दोनों के पीछे एक ही उद्देश्य है-अन्ना हजारे और उनके साथियों पर कीचड़ उछालना। यदि कांग्रेस वही चाहती है जो अन्ना चाह रहे हैं तो फिर दिग्विजय सिंह बेलगाम क्यों हैं? यदि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत अपने सुविचार सामने रख रहे हैं तो ऐसी ही स्वतंत्रता तब क्यों नहीं देखने को मिली जब क्वात्रोची के खातों पर लगी रोक हटाई गई थी अथवा ए. राजा को क्लीन चिट दी जा रही थी या फिर सीवीसी बनाए गए पीजे थॉमस को चरित्र प्रमाण पत्र दिया जा रहा था? मनमोहन सरकार स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से न कराने पर महीनों तक अड़ी रही और सब जानते हैं कि इस दौरान सत्तापक्ष के नेक-ईमानदार नेता मौन बने रहे। देश यह चाह रहा है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा के खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन भाजपा के नेक-ईमानदार नेता या तो मौन हैं या फिर यह तर्क दे रहे हैं कि अभी उनके खिलाफ कार्रवाई की जरूरत नहीं। दरअसल चाहे सत्तापक्ष के ईमानदार नेता हों या विपक्ष के, वे उस समय दलीय हित या पार्टी अनुशासन की आड़ में छिपना पसंद करते हैं जब उन्हें मुखर और सक्रिय होना चाहिए। अन्ना और उनके साथियों पर कीचड़ उछालने का काम जिस सुनियोजित तरीके से हो रहा है उससे साफ है कि भ्रष्ट एवं दुष्ट ताकतें एक हो गई हैं। बावजूद इसके हमारे नेक एवं ईमानदार नेता मौन है? वे कृपा कर यह बताएं कि उनके होने का लाभ क्या है? (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं).
Friday, January 21, 2011
अंधेरे में उम्मीद की किरणें
लेखक केंद्रीय सत्ता के बजाय कुछ राज्य सरकारों को देश की दिशा बदलने वाले फैसले करते देख रहे हैं.....
मनमोहन सरकार अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए जिन कुछ उपायों पर विचार कर रही है उनमें मंत्रिमंडल में फेरबदल भी शामिल हैं। इसके अलावा उसकी ओर से लोकपाल विधेयक पेश करने और चुनाव सुधारों संबंधी निर्वाचन आयोग के एक प्रस्ताव पर विचार करने के संकेत भी दिए गए हैं। इससे यह तो संकेत मिलता है कि वह अपने दाग धोने की कोशिश में है, लेकिन यह भरोसा नहीं होता कि वह अपनी कोशिशों को लेकर ईमानदार भी है, क्योंकि उसकी ओर से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने अथवा भ्रष्ट तत्वों को दंडित करने के लिए कोई फौरी कदम नहीं उठाया गया है। यह लगभग तय है कि संसद का बजट सत्र करीब आने के साथ ही 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला एक बार फिर उसके सामने होगा। विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति की अपनी मांग छोड़ने वाला नहीं है। केंद्र सरकार ने इस मांग से बचने के लिए यह एक नया शिगूफा छोड़ा है कि स्पेक्ट्रम आवंटन कोई राजस्व हानि नहीं हुई और इस बारे में नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक का आकलन हवा-हवाई है। केंद्र सरकार चाहे जैसे कुतर्क क्यों न दे, स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाला एक ऐसी सच्चाई है, जिसे अब दबाया नहीं जा सकता। ऐसा लगता है कि कांग्रेस यह समझने के लिए तैयार नहीं कि उसकी ओर से स्पेक्ट्रम घोटाले पर पर्दा डालने की जितनी कोशिश की जा रही है, आम जनता की यह धारणा उतनी ही मजबूत होती जा रही है कि शायद घोटाले का पैसा उसके लोगों ने भी खाया है। आम जनता में यह धारणा भी घर कर रही है कि यह सरकार महंगाई पर लगाम लगाने में नाकाम है। ऐसी धारणाओं के चलते कांग्रेस और मनमोहन सरकार आम जनता की नजर से उतरती जा रही हैं। अपने दूसरे कार्यकाल में मनमोहन सरकार की इसलिए अधिक दुर्गति हो गई है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री की छवि तार-तार हो गई है। इस वर्ष पांच राज्यों-असम, तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल और प. बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में विपरीत प्रदर्शन केंद्र में कांगे्रस के पतन का सिलसिला कायम कर सकता है। यदि ऐसा न भी हो तो भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनेक गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारों का बेहतर प्रदर्शन केंद्र सरकार को नाकाम सिद्ध कर रहा है। बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों में जनहित के जैसे काम हो रहे हैं उससे स्पष्ट है कि इन राज्यों में कांग्रेस की वापसी आसान नहीं होगी। अब तो ऐसे हालात उत्तर प्रदेश में भी नजर आने लगे हैं। मायावती सरकार विधानसभा चुनाव निकट आते देखकर जिस तरह प्रशासन को कसने और छवि निर्माण के अभियान में जुट गई है उससे सपा, भाजपा समेत कांग्रेस की वापसी का सपना धूमिल पड़ सकता है। यदि 2012 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर सकी तो इसका असर 2014 के आम चुनाव पर भी पड़ेगा-इसलिए और भी कि तब राहुल गांधी करिश्माई नेता की छवि से हीन हो चुके होंगे। जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जनहित तो छोडि़ए, अपनी छवि के हित वाले फैसले भी नहीं ले पा रही है तब यह देखना सुखद है कि मध्य प्रदेश, बिहार देश को सुशासन और बुनियादी बदलाव की राह दिखा रहे हैं। मध्य प्रदेश ने लोक सेवा गारंटी कानून के जरिये यह साबित करने की कोशिश की है कि प्रशासन जनता की सेवा के लिए है। इस कानून के तहत प्रशासन पर प्रभावशाली तरीके से नकेल कसी गई है। इसी तरह का कानून बिहार ने भी बनाया है। जब केंद्र सरकार सूचना अधिकार में संशोधन कर उसे जटिल बनाने जा रही है तब मध्य प्रदेश और बिहार में आम जनता का सशक्त अधिकारों से लैस होना उल्लेखनीय है। आश्चर्यजनक रूप से जनहित अधिकार गारंटी अधिनियम के जरिये उत्तर प्रदेश भी मध्य प्रदेश और बिहार की कतार में आ खड़ा हुआ है। बिहार ने विधायक निधि खत्म करने का फैसला एक झटके में ले लिया। इसके विपरीत देश की सबसे मजबूत मानी जाने वाली नेता सोनिया गांधी कांग्रेसी मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को विवेकाधीन अधिकार छोड़ने की सलाह देने तक ही सीमित रह सकीं। मध्य प्रदेश सरकार ने किसानों को एक फीसदी पर कर्ज मुहैया कराने का फैसला कर यह साबित किया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो मुश्किल नजर आने वाले फैसले भी आसानी से लिए जा सकते हैं। दूसरी ओर यह जानना कठिन है कि केंद्र सरकार को द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशें लागू करने में परेशानी क्यों हो रही है? इस आयोग की सिफारिशें मंत्रियों के एक समूह के हवाले करके छुट्टी पा ली गई और कोई नहीं जानता कि यह समूह क्या कर रहा है? सच तो यह है कि ऐसे न जाने कितने समूह अस्तित्व में हैं। देश यह देख रहा है कि प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल में हर महत्वपूर्ण मुद्दे को मंत्री समूहों के हवाले करने पर कुछ ज्यादा ही जोर दे रहे हैं। यह इसलिए आश्चर्यजनक है, क्योंकि माना जा रहा था कि वह अपने दूसरे कार्यकाल में ज्यादा सशक्त होकर उभरे हैं। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)
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